Tuesday, 18 August 2026

पंचतिक्त : अस्थिसंधिरोग & त्वचारोग का सर्वोत्तम औषध: पंचतिक्त सप्तधा बलाधान टॅबलेट & पंचतिक्त क्षीरपाक शर्करा कल्प ग्रॅन्युल्स

पंचतिक्त : अस्थिसंधिरोग & त्वचारोग का सर्वोत्तम औषध: पंचतिक्त सप्तधा बलाधान टॅबलेट & पंचतिक्त क्षीरपाक शर्करा कल्प ग्रॅन्युल्स




A. घटक

पञ्चतित्तकं = वृषनिम्बामृताव्याघ्रीपटोलम्


5 तिक्त : 1वासा 2निंब 3गुडूची 4कंटकारी 5पटोल 


B. उपलब्धि

पंचतिक्त सप्तधा बलाधान टॅबलेट और पंचतिक्त क्षीरपाक शर्करा ग्रॅन्युल्स ... जी एम पी सर्टिफाईड और एफडीए महाराष्ट्र द्वारा ॲप्रूवह्ड, यह MhetreAyurveda Pharmacy द्वारा , सभी बीएएमएस आयुर्वेद प्रॅक्टिशनर वैद्यों के पेशंट के उपयोग के लिए, केवल इसी वेबसाईट पर उपलब्ध है

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उपरोक्त वेबसाईट के अलावा MhetreAyurveda फार्मसी के कोई भी औषध कही पर भी किसी भी डिस्ट्रीब्यूटर स्टॉकिस्ट या रिटेल आयुर्वेद औषध शॉप या अन्य किसी भी मेडिकल शॉप पर विक्री के लिये उपलब्ध नही है


C. उपयोगिता

निम्बामृतावृषपटोलनिदिग्धिकानां 

भागान् पृथक् दश पलान् विपचेद्धटेऽपाम्। 

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अष्टाङ्गहृदय वाताव्याधिचिकित्सित

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तत्सेवितं विधमति

1. प्रबलं समीरं सन्ध्यस्थिमज्जगतमप्यथ समीर = वातव्याधी

2. कुष्ठमीदृक्॥ सन्ध्यस्थिमज्जगतम् again ! कुष्ठ = त्वचारोग


अर्थात पंचतिक्त यह ...

1. संधि अस्थि मज्जागत वात व्याधी Musculoskeletal & Osteoarthrological तथा उसी प्रकार से, 


2. 

संधि अस्थि मज्जागत कुष्ठरोग अर्थात त्वचारोग Skin Diseases का भी उत्तम उपचार है. 

D. अन्य उपयोग

3.

साथ ही "पंचतिक्त" मेध्य 🧠 तथा चक्षुष्य 👁👁 है. 


4.

रक्तपित्त/वासा, वातरक्त/गुडूची & कास/कंटकारी का, तथा

5.

अवरोधजन्य, पृथ्वी जल प्रधान, द्रव गुण प्रधान, शैथिल्यजन्य, क्लेदजन्य विकारो में उत्तम औषध है


A. 1.

"तिक्त रस युक्त क्षीर घृत का बस्ति" यह, अस्थिक्षय की चिकित्सा है (अष्टाङ्गहृदय सूत्रस्थान अध्याय 11 & चरक सूत्रस्थान अध्याय 28)


2.

इसलिए *पंचतिक्त* (सप्तधा बलाधान टॅबलेट या क्षीरपाक शर्करा कल्प ग्रॅन्युल्स, के रूप में) यह 

अस्थि पर काम करने हेतु, 

तीनों भोजन के पूर्व = नाष्टे के पहले/ लंच के पहले/ डिनर के पहले = अपान काल में = प्राग्भक्त काल में,

क्षीर घृत के साथ देना उपयोगी होता है.


3.

क्योंकि अस्थिधरा कला & पुरीष धरा कला एकही है, जो पक्वाशय मे स्थित है 

तथा 


4.

"तिक्त रस सिद्ध क्षीर घृत" इनका "बस्ति" देने के लिए कहा है और यह बस्ति, पक्वाशय में कार्य करता है. तथा पक्वाशय का नियंत्रक अपान वात है और अपान वात का औषधि काल प्राग्भक्त अर्थात भोजन पूर्व है


5.

यद्यपि "तिक्त क्षीर घृत बस्ति" यह शास्त्र का आदेश है किंतु क्षीरपाक या सिद्ध घृत बनाने को लगनेवाला समय तथा इतने तिक्त रस का = कड़वे टेस्ट का औषधि दूध/घृत पीना, यह पेशेंट के लिए सुविधाजनक नहीं होता है! 


6. निर्माण विधी के विकल्प

इसलिए 80 ml दूध में 5 ग्राम पंचतिक्त चूर्ण मिलाकर जो क्षीरपाक बनेगा उसका, जितना एक्स्ट्रॅक्ट क्षीर में आएगा उसका बाय वॉल्यूम फार्मास्युटिकल कॅल्क्युलेशन करके, उतना ही पंचतिक्त का एक्स्ट्रॅक्ट, एक फ्लॅट स्पून शुगर में आएगा, इस प्रकार से पंचतिक्त ग्रॅन्युल्स तथा सप्तधा बलाधान टॅबलेट बनाए हैं! ✅️ ये ग्रॅन्युल्स यदि भोजन के पहले, क्षीर घृत के साथ दिए जाएं, तो वह तिक्त क्षीर पाक का चिकित्सकीय परिणाम देते हैं 


इन ग्रॅन्युल्स की मात्रा एक फ्लॅट स्पून तीनों बार भोजन से पहले ऐसे देनी हैं ... या 2 to 6 टॅबलेट्स भोजन से पहले देनी है


7. मात्रा एवं कालावधी

यदि व्याधि की तीव्रता/ क्राॅनिसिटी & रुग्ण का वय / बल यह उतने अनुकूल नहीं है या वेदना शूल pain दारूण/strong/ असह्य/ unbearable है या व्याधि का उपद्रव मूल्य nuisance अधिक है, तो ऐसी स्थिति में यही ग्रॅन्युल्स दो या तीन फ्लॅट स्पून भोजन से पहले = 3 या 6 या 9 ग्राम तक भी दे सकते हैं ...


या फिर *पंचतिक्त सप्तधा बलाधान टॅबलेट*; 2/4/6 की मात्रा मे वेदना की तीव्रता व्याधी की chronicity और पेशंट वय बल इत्यादी की की स्थिति के अनुसार देनी चाहिए



8.

अभी जिन पेशंट में डायबिटीज की समस्या🤔⁉️ हो,वहां पर भी यह ग्रॅन्युल्स "भोजन से पहले" देने के कारण शुगर कार्बोहाइड्रेट ग्लूकोज नहीं बढ़ते हैं, क्योंकि "भोजन से पहले" लेने के कारण, उसके बाद जो आहार लिया जाने वाला है, उसमें अनायास ही अपने आप ही, चार-पांच निवाले/bolus पेशेंट कम ही खाता है; क्योंकि उसके भोजन का प्रारंभ ही में दो चम्मच शर्करा/ग्रॅन्युल्स खाकर की हुई होती है


या फिर ग्रॅन्युल्स की बजाय *पंचतिक्त सप्तधा बलाधान टॅबलेट* देना उचित होता है


9. कार्यपद्धती (मोड ऑफ ॲक्शन) एक भी बस्ती दिये बिना

इस प्रकार से "पंचतिक्त ग्रॅन्युल्स का या टॅबलेट्स" का "भोजन से पहले" प्रयोग करने के कारण, यह "अपान क्षेत्र" में अर्थात प्राग्भक्त काल में , अर्थात वात का मुख्य स्थान पक्वाशय है, उस पर कार्यरत होता है... इसलिए निश्चित रूप से, मूल संदर्भ मे उल्लेखित बस्ति के समान, शीघ्र गति से, अल्पकाल में, अपेक्षित लाभदायक परिणाम प्राप्त होते हैं ... यह केवल सैद्धांतिक तात्त्विक थियोरेटिकल हाइपोथेटिकल स्टेटमेंट ना होकर... इस प्रकार से विगत 28 वर्षों की प्रैक्टिस के अनुभव का 3000+ यह निचोड़ इस विधान में समाविष्ट है!!! 

... और वह भी *"आज तक एक भी पेशंट को एक बार भी तिक्त क्षीर घृत बस्ती दिये बिना*" आज तक जितने पेशंट ठीक किये, वे सभी आज भी 22/ 24 वर्षों के पश्चात भी ठीक ही है ... वेदना मुक्त है ... अपने पांवों पर चल रहे है ... दैनंदिन सारे व्यवहार कुशलता से अनायास कर रहे है और नियमित रूप से नये नये पेशंट को रेफर कर रहे है


10. विशेष और विविध उपयोगिता

... तो L5 S1 डी जनरेशन (यह observation प्रायः सभी एलएस स्पाइन LS Spine के MRI में लिखा हुआ स्टेटमेंट होता है), 

या उसके साथ L4 L3 L2 L1 Degeneration, डिस्क बल्ज, डिस्क डेसिकेशन, लिस्थेसिस, स्पॉन्डिलाॅसिस/ स्पॉन्डिलायटिस, स्लिप डिस्क, AVN, Sacro Ilitis, ओस्टियोआर्थरायटिस, knee डिजनरेशन, ACL पीसीएल लिगामेंट टेयर, सर्वाइकल स्पॉन्डलोसिस, फ्रोजन शोल्डर, अवबाहुक, विश्वाची ऐसे अनेक वातव्याधि...


 जिसमें संधि अस्थि मज्जा Musculoskeletal OsteArthrological इनकी विकृति होती है ... 


11.

इन सभी में "पंचतिक्त ग्रॅन्युल्स" स्वयं मधुर स्निग्ध रोपण संधान होने के कारण तथा "पंचतिक्त टॅबलेट्स" *सप्तधा बलाधान विधि* से निर्मित होने के कारण आत्यंतिक वीर्यवान होने के कारण, शीघ्र गति से अल्पकाल मे अत्यंत अपेक्षित लाभदायक परिणाम देने वाली होती है 


12. कालावधी Duration 

& पेशंट का वय और विकृती की कालमर्यादा chronicity के अनुसार प्रायः 6 से 12 हप्तों में = 42 से 90 दिनों में, उपरोक्त सभी प्रकार की अस्थी संधी स्पाईन जॉईंट बोन रिलेटेड विकृतियां पूर्ण रूप से ठीक करने में सक्षम होती है!!!


13. Height Growth 

इसी कारण से "पंचतिक्त ग्रॅन्युल्स तथा पंचतिक्त टॅबलेट"; उचित तरुण वय मे प्युबर्टी के पश्चात; स्त्रियों में 18 वर्ष तक & पुरुषो मे 21 वर्ष तक, नैसर्गिक रूप मे हाईट बढाने के लिए भी उपयोगी होते है... जिनका प्रयोग 3 महिने से लेके 1 वर्ष तक निरंतर रूप से करना चाहिए! 


14. केश पतन = बालों का झडना गिरना तथा दारूणक/रूसी = डँड्रफ मे भी अस्थि और त्वचा दोनों का संबंध होने के कारण पंचतिक्त सप्तधा बलाधान टॅबलेट & पंचतिक्त क्षीरपाक कल्प ग्रॅन्युल्स इनका लाभदायक परिणाम प्राप्त होता है

इसके साथ *यष्टी लाक्षा टॅबलेट & यष्टी गुडूची ग्रॅन्युल्स* या केवल *गुडूची ग्रॅन्युल्स* इनका प्रयोग लाभदायक परिणाम अल्पकाल में देता है.


B. 1.

साथ ही अन्य एक वस्तुस्थिती, जो अधिक गंभीर है की... तिक्त रस यह "आकाश महाभूत" निर्माण करने वाला एक मात्र रस है, इसीलिए अस्थिक्षय जैसे वात वृद्धि की स्थिति में भी, तिक्त रस जैसा वातवर्धक ही रस, अस्थिक्षय की चिकित्सा में विशेष रूप से निर्देशित है, ऐसा अरुण दत्त की टीका में स्पष्ट रूप से लिखा है, तो यदि अस्थियों में खरत्व के लिए, सच्छिद्रता के लिए, तिक्त रस, जो आकाश और वायु महाभूतों से बना है, यह चिकित्सकीय परिणाम देता है, तो इसी प्रकार से, ...


जहां पर अवरोध है, स्पेशली हृदय की वाहिनींयों में, कार्डियक आर्टिरीज में, जो मुख्य तीन व्हेसल है... उनमें जब प्लेक plaque या थ्रोंबस के रूप में अवरोध होता है, तो वहां पर भी, "पंचतिक्त टॅबलेट्स सप्तधा बलाधान विधि से निर्मित या पंचतिक्त ग्रॅन्युल्स" इनका लाभदायक परिणाम होता है ! आत्ययिक गंभीर अवस्था छोडकर!!!


