Wednesday, 9 September 2026

पथ्यादि सप्तधा बलाधान वटी निर्माण by MhetreAyurveda Pharmacy

पथ्यादि क्वाथ सप्तधा बलाधान टॅबलेट्स by MhetreAyurveda Pharmacy 

लेखक ✍🏼 : 

वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे, 

एम डी आयुर्वेद संहिता एम ए संस्कृत. 

आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे & नाशिक. 

मोबाईल 9422016871

शिरोरोगेनेत्ररोगादौ च पथ्यादिषडङ्गक्वाथः

शिरो रोग तथा नेत्र रोग में उपयोगी पथ्यादि षडंग कषाय


संदर्भ शार्ङ्गधर संहिता

श्लोक 👇🏼

पथ्याऽक्षधात्रीभूनिम्बनिशानिम्बामृतायुतैः

कृतः क्वाथः षडङ्गोऽय सगुडः 


6️⃣ घटकद्रव्य 6️⃣ Contents 👇🏼

1. पथ्याऽक्षधात्री = त्रिफला 

2. भूनिम्ब = किराततिक्त 

3. निशा = हरिद्रा

4. निम्ब

5. अमृता = गुडुची युतैः

कृतः क्वाथः षडङ्गोऽयं = 6 घटक द्रव्य contents

6. सगुडः


पथ्यादि सप्तधा बलाधान वटी निर्माण विधी, MhetreAyurveda Pharmacy में 

👇🏼

त्रिफला 1400gms, किराततिक्त 1400gms, हरिद्रा 1400gms, निंब 1400gms & गुडूची 1400gms 

इनको मिलाकर होनेवाले 

7 किलो चूर्ण का शास्त्रोक्त पद्धती से क्वाथ बनाकर ...

उस क्वाथ को

👇🏼

त्रिफला 200gms, किराततिक्त 200gms, हरिद्रा 200gms, निंब 200gms & गुडूची 200gms 

इनको मिलाकर 

जो 1 किलो चूर्ण होता है ...

इस मूलाधार/ बेस चूर्ण मे ... 

घोटकर ... अवशोषित करना ॲब्सॉर्ब करवाना इन्स्टॉल करना ...

& फिर इसे सुखाकर उसकी 250mg की टॅबलेट्स बनाना अर्थात ...

👆🏼

MhetreAyurveda Pharmacy का पथ्यादि सप्तधा बलाधान वटी निर्माण!!!



फलश्रुति = उपयोग = अर्हता Indications 👇🏼

शीर्षशूलहृत्

भ्रूशङ्खकर्णशूलानि तथाऽर्धशिरसो रुजम्

सूर्यावर्त्तं शङ्खकं च दन्तपातं च तद्रुजम्

नक्तान्ध्यं पटलं शुक्रं चक्षुःपीडां व्यपोहति


शिरःशूल तथा भ्रू, शङ्ख, कर्ण यहां का शूल = वेदना, अर्धावभेदक की वेदना, सूर्यावर्त का वेदना, दंतपात जन्य वेदना तथा विविध नेत्ररोग इनमे उपयोगी


पथ्यादि का गामित्व शिर है, विशेषतः वातप्रधान विकारो मे उपयोगी है 


इसमे त्रिफला होने के कारण यह नेत्रगत विकारो मे भी (कुछ मर्यादा तक) उपयोगी है 


गुड यह इक्षु विकृती है, जो प्रतिश्याय मे भी हरीतकी के साथ निर्दिष्ट है... 

तथा गुड यह अभिष्यंदि होने के कारण एक उत्क्लेशकद्रव्य है, इस कारण से वात के साथ साथ, यह पित्त और कफ इन मूर्तिमंत पृथ्वी जल प्रधान अवरोधकारक घटकों को , सूक्ष्म स्रोतस् स्थित/गत/लीन अवकाशों से... सायनस से ... आकाशीय भावों असे विलग अलग करने में निष्कासित करने में, सक्षम होता है 


साथ ही इसमे त्रिफला होने के कारण रूक्षता के रूप मे क्लेद का शोषण और विरेचन के रूप मे अनुलोमन या शोधन के रूप मे उपयोगी होता है 


त्रिफला जत्रूर्ध्वगत वात कफ जन्य विकारों का मुख्य उपक्रम धूमपान के तीक्ष्ण धूमपान के द्रव्यों में समाविष्ट है इसीलिए यह उत्तमांग शोधन है


भूनिम्ब अर्थात किराततिक्त यह महासुदर्शन का मुख्य घटकद्रव्य है जो ज्वर नाशक अर्थात आमनाशन पाचन के रूप मे उपयोगी है ... स्वयं सारक अर्थात मृदुविरेचक है ज्वरान्ते रेचनं दद्यात्


