Monday, 13 April 2026

सभी पेशंट के लिये चिकित्सा के आरंभ में सामान्य नियम

सभी पेशंट के लिये चिकित्सा के आरंभ में सामान्य नियम

किसी भी लक्षण या व्याधी के लिए या रिपोर्ट के लिए ट्रीटमेंट देने से पहले या साथ मे ...

पेशंट को दो प्रश्न पूछना चाहिए ॲसिडिटी है क्या और कॉन्स्टिपेशन है क्या?



ॲसिडिटी या उससे संबंधित या सदृश समान लक्षण हो तो उसको पहले ठीक करे उसके लिए यथा संभव भूनिंबादि या वासागुडूच्यादि या यष्टी सारिवा इसका प्रयोग करे 


कॉन्स्टिपेशन मलावरोध गॅसेस या उससे संबंधित उसके सदृश या समान लक्षण है तो कोई मृदु अनुलोमन जो आपके प्रॅक्टिस मे आपको अच्छा अनुभव हो वह अपान काल में देना चाहिए 


आमाशय और पक्वाशय इनका स्वास्थ्य अगर हमने ठीक रखा तो, बाकी जो भी हम आहार या औषध देंगे उसका शीघ्र और अच्छा परिणाम प्राप्त होता है 


तो किसी भी लक्षण को औषध देने से पहले इन दो आशयों का व्यापार ठीक से चल रहा है इसकी सुनिश्चित व्यवस्था या रिपेअर, जो आवश्यक है, वो करे... उसके लिए जो औषध और आहार विहार मे परिवर्तन करना है , वो अन्य लक्षण के लिए दिया जाने वाले औषध के साथ ही दे दे 


आमाशय के लिए औषध या तो भोजन के बीच मे या भोजन के पश्चात दे दे 


और पक्वाशय के लिये औषध भोजन के प्रारंभ मे देना

Friday, 27 March 2026

The Reality of Viddhakarma 📌📍 & Marma Chikitsa(?) ! Intellectual Robbery of Acupuncture & Varma Chikitsa in Siddha!

The Reality of Viddhakarma 📌📍 & Marma Chikitsa(?) ! Intellectual Robbery of Acupuncture & Varma Chikitsa in Siddha!






Presented/spread in the interest of all patients, well-wishers of Ayurveda, students, and young Vaidyas!!!

In the "Ashtavidha Shastra Karma" (eight types of surgical procedures) mentioned by Sushruta, there are words like "Vyadha" or "Vedhan"... however, these are in the context of "Siravedha," meaning as a type of "Raktamokshana" (bloodletting). But apart from Siravyadha, the word "Viddha" is not mentioned anywhere else as a form of treatment. The word "Viddha" has appeared in the context of certain procedures in Marma, Srotas, Karna (ear), and Drushti (vision) diseases.

However, today, based on popularity and crowd/throng, the way a fake narrative is being created, and for that, from top Ayurveda institutes to presentations happening in general-level seminars or colleges—everywhere—people are running behind this, becoming crazy! This is a matter of surprise, but also of misfortune!

In reality, what is considered today in the field of Ayurveda as a means of gaining popularity and gathering a crowd by the name of "Viddha Karma"... that is, in reality, a theft, robbery, and loot committed at an intellectual level! There is another science named Acupuncture; because only BAMS degree holders are practicing it, it is being given a local name and established as Viddha Karma in Ayurveda through Goebbels’ theory, by repeatedly telling lies.

It may be true that the results of what is done in the field of Ayurveda today in the name of Viddha Karma are good... but there are results and people with BAMS degrees perform it; that does not mean that Viddha Karma—which has been brought here by dragging it, by stealing, looting, and committing dacoity of the science of Acupuncture = "Intellectual Robbery"—is Ayurveda!

I have no objection to anyone’s popularity or their skill in gathering a crowd.

But while doing that, “in the name of Ayurveda science,” committing intellectual theft = Intellectual Robbery of another science, and using it on patients boldly in an unethical, non-ethical, and non-moral manner in broad daylight... this is an extremely improper, prohibited, censurable, contemptible, and rejectable tendency!

I have no opposition to any individual...

But I am an extreme opponent of this tendency of "selling" a method of another science, which was never in the Ayurveda science, "in the name of Ayurveda."

To commit this kind of "Intellectual Robbery" is, in my view, a hypocrisy (Pakhanda), and it is the exploitation and misleading of the patient who is our breadwinner (Annadata)... so such unethical things should not be done... and if someone is doing it, then the competent authority/competent institution/Regulatory Authority should put a ban/restriction/BAN on it...

However, instead of this happening, due to the pressure of popularity and the crowd, the top institutes of the Ayurveda field and their experienced and senior heads are dancing with this Viddha Karma on their heads... seeing this, we have completely failed in our "loyalty" toward the science and "thinking" from the perspective of the science, and we have nothing to do with the science... we don't want to "think" anything for the science! ... We want to "sell" every "thing" that "makes money" in the name of Ayurveda, "by any means possible"!