2. अवरोधनाशन = ब्लॉकेज क्लियरन्स

इसी प्रकार से जहां-जहां "पृथ्वी जल" प्रधान "स्थूल" गुण से "अवरोध" है, वहां-वहां "वायु आकाश" प्रधान "सूक्ष्म" गुण प्रधान "विवरण अर्थात स्रोतस् का विकसन = अवरोधनाशन = ब्लॉकेज क्लिअरिंग... इस दृष्टि से पंचतिक्त सप्तधा बलाधान टॅबलेट & पंचतिक्त ग्रॅन्युल्स यह उपयोगी होते हैं 


इसीलिए एव्हीएन AVN मे भी "पंचतिक्त टॅबलेट या ग्रॅन्युल्स" का उपयोग लाभदायक परिणाम देता है 


3. AVN में उपचार कालावधी & नॉन रिकरन्स

किंतु, इसके लिये संयम और प्रतीक्षा की आवश्यकता होती है! साधारणतः एव्हीएन AVN के GRADE ग्रेड के अनुसार 100 से 1000 दिन तक ट्रीटमेंट की आवश्यकता होती है ... किंतु, तत्पश्चात इस के जो परिणाम प्राप्त होते है और जो उपशम प्राप्त होता है, वो प्रदीर्घकालीन तथा स्थायी होता है... अपुनर्भव के रूप मे नॉन रीकरन्स के रूप मे पेशंट को इस उपचार का लाभ होता है ! एव्हीएन AVN के जो पेशंट आज से 20/22 साल पहले ट्रीट और ठीक है, वे आज भी ठीक है, वेदना मुक्त है, अपने पांव पर चलते फिरते है,  दौडते कूदते है और कुशलता से दैनंदिन सारे व्यवहार करते रहते है


4.

ऐसे 22 वर्ष पहले जो पेशंट एव्हीएन AVN के ट्रीट किये , वे आज भी बिना सर्जरी के, किसी भी अन्य समस्या या उपद्रव के, अपने पांवो पर चल फिर दौड रहे है और दैनंदिन व्यवहार व्यवहार पूर्ण क्षमता से कर पा रहे है


D. 1 पंचतिक्त & यकृत उष्णता तथा पित्त रक्त अग्नि +++

स्वयं "पंचतिक्त" में "वासा गुडूची निंब" यह द्रव्य होने के कारण, जैसे "वासागुडूच्यादि" यह "यकृत उष्णता" की स्थिति में "पित्त रक्त अग्नि उष्णता+++" की स्थिति में बहुतर उपयोगी होता है ... वैसे ही "पंचतिक्त" ऐसी अवस्था में उपयोगी होता है


2.

साथ ही "वासा गुडूची पटोल" यह द्रव्य "पंचतिक्त" में होने के कारण, जैसे "भूनिंबादि" यह अम्लपित्त शीतपित्त के "पृथ्वी जल" प्रधान "द्रव क्लेद"प्रधान व्याधि की ट्रॅक से संबंधित अनेक व्याधि तथा ॲलर्जी संबंधित व्याधियों में उपयोगी होता है... "क्लेद की कोष्ठ शाखा गति जन्य विकारों" में उपयोगी होता है ... वैसे ही "पंचतिक्त", भूनिंबादि के तुलना में अभाव में, प्रतिनिधि के रूप में, दुय्यम रूप से, गौण रूप में उपयोगी होता है 


3.

"पृथ्वी जल प्रधान, स्थूल गुण युक्त, अवरोध" को नष्ट करने के लिए, "आकाश वायु प्रधान, सूक्ष्म गुण युक्त, तिक्त रस" का उपयोग होता है ... यह मूल सिद्धांत अगर ध्यान में लिया जाए तो आगे लिखे हुए भी , सभी व्याधियों में "पंचतिक्त सप्तधा बलाधान टॅबलेट्स और पंचतिक्त ग्रॅन्युल्स" का युक्तियुक्त उपयोग लाभदायक अपेक्षित चिकित्सकीय परिणाम यशस्वी रूप से देता है


नाडीव्रण अर्बुद भगन्दर गण्डमाला

जत्रूर्ध्वसर्वगद गुल्म गुदोत्थ मेहान्। 

यक्ष्मा अरुचि श्वसन पीनस कास शोफ

हृत्पाण्डुरोग मद विद्रधि वातरक्तम्॥


possible nearby medical conditions 

Nāḍī-vraṇa — sinus/tract ulcer or wound

Arbuda — tumour / mass

Bhagandara — fistula

Gaṇḍamālā — glandular swelling of the neck or mumps 

Jatrūrdhva-sarvagada — all diseases occurring above the clavicular region i.e. head, ear, nose, throat, mouth & eye

Gulma — abdominal mass / lump

Gudottha — piles, haemorrhoids & diseases arising from the anus

Meha — urinary disorders


Yakṣmā — wasting disease / tuberculosis

Aruci — anorexia / loss of appetite

Śvasana — dyspnoea / difficulty in breathing

Pīnasa — nasal disorder / rhinitis

Kāsa — cough

Śopha — swelling / oedema


Hṛt — cardiac/heart disorder

Pāṇḍuroga — pallor / anaemia-like disorder

Mada — intoxication / state of intoxication

Vidradhi — abscess

Vātarakta — gout-like disorder / gout


E. 1.

क्षीरपाक बहुत ही प्रभाव शाली परिणामकारक औषधी कल्पना है.


2. विशेष उपयोगिता & कालावधी & सहयोगी अन्य औषध

तिक्त क्षीरपाक से कई अस्थिक्षय के पेशंट [जैसे कि एल5एस1 (L5-S1) डीजनरेशन स्लिप डिस्क डिस्क बल्ज AVN सायटिका स्पाॅण्डिलाॅसिस knee degeneration ACL osteoarthritis] में लाभ होता हुआ, सभी ने अनुभव किया होता है. यह लाभ, *बस्ति दिये बिना हि*, मात्र एक मंडल अर्थात 42 दिन अर्थात 6 सप्ताह मे ही प्राप्त होता है. यदि पंचतिक्त टॅबलेट्स/ग्रॅन्युल्स का ... केवल प्लेन गुडूची/ यष्टी गुडुची / यष्टी लाक्षा इन का टॅबलेट्स या ग्रॅन्युल्स के रूप में और क्षीर घृत के साथ, भोजन पूर्व अर्थात प्राग्भक्त अर्थात अपान काल में प्रयोग किया जाए , तो अल्पकाल मे शीघ्रगती से उत्तम लाभदायक परिणाम प्राप्त होता है.


3.

क्योंकि तिक्त क्षीर बस्ति, जो शास्त्र में देने के लिए कहा है वह पक्वाशय में ही कार्यकारी होता है ... पक्वाशय का स्वामी अपान वायु है और अपान का औषधि काल प्राग्भक्त अर्थात भोजन पूर्व है इसलिए भोजन पूर्व प्राभक्त काल में दिया हुआ "पंचतिक्त + यष्टी लाक्षा / गुडुची / यष्टी गुडूची यह औषधि योग सप्तधा बलाधान टॅबलेट्स या ग्रॅन्युल्स के रूप में" ; इस प्रकार के उत्तम परिणाम अपुनर्भव कारक चिकित्सकीय लाभ के रूप में देता है, ऐसा 3000+ पेशंट का विगत 28 वर्षों के चिकित्सा व्यवसाय का अनुभव है


4.

यष्टी गुडूची क्षीरपाक या पंचतिक्त क्षीरपाक से ऐसे शीघ्र परिणाम प्राप्त हो सकते है, ऐसा पिछले 28 वर्षों का अनुभव है और ये परिणाम no recurrence अर्थात अपुनर्भव , इस प्रकार के होते है. अर्थात् पिछले 28 सालो मे ऐसे 3000+ से ज्यादा केसेस का अनुभव है, जिन मे से कईयों की सर्जिकल ऑपरेशन टल चुके है और जो पेशंट 20/22 साल पहले ठीक हुये है, वो आज भी वैसे हि ठीक है और आज भी वे पेशंट, अन्य दूसरे नये पेशंट को निरंतर रेफर करते रहते है. 


5.

जो पेशंट बेड पर पडे हुए है , जिनका एस एल आर SLR, 10° से कम या शून्य 0° के समीप है, जिनका अपान क्षेत्र का व्यवहार (शौच और मूत्र) बेड पर हि, अन्य व्यक्तियों के सहाय्यता से चल रहा है, वे भी बयालीस (42) दिन या ज्यादा से ज्यादा चौरासी (84) दिन मे (6 to 12 weeks), अपने पांव पर चलकर, एक दो मंजिला स्टेप चढकर उतर कर आते है ... और अपने दैनंदिन सारे व्यवहार सुकरता से पूर्ववत करने लगते है. ऐसे अनेकों पेशंट के अनुभव हमारे पास कई वर्षों से आ रहे है.


6. Gynaecological Obstetrics Conditions 


इतना हि नही, अत्यंत दुष्कर अवस्था मे भी पंचतिक्त टॅबलेट या पंचतिक्त/ गुडूची /यष्टी गुडूची क्षीरपाक ग्रॅन्युल्स अत्यंत सुखकारक यशस्वी काम करता है. 


Placental insufficiency जैसी गर्भाशयांतर्गत स्थिती में भी क्षीरपाक ग्रॅन्युल्स जैसे मृदु किंतु वीर्यवान कल्पना से शीघ्र ट्रीट करके अपेक्षित अनुकूल परिणाम प्राप्त होते है, क्योंकि गर्भिणी यह मृदू औषध से ट्रीट करना आवश्यक है, ऐसे शास्त्र कहता है.


निम्नलिखित फेसबुक लिंक पर देखे , इसके बीटी एटी रिपोर्ट (BT & AT Reports) या प्लेसेंटल इन्सफिशियन्सी (Placental insufficiency) ऐसा फेसबुक सर्च करके posts में MhetreAyurved की पोस्ट देखे


https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=pfbid0iTj1xCY85Qr2xXnSoTiVywSaArPCxDB9EMiY9RLaJY66Amv2AT1JuLHzuax4272Zl&id=100002080068773&mibextid=lOuIew


7. नॉन हीलिंग और डीलेड फ्रॅक्चर्स non healing & delayed fractures 

भग्न मे भी *पंचतिक्त* टॅबलेट या ग्रॅन्युल्स... यष्टी लाक्षा टॅबलेट या लशुन ग्रॅन्युल्स या केवल गुडूची ग्रॅन्युल्स या यष्टी गुडूची ग्रॅन्युल्स के साथ बहुत परिणामदायक होता है & ये सभी "यथा अवस्था" अत्यंत लाभदायक सिद्ध होते है ... नॉन हीलिंग फ्रॅक्चर्स या स्पाईन के घुटने के हिप जॉइंट के सर्वाइकल लंबार के डी जनरेटिव्ह कंडिशन्स मे


8.

किंतु जैसे पहले कहा, ऐसे क्षीरपाक बनाते समय, उचित मात्रा मे, क्षीर का शेष रहकर, अचूक समय पर हि, अग्नि देना बंद करके, पूरा पानी उड जाये व केवल औषधी द्रव्य के एक्स्ट्रॅक्ट वाला दूध हि पूर्णतः शेष रहे, यह एक कलात्मक, टेक्निकल तथा समय व्ययकारक विधी है. 


9.

इसलिये "क्षीरपाक" इस अमृततुल्य औषधी कल्पना के लाभ तो प्राप्त हो , किंतु उसके लिए जो दुष्कर विधी है और उसमे स्टॅबिलिटी shelf life (very short expiry time), तीक्त होने के कारण पॅलेटेबिलिटी & storage facility & ट्रान्सपोर्टेबिलिटी नही है; इन दोषों को एलिमिनेट करते हुए, एक नये विचार के साथ यह "क्षीरपाक शर्करा ग्रॅन्युल्स & सप्तधा बलाधाम टॅबलेट" प्रस्तुत कर रहे है, कि जिस प्रमाण मे औषधी का एक्स्ट्रॅक्ट क्षीरपाक मे 80 दुग्ध मे आता है, उतने ही प्लेन / सामान्य दूध मे, अगर जिस द्रव्य का क्षीरपाक बनाना है, उसका शर्करा कल्प (जैसे शतावरी कल्प बनता है, वैसे) उचित मात्रा मे (ग्राम या व्हॉल्युम की यथायोग्य proportionate परिमाण मे) मिला दिया जाये, तो उतने हि द्रव्य का एक्स्ट्रॅक्ट दुग्ध मे आयेगा, इसकी व्यवस्था कर सकते है... या 250mg की 6 सप्तधा बलाधान टॅबलेट 80ml गरम पाणी या गरम दूध मे मिलाई जाये, तो उतनाही औषधी परिणाम प्राप्त हो सके


10.