हरिद्रा मेह का अग्र्य द्रव्य है, इस कारण से क्लेदनाशक है, दारू हरिद्रा के गुण हरिद्रा के समान होते है, इसलिये उत्तमांग शोधन के रूप मे उपयोगी है 


निंब पंचतिक्त में समाविष्ट है तथा कृमि कुष्ठ इनका नाशक है तथा निंब यह आरोग्यवर्धिनी का मुख्य और एकमात्र भावना द्रव्य है इसलिये कुष्ठ जैसे क्लेद (कफ पित्त) प्रधान विकार का नाशक है 


गुडूची वातरक्त नाशक हे अर्थात फिरसे क्लेदनाशक हे तथा शोणितविबंधनाशक हे अर्थात अवरोध नाशक है तथा संशमन और रसायन & मेध्य होने के कारण में होने के कारण इंद्रिय प्रसादक है 


इस प्रकार से गुड = स्नेहन उत्क्लेशन , त्रिफला = विरेचन शोधन प्रक्रिया द्वारा तथा निंब किराततिक्त हरिद्रा गुडूची = क्लेद शोषण रूक्षण प्रसादन इस शमन प्रक्रिया द्वारा ... विशेषतः वातजन्य तथा वात को अवरोध के द्वारा प्रकोपित करने वाले पित्त कफ का भी गौण रूप मे शमन करने में पथ्यादि सक्षम है 


शिर इस ग्राॅस या व्यापक या अम्ब्रेला स्वरूप अवयव के साथ साथ ,

शिर का अर्थ intra cranial इंट्राक्रेनियल स्पेस = जो अवकाश तथा peri cranial आसमंत = सायनसेस जिसमे मॅक्सिलेरी फ्रंटल स्फिनाॅइड इथेमाॅईड तथा मॅस्टाॅईड सेल्स और इस प्रदेश मे होने वाले सभी अन्य अवकाश जिसमे नेत्र गोलक, कर्ण कंठ जोडने वाली युस्टेशियन ट्यूब , नासा , मॅक्झेलरी सायनस, नाझोलॅक्रिमल डक्ट, नेझल मेटस, मुखकुहर, कंठ, फॅरिन्क्स लॅरिंक्स ये जो सभी जत्रूर्ध्व प्रदेश में आकाशीय भाव है, अवकाश है, सायनस है, व्हॅक्युओल्स है, ट्यूब है ... तथा कर्ण के अंतर्गत बाह्य मध्य अंतर कर्ण, इन सभी मे जो अवकाश है , जो काॅक्लिआ और व्हेस्टीब्युल के रूप मे दिशा संतुलन बॅलन्स इनका नियंत्रक है, इन सभी अवयव मे जो मुख्यतः वातजन्य और गौण रूप मे पित्त कफजन्य विकृतियां होती है, इन सभी मे गामित्व के रूप मे , दोष शामकत्व के रूप मे, अवरोधनाशके रूप मे , शोधन प्रक्रिया के रूप में ... तथा शमन प्रसादन क्षोभनाशन के रूप मे *पथ्यादि एक संतुलित योग* के रूप मे काम करता है ...

जिसमे ...

गुड यह स्नेहन & उत्कलेशन का तथा 

त्रिफला यह रूक्षण शोधन अनुलोमन का और 

निंब किरात गुडूची हरिद्रा ये शमन प्रसादन के रूप मे सर्वोपकारी कार्य करते है


इसलिये किसी भी प्रकार की वेदना वाले शिरो रोग मे... चाहे वह 

आधुनिक काल का मायग्रेन हो या 

ट्रायजेमिनल न्यूराल्जिया हो

सायनुसाईटिस के कारण होने वाला शिरो गौरव हो या

अम्लपित्त छर्दि इनके लक्षण या उपशम से युक्त शंखशूल हो या 

बाह्य कारण से या अभ्यंतर कारण से होने वाला कर्णशूल / कर्ण गौरव / कर्णस्राव / कर्ण नाद / टिनिटस ये हो या 

मध्यकर्ण गत इन्फ्लामेशन इन्फेक्शन हो या 

अंतःकर्णगत श्रुती हानी या संतुलन नाश इम्बॅलन्स या भ्रम व्हर्टिगो इस प्रकार की विकृती हो या 

पराईटल टेंपोरल ऑक्सिपिटल फ्रंटल यहां का शिरःशूल हो जो 

आतपजन्य क्रोधजन्य शोकजन्य या बीपी बढने के कारण होने वाला शिरःशूल हो अथवा 

वातजन्य या कफ अवरोधजन्य या पित्त इन्फ्लामेशन जन्य सायनुसायटिस जन्य शिरःशूल हो या 

नेत्र गोलकमे दोषजन्य विकृतियां हो या 

नासा (प्रतिश्याय सायनुसाईटिस छींके नाक बंद होना नाक से पानी आना नाक मे खुजली होना) कंठ (टाॅन्सिल्स फॅरिंजायटिस) मुखकुहर(मुखपाक दंतशूल जिंजिव्हायटिस) इनमे वात या वातकफ या वातपित्त या पित्तकफ प्रधान / जन्य विकृती हो, 

किसी ने किसी कार्मुकता से , मोड ऑफ ॲक्शन से पथ्यादि निश्चित रूप से उपशमकारी होता है ...