I condemn this "selling," "business-minded," and "selfish" tendency in the strongest possible words.

And the tendency of "selling" the skills or methods of other sciences in the name of Ayurveda is not only about this Viddha Karma... rather, this tendency is also regarding popular things like Yoga, Rasashastra, and Nadi... which have no connection—not even distantly—with the original Samhitas of Ayurveda, its principles, clinical examination methods, or the principles of Bhaishajya Kalpana!

A therapy by the name of Marma Chikitsa is also run in the field of Ayurveda "in the name of Ayurveda"... but that is actually inspired by the "Varma" therapy of the "Siddha" branch of Ayush! In Ayurveda, the number of Marma is only 107! In this Siddha system, the "Varma" number is 108... or according to various references in the Siddha system, the Varma number (not Marma) is 251, 500, or 8000, which is much more than the Marmas mentioned in Ayurveda.

The classification of these Varmas in the Siddha system is also very different from the Ayurveda Marma classification!

In Ayurveda, Marma is mentioned only for diagnosis (Nidana)! The use of Marma as a treatment (Chikitsa) is not mentioned anywhere in the Ayurveda science at all.

By again committing Intellectual Robbery = intellectual theft from the other medical system named Siddha, these things are run in the name of Marma therapy. This is similarly an unethical, non-moral, and unethical tendency!

Varma or Marma therapy is possibly a corrupted form, copy, imitation, or mockery of Acupressure itself.

One does not even know how to study one's own Ayurveda science... because it is not understood, because the original Sanskrit Samhitas, commentaries, and original Ayurveda science do not enter anyone's head... therefore, after taking a BAMS degree, in the name of Ayurveda, "marketing" and "selling" things of any other science "only to make money" and "by making fools of people" is an extremely censurable, rejectable, prohibited, and contemptible tendency.

The scientific validity of any thing is not determined by its popularity or its crowd-pulling capacity... scientific validity is determined by whether it is consistent with the principles of that science or not! Determining the scientific validity of something based on the majority is not as simple as democracy!

Scientific validity is decided on principles, not on popularity and crowds... Be careful!

विद्धकर्म 📌📍 & मर्म चिकित्सा(?) का वास्तव! ॲक्युपंक्चर & सिद्ध के वर्म चिकित्सा की, की गई बौद्धिक चोरी = इंटेलेक्च्युअल रॉबरी

विद्धकर्म 📍📌 & मर्म चिकित्सा(?) का वास्तव! ॲक्युपंक्चर & सिद्ध के वर्म चिकित्सा की, की गई बौद्धिक चोरी = इंटेलेक्च्युअल रॉबरी




सभी पेशंट तथा आयुर्वेद के हितचिंतक विद्यार्थी एवं नवतरुण वैद्यों के हित में प्रसृत / प्रस्तुत !!!


सुश्रुतोक्त अष्टविध शस्त्र कर्म मे "व्यध या वेधन" ऐसे शब्द है ... किंतु ये सिरा वेधके संदर्भ में अर्थात रक्तमोक्षण का एक प्रकार इस रूप मे है. किंतु सिराव्यध छोडकर, अन्य कही पर भी विद्ध शब्द उपचार के रूप मे उल्लेखित नही है. विद्ध शब्द मर्म स्रोतस कर्ण दृष्टि रोग मे कुछ प्रक्रिया के संदर्भ मे आया है. 


किंतु आज जिस प्रकार से लोकप्रियता & भीड/crowd के आधार पर एक फेक नॅरेटिव्ह बनाया जा रहा है और उसके लिए शीर्ष आयुर्वेद संस्थान से लेकर सामान्य स्तर के सेमिनार या कॉलेज तक में होने वाले प्रस्तुतीकरण यहां तक, सभी जगह, लोग इसके पीछे पागल होते हुए दौड रहे है! यह आश्चर्य की किंतु दुर्दैव की बात है !


वस्तुतः आज जिसे आयुर्वेद क्षेत्र में विद्ध कर्म नाम से लोकप्रियता और भीड जमा करने का साधन माना जाता है ... वह वस्तुतः, बौद्धिक स्तर पर की गई, एक चोरी डकैती लूट है! ॲक्युपंक्चर नाम का जो कोई अन्य एक शास्त्र है, उसको केवल BAMS डिग्रीधारक कर रहे है, इसलिये उसको यहां का नाम देकर आयुर्वेद में विद्ध कर्म इस प्रकार से, गोबेल्स थिअरी के द्वारा , बार बार झूठ बोल कर प्रस्थापित किया गया है.