यह एक फार्मास्युटिकल कॅल्क्युलेशन है, जिसमे क्षीरपाक से (1:16:16 या 1:8:32 दोनो विकल्पों से करके) कितना औषधी एक्स्ट्रॅक्ट आता है, उसी हिसाब से उसी प्रपोर्शन से, द्रव्य : पानी : शर्करा की मात्रा का उचित गणन/ संगणन / कॉम्प्युटेशन/ कॅल्क्युलेशन /गणित करके, यह निर्धारित किया गया है ; कि 80ml या 100ml (2 पल) दुग्ध मे अगर 5 ग्राम या 6.25gms (½ कर्ष) का औषधी कल्प, शर्करा कल्प granules या क्यूब के रूप मे उसे मिला दिया जाये, तो उतनी ही क्षीरपाक की प्राप्ती, औषधी वीर्य के साथ, हो जायेगी.


11.

आज इस प्रकार से 

लशुन (for bones joints spine), 

रसोन आर्द्रक(For RA, Sinusitis, Rhinitis & URTI), 

दूर्वा(For bleeding & heat), 

कूष्मांड(for chest, bladder urine, brain),

शालिपर्णी(exclusivelyfor HEART), 

गुडूची(for AVN, DVT, bones, joints, Vericose vein), 

गुडूची यष्टी(for non healing delayed fractures, intellectual health, medhya, bones, hair), 

शतावरी गोक्षुर(for hematuria urine bladder),

यष्टी सारिवा(for cancer, stress, heavy bleeding, heat), 

& पंचतिक्त इनके pharmaceutical प्रपोर्शन के साथ शर्कराकल्प granules & सप्तधा बलाधान टॅबलेट MhetreAyurveda Pharmacy ने एफडीए ॲप्रूवह्ड और जीएमपी सर्टिफाइड गुणवत्ताके औषध, सभी बीएमएस आयुर्वेदिक प्रॅक्टिशनर वैद्यों के उपयोग के लिए उपलब्ध किये है.👇🏼

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12.

ये कोई, फिर से, मेरी इन्वेंशन डिस्कवरी रिसर्च पेटंट नही है. इन शर्करा कल्पोंका तथा सभी सप्तधा बलाधान टॅबलेट्स का भी महाराष्ट्र एफडीए FDA में म्हेत्रेआयुर्वेद MhetreAyurveda द्वारा रजिस्ट्रेशन किया हुआ है. आप भी इस प्रकार से, उचित मात्रा मे, संगणन करके computation करके, लिए हुये, उचित मात्रा मे शर्करा कल्प & सप्तधा बलाधान टॅबलेट्स काका निर्माण कर सकते है. पानी मे विद्राव्य वॉटर सोल्युबल वनस्पती एक्स्ट्रॅक्ट का स्थानांतरण/ ट्रान्सफॉर्मशन या ट्रान्सपोर्टेशन "शर्करा पर" करके, उसको ग्रॅन्युलस के रूप मे , अगर तैयार किया जाये , तो वह आसानी से कोष्ण दुग्ध मे विलयन होकर, हमे शीघ्र क्षीरपाक / इन्स्टंट क्षीरपाक प्राप्त हो सकता है, जिससे की पेशंट को ये सुविधा जनक हो और वैद्य के लिए ये ट्रान्सपोर्टेबल भी हो और इसके साथ ही या सारा समय बचाने वाला तथा इकॉनोमिकल भी है और सर्वतो मुख्य अपेक्षित परिणामकारक लाभदायक भी है!


13.

अस्थिक्षयजन्य विकृतियों में, पंचतिक्त सप्तधा बलाढान टॅबलेट तथा कल्प = क्षीरपाक शर्करा ग्रॅन्युल्स, गुडूची कल्प और गुडूची यष्टी कल्प यह तीनो कल्प "तिक्तक्षीरपाक" के रूप मे, यष्टी लाक्षा* टॅबलेट के साथ उपयोगी है. 


तिक्तक्षीरपाक अस्थिक्षय मे उल्लेखित है, साथ हि अगर हम भग्न अधिकार देखेंगे, तो मधुर औषधसिद्धं *लाक्षा युतम्*, इस तरह से संदर्भ आता है. इसलिये यष्टी के साथ गुडूची को यहां पर समाविष्ट किया है, जिससे की मधुर और तिक्त दोनो रसों का क्षीरपाक यहां पर प्राप्त हो सके. 


14. पंचतिक्त + यष्टी लाक्षा  + यष्टी गुडूची इनके विशेष इंडिकेशन्स उपयोगिता

और भी अगर आगे जाना है, तो *पंचतिक्त सप्तधा बलाधान टॅबलेट्स या शर्करा कल्प = ग्रॅन्युल्स* अधिक उपयोगी होते है. मन्या कटी जानु शूल, तथा अस्थिक्षयात्मक संप्राप्ति के ए सी एल ACL, एव्हीएन, ऑस्टिओ आर्थ्राइटिस, सायटिका, एल फाईव्ह एस वन डीजनरेशन L5-S1, लंबर &/or सर्वाइकल स्पोंडीलोसिस... इन सभी मे पंचतिक्त + केवल प्लेन गुडूची + यष्टी गुडूची इन तीनों में से कोई भी एक क्षीरपाक ग्रॅन्युल्स = शर्कराकल्प; *यष्टी लाक्षा* टॅबलेट के साथ अपेक्षित परिणाम देता है. पंचतिक्त जैसे ही परिणाम लशुन ग्रॅन्युल्स से आते है , जो "भग्नसंधानकर है और प्रभंजनं जयति लशुनः" इस रूप मे वात का सर्वोत्तम औषध है


15.

पंचतिक्त का उपयोग अस्थिभग्न के साथ साथ, त्वचारोगों मे भी कार्यकारी है! यह शर्करा कल्प ग्रॅन्युल्स या सप्तधा बलाधान टॅबलेट नाम की अभिनव कल्पना अगर दुग्ध के साथ या गरम पानी के साथ दी जाये, तो किसी भी औषध को बालक के लिए लेना सुग्राह्य होगा. यह शर्करा कल्प होने के कारण, जैसे दुग्ध या पानी के साथ दे सकते है, वैसे हि इस पंचतिक्त शर्कराकल्प भेषज को चाय कॉफी के साथ तथा रोटी पर पंचतिक्त ग्रॅन्यूल्स फैला कर तथा पंचतिक्त टॅबलेट्स को पीस कर उसका चूर्ण पावडर बनाकर वह रोटी पर फैला कर, घी लगाकर रोल बनाकर भी दे सकते है. तो इसकी "*बहुकल्पना* बहुगुणता संपन्नता और योग्यता", इसके साथ साथ हि इकॉनाॅमिकली अफोर्डेबल है.


16.

त्वचारोगों के सभी प्रस्तुतीकरण= मॅनिफेस्टेशन्स में पंचतिक्त सप्तधा बलाधाम टॅबलेट या पंचतिक्त क्षीरपाक शर्करा कल्प ग्रॅन्युल्स उपयोगी होते है ...


विशेष रूप से ...


जहां, कफ पित्त प्रधान, पृथ्वी जल प्रधान, द्रव क्लेद प्रधान, स्राव कंडू दुर्गंध दाह रक्तिमा लालिमा वैवर्ण्य गौरव शोथ संवेदनहीनता सुप्ति बाधिर्य ऐसे लक्षण हो... वहा पर टॅबलेट या क्षीरपाक शर्करा कल्प ग्रॅन्युल्स का प्रयोग *उष्ण जल या मुद्गयूष* के साथ करे! 


और ...


जहां पर, रूक्ष कंडू दाह त्वचा का टूटना स्केलिंग शोथ वेदना अत्यधिक दाह रक्तस्राव ऐसे लक्षण हो ... वहा पर क्षीर घृत के साथ या तो पंचतिक्त शर्करा कल्प ग्रॅन्युल्स या पंचतिक्त सप्तधा बलाधान टॅबलेट का प्रयोग करना लाभदायक परिणाम देता है


17. मात्रा, अनुपान & कालावधी त्वचारोग के लिए

विशेषतः पंचतिक्त टॅबलेट जो सप्तधा बलाधान विधी से बनाई जाती है, जिसमे 7 गुना सामर्थ्य है, यह कुष्ठरोग अर्थात त्वचारोग के लिए, भोजन पश्चात्, तीनो बार अर्थात नाश्ते के बाद/ लंच के बाद/ डिनर के बाद; गरम पानी या मुद्गयूष के साथ (या शुष्क रूक्ष कुष्ठ हो तो अच्छे गुणवत्ता के, शुद्ध गृहनिर्मित देसी घी के साथ )देना अत्यंत लाभदायक होता है.


त्वचारोग की व्याप्ती तथा क्रोनिसिटी की अनुसार 6 हप्ते अर्थात 42 दिन या 12 हप्ते अर्थात 90 दिन मे त्वचारोग = कुष्ठरोग मे उत्तम उपशम प्राप्त होता है


18

वैसे भी आरोग्यवर्धिनी का जो भी कार्मुकत्व है, वह "निंबपत्र की भावना" तथा त्रिफला और कटुकी इनका विरेचनत्व इनके कारण ही है और पंचतिक्त में निंब का समावेश है ही!


19. Dose & Duration 

 पेशंट मे कुष्ठ की त्वचारोग की व्याप्ती देखकर तथा लक्षणों की तीव्रता देखकर, पंचतिक्त सप्तधा बलाधान टॅबलेट 6 गोली 3 बार / या 4 गोली 3 बार / या 2 गोली 3 बार ऐसा प्रयोग करना उचित होता है. 


डोस कितना देना है, यह वैद्य ने, पेशंट का असेसमेंट करके, निश्चय करना चाहिये 


20. बाह्य प्रयोग से लाभ External Application Usage

साथ मे पंचतिक्त का ही या TNKMJ का चूर्ण का लेपन, यदि मसूर दाल के आटे के साथ मिलाकर, पूरे शरीर पर करके , वह लेप सूखने पर, गरम पानी से स्नान किया जाये और उसके पश्चात त्वचा सुती(cotton) कपडे से पोछकर, शुष्क होने के बाद, उस पर एलादि केर तैलम या शतधौत घृत ... या रक्तस्राव या अन्य कोई स्राव हो तो जात्यादि घृत/तैल लगाना, यह बाह्य उपचार के रूप मे लाभदायक होता है , कुछ मर्यादा तक! 


21. External Don'ts

इस पूरे उपचार कालावधी (= 6 months) मे, शरीर पर साबुन शाम्पू फेसवॉश इस प्रकार के झाग foam होने वाले कोई भी केमिकल कॉस्मेटिक्स इन का प्रयोग नही करना चाहिए 

Food Don'ts

तथा भोजन मे अम्लरस, लवण रस, मैदा जन्य पदार्थ, हरी पत्तेदार सब्जीया (पत्र शाक), जमीन के नीचे उगने वाले पदार्थ & कुकर मे पकाये हुए पदार्थ ... इनका सेवन पूर्णतः वर्ज्य करना चाहिये, जितने दिन उपचार चल रहे है, उससे द्विगुण दिनों तक!!!


22 महाभूत विचार

तिक्त रस यह एकमात्र आकाश महाभूत युक्त रस है और आकाश महाभूत सत्त्व बहुल है, सत्त्व लघु प्रकाशक होता है ... साथ ही मेध्य होने के कारण तमो गुण प्रधान अर्थात पृथ्वी जल प्रधान अर्थात क्लेद प्रधान विकारो में यह उपयोगी होता है


23

तिक्त रस के दो सर्वश्रेष्ठ द्रव्य अर्थात गुडूची और पटोल यह दोनों भी पंचतिक्त में समाविष्ट है, इसमे से गुडूची तो मेध्य रसायन भी है


24

शार्ङ्गधर संहिता मे पंचतिक्त का उल्लेख विषमज्वर के संदर्भ मे आता है और ज्वर की संहितोक्त चिकित्सा सूत्र मे तिक्त रस का स्पष्ट स्वतंत्र मुख्य उपचार के रूप मे उल्लेख हुआ है


25

वासा (रक्तपित्त का), गुडूची (वातरक्त का) और कंटकारी (कास का) अग्र्य द्रव्य, है ऐसे तीन 3 अग्र्य द्रव्य का समावेश भी पंचतिक्त में है


26

पटोल हृद्य & कृमिनाशक है. तथा पटोल यह अम्लपित्त & शीतपित्त का प्रमुख शोधनद्रव्य है, योगरत्नाकरोक्त चिकित्सा में! अर्थात यह शाखा कोष्ठ गत क्लेद जल पृथ्वी प्रधान द्रव शैथिल्य प्रधान विकारो मे उपयोगी होता है!