जिसमे त्रिफला यह शोधन रूक्षण नेत्रहितकारी इस रूप में कार्यकारी है उपयोगी है प्रभावी है 


गुड यह मधुर गुरु स्निग्ध होने के कारण वातशामक है तथा उसके अभिषंदी स्वभाव के कारण दोष उत्क्लेशकद्रव्य है अर्थात स्रोतोलीन दोषों को निकालने वाला है और 

निंब किराततिक्त हरिद्रा गुडूची ये बाकी के चार द्रव्य यह अपने स्व सामर्थ्य से रोगघ्नता से गुणसंपन्नता से क्लेदशोषक दोषशामक प्रसादक & धातु दुष्टी नाशक इस प्रकार से कार्यकारी है

इस कारण से केवल शिर या नेत्र नही अपितु 

जत्रूर्ध्वगत प्रदेश में शिर कपाल शंख कर्ण नेत्र नासा दंत मुख जिह्वा कंठ फॅरिंक्स लॅरिंक्स सायनसेस मॅस्टाॅईड युस्टेशियन ट्यूब काॅक्लिया व्हेस्टीब्युल मिडल इयर एक्स्टर्नल & इंटर्नल इयर तथा इंट्रा क्रेनियल, पेरि क्रेनियल इन सभी स्थानो पर होने वाले मुख्यतः वातप्रधान तथा पित्त कफजन्य विकृती में पथ्यादि निश्चित रूप से कार्यकारी होता है 

मात्रा

विकारों की या वेदना की तीव्रता अत्यंत हो तो , 6 टॅबलेट्स, दिन में 3/4बार, भोजन के पश्चात् या रात्री सोने से पहले स्वप्नकाल=निशिकाल में...


विकार या वेदना की तीव्रता मध्यम हो तो 4 टॅबलेट & 


विकार या वेदना की तीव्रता अल्प हो तो 2 टॅबलेट 

👆🏼

इस प्रकार से इसकी मात्रा देना उपयोगी होता है 


अनुपान 

प्रत्यक्ष टॅबलेट मे गुड का समावेश नही कर सकते, इसलिये ...

गुड / गुडोदक = गुड घोला हुआ जल 

उष्णोदक या 

मुद्गयूष या 

आर्द्रक सिद्ध/ लसूण सिद्ध क्षीरपाक या 

घृत & उष्णोदक 

इसका अनुपान यथाव्याधी यथा ऋतू यथादोष यथा वय यथादेश देना उपयोगी हो सकता है


कालावधी

तीव्र शूल/वेदना के लिये आधे घंटे 30 मिनट से लेकर 3 घंटे उपशम आना संभव है 


और दीर्घकालीन चिरकारी व्याधी के लिये 2 सप्ताह से 6 सप्ताह तक = 14 से 42 दिनों तक इस योग का निरंतर उपयोग करना आवश्यक हो सकता है

अन्य योग कॉम्बिनेशन्स combination 

1.

यदि वेदना अधिक्य हो तो दुरालभादि वेदनाशामक or गृध्रसीनाशक 

2.

यदि धातुक्षयजन्य संप्राप्ति या कारण हो तो विदार्यादि / यष्टी गोक्षुर कल्प / कूष्मांड कल्प / शालिपर्णी कल्प 

3.

यदि क्षोभ मनस्ताप भावनिक वैचारिक बौद्धिक स्ट्रेस ये कारण हो तो यष्टी सारिवा & घृत क्षीर नस्य तर्पण नेत्र पिचु

4.

यदि अग्नि पित्त रक्त उष्णता व्हायरल इन्फेक्शन टायफाईड मलेरिया डेंग्यू चिकनगुनिया इस प्रकार का कारण या इतिहास हो तो वासागुडूच्यादि

5.

यदि अम्लपित्त के लक्षण साथ मे हो और छर्दि से शीघ्र उपशम मिलता हो तो भूनिंबादि 

6.

यदि प्रतिश्याय पीनस सायनुसायटिस ऱ्हायनायटिस इस प्रकार का लक्षण हो तो उत्तमांगशोधन 

7.

यदि मलावरोध कॉन्स्टिपेशन हो तो साथ मे कोई नित्य मृदु विरेचन 

8.

शिरोरोग में रक्त यह दूष्य होने के कारण जहा संभव & आवश्यक हो, वहां पर रक्त मोक्षण करना उपयोगी होता है






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