यह सत्य हो सकता है की विद्ध कर्म नाम से आज आयुर्वेद के क्षेत्र में, जो किया जाता है, उसके रिजल्ट अच्छे है ... किंतु रिझल्ट है और BAMS की डिग्री है वो लोग इसे करते है; इसका अर्थ वह विद्धकर्म, जो ॲक्युपंक्चर शास्त्र को चुरा कर , लूट कर , डकैती करके = "इंटेलेक्च्युअल रॉबरी" करके, यहां घसीट कर लाया गया है ... वह आयुर्वेद नही है!


मुझे किसी की लोकप्रियता या भीड जमा करने का कौशल्य इस पर कोई आपत्ती नही है 


किंतु वह करते समय, *"आयुर्वेद शास्त्र के नाम पर"* , किसी अन्य शास्त्र की बौद्धिक चोरी = इंटेलेक्च्युअल रॉबरी करके, उसका अनैतिक नाॅन एथिकल नॉन मॉरल रूप मे, दिनदहाडे, पेशंट पर धडल्ले से उपयोग किये जा रहे है ... यह अत्यंत अनुचित निषेधार्ह निंद्य गर्हणीय त्याज्य वर्ज्य इस प्रकार की यह वृत्ती है !


मेरा किसी व्यक्ति को कोई विरोध नही है ...


किंतु आयुर्वेद शास्त्र मे जो कभी था ही नही , ऐसी पर शास्त्र की विधि को, *"आयुर्वेद के नाम पर" ... "बेचना"* इस वृत्ती का मैं आत्यंतिक विरोधी हूँ. 


इस प्रकार की "इंटेलेक्च्युअल रॉबरी" करना, यह मेरी दृष्टी से एक पाखंड है और जो पेशंट हमारा अन्नदाता है उसका यह एक्स्प्लाॅयटेशन है, दिशाभूल है ... तो ऐसी अनैतिक अनएथिकल चीजे नही करनी चाहिए ... और अगर कोई कर रहा है तो उसको सक्षम अधिकारी/ सक्षम संस्था/ Regulatory Authority ने , उस पर पाबंदी/रोक/BAN लगाना चाहिये ...


किंतु ऐसा न होते हुए लोकप्रियता और भीड का दबाव इस कारण से, आयुर्वेद क्षेत्र के शीर्ष संस्थान & उनके अनुभवी और ज्येष्ठ प्रमुख, इस विद्धकर्म को सर पर लेकर नाच रहे है ... ये देखते हुए हमारी शास्त्र के प्रति "निष्ठा" और शास्त्र की दृष्टी से "सोचना", इसमे हम पूर्णतः असफल हुए है और हमे शास्त्र से कुछ भी लेना देना नही है... शास्त्र के लिए हमे कुछ भी "सोचना" नही है ! ... हमे , "जैसे भी हो सके" , आयुर्वेद के नाम पर, "पैसा बनाने वाली" हर "चीज" को *"बेचना"* है! 


मै इस "बेचने" वाली , "धंदा" करने की "स्वार्थी" वृत्ती का अत्यंत तीव्र शब्द मे निषेध करता हूँ. 


और अन्य शास्त्र के कौशल्य को या विधियों को, आयुर्वेद के नाम पर "बेचना" यह वृत्ती, केवल इस विद्ध कर्म के बारेमे ही नही है ... अपितु, यह वृत्ती ; योग रसशास्त्र नाडी इन लोकप्रिय चीजों के बारे मे भी है ... की जिनका आयुर्वेद की मूल संहिताओ से, तत्त्वों से, नैदानिक परीक्षण विधियों से, भैषज्य कल्पना के सिद्धांतों से ... दूर दूर तक ... कोई भी संबंध नही है!


एक मर्मचिकित्सा नाम से भी एक थेरेपी आयुर्वेद क्षेत्र में "आयुर्वेद के नाम पर" चलाई जाती है ... लेकिन वो ॲक्च्युली "सिद्ध" इस आयुष् अंगके "वर्म" चिकित्सा यहा से प्रेरित है ! आयुर्वेद में मर्म संख्या केवल 107 है! इस सिद्ध पद्धती में "वर्म" संख्या 108 है ... या विविध संदर्भों को अनुसार सिद्ध पद्धती में वर्म संख्या (मर्म नही) 251, 500 या 8000 ऐसी आयुर्वेदोक्त मर्मों से अधिक है. 


इन वर्मों का वर्गीकरण भी सिद्ध पद्धती में, आयुर्वेद मर्म वर्गीकरण से बहुत ही अलग है!


आयुर्वेद मे मर्म यह केवल निदान के लिए उल्लेखित है! मर्म का चिकित्सा के रूप मे कोई भी उपयोग कही पर भी आयुर्वेद शास्त्र मे उल्लेखित है ही नही. 