27.

पंचतिक्त सप्तधा बलाधान टॅबलेट और पंचतिक्त क्षीरपाक शर्करा ग्रॅन्युल्स ... जी एम पी सर्टिफाईड और एफडीए महाराष्ट्र द्वारा ॲप्रूवह्ड, यह MhetreAyurveda Pharmacy द्वारा , सभी बीएएमएस आयुर्वेद प्रॅक्टिशनर वैद्यों के पेशंट के उपयोग के लिए, केवल इसी वेबसाईट पर उपलब्ध है 👇🏼

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👆🏼 उपरोक्त वेबसाईट के अलावा MhetreAyurveda फार्मसी के कोई भी औषध कही पर भी किसी भी डिस्ट्रीब्यूटर स्टॉकिस्ट या रिटेल आयुर्वेद औषध शॉप या अन्य किसी भी मेडिकल शॉप पर विक्री के लिये उपलब्ध नही ह






Monday, 17 August 2026

Why is Basti considered superior? Why is oral medicine not considered superior?**

 English  *Why is Basti considered superior? Why is oral medicine not considered superior?**






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In Ayurveda, Basti is considered superior...




1. Because after taking medicine or food through the mouth,




2. digesting it properly through the capacity of one’s own Agni,




3. carrying out proper separation/discrimination of the essence through Samana Vayu,




4. and producing proper Dhatus from it oneself,




5. ...for this, both capacity and self-reliance are required




6. and it takes nearly more than 22 hours




7. But here, in Basti, how is it...?!


   No effort whatsoever?! 😃




8. As if you opened a drawer 📥📭📩🗃




9. put something inside it, and closed the drawer




10. In the same way, things are put inside through the anal route in enormous quantities—240 or 960 ml—and that's it, done ✅️👍🏼




11. Therefore, people in Ayurveda consider Basti superior




12. because there is no effort in it... ready-made... spoon-feeding... predigested... free... easy... obtained without effort




13. But they simply do not understand that even after the effort of 22 hours, where there is no guarantee that digestion will actually occur properly,




14. just because Niruha remained in the body for 45 minutes or Anuvasana Sneha remained in the body for nine hours... what great lamps 💡🕯🪔🔦 have actually been lit because of that!!!




15. Basically, these Ayurvedic people are 99.99% dependent, dull, defeated, helpless, powerless, surrendered, somehow surviving in survival mode; even if they are extremely wealthy in terms of money, they are extremely impoverished in intelligence and morality, and most importantly in courage, truthfulness and integrity—utterly wretched, miserable, greedy, nonsensical, rubbish and “broken-brain” types...




16. Just ask them to "celebrate" lies, cunningness, hypocrisy, free and useless things... ask them to push lies... and ask them to treat the patient in front of them as a customer and "sell" to them... ask them to loot, cheat, exploit and fleece them... they are clever at that...!!!




17. But contemplation of the Shastra, references, resolution of doubts, discussion, dialogue—nothing is known... intelligence has nothing whatsoever to do with Shastra... there is no awareness or consciousness... they do not know where something is written... there is not even any basic study... no acquaintance... no familiarity...




18. Well, they do not know this, but there is no regret, remorse, awareness, curiosity, inquisitiveness or effort regarding the fact that they do not know it.




19. In the Charaka Chikitsa Rasayana chapter, before describing Rasayana, before describing the properties of Haritaki, there is a Virechana Yoga mentioned... nobody has used it till date... nobody knows what its results are, what its dosage is, and nobody has any information or curiosity about what **Purāṇaśakṛt** mentioned there actually means...




20. But the third one that comes after that, Chyavanaprasha, is vigorously sold by everyone by setting up a "market"... just as people sit on the roadside and sell things in weekly markets... or the street vendors and hawkers sell things on footpaths in all our cities, or fish sellers sell fish in fish markets... in the same way, whenever they get an opportunity, whether it is the season or not, all these nonsensical, "broken-brain" people keep selling Chyavanaprasha, Ubtan, Abhyanga oils, soaps, shampoos, conditioners, Suvarnaprashana, Shirodhara, Garbhasanskar, Viddha, Nadi, Marma and all sorts of things—selling = "Bechna"—that is the only work they keep doing.




21. They practice this kind of wretched practice of putting ten, twelve or fifteen Rasakalpas—however many they can think of and however many can fit—into a tiny paper packet... they have nothing whatsoever to do with the original Ayurvedic Shastra, references, contemplation, logic or reasoning... there is no knowledge, no coherence whatsoever...




22. And therefore, they consider Basti, which goes in through the **ass# from the but#**, superior to medicines that go through the mouth... It is such a simple, straightforward and obvious answer.




23. Now some people will call this "collective insult"... but what do you actually have with which you can be honoured???




Of course, this is my personal opinion.




There may be faults, errors and shortcomings in these statements.




And there may certainly be some honourable exceptions to the statements made above.



बस्ती श्रेष्ठ क्यों? मुख से औषध श्रेष्ठ क्यों नहीं?

 ## हिंदी *बस्ती श्रेष्ठ क्यों? मुख से औषध श्रेष्ठ क्यों नहीं?





**

उपर के चारो चित्र फेसबुक पर अच्छे दिखाई देते है उसकी लिंक यहा है

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आयुर्वेद में बस्ती को श्रेष्ठ माना गया है...


1. क्योंकि मुँह से औषधि या अन्न लेकर


2. उसका अपनी अग्नि की क्षमता से उचित पाचन करके


3. उसके समान वायु द्वारा उचित सार-विवेचन करके


4. उससे स्वयं सम्यक् धातु का निर्माण करना


5. ...इसके लिए क्षमता और स्वावलंबन दोनों की आवश्यकता होती है


6. और इसमें लगभग 22 घंटे से अधिक का समय लगता है


7. लेकिन यहाँ बस्ती में कैसे...?!

   कोई भी कष्ट नहीं?! 😃


8. मानो कोई ड्रॉअर खोला 📥📭📩🗃


9. और उसमें वस्तु रखी, ड्रॉअर बंद किया


10. उसी तरह गुदामार्ग से चीजें बहुत बड़ी मात्रा में 240 या 960 ml अंदर डाल दीं तो हो गया ✅️👍🏼


11. इसलिए आयुर्वेद के लोगों को बस्ती श्रेष्ठ लगता है


12. क्योंकि उसमें कष्ट नहीं हैं... बना-बनाया... रेडीमेड... स्पून-फीडिंग... प्रीडाइजेस्टेड... मुफ्त... आसान... बिना कष्ट के प्राप्त हो जाता है


13. लेकिन इन्हें साधारण-सी बात समझ में नहीं आती कि 22 घंटे के कष्ट के बाद भी जहाँ पाचन ठीक होगा ही, इसकी कोई गारंटी नहीं है


14. वहाँ 45 मिनट निरूह शरीर में रहा या नौ घंटे अनुवासन स्नेह शरीर में रहा... इसलिए ऐसा कौन-सा बड़ा दीपक 💡🕯🪔🔦 जलाने वाला काम हो गया!!!


15. मूलतः ये आयुर्वेदिक लोग 99.99% परावलंबी, निस्तेज, पराजित, असहाय, अगतिक, शरणागत, सर्वाइवल मोड में जैसे-तैसे जीने वाले, पैसे से अत्यंत धनी होने पर भी बुद्धि से और नैतिकता से और मुख्यतः धैर्य से, सच्चाई से, ईमानदारी से अत्यंत दरिद्र, दयनीय, भुक्कड़, बकवास, भंकस और ब्रोकन-ब्रेन इस प्रकार के होते हैं...


16. इन्हें केवल झूठ, चालाकी, पाखंड, मुफ्त की, निष्प्रयोजन चीजों को "सेलिब्रेट" करने के लिए कहिए... झूठ को रेट करने के लिए कहिए... और सामने वाले मरीज को कस्टमर समझकर "बेचना" करने के लिए कहिए... लूटने, ठगने, नोचने-खसोटने के लिए कहिए... उसमें ये होशियार हैं...!!!


17. लेकिन शास्त्र में चिंतन, संदर्भ, शंका-निरसन, चर्चा, संवाद कुछ भी मालूम नहीं होता... बुद्धि और शास्त्र का इससे कुछ भी लेना-देना नहीं होता... जान-जागरूकता नहीं होती... कहाँ लिखा है, मालूम नहीं होता... किसी भी प्रकार का प्राथमिक भी अध्ययन नहीं होता... परिचय नहीं होता... पहचान नहीं होती...


18. अच्छा, हमें यह मालूम नहीं है, इसके बारे में खेद, पछतावा, जागरूकता, जिज्ञासा, कौतूहल, प्रयास कुछ भी नहीं होता।


19. चरक चिकित्सा रसायन अध्याय में रसायन का वर्णन करने से पहले, हरितकी के गुणधर्मों के वर्णन से पहले, एक विरेचन योग आया हुआ है... उसे आज तक किसी ने भी उपयोग नहीं किया है... उसके परिणाम क्या होते हैं, उसकी मात्रा क्या है, किसी को भी मालूम नहीं है, उसमें उल्लिखित **पुराणशकृत्** का क्या अर्थ है, इसके विषय में किसी को भी कोई जानकारी या जिज्ञासा नहीं है...


20. परंतु वहाँ से आगे आया हुआ तीसरे क्रमांक का च्यवनप्राश मात्र सभी लोग "बाजार लगाकर" जोर-शोर से बेचते हैं... जैसे साप्ताहिक बाजार में लोग सड़क पर बैठकर बेचते हैं ना... या हमारे सभी शहरों में फुटपाथ पर फेरीवाले, हॉकर बेचते हैं या मछली बाजार में मछलियाँ बेचते हैं... वैसे ही ये सारे भंकस लोग, "ब्रोकन-ब्रेन" लोग अवसर मिलते ही, सीजन हो या न हो, च्यवनप्राश, उटने, अभ्यंग तेल, साबुन, शैम्पू, कंडीशनर, सुवर्णप्राशन, शिरोधारा, गर्भसंस्कार, विद्ध, नाड़ी, मर्म आदि कुछ भी बेचते रहना = "बेचना" यही एकमात्र काम करते रहते हैं।


21. एक ही छोटी-सी कागज की पुड़िया में जितने सूझें, जितने समा सकें, ऐसे दस-बारह-पंद्रह रसकल्प डालने की ऐसी घटिया प्रैक्टिस करते हैं... उन्हें मूल आयुर्वेद शास्त्र, संदर्भ, चिंतन, लॉजिक, तर्क से कुछ भी लेना-देना नहीं होता... ज्ञान, संगति कुछ भी नहीं होती...


22. और इसलिए उन्हें मुँह से जाने वाली औषधियों की अपेक्षा **गा#डी से, मां#डी से जाने वाला बस्ती** श्रेष्ठ लगता है... इतना सरल, सीधा और आसान उत्तर है।


23. अब कुछ लोग इसे "सामूहिक अपमान" करना कहेंगे... लेकिन सम्मान करने के लिए आपके पास आखिर है ही क्या???


अर्थात् यह मेरा व्यक्तिगत मत है।


इन कथनों में दोष, त्रुटियाँ, कमियाँ हो सकती हैं।


और उपरोक्त कथनों के कुछ सम्माननीय अपवाद निश्चित रूप से हो सकते हैं।

बस्ती श्रेष्ठ का ? मुखाने औषध श्रेष्ठ का नाही?

 बस्ती श्रेष्ठ का ? मुखाने औषध श्रेष्ठ का नाही?

आयुर्वेदात बस्ती श्रेष्ठ मानला आहे ...





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1

कारण तोंडाने औषध किंवा अन्न घेऊन 

2

त्याचं स्वतःच्या अग्नीच्या क्षमतेने योग्य ते पचन करून

3

 त्याचे समान वायु ने योग्य ते सार विवेचन करून

4

 त्याच्यापासून स्वतः सम्यक धातु निर्माण करणे

5

... यासाठी क्षमता आणि स्वावलंबन दोन्हीची आवश्यकता असते 

6

आणि त्याला जवळपास 22 तासांपेक्षा जास्त कालावधी लागतो 

7

पण इथे बस्ती मध्ये कसं ...?!