सिद्धनामक अन्यचिकित्सा पद्धती से फिरसे इंटेलेक्च्युअल रॉबरी = बौद्धिक चोरी करके ये मर्म चिकित्सा नाम से चीजे चलाई जाती है. ये इसी प्रकार से एक अन् एथिकल नॉन मॉरल अनैतिक वृत्ती है !


वर्म या मर्म चिकित्सा, संभवतः ॲक्युप्रेशर का ही एक कॉपी नकल अनुकरण इमिटेशन भ्रष्ट स्वरूप होने की संभावना है


स्वयंके आयुर्वेद शास्त्र का अनुशीलन करना तो आता ही नही है ... क्यूकी वह समजता नहीं, क्यूंकि मूल संस्कृत संहिता टीका मूल आयुर्वेद शास्त्र किसी के पल्ले पडता ही नही ... इसलिये BAMS डिग्री लेकर आयुर्वेद के नाम पर किसी भी अन्य शास्त्र की चीजों को "सिर्फ पैसाबनाने के लिए" , "लोगों को मूर्ख बनाकर" उन चीजों को "मार्केटिंग" कर कर के "बेचना" यह आत्यंतिक निंद्य त्याज्य वर्ज्य गर्हणीय त्याज्य वृत्ती है


किसी भी चीज की शास्त्रीयता उसकी लोकप्रियता या भेट जमा करने की कपॅसिटी क्राउड पुलिंग कॅपॅसिटी इस पर निर्धारित नही होता है ... शास्त्रीयता , उस शास्त्र के सिद्धांत से सुसंगत है या नही, इस पर निर्धारित होती है! बहुसंख्या पर किसी चीज की शास्त्रीयता निर्धारित करना, यह डेमोक्रसी जितना सरल नही है ! 


शास्त्रीयता यह सिद्धांत पर निश्चित होती है, न की लोकप्रियता पर और भीड पर ... सावधान रहे!

Friday, 20 March 2026

शिरोधारा का वास्तव !?

शिरोधारा का वास्तव?!


लेखक : वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे

एम डी आयुर्वेद संहिता जामनगर 1998

आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे & नाशिक 


शिरोधारा आज आयुर्वेद क्लिनिक का बोधचिन्ह या लोगो बन गया है!


शिरोधारा इस संज्ञा से शास्त्र मे कही पर भी उल्लेख या संदर्भ नही है! 


मूलतः मूर्धतैलम् यह अष्टांगहृदय सूत्र स्थान 22 मे 4 प्रकार मे से एक मूर्धा सेक/ मूर्धा परिषेक यह आज शिरोधारा के रूप मे लोकप्रिय है.


मूर्धतैल के 4 प्रकार है ... 

1. अभ्यंग 

2. सेक = परिषेक = शिरोधारा

3. पिचु और 

4. बस्ति! 


Indications/Benefits :


1. अभ्यंग for रौक्ष्य कण्डू मल

2. सेक/परिषेक = शिरोधारा for अरूंषिका शिरस्तोद दाह पाक व्रण 

3. पिचु for केशशात स्फुटन धूपन नेत्रस्तम्भ

4. बस्ति for प्रसुप्ति अर्दित जागर नासास्यशोष तिमिर शिरोरोग दारुण


तो ऍक्च्युली जिस अवस्था के लिए सेक परिफेक शिरोधारा या शास्त्र मे बताई गई है उसके लिए तो आज उसका पेशंट मे उपयोग होता हुआ दिखाई नही देता है !

आज केवल मार्केटिंग के रूप मे इसका स्ट्रेस मे अच्छा है, नींद के लिये उपयोग होता है, ऐसा है गोबेल थेअरी के द्वारा "प्रस्थापित" किया गया है जो की असत्य शास्त्रीय और झूठ है पेशंट को अच्छा लगता है पेशंट डिमांड करते है इसलिये हम शिरोधारा करते है यह जस्टीफिकेशन शास्त्रीय न होकर कमर्शियल यह शास्त्रीय "सोचना" न होकर , यह केवल "बेचना" इस प्रकार की की वृत्ती है


आयुर्वेद शास्त्रीय प्रॅक्टिस या चिकित्सा उपचार इनका उद्देश पेशंट क्या "चाहता", है पेशंट को क्या "अच्छा लगता" है, पेशंट की क्या "डिमांड" है ... इस पर नही चलता है !


वस्तुतः, पेशंट की "आवश्यकता" क्या है "need" क्या है , इस पर शास्त्रीय प्रॅक्टिस = चिकित्सा व्यवहार आधारित होता है!!!


अगर हम पेशंट की "डिमांड" की पूर्ती के लिए कुछ कर रहे है, तो फिर हम कि प्रॅक्टिस नही कर रहे है ... हम रिसॉर्ट स्पा सलून पार्लर इस प्रकार की सेवा व्यवस्था = सर्विस इंडस्ट्री चला रहे ... किंतु, हमने तो डिग्री एक प्रोफेशनल कन्सल्टंट = आरोग्य मार्गदर्शक के रूप मे कार्यरत होने के लिए ली है!