कसलेच कष्ट नाहीत ?!😃

8

जणू काही ड्रॉवर उघडला 📥📭📩🗃

9

आणि त्याच्यामध्ये वस्तू ठेवली ड्रॉवर बंद केला 

10

तसं गुदामार्गे गोष्टी प्रचंड मोठ्या प्रमाणात 240 किंवा 960 ml आत मध्ये घातल्या की झालं ✅️👍🏼


11

म्हणून आयुर्वेदातल्या लोकांना बस्ती हा श्रेष्ठ वाटतो

12

 कारण त्यात कष्ट नाहीत ... आयतं ... रेडिमेड ... स्पून फीडिंग ... प्रीडायजेस्टेड ... फुकट... सोपे ... बिना कष्टाचं असं मिळतं 

13

पण यांना साधं हे लक्षात येत नाही की, 22 तासांच्या कष्टानंतरही जिथं पचन नीट होईलच की नाही , याची शाश्वती नाही 

14

तिथं 45 मिनिटं निरूह शरीरात राहिला किंवा नऊ तास अनुवासन स्नेह शरीरात राहिला ... म्हणून काय असे काय मोठे दिवे 💡🕯🪔🔦लावणारेयत !!!

15

मुळात हे आयुर्वेदिक लोक हे 99.99% हे परावलंबी निस्तेज पराभूत असाह्य अगतिक शरणागत सर्वायवल मोडमध्ये कसेबसे जगणारे, पैशाने प्रचंड श्रीमंत असले तरी बुद्धीने आणि नीतिमत्तेने आणि मुख्य म्हणजे धैर्याने खरेपणांनी सचोटीने आत्यंतिक दळभद्री दरिद्री भुक्कड बकवास भंकस आणि ब्रोकन ब्रेन अशा पद्धतीचे असतात ... 


16

यांना फक्त खोटं लबाडीच ढोंगी फुकटचं निष्प्रयोजन "सेलिब्रेट" करायला सांगा ... खोटं रेटायला सांगा ... आणि समोरच्या पेशंटला कस्टमर समजून "बेचना" करायला सांगा... लुटायला लुबाडायला ओरबडायला सांगा... त्यात हे हुशार ... !!!

17

पण शास्त्रातील चिंतन संदर्भ शंका निरसन चर्चा संवाद काहीही माहित नसतं ... बुद्धी शास्त्र याच्याशी काहीही घेणं देणं नसतं ... जाण जाणीव नसते ... कुठे लिहिलेय माहित नसतं ... कसलाही प्राथमिक सुद्धा अभ्यास नसतो ... परिचय नसतो... ओळख नसते... 

18

बरं आपल्याला हे माहीत नाही , याबद्दल खेद खंत जाणीव जिज्ञासा कुतूहल प्रयत्न काहीही नसतं 


19

चरक चिकित्सा रसायन अध्यायामध्ये रसायन वर्णन करण्यापूर्वी, हरितकीच्या गुणधर्मांच्या वर्णनाच्या पूर्वी, एक विरेचन योग आलेला आहे... तो आजपर्यंत कुणीही वापरलेला नाही... त्याचे परिणाम काय होतात, त्याची मात्रा काय आहे, कोणालाही माहित नाही, त्यात उल्लेख केलेला पुराणशकृत् म्हणजे काय याविषयी कुणालाही काहीही माहिती जिज्ञासा नाही...


20

 परंतु तिथून पुढे आलेल्या तिसऱ्या क्रमांकाचा चवनप्राश मात्र सगळेजण "बाजार मांडून" जोमाने जोशाने विकतात ... ते आठवड्या बाजारात लोकं रस्त्यावर बसून विकतात ना ... किंवा आपल्या सगळ्या शहरांमध्ये फुटपाथ वर फेरीवाले हॉकर्स विकतात किंवा मासळी बाजारात मासे विकतात ... तसे हे सगळे भंकस लोक "ब्रोकन ब्रेन" लोक संधी मिळेल तेव्हा, सीजन असो / नसो चवनप्राश उटणे अभ्यंग तेल साबण शाम्पू कंडिशनर सुवर्णप्राशन शिरोधारा गर्भसंस्कार विद्ध नाडी मर्म असलं काही बाही विकणे = "बेचना" एवढे एकच काम करत असतात


21

 एकाच टीचभर कागदाच्या पुडी मध्ये सुचतील तेवढी मावतील तेवढी दहा-बारा 15 रसकल्प घालायचे असली भुक्कड प्रॅक्टिस करतात ... त्यांना मूळ आयुर्वेद शास्त्र संदर्भ चिंतन लॉजिक तर्क याच्याशी काही घेणं देणं ज्ञान सुसंगती काहीही नसतं ...


22

आणि म्हणून त्यांना तोंडाकडून जाणारी औषधे पेक्षा गा#डी कडून मां#डी कडून जाणारा बस्ती हा श्रेष्ठ वाटतो... इतकं साधं सोपं सरळ उत्तर आहे 


23

आता काही लोक याला "सामूहिक अपमान" केला असं म्हणतील ... पण बहुमान करण्याजोगे तुमच्याकडे आहे तरी काय???


अर्थात हे माझे वैयक्तिक मत आहे 

या विधानांमध्ये दोष त्रुटी उणीवा असू शकतात 

आणि वरील विधानांना काही सन्माननीय अपवाद निश्चितपणे असू शकतात

Friday, 26 June 2026

English Translation Part 1 : White/Grey Hair ... Black Hair !!! ... Remedies and Possibilities !!!

 English Translation


Part 1 : White Hair ... Black Hair !!! ... Remedies and Possibilities !!!




1

Even if "anything" is applied from the outside, once the hair turns white, it does not / cannot become "permanently black" again. This truth must be accepted as soon as possible by people aged between 35 and 45, who "still wish to look young"!

2

Newly growing hair does "not grow out black". If something is applied from the outside, the existing white hair merely "looks" black for the time being.

3

However, the lower hair growing out in the next few days "comes out white again"!

4

Therefore ... whether you apply Amla, iron filings, Maka (Bhringraj), Sahachar= Koranti, sugarcane juice, Aloe vera, fenugreek ... "anything" from the outside, the hair becomes black "only from the outside and only temporarily"✅️ ... just as it happens due to applying henna or black henna, exactly like that!!!

5

But after a few/some days, those "blackened" hairs grow forward, and the hair coming from the scalp, meaning from the roots of the hair, "comes out white again".

6

Therefore, behind such temporary, external coloring remedies, one should stop wasting their "time, money, energy, resources" !!!

7

The first thing is that due to current ...


pollution, hybridization, stress, waking up late at night, wrong eating habits, excessive use of shampoo and soap, use of "high-salt food items" like cheese, butter, bakery/bread, chaat ...

8

due to this, right from the age of 30 onwards, many people's hair starts turning white !!

9

(In this regard, guidance should be taken from a nearby trustworthy Vaidya who is definitely a Vaidya, meaning one who practices only classical Ayurveda ... does not practice Rasakalpas, meaning does not use metal Bhasma, gold, silver, mercury, sulphur, poison, sub-poison, chemicals, steroids in medicines, and does not adopt absurd unscientific practices like Nadi Yoga in the name of Ayurveda)

10

If these mistakes in diet are not corrected, they "never grow out black again anew" in the rest of life ...

11

Therefore, if we are not going to find the mistakes in our diet and if we are not going to correct them, then no matter how young the age is ...

12

once the hair turns white, it cannot come out black again from the roots!

13

At the most, you can "make them black" by doing external coloring, that's all !!!

14

Secondly, in the case of men after 35-40 and in the case of women after 40-45 or around menopause, hair turning white naturally can definitely happen ...

15

It should be "accepted" as age and the effect of age = time !!! ✅s

There is no reason to hide it ...

16

And for that, chemical-laden, extremely expensive hair "dyes" should not be used ...; because these "dyes" can lead you directly to "die", meaning towards death.

17

Many chemical-laden expensive hair dyes contain "carcinogenic components = chemicals". Especially for women, among the main causes of breast cancer are many types of chemicals used in makeup, this has been "proven and accepted" worldwide !!!

18

Therefore, whether you want life, living, lifespan ... or breast cancer, cancer and dyed, externally blackened hair, you should decide for yourself!!!

19

Natural changes happening according to age and time must definitely be accepted ... there is nothing embarrassing in it!!! On the contrary, if even after 35, 40, 45 our hair "looks" "jet black" ... then we are deceiving ourselves / society and presenting a hypocritical, pretentious, colorful, buffoon, joker-like form of ourselves to the world, one should be aware of this.

20

If we are in the mature age of 35 to 45 and our hair has started turning white, then by finding the mistakes in our diet, there should be "patience and effort to correct them" ... one should absolutely not sit around doing temporary, easy shortcut remedies of coloring hair black from the outside!!!

21

At this age of 35 to 45, marriage has usually lasted for five to ten years. How our relations are with our partner has been determined by now. Therefore, in such a situation; whether the hair is black, turned white, fallen out, broken, gone bald, turned short ... it actually makes no difference at all! Therefore, running behind such external things ... which have absolutely no relation to the existence of life and health, like the color / length / number / thinning / presence / absence of hair ... one should not waste their time, energy, money, resources unnecessarily, and ... it is better not to cause oneself mental distress unnecessarily!!!

22

Every day urination happened, defecation happened, mucus came out of the nose, overgrown nail was cut or broken ... do we grieve for that ... do we beat our chest ... do we smash our forehead ... no !!! Then in the same way, a waste product coming out of the body = hair on the head, giving unnecessary importance to this matter should be avoided. If our "perspective towards that hair changes", then hair fall and graying do not remain problems(?) at all.

23

It is hoped that the wise do not need to be told more !!!

Still ...

A simple, easy, straight remedy is to drop homemade pure ghee, made by melting butter, into the nose every night before sleeping ... (readymade store-bought ghee is absolutely not wanted).

Those who do not like dropping ghee should drop high-quality coconut oil (preferably if it can be prepared at home itself ... such).

Those for whom both these things are not going to be feasible, acceptable, or liked, they should drop high-quality milk into the nose!!!

The quantity of dropping pure ghee, coconut oil, pure milk into the nose is a full dropper full, meaning half ml = 0.5ml (point five ml), meaning if actually counted, 14 to 15 drops ...

should be dropped into the nostrils on both sides, before sleeping at night ... !!!

(In this regard, guidance should be taken from a nearby trustworthy Vaidya who is definitely a Vaidya, meaning one who practices only classical Ayurveda ... does not practice Rasakalpas, meaning does not use metal Bhasma, gold, silver, mercury, sulphur, poison, sub-poison, chemicals, steroids in medicines, and does not adopt absurd unscientific practices like Nadi Yoga in the name of Ayurveda)

The above oil, ghee, milk treatments should be tried ...

24

If you are fortunate,

if the body responds well,

if the mistakes in diet have been corrected ...

if it is a health-conducive season, then ...

generally in one and a half months = 45 days, and in the case of women up to two to four menses,

if the remedy of dropping ghee, oil, milk into the nose is done consistently, continuously, without laziness ...

there is a possibility of getting the expected benefit ... of course, this is only a possibility, not a certainty !!!

✍️🏼 Disclaimer : The result of the above remedy, treatment, Kalpa, Kwath, Yoga, tablet depends on many factors such as the quality of the ingredients included in it, given quantity, duration, medicine timings, season, condition of the patient, etc.




✍️🏼 Copyright © Vaidya Hrishikesh Balkrishna Mhetre. M D Ayurveda M A Sanskrit.




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हिंदी भाग 1 : सफेद बाल ... काले बाल !!! ... उपाय और संभावनाएं !!!

हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)

भाग 1 : सफेद बाल ... काले बाल !!! ... उपाय और संभावनाएं !!!

1

बाहर से "कुछ भी" लगाया जाए, तो भी एक बार सफेद हुए बाल फिर से "हमेशा के लिए काले" नहीं होते / नहीं हो सकते, इस सत्य को 35 से 45 की उम्र के, "अभी भी युवा ही दिखने की इच्छा रखने वाले" लोगों को जल्द से जल्द स्वीकार कर लेना चाहिए!

2

नए आने वाले बाल, "काले उगकर नहीं आते"। बाहर से कुछ लगाया जाए तो, जो हैं, वे सफेद बाल उतने समय के लिए काले "दिखते" हैं।

3

लेकिन अगले कुछ दिनों में बढ़कर आने वाला, नीचे का बाल, वह "फिर से सफेद ही आता है"!

4

इसलिए ...आंवला, लोहे का बुरादा (कीस), भृंगराज (माका), सहचर= कोरंटी, गन्ने का रस, एलोवेरा (कोरफड़), मेथी ... ऐसा "कुछ भी" बाहर से लगाया जाए, तो भी बाल "सिर्फ बाहर से ही और अस्थायी रूप से ही" काले होते हैं✅️ ... जैसे मेहंदी/काली मेहंदी लगाने से होते हैं, वैसे ही!!!

5

लेकिन कुछ/थोड़े ही दिनों में वे "काले किए हुए" बाल बढ़कर आगे आते हैं और सिर की त्वचा से यानी बालों की जड़ों से "आने वाला बाल फिर से सफेद ही आता है"।

6

इसलिए ऐसे अस्थायी, रंग-रोगन के उपायों के पीछे, अपना "समय, पैसा, ऊर्जा, संसाधन (रिसोर्सेज)" बर्बाद करना बंद करना चाहिए !!!

7

पहली बात तो यह है कि वर्तमान के ...


प्रदूषण (पोल्यूशन), हाइब्रिडाइजेशन, तनाव (स्ट्रेस), रात का जागरण, गलत खान-पान, शैम्पू-साबुन का अत्यधिक उपयोग, चीज, बटर, बेकरी/पाव, चाट जैसे "नमक की अधिकता वाले पदार्थों का उपयोग" ...

8

इस वजह से उम्र के 30 वर्ष से आगे तुरंत ही, बहुत से लोगों के बाल सफेद होने लगते हैं !!


(इस बारे में पास के किसी विश्वसनीय वैद्य का मार्गदर्शन लेना चाहिए जो निश्चित रूप से वैद्य हो, यानी जो आयुर्वेद की ही शास्त्रीय प्रैक्टिस करता हो ... रसकल्पों की प्रैक्टिस नहीं करता हो, यानी दवाओं में मेटल भस्म, सोना, चांदी, पारा, गंधक, विष, उपविष, केमिकल, स्टेरॉयड का उपयोग नहीं करता हो और आयुर्वेद के नाम पर नाड़ी योग जैसे ढोंग और अशास्त्रीय प्रकारों का सहारा नहीं लेता हो)

9

आहार की इन गलतियों को न सुधारने पर, वे आगे पूरे जीवन में "कभी भी नए सिरे से फिर से काले उगकर नहीं आते" ...

10

इसलिए हम यदि आहार की गलतियों को ढूंढने वाले नहीं हैं और उन्हें सुधारने वाले नहीं हैं, तो उम्र चाहे कितनी भी युवा हो ...


एक बार सफेद हुए बाल, जड़ों से फिर से काले नहीं आ सकते!

11

ज्यादा से ज्यादा आप उन्हें बाहर का रंग-रोगन करके "काले कर" सकते हैं, बस इतना ही !!!

12

दूसरा यह कि पुरुषों के मामले में 35-40 के बाद और महिलाओं के मामले में 40-45 के बाद या मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति) के आसपास, प्राकृतिक रूप से बाल सफेद होना, यह निश्चित रूप से हो सकता है ...

13

उसे उम्र और उम्र का = समय का प्रभाव मानकर "स्वीकार करना चाहिए" !!! ✅️


उसे छुपाने का कोई कारण नहीं है ...

14

और उसके लिए केमिकल युक्त अत्यंत महंगे हेयर "डाई" का उपयोग नहीं करना चाहिए ...; क्योंकि ये "डाई Dye" आपको सीधे "डाई Die" यानी मृत्यु की ओर ले जा सकते हैं।

15

कई केमिकल युक्त महंगे हेयर डाई में "कैंसर पैदा करने वाले रासायनिक घटक= केमिकल" होते हैं, विशेष रूप से महिलाओं को, ब्रेस्ट कैंसर होने के मुख्य कारणों में, मेकअप में उपयोग किए जाने वाले कई प्रकार के केमिकल हैं, यह दुनिया भर में "सिद्ध और स्वीकृत" हो चुका है !!!

16

इसलिए जान चाहिए, जीवन चाहिए, आयु चाहिए ... या ब्रेस्ट कैंसर चाहिए, कैंसर चाहिए और रंगे हुए बाहर से काले किए हुए बाल चाहिए, यह खुद ही तय करना चाहिए!!!

17

उम्र के अनुसार, समय के अनुसार होने वाले प्राकृतिक बदलावों को निश्चित रूप से स्वीकार करना चाहिए ... उसमें शर्माने जैसा कुछ भी नहीं होता!!! इसके विपरीत यदि 35, 40, 45 के बाद भी हमारे बाल "काले-स्याह" "दिख" रहे हों ... तो हम खुद को / समाज को धोखा दे रहे हैं और अपना खुद का एक ढोंगी, पाखंडी, रंग-बिरंगा, विदूषक, जोकर जैसा रूप दुनिया के सामने रख रहे हैं, इसकी जागरूकता होनी चाहिए।

18

यदि हम 35 से 45 की इस प्रौढ़ उम्र में हों और हमारे बाल सफेद होने लगे हों, तो आहार की गलतियों को ढूंढकर, "सुधारने का धैर्य और प्रयास" होना चाहिए ... अस्थायी, आसान शॉर्टकट के, बाहर से रंग-रोगन करके बाल काले करने के उपाय बिल्कुल करते नहीं बैठना चाहिए!!!

19

35 से 45 की इस उम्र में शादी होकर अमूमन पांच से दस साल बीत चुके होते हैं। अपने जीवनसाथी के साथ हमारे संबंध कैसे हैं, यह अब तक तय हो चुका होता है। इसलिए ऐसी स्थिति में; बाल काले हों तो क्या, सफेद हो गए तो क्या, झड़ गए तो क्या, टूट गए तो क्या, गंजापन आ गया तो क्या, बाल छोटे हो गए तो क्या ... इन सब से वास्तव में कुछ भी फर्क नहीं पड़ता! इसलिए ऐसी बाहरी... और जीवन के अस्तित्व तथा स्वास्थ्य से जरा भी संबंध न रखने वाली, बालों के रंग / लंबाई / संख्या / विरलता (पतलेपन) / होने / न होने ... के पीछे पड़कर अकारण अपना समय, ऊर्जा, पैसा, संसाधन बर्बाद नहीं करना चाहिए और ... अकारण खुद को मानसिक कष्ट भी नहीं देना चाहिए, यही बेहतर है!!!

20

रोज पेशाब हुई, शौच हुआ, नाक से गंदगी निकल गई, बढ़ा हुआ नाखून काट दिया या टूट गया ... इसलिए क्या हम दुख करते हैं ... छाती पीटते हैं ... सिर पटकते हैं ... नहीं !!! तो फिर उसी तरह, शरीर से बाहर निकलने वाले, एक अपशिष्ट पदार्थ (टाकाऊ पदार्थ) यानी सिर के बाल, इस बात को अनावश्यक महत्व देने से बचना चाहिए। यदि उन "बालों की तरफ देखने का हमारा नजरिया बदल जाए", तो बालों का झड़ना, सफेद होना, ये समस्याएं(?) समस्याएं ही नहीं रहतीं।


आशा है बुद्धिमान को अधिक बताने की आवश्यकता नहीं है !!!


फिर भी ...

21

एक साधारण, आसान, सीधा उपाय यह है कि नाक में रोज रात को सोने से पहले मक्खन पिघलाकर बनाया हुआ घर का शुद्ध देसी घी डालना चाहिए ... (बाजार का रेडीमेड घी बिल्कुल नहीं चाहिए)।

22

घी डालना जिन्हें पसंद नहीं है, उन्हें अच्छी गुणवत्ता का, (संभव हो तो घर में ही तैयार किया जा सके तो बेहतर ... ऐसा) नारियल का तेल डालना चाहिए ...

23

ये दोनों चीजें जिन्हें जमने, पचने या पसंद आने वाली नहीं होंगी, उन्होंने अच्छी गुणवत्ता का दूध नाक में डालना चाहिए!!!

24

शुद्ध घी, नारियल तेल, शुद्ध दूध नाक में डालने की मात्रा एक पूरा ड्रॉपर भरकर यानी आधा मिलीलीटर = 0.5ml (पॉइंट फाइव एमएल) यानी वास्तव में गिना जाए तो 14 से 15 बूंद इतनी ...


दोनों तरफ के नथुनों में, रात को सोने से पहले डालनी चाहिए ... !!!

25

(इस बारे में पास के किसी विश्वसनीय वैद्य का मार्गदर्शन लेना चाहिए जो निश्चित रूप से वैद्य हो, यानी जो आयुर्वेद की ही शास्त्रीय प्रैक्टिस करता हो ... रसकल्पों की प्रैक्टिस नहीं करता हो, यानी दवाओं में मेटल भस्म, सोना, चांदी, पारा, गंधक, विष, उपविष, केमिकल, स्टेरॉयड का उपयोग नहीं करता हो और आयुर्वेद के नाम पर नाड़ी योग जैसे ढोंग और अशास्त्रीय प्रकारों का सहारा नहीं लेता हो)


उपरोक्त तेल, घी, दूध के उपचार करके देखने चाहिए ...


आपका सौभाग्य रहा,


शरीर ने अच्छी प्रतिक्रिया दी,


आहार की गलतियां सुधार ली होंगी ...


स्वास्थ्य के अनुकूल ऋतु होगी तो ...


आमतौर पर डेढ़ महीने में = 45 दिनों में और महिलाओं के मामले में दो से चार मासिक चक्र (मेन्सेस) तक,


नाक में घी, तेल, दूध डालने का उपाय लगातार, निरंतर, बिना आलस किए करने पर ...


अपेक्षित लाभ मिलने की संभावना होती है ... बेशक यह केवल संभावना ही होती है, निश्चितता नहीं !!!


✍️🏼 डिस्क्लेमर/Disclaimer : उपरोक्त उपाय, उपचार, कल्प, क्वाथ, योग, टैबलेट का परिणाम; उसमें सम्मिलित द्रव्यों की क्वालिटी, दी हुई मात्रा, कालावधी, औषधिकाल, ऋतु, पेशंट की अवस्था इत्यादि अनेक घटकों पर निर्भर करता है.


✍️🏼 Copyright © वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे. एम डी आयुर्वेद एम ए संस्कृत.


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Friday, 19 June 2026

धातु"पाचक" होते ही नही है!

धातु"पाचक" होते ही नही है!

The king is Naked ... The Parrot is Dead
राजा निर्वस्त्र है ... तोता मर गया है
Picture credit Chatgpt AI 

लेखक ✍🏼 : 

वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे, 

एम डी आयुर्वेद संहिता, 

एम ए संस्कृत. 

आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे & नाशिक. 

मोबाईल 9422016871


विषमज्वर कषाय पंचक को, "धातुपाचक" ऐसा "कहकर समझकर" व्यवहार करना, अत्यंत "अशास्त्रीय अनार्ष प्रक्षिप्त असत्य असिद्ध" है!


यह लेख पढने से पहले मूल चरक संहिता आपके पास उपलब्ध है और आपने च चि 3 ज्वर चिकित्सित अध्याय ओपन करके रखा है , यह सुनिश्चित करे


सद्यकालीन व्यवहार इस प्रकार से है की


कलिङ्गकाः पटोलस्य पत्रं कटुकरोहिणी ॥२००॥ = संततज्वर = रस पाचक


पटोलः सारिवा मुस्तं पाठा कटुकरोहिणी । = सततज्वर = रक्तपाचक


निम्बः पटोलस्त्रिफला मृद्वीका मुस्तवत्सकौ ॥२०१॥ = अन्येद्युष्क = मांसपाचक 


किराततिक्तममृता चन्दनं विश्वभेषजम् । = तृतीयक = (मेदोपाचक ऐसा शब्द संस्कृत भाषा मे सिद्ध नही होता है क्योंकि विसर्ग के आगे प आ जाये तो विसर्ग का ओ नही होता है उपध्मानीय होता है इसलिये) = मेदःपाचक! किंतु जो "धातुपाचक" जैसे अस्तित्वहीन & अशास्त्रीय संज्ञा का निर्माण और प्रयोग कर सकते है , उनको मेदोपाचक गलत है और मेदःपाचक यह शब्द उचित है, इतना ज्ञान होगा ऐसे संभव ही नही!)


गुडूच्यामलकं मुस्तमर्धश्लोकसमापनाः ॥२०२॥ = चतुर्थक = अस्थिमज्जापाचक 


कषायाः शमयन्त्याशु पञ्च पञ्चविधाञ्ज्वरान् ।

सन्ततं सततान्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकान् ॥२०३॥

👆🏼

प्रस्तुत इन उपरोक्त तीन श्लोकों में कही पर भी "क्रमात्" यह शब्द लिखा हुआ नही है. यद्यपि "क्रमात्" ऐसा शब्द इसमे लिखना अनुष्ठुभ् छंद की दृष्टि से संभव है, तथापि "नही लिखा" है 


और इन 3 श्लोक मे "शमयन्ति" ऐसा शब्द है "पाचयन्ति" ऐसा शब्द नही है !


विषमज्वर में आम की उपस्थिती नही होती है, किसी पाचन की आवश्यकता होती ही नहीं, इसलिये "शमन कषायों" को, मूढबुद्धि की तरह, धातु"पाचक" संज्ञा देकर व्यवहार मे लाना, यही मूलतः अशास्त्रीय है!