मूर्धतैल के 4 प्रकारों के नामों का सभी का पर्यायी नाम देखेंगे तो ... मूर्धा की जगह शिरस् ऐसा शब्द रखके शिरोभ्यंग, शिरः परिषेक (= शिरोधारा), शिरःपिचु & शिरोबस्ति ... ये यथोतर बलवान है अर्थात अधिक परिणामकारक है


अभ्यंग और पिचु ये उतने लोकप्रिय नही रहे 


किंतु अगर पिछली पिढी में देखा जाये तो... शिरोभ्यंग यह विधी; चंपी/तेलमालिश के रूप में तथा नवजात शिशुओं के शिरःपूरण (टाळू भरणे) = हर घर मे एक वर्ष तक, शिर मूर्धा अभ्यंग करना यह एक सामाजिक रूढी भी थी ... और लोकप्रिय गाना देखेंगे तो ... "सर जो तेरा चकराये या दिल डूबा जाये" ... इस जॉनी लिव्हर पर चित्रित, मोहम्मद रफी का गाना, चंपी तेलमालिश के रूप मे शिरोभ्यंग का स्मरण करता है 


दूसरी तरफ शिरोबस्ती अत्यंत प्रभावी होने पर भी उसके लिए जो यंत्रणा जो प्रिपरेशन करना पडता है वह अधिक दुष्कर है... सर्वाधिक दुष्कर और अप्रिय अवांछित बात तो ये है कि शिरोबस्ती के लिये शिर के सभी बाल निकालने पडते है अर्थात गंजा टक्कल खल्वाट bald इस स्थिती मे आना पडता है, जो किसी भी व्यक्ति को मान्य नही होता है, सहसा!


इसीलिये यह शिरोबस्ति सामाजिक व्यवहार मे कभी भी लोकप्रिय नही रहा !


"तलम्" नाम से कुछ इसका परिवर्तित स्वरूप दक्षिण भारत मे व्यवहार में है 


"शिरोभ्यंग" करते समय, उतने समय तक करने वाले परिचारक/therapist व्यक्ती को समय व्यय और शारीरिक कष्ट होते है ... labor & time!


"शिरःपिचु" विधि में स्नेह से आप्लावित कार्पास पिचु या कोई कपडा फोल्ड करके रखना , इतना सुखावह या हॅपनिंग या फील गुड या लक्झरी या स्पा ट्रीटमेंट की तरह नही लगता है ... इसलिये!!!


परिचारक का समय बंधा ना रहे (occupied& busy therapist) और कोई विशेष दुष्कर यंत्रणा करनी ना पडे और सबसे इम्पॉर्टंट जो फील गुड हॅपनिंग रिसॉर्ट इस प्रकार का लक्झरी ट्रीटमेंट "लगे .."

यह मूर्धा अभिषेक या शिरः परिषेक या "मार्केटिंग" मे बहुत ज्यादा "हाईप" किया गया, झूठे लाभ प्रचारित करके "प्रस्थापित" किया गया ... शिरोधारा यह उसी का भ्रष्ट स्वरूप है !


वस्तुतः ये जो चारो मूर्ध तैल है ...

ये मूर्धा पर अर्थात शिरके सर्वोच्च स्थान पर करने है, इसे व्हर्टेक्स vertex रोमावर्त अधिपति या उसके आसपास का प्रदेश कहेंगे ...


किंतु जैसे की सभी को ज्ञात है की ... "शिरोधारा" यह "आज का जो लोकप्रिय हॅपेनिंग ट्रीटमेंट" है , यह मूर्धा = शिरस् पर नही किया जाता ... यह आज ॲक्च्युअली कपाल भाल ललाट फोरहेड पर ... भ्रू भवें eye brow के थोडा पीछे , धारा की जाती है ... तो इसे शिरोधारा न कहते हुए , भालधारा कपालधारा ललाटधारा forehead oil stream कहना चाहिए!


आयुर्वेद की आज के व्यवहार में पेशंट को इस विधी से क्या लाभ होगा यह "सोचना" उतना आवश्यक नही समजा जाता , जितना की पैसा बटोरने के लिए क्या "बेचना" अधिक फायदेमंद होगा इसका विचार अधिक होता है !!!


वैसे देखा जाये तो शिरोधारा यह अन्य तीन मूर्धतैल प्रकारों की तुलना मे "अत्यंत अल्पकाल और कोई भी प्रेशर दिए बिना" , ॲक्च्युअली मूर्धा या शिरस् से अत्यल्प संपर्क होकर ही तैल का निर्गमन होने वाली विधि है !


अभ्यंग मे हात का प्रेशर और बहुत दीर्घकाल तक ॲक्च्युअली मूर्धा या शिरस् की त्वचा = स्काल्प इसके साथ तैल का संपर्क रहता है 


शिरःपिचु में ... जितना तेल है, पिचु के आकार के शिरःप्रदेश मूर्धाप्रदेश स्काल्प त्वचा इनके संपर्क में तैल रहता है 


शिरोबस्ति में अत्यंतिक/अत्यधिक मात्रा मे तेल का बहुत बडा स्तंभ , scalp = शिरस्त्वचा से एक अंगुल उपर तक उसका स्तर या लेवल बहुत दीर्घकाल तक धारण किया जाता है; 

तो अभ्यंग, पिचु और बस्ति ये जो मूर्धतैल के प्रकार है इनमें, तैल एवं scalp/शिरोभूमि इनका परस्पर संपर्क का कालावधी और उसका प्रेशर यह तुलना मे अधिक रहता है !


जहां पर शिरोधारा मे तैल बहता रहता है और मूर्धा तक आता ही नही ... वह कपाल पर गिरता है और वहा से बालो मे जाकर शिरस्त्वचा को जैसे तैसे संपर्क करके या बिना संपर्क किये निकल जाता है. 


क्यूकी बाल तो निकाले हुए नही रहते है , बाल तो जैसे है वैसे ही होते है और पिचु अभ्यंग या बस्ति की तरह ग्रॅव्हिटी या हस्त स्पर्श इनका प्रेशर भी तेल को स्काल्प के संपर्क मे आने की सहायता नही करता है 


क्योंकि शिरोधारा मे समांतर parallel गती में बह जाता है निकल जाता है ... ऐसा होने के बावजूद शिरस् अभ्यंग शिरःपिचु शिरोबस्ति इनका प्रचलन आज के व्यवहार मे नही है!


क्यूकी इन तीनो प्रकारो मे समय, मटेरियल, कौशल्य इनके साथ साथ परिचारक की संपूर्ण काळ व्यक्तिगत फिजिकल उपस्थिती इनकी आवश्यकता होती है और उसमे फील गुड हॅपनिंग स्पा ऐसे वेलनेस ट्रीटमेंट का अनुभव नही आता है ... जो की शिरोधारा मे पेशंट को बेड पर आराम से लिटाकर मॅन्युअली या यांत्रिक रूप में लूप मे रिपीटेशन आवर्तन में रोटेशन के रूप मे तेल की धारा कपाल पर डाली जा सकती है , उसको ऑटोमेटेड यांत्रिक भी बनाया जा सकता है , जिसे की परिचारक का समय उसने बंधा ना रहे और थोडासा मंद प्रकाश & कोई संगीत लगाया तो पेशंट को भी फील गुड होता है!!


वस्तुतः यह शिरोधारा शिरस पर नहीं अपितु कपाल भाल ललाट फोर हेड पर की जाती है 


मैने कुछ वर्ष पूर्व सजेस्ट किया था कि पेशंट को पीठ के बल supine = facing upwards लिटाने के बजाये , उसको पेट के बल prone लिटाये, उसका जो मुंह मुद्रा चेहरा है जमीन की तरफ करे facing downward जिस से की जहां पर तैल का संपर्क आना "शास्त्र को अभिप्रेत है" = उस व्हर्टेक्स अधिपति रोमावर्त मूर्धा पर शिरस् के सर्वोच्च बिंदू पर ... तेल की धारा गिरती रहेगी 

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और वहा से ग्रॅव्हिटी की दिशा से अधोगमन करते हुई वह शिरके संपूर्ण प्रदेश को संपूर्ण scalp त्वचा को तैल का संयोग संपर्क आप्लावन होकर वह नीचे निकल जायेगी ! ✅️


तो किसी ने कहा कि ऐसे पेट की बल की स्थिती मे विपरीत शयन prone/facing downward की स्थिती मे मूर्धा पर व्हर्टेक्स पर ॲक्च्युली डाला हुआ तैल आंखो मे जाने की संभावना है ! 🙄


आज की जो शिरोधारा = कपाल धारा करते है , उसमे भी आंखो पर कॉटन का पिचु रखते ही है !!!


किंतु, नही !!!

जो प्रस्थापित है जो मार्केटेड है वही हमे करना है ... चाहे वो कितना शास्त्रीय हो कितना भी कमर्शियल हो कितना भी गलत हो ! हम नही सुधरेंगे !!!


जैसे आज कल देखिये ... चाकण मे वाघोली मे शिरवळ मे याने पुणे से 30 35 किलोमीटर जो लोग दूर रहते है, वे कहते समझते मानते है की हम पुणे मे रहते है... वसई विरार से लेकर अलिबाग तक वाशी तक खारघर तक रहने वाले लोग कहते समझते मानते है की मुंबई मे रहते है ... मुंबई से पचास से सौ किलोमीटर दूर रहकर की भी!!


वैसे ही कपाल भाल ललाट फोर हेडफर धारा करके हम कहते समझते मानते है की, हम शिरोधारा करते है!


कपाल ललाट भाल फोरहेड यहां पर धारा करके हम स्वयं को शास्त्र को आप्तों को पेशंट को समाज को ईश्वर को फंसा रहे है वंचना कर रहे है प्रतारणा कर रहे है कि हम शिरोधारा कर रहे है ... जितकी वस्तुतः यह धारा शिरस् पर नही कपाल पर होती है 


इस नए से मार्केट किये गये लोकप्रिय किये गये प्रस्थापित किये गये अशास्त्रीय झूठ असत्य शिरोधारा के आज के व्यवहार में तेल का संपर्क मूर्धा से शिरसे "आताही नही है" !!!


... तो सभी पेशंट को और सभी वैद्यों को कभी शास्त्रीयता और नैतिकता इस रूप मे है सोचना चाहिए की क्या हम सही मे आयुर्वेद शास्त्र का अवलंबन कर रहे है या आयुर्वेद के नाम पर हम कुछ अलग ही "बेच रहे है" ?!


हम पेशंट को कस्टमर क्लाएंट समज रहे है ... या पेशंट हमारा अन्नदाता स्वरूप भगवंत है ???


हम पैसा बटोरने के लिए शिरोधारा कहकर कपाल ललाट भाग फोरहेड पर तेल उंडेल रहे है, जिसका वस्तुतः "कोई उपयोग नही है" हम उसको आज मनःशांती स्ट्रेस रिलिव्हर नींद का उपाय और न जाने क्या क्या बडबडाते रहते है ...


और पेशंट को भी "वह परिणाम", प्लासीबो या कंडिशनिंग सायकोथेरपी के रूप मे "सच्चे लगते है"!


 लेकिन यह शास्त्र नही है ... यह दिगभ्रम है दिशा भूल है वंचना है प्रतारणा है 


हां, इससे पैसा बन सकता है...  किंतु यह आयुर्वेद नही है!! 


अगर हमे सत्य स्वरूप मे शिरोधारा करनी है तो आज जैसे वह पीठ के लिटाकर facing upwards, कपाल पर करते है...

उसकी बजाये विपरीत शयन करके पेट के बल लिटाकर जमीन की ओर चेहरा करके facing downward करके मूर्धा व्हर्टेक्स रोमावर्त अधिपती मर्म शिरस् का सर्वोच्च बिंदू यहां पर होना चाहिये ✅️✅️✅️


और इस तथाकथित शिरोधारा की तुलना मे, जिसका कभी प्रचार ✅️ /मार्केटिंग(?) हुआ ही नही ऐसे शिरो अभ्यंग, शिरःपिचु & प्राचीन काल का सर्वाधिक प्रभावी शिरोबस्ति; वह कई गुना अधिक परिणामकारक अधिक शास्त्रीय है!


लेकिन सच बतायेगा कौन? 

झूठ को उजागर कौन करेगा ?

सच सुनने की किसकी इच्छा है? 

और सही क्या गलत क्या शास्त्र क्या मार्केट क्या ... भोले भाले आयुर्वेद पर विश्वास रखने वाले पेशंट को क्या पता है !!??


इसलिये जिनको शास्त्र के प्रति निष्ठा है प्रेम है, उन वैद्यों ने आयुर्वेद प्रॅक्टिशनर्स ने और जिन पेशंट को आयुर्वेद शास्त्र मे शास्त्रीय क्या है, मार्केटिंग क्या है , सत्य क्या है असत्य क्या है ... पेशंट के लिए "सोच" कर कौनसा उपचार किया जाता है & पेशंट को कुछ "बेचकर" कोई आर्थिक लाभ स्वयं का कैसे कर लेता है ... यह बताने के लिए आज का यह प्रयास है !


जागृत रहिये ... और सत्य का अवलंबन करे!!!

Monday, 19 January 2026

दोष an illusion. दोष नसतात. "Nir"Dosha Ayurveda "नि"र्दोष आयुर्वेद

दोष an illusion. दोष नसतात. "Nir"Dosha Ayurveda "नि"र्दोष आयुर्वेद 

Picture Credit Chatgpt AI 

Think rational. Quit illusion ते गुल्मनिदान आणि संप्राप्ती याच्यावर लेक्चर देणारे लोकांचे मला भयंकर कौतुक वाटतं! म्हणजे सशाला शिंग असतं, पुरुषाला गर्भाशय असतं !!! ... अशा "आश्रय असिद्ध" गोष्टींवरती लोक लेक्चर देतात, याच्याविषयी मला भयंकर आदर आहे! 


ठीक आहे ...


म्हणजे शास्त्रामध्ये लिहिलेलं आहे, म्हणून ते वाचायला पाहिजे, याबाबत काही शंका नाही 


... पण काही गोष्टी कालबाह्य आहेत त्या अस्तित्वात असू शकत नाहीत, हे काही विशिष्ट कालावधीनंतर स्पष्टपणे मान्य करायला काय हरकत आहे ??


त्यातल्या त्यात वात दोष ही एक भयंकर अशक्य संकल्पना आयुर्वेदामध्ये आहे... 


की आपण अन्न खाल्ल्यानंतर तिसऱ्या अवस्था पाकामध्ये वात "निर्माण" होतो...🤔⁉️ 


म्हणजे हे मला अजिबात आजपर्यंत न कळलेलं कोडं आहे की, जो वात शरीरामधल्या सगळ्या हालचाली घडवतो , की जो चल रूक्ष शीत अशा गुणांचा असतो, तो वात अन्नाच्या तिसऱ्या अवस्था पाकामध्ये आपण "खाल्लेल्या अन्नामधून निर्माण" होतो 😇


आता मूळ गोष्ट अशी आहे की, आपण जे अन्न खातो, ते अन्न पृथ्वी महाभूत प्रधान आहे, त्याच्या सोबत आपण थोडाफार पाणी पितो किंवा काही जेवणामध्ये द्रव पदार्थ असतात हे जल प्रधान आहेत ...णत्यामुळे त्यातून "शरीर अस्तित्वात ठेवणारे घटक = धातु" निर्माण होतात, हे निश्चितपणे मान्य करायला हवं ...


पण आपण खाल्लेल्या पृथ्वी जल प्रधान अन्नातून आपलं अख्खं शरीर चालवेल, गतिमान ठेवेल, असा "वातदोष निर्माण" होतो, ही अत्यंत प्राथमिक ज्ञान ज्याला आहे , त्याला सुद्धा न समजणारी, न कळणारी, न पटणारी गोष्ट आहे!!! 


... वायूचे जर गुण रूक्ष चल शीत असे असतील तर अशा गुणांचा भाव पदार्थ निर्माण होणारे पदार्थ , आपण असे किती प्रमाणात खातो , की ज्यातून आयुष्यभर ... जन्मल्यापासून आपण मरेपर्यंत ... आपलं हृदय आपलं फुफ्फुस ही, "कधीही न थांबणारी दोन यंत्र सतत गतिमान राहतील?" ... आणि अन्य सर्व वेळेला आपण जागृत असतो तेव्हा आपल्या शरीरातील सर्व हालचाली ज्या आपल्याला ऐच्छिक दृष्टीने करायच्या, त्या करता येतात ... हे वातामुळे होतं एवढी अखंड अविरत गती, ज्या वाताला attribute करण्यात आलेली आहे , तेवढा वात, आपण खात असलेल्या अन्नातून निर्माण होत असेल, ही अशक्यप्राय गोष्ट आहे !!! ... एवढं रूक्ष एवढं चल आणि एवढं शीत गुण असलेलं अन्न आपण खातो, अशी वस्तुस्थिती अजिबात नाही...!!! 

👶🏻

जन्माला आलेलं लहान मूल फक्त आईचं दूधच पिते की जे आईचं दूध हे निश्चितपणे पृथ्वी जल स्निग्ध गुरु संतर्पण बृंहण असे आहे आणि बाळ जोपर्यंत जागं आहे, तोपर्यंत सतत हात पाय हलवत असतं आणि बाळ गर्भाशयात सहा आठवड्याचं असल्यापासून (चौथ्या महिन्यात नव्हे) त्याचे हृदय धडधडत असते आणि जन्माला आल्यापासून फुफ्फुस आकुंचन प्रसरण पावत असते, एवढ्या सगळ्या गती, चल गुण अविरतपणे सुरू असताना, त्यासाठी लागणारा वात बाळाने घेतलेल्या आहारातून म्हणजे आईच्या दुधातून निर्माण होतो, असं म्हणणं हे पंचमहाभूत सिद्धांताला नाकारण्यासारखा आहे, त्याच्याशी विसंगत आहे, अशास्त्रीय आहे 

दोष नसतात 


धातू असतात 

मल असतात 

महाभूत असतात 


आणि दोष आहारातून निर्माण होत नाहीत


मुळात , "दोष हे अन्नातून निर्माण होतात", ही मूलभूत गोष्टच चुकीची आहे!!! 

वातामुळे , चल गुणामुळे हालचाल होते? की हालचाल झाल्यामुळे, व्यायाम केल्यामुळे वात वाढतो ?

जर रोजच्या हालचालींमुळे, शारीरिक क्रियांमुळे ... वात वाढत असेल, (चल गुणामुळे) , तर हृदय आणि फुफ्फुस येथे जीवनभर हालचाल सुरू असते म्हणजे वात वाढलाच पाहिजे ! असं असताना , पुन