आपको ब्रेन वॉशिंग या मेंटल कंडिशनिंग हुआ है कि धातुपाचक उस धातु पर काम करते हैं... मूलतः धातुपाचक पर क्रिटिकली विचार करना चाहिए, श्रद्धा से नहीं।


एक ज्येष्ठ वैद्य का धातुपाचक के बारे में वीडियो सुना, उसमें उन्होंने धातुपाचक कषाय (या मूल बायवारू के लेख का नाम ज्वरपंचक कषाय), यह रूक्ष तेज के संदर्भ में आए हैं, ऐसा बताया।


मूलतः, वे श्लोक ठीक से पढ़े 

चरक चिकित्सा 3 / 200 से आगे 203 तक, 

तो यह संपूर्ण छह पंक्तियों का, 

तीन श्लोकों का भाग स्पष्ट रूप से "प्रक्षिप्त" है ऐसा निश्चित होता है।


इति क्रिया"क्रमः" सिद्धो ज्वरघ्नः सम्प्रकाशितः ॥१७७॥

येषां त्वेष "क्रमः" तानि द्रव्याण्यूर्ध्वमतः शृणु ।


ऐसा कहकर जिस क्रिया"क्रम" का तात्विक उल्लेख चरक संहिता चिकित्सा 3 में होता है, उस तात्विक "क्रम" से, आगे द्रव्य = कषाय/कल्प आए हैं।


उस मूल 139 से शुरू होने वाले, तात्विक "क्रम" में विषमज्वर बहुत ही बाद में, करीब करीब अंत में है.


और 160 श्लोक कषाय पान (क्रिया"क्रम") बताता है। 


"प्रत्यक्ष कषाय वर्णन" 197 पर आता है।


और "विषमज्वर नाशना" यह श्लोक क्रमांक 297 यहाँ है। 


उसके बाद फिर 315 पर धातुगतज्वर के कषाय आते हैं या उपचार आते हैं, ऐसा स्पष्ट "अच्छा क्रम" होते हुए.. 


श्लोक 197 पर , "सामान्य ज्वर" के योग चालू होते हुए, "बीच में ही असंबद्ध", "अप्रस्तुत", "क्रमभंग" करके ऐसे 200 से 203 श्लोक आते हैं, वे "प्रक्षिप्त" ही है! ... क्योंकि 297 पर प्रतिज्ञा = विषयप्रस्तावना करके , फिर उसके पश्चात ही, "विषमज्वर नाशना" योग हैं।


यह, "निदान क्रम से विसंगत" (inconsistent/non concurrent), विषय "क्रमभंग" वाग्भट में भी हमें मिलता है, अहृचि1/श्लोक 48-50।


और वह "रूक्ष तेज ज्वरकर" यह आगे, "स्नेहवध्य अनिल" के अनुरोधानुसार (in the context of) "जीर्णज्वर में घृतपान" के लिए आए श्लोक हैं, उसका उस "तथाकथित धातुपाचक" श्लोकों से थोड़ा भी संबंध नहीं है।


तथाकथित स्थापित ट्रेड, व्यापार, व्यवसाय, धंधा इसमें जमे हुए, जमाए हुए, गलतफहमियां फैलाए हुए, ऐसे यह सब "धातुपाचक" नाम के जो स्थापित कल्प हैं, उनका संबंध धातुओं से नहीं है, विषमज्वरों का संबंध भी "एक से एक = 1:1 =one is to one" ऐसा धातुओं से निश्चित दृढ (firm & fixed) नहीं है!


पाँच (5) विषमज्वर और छह (6) धातु इनका एक-दूसरे से कोई संबंध स्थापित नहीं होता है।


यह छह धातुओं से, "एक को एक = 1:1" इस पद्धति से बंधे हुए नहीं हैं। 


1.

संतत रस में न होकर वह द्वादश आश्रय = 12 भावों के आश्रयों से होता है ...

द्वादशैते समुद्दिष्टाः सन्ततस्याश्रयास्तदा ।


2.

तो संततज्वर रक्त, मांस दोनों जगह हो सकता है 


3

और अगले तीन ज्वर अगले-पिछले दो-दो धातुओं में इधर-उधर खिसक सकते हैं, 


4.

ऐसी चरक की स्वयं की श्लोकों में स्पष्टोक्ति है।

👇🏼

अन्येद्युष्कं ज्वरं कुर्यादपि संश्रित्य शोणितम् ॥६५॥

मांसस्रोतांस्यनुगतो जनयेत्तु तृतीयकम् ।

संश्रितो मेदसो मार्गं दोषश्चापि चतुर्थकम्


5.

ऐसा होते हुए, केवल एक लेख में, अत्यंत कम रोगी संख्या पर रखे गए, एक संभावित निरीक्षण के कारण, इतना प्रचंड ढांचा (structure) दृढ़ आत्मविश्वास से खड़ा करना, यह अत्यंत अशास्त्रीय है, 


और यह केवल परंपरागत विवशता (helplessness) और कोई भी शास्त्रीय आधार न रखने वाली … श्रद्धा, भक्ति, आरती, कीर्तन, गोंधळ, भारुड (folk performances) ऐसी अज्ञानी लोगों की भीड़ (gathering) है।



उसमें उन्हें सिर्फ सकारात्मक (affirmative) विधान ही पसंद आते हैं!!! 


जब कोई उससे प्रश्न पूछे, उसे कोई अस्वीकार करे / रिव्हॅलिडेट / व्हेरिफाय / चॅलेंज करे कि, ऐसा इन लोगों का पित्त भड़कता है! कि यह सारी पारंपरिक शरणागत गतानुगतिक मंडली हिंसक, आक्रमक, अतिरेकी हो जाती है!! 


शास्त्र का अध्ययन करते समय भावना, परंपरा, श्रद्धा, भक्ति को एक तरफ रखकर, सीधा व्यवहार देखें, क्या संदर्भ हैं वह ठीक से पढ़ें।



कोई एक हाँऽऽऽऽ बोले, इसलिए उसके सुर में सुर मिलाकर सबको गला निकालना (cry out/agree) बंद करना चाहिए, यह सीधा साधा विचार किसी को भी नहीं सूझता। 


एम्परर विथ नो क्लाॅथ्स, यह जो एक प्रसिद्ध प्रकार है, वह अपने यहाँ आयुर्वेद क्षेत्र में बहुत ही अधिक है!!! एक बार किसीने "अहो रुपम्" कहा तो बाकी सबको “अहो ध्वनि” कहना है 🙆🏻‍♂️🤦🏻‍♂️


अरे , लेकिन वह मूल मुद्दा, सच में, उतनी योग्यता का, पात्रता का, मूल्य का है क्या, यह एक बार तो, खनखनाता सिक्का है या नहीं, जाँच कर देखने में क्या आपत्ति है???


केवल परंपरा के नाम पर, व्यवसाय हो रहा है इसलिए, रगड़ते बैठना (continuously practicing it), यह ... कम से कम, जिन्हें संहिताएँ समझती हैं, संस्कृत समझता है, वर्षों से सिखाया है, वर्षों से पेशेंट देखे हैं... उन्हें तो विचार चिंतन अध्ययन करना चाहिए... ✅️


6.

एक बार तो साहस करके, एक बार तो अकेली (single drug) वह क्या कैसी "धातुपाचकें" है, उनका उपयोग करके, दो चार रिजल्ट लेकर दिखाओ। खालमुंडी पाताळ धुंडी (deeply engrossed/overly focused) प्रकार चल रहे होते हैं बस।

👇🏼

On a lighter note...

ये क्या जगह है दोस्तों,

ये कौन सा दयार है

हद-ए-निगाह तक जहां

गुबार ही गुबार है ...

ये क्या जगह है दोस्तों 🤔

https://youtu.be/GW-nYoihQaY

👆🏼

After 10 years ... reading & writing, in various Ayurveda groups 😇


7.

... और क्या वह "मीमांसा शास्त्र" के आधार पर एक्स्प्लेनेशन किया, इसलिए उसकी प्रशंसा करनी है ??? 

किसे समझता है मीमांसा शास्त्र!? 

जिन्हें मीमांसा शास्त्र नहीं समझता, उनके सामने कितना भी आप बताएं तो भी, उन्हें आप सच बता रहे हैं या झूठ, गलत या सही, उचित या अनुचित, अपूर्ण या संपूर्ण (complete) यह कैसे मालूम पड़ेगा ???


इंग्लिश समझने वाले सब लोगों के सामने कोई मराठी में जाकर शुद्ध मराठी ज्ञानेश्वरी का निरूपण बताए कि ऐसा है तो, क्या वह इंग्लिश लोगों को मालूम पड़ेगा कि, आपने गलत बताया या सही?


इसलिए वह क्या, जो मूल लेख हैं, वह मीमांसा शास्त्र के अनुसार बताए, उससे हमें क्या फर्क पड़ता है ??? 


8.

आयुर्वेद के नियमानुसार, आयुर्वेद की संहिता श्लोक, विषय, अधिकरण, क्रमांक के अनुसार, यह तथाकथित ज्वरपंचकषाय = "धातु पाचक" कहलाने वाले श्लोक प्रक्षिप्त हैं ...


9.

और प्रक्षिप्त न भी हों …

तो भी उन्हीं श्लोकों से ...

अमुक कषाय = अमुक धातु के लिए, 

ऐसा 1:1 सिद्ध नहीं होता... 


10.

क्योंकि मूलतः ही पाँच विषमज्वर ये, अमुक पाँच(/छह 🙃😇) धातुओं से एक को एक 1:1 सुसंगति से होते हैं, ऐसा शास्त्रीय रूप से लिख रखा ही नहीं गया है।


द्वादशैते समुद्दिष्टाः सन्ततस्याश्रयास्तदा ।

अन्येद्युष्कं ज्वरं कुर्यादपि संश्रित्य शोणितम् ॥६५॥

मांसस्रोतांस्यनुगतो जनयेत्तु तृतीयकम् ।

संश्रितो मेदसो मार्गं दोषश्चापि चतुर्थकम्


इस अनुसार तो, वह अनिश्चित (randomn) ऐसा ही है।


11.

खैर, उसके भी परे, पिछले 20,30,50,70 वर्षों में किसने विषमज्वर देखे है?? 

टेंपरेचर आने के बाद वह कितने इंटरवल से आते हैं ??

एक दिन छोड़कर, दो दिन छोड़कर ...? 

इतना देखने के लिए पेशेंट के पास समय/संयम कहाँ है??? 

तब तक वह काउंटर पर जाकर पेरासिटामोल लेकर आता है! 


12.

नहीं तो ... "चरकस्तु चिकित्सिते" कहने वाले सारे आयुर्वेदिक वैद्य ट्रिकी 😬 देते हैं!!! 😆🤣 (कौन से तीन भुवनों में कीर्ति फैली उस ट्रिकी की, किसे पता??? 

पड़ोस की 10 सोसाइटी में पूछा तो एक को भी त्रिभुवन कीर्ति नहीं मालूम... और कहें त्रिभुवन कीर्ति... यह तो आश्चर्य की बात है 👎🏼)

तो ट्रिकी दे देते हैं... 


13.

इसलिए पेशंट और वैद्य यह दोनों ओर से, इस प्रकार का दीर्घकालीन इंटरवल रहकर, विषमज्वर निदान होना, यह मूलतः संभव ही नहीं है... 

वहाँ आप उसके ऊपर के ज्वर पंचक कषाय उपयोग करेंगे और फिर वह सिद्ध होगा... 

यह बऽऽऽऽऽऽहुत दूर की बातें... 

इन जैसी सारी आश्रयासिद्ध (unproven/dependent on unproven ground) बातों पर ढाँचे खड़े करना, हम कब बंद करेंगे , कौन जाने!!!


14.

बाकी... लेख, विशेषांक (special issue), रिसर्च पेपर, वेबिनार, सेमिनार, निरूपण के लिए यह चलने दीजिए। उसके लिए यह सब चलन वाला सिक्का (currency), पर्याप्त खाद्य, कागजी घोड़े के रूप में ठीक है 😬😇🙃


15.

मूलतः गड़बड़ी ऐसी है कि ...

जिनके शमन के लिए यह पाँच कषाय आए हैं (धातु "पाचक" "कहे" जाने वाले)

वह जो पाँच विषमज्वर हैं

वह अमुक धातु में, अमुक ही विषमज्वर होता है, ऐसा भी निश्चित नहीं है

इसलिए "अमुक कषाय" यह "अमुक धातु के लिए है”, ऐसा ही "मूलतः निश्चित नहीं है"


16.

देखें 

👇🏼

दोषा गुरवो रसवाहिभिः ॥५३॥

सर्वदेहानुगाः स्तब्धा ज्वरं कुर्वन्ति सन्ततम् ।


संतत में , रसवह स्रोतस् के द्वारा, पूरे देहभर जाते हैं ... सिर्फ रसधातु नहीं


द्वादशैते समुद्दिष्टाः सन्ततस्याश्रयास्तदा ।


संतत "सिर्फ रस में नहीं" ... बल्कि 12 भावों में होता है


17.

रक्तधात्वाश्रयः प्रायो दोषः सततकं ज्वरम्


रक्त = संतत ✅ ऐसा लगेगा 


लेकिन आगे देखें

अन्येद्युष्कं ज्वरं कुर्यादपि संश्रित्य शोणितम् 😇


18.

फिर और विचित्र बाद देखिये

अन्येद्युष्कं ज्वरं दोषो रुद्ध्वा मेदोवहाः सिराः ॥६३॥


अन्येद्यु = मांस ❌️ 😇 मेद ✅️😬 ... 

तो फिर अब, मांसपाचक, ठीक कौन सा 🙃🤔❓


19.

सप्रत्यनीको जनयत्येककालमहर्निशि ।

दोषोऽस्थिमज्जगः कुर्यात्तृतीयकचतुर्थकौ ॥६४॥


अस्थि मज्जा = तृतीयक & चतुर्थक both ✅️= मेद नहीं है क्या?... 


20.

तृतीयक चतुर्थक ये दोनों अस्थि मज्जा से यानी दोनों से होते हैं , 

या एक अकेले , एक एक से, क्या पता???


21.

गतिद्‌र्व्येकान्तराऽन्येद्युर्दोषस्योक्ताऽन्यथा परैः ।

अन्येद्युष्कं ज्वरं कुर्यादपि संश्रित्य शोणितम् ॥६५॥

अन्येद्यु = रक्त ✅️, मांस ❌️


22.

मांसस्रोतांस्यनुगतो जनयेत्तु तृतीयकम् ।

तृतीयक = मांस✅️ मेद❌️


23.

संश्रितो मेदसो मार्गं दोषश्चापि चतुर्थकम्

चतुर्थक = मेद✅️ अस्थिमज्जा❌️


👆🏼

ऐसे उपलब्ध "अधिकृत संदर्भों" के कारण ...

जो प्रचलित "यह काढ़ा और यह धातु", 

ऐसी स्थापित व्यवस्था है, 

वह वैसी सुसंगत एवं शास्त्रीय संदर्भ अनुसार योग्य नहीं है, 

यह ध्यान में आएगा ही।


24

किसके रिजल्ट आते हैं?? कैसे??? 

उसका ऑब्जेक्टिव्ह असेसमेंट है क्या? 

अकेला धातुपाचक single drug उपयोग किया क्या?? 

पेशेंट की संख्या कितनी??? 

निदान निश्चिति "धातु" इस स्वरूप में ही, की गई थी क्या??? 

धातु पाचक के रूप में जो कुछ अभी मान्य है, उसके अतिरिक्त, उसके साथ में, अन्य कोई कल्प दिए थे क्या??? 

जो रिजल्ट आए , उसका कालावधि कितना???

लक्षणों का रिकरन्स हुआ अथवा नहीं हुआ, इसका डाटा कितना??? 

तभी यह बोलना चाहिए... कि, फैंटैस्टिक रिजल्ट आते हैं... पेशंट को बहुत अच्छा लगा... यह तो सब्जेक्टिव्ह है ... सब बेकार का ... असिद्ध!!


25.

वह हम वर्षों से, पीढ़ियों से करते आए हैं... उसका कोई अर्थ नहीं... उससे शास्त्र की कोई प्रगति और समृद्धि नहीं होती... कृपा करके ऐसे भोंगळ (hollow/vague) और सब्जेक्टिव्ह साँचे से हम अब तो बाहर निकलें, कम से कम इस पीढ़ी ने तो!


26.

धातुपाचक तो होते ही नही है ... यह अनेको बार ससंदर्भ सतर्क स्पष्ट करने के बाद भी, विषमज्वर कषाय पंचक को धातुपाचक समझकर, व्यवहार करने की भ्रांती नष्ट नही होती है.



27.

अगर हम औषधों को केवल "बेचने" के साथ हि, औषध "सोचने" पर काम करेंगे तो ... linking ourself with scientific thinking, will be surely possible



28.

कषायाः शमयन्त्याशु पञ्च पञ्चविधान् *क्रमात्* (~ज्वरान्~) ।


सन्ततं सततान्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकान् ॥


चरक👆🏼




पञ्चैते सन्ततादीनां पञ्चानां शमना *क्रमात्* (~मताः।~)


वाग्भट 👆🏼




मूल श्लोक/ चरण लिखते समय "क्रमात्" यह शब्द लिखकर, स्पष्ट रूप से, "अमुक कषाय ... अमुक विषमज्वर के लिए" ऐसा लिख सकते थे✅️, लेकिन ऐसे लिखा हुआ नही है 



29.

और तो और ज्वर चिकित्सा वर्णन का क्रम भंग इन श्लोकविन्यास मे हुआ है , इसको पुन्हा एक बार सुसंगत सविस्तर संदर्भ और सतर्क प्रस्तुत करते है 




ये ⬆️ मै नही कहता, किताबों 📖📚 में लिखा है, यारो ...



30.

चरकोक्त विषमज्वर कषाय पंचक का, किसी भी धातू के साथ, निश्चित संबंध नही है, यह हमने स्पष्ट कर दिया है ... *चरक संहिता के ही संदर्भों के अनुसार!* 



31.

चरक के विषमज्वर यह धातु मे दोष का प्राबल्य इस संकल्पना पर आधारित है.



32.

इस कारण से संततादी पाच ज्वरों का निश्चित धातु अधिष्ठान वहां पर निर्धारित हि नही है



33

चरक की निम्नोक्त पंक्तिया देखेंगे, तो ये पता चलता है कि कौन सा भी विषमज्वर, किसी भी धातु मे आश्रित होकर निर्माण हो सकता है.

👇🏼

रक्तधात्वाश्रयः प्रायो दोषः सततकं ज्वरम् 


रक्त = सतत ✅️


अन्येद्युष्कं ज्वरं दोषो रुद्ध्वा मेदोवहाः सिराः ॥


अन्येद्युष्क = मेदस् 🤔⁉️ मांस ❌️


दोषोऽस्थिमज्जगः कुर्यात्तृतीयकचतुर्थकौ 


तृतीयक = अस्थिमज्जा 🤔 ⁉️ मेदस् ❌️


अन्येद्युष्कं ज्वरं कुर्यादपि संश्रित्य शोणितम् ॥


अन्येद्युष्क = रक्त 🙃😇🤔⁉️ मांस ❌️


मांसस्रोतांस्यनुगतो जनयेत्तु तृतीयकम् ।


तृतीयक = मांस 🤔⁉️ मेदस ❌️


संश्रितो मेदसो मार्गं दोषश्चापि चतुर्थकम् 


चतुर्थक = मेदस् 🤔 ⁉️ अस्थिमज्जा ❌️


34.

और तो और चरक संहिता मे हि,


संततज्वर केवल रसधात्वाश्रित न होकर, 


(संतत = रस ❌️)


संतत द्वादशाश्रयी ज्वर है ✅️ 

12 भाव आश्रय ✅️


संतत = 12 भाव = 7 धातू + 2 मल + 3 दोष


द्वादशाश्रयी का अर्थ केवल रसके साथ नही, अपितु द्वादश✅️ = 7 धातू 2 मल 3 दोषों के साथ जुडा है , ऐसे लेना चाहिए 


यथा धातूंस्तथा मूत्रं पुरीषं चानिलादयः ॥


द्वादशैते समुद्दिष्टाः सन्ततस्याश्रयास्तदा ।✅️


द्वादशेति सप्त धातवस्त्रयो दोषा मूत्रं पुरीषं च।


35.

उपरोक्त संदर्भ से यह पता चलता है की ,

5 विषमज्वरों का, क्रमशः 5 धातुओं से "निश्चित संबंध" चरक संहिता मे उल्लेखित हि नहीं है. 


36.

तो फिर … शास्त्रीय दृष्टी से , शास्त्रीय संदर्भ के अनुसार तो … अमुक धातू के लिए, अमुक धातू पाचक काढा ऐसे हो हि नही सकता !


37.

जो आज का व्यवहार चल रहा है , यह केवल एक कही सुनी, प्रस्थापित, रूढीजन्य, व्यावसायिक बात है और और इस विषमज्वर का, धातुपाचक का एवं शरीरस्थ धातूओं का कोई भी परस्पर निश्चित शास्त्रीय संबंध कुछ भी नही है ... ❌️🚫⛔️


38

इस कारण से जो आज प्रस्थापित लोकप्रिय , 

*किंतु अशास्त्रीय* एवं _मात्र रूढीजन्य_ धातुपाचक(🤔⁉️) व्यवहार मे उपयोग मे लाये जाते है, उन धातुपाचकों का वस्तुतः शास्त्रीय रूप मे, उस उस धातु से कुछ भी निश्चित संबंध है ही नही है ...नही है … नही है … !


39.

अगर हम औषधों को केवल "बेचने" के साथ हि, औषध "सोचने" पर काम करेंगे तो ... linking ourself with scientific thinking, will be surely possible✅️✅️✅️


40.

गुरुजी बायवारूं के प्रति कितना भी आदर क्यों न हो, उनके द्वारा रखे गए विचार को प्राथमिक कदम मानना चाहिए... अंतिम गंतव्य स्थान नहीं।


41.

आज धातुपाचक नाम की स्थापित संकल्पना और उसका व्यवहार एक असिद्ध अपरिक्षित अभ्युपगम assumed considered believed suposed अध्याहृत स्वीकृत ऐसे विचार पर आधारित है।


42.

भले ही उस मूल लेख में "उपरुग्ण पद्धति से देखा गया" ऐसा कहा गया हो, फिर भी सैंपल साइज़ और फॉलोअप अत्यंत छोटा, अपर्याप्त और अशास्त्रीय है।


43.

बायवारू गुरुजी के अनुभव और उसके पीछे के विचार कुछ भी हों... लेकिन अकेला धातुपाचक देकर उस धातु पर वृद्धि / क्षय के स्वरूप के या गुणांतर के स्वरूप के या वैगुण्य नाशक के स्वरूप के परिणाम, निश्चित रूप से और बार-बार प्राप्त हुए हों, तभी उस विचार को शास्त्रीयता और सार्थकता है।


44.

अन्यथा हम परंपरा से, श्रद्धा से, गतानुगतिक रूप से, पहले वाले उपयोग करते थे, इसलिए अभी के वैद्य... अभी के वैद्य उपयोग करते हैं, इसलिए आगे वाले वैद्य, इस पद्धति से धातुपाचक उपयोग करते हैं।


45.

“Right is right even if no one is doing it; wrong is wrong even if everyone is doing it.


46.

तथाकथित धातुपाचक के इन्क्लुजन और एक्स्क्लुजन के कारण, कुछ विशेष उल्लेखनीय परिणाम मिलते हों, तभी उसे उसका श्रेय देना, शास्त्रीय मानदंडों पर उचित होगा।


47.

अन्यथा व्यवहार, व्यापार, व्यवसाय, बिक्री, मार्केटिंग और लेख लिखना, व्याख्यान देना ... ऐसे अशास्त्रीय परंतु वाणिज्यिक व बोल-घेवड्या (बातूनी) उद्योगों के लिए वह ठीक है... वह वैसा ही चलता रहेगा।


48.

उपरोक्त संदर्भ से यह पता चलता है की …

5 विषमज्वरों का क्रमशः 5 धातुओं से "निश्चित संबंध" चरक संहिता मे उल्लेखित हि नहीं है. 


तो फिर अमुक धातू के लिए, अमुक धातू पाचक काढा ऐसे हो हि नही सकता, शास्त्रीय दृष्टी से , शास्त्रीय संदर्भ के अनुसार तो! 


49.

जो आज का व्यवहार चल रहा है , यह केवल एक कही सुनी, प्रस्थापित, रूढीजन्य, व्यावसायिक बात है और और इस विषमज्वर का, धातुपाचक का एवं शरीरस्थ धातूओं का कोई भी परस्पर निश्चित शास्त्रीय संबंध कुछ भी नही है ... ❌️🚫⛔️


50.

इस कारण से , विषमज्वर कषाय पंचक को धातुपाचक कहकर व्यवहार करना, अत्यंत अशास्त्रीय अनार्ष प्रक्षिप्त असत्य असिद्ध है.


लेखक ✍🏼 : 

वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे, 

एम डी आयुर्वेद संहिता, 

एम ए संस्कृत. 

आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे & नाशिक. 

मोबाईल 9422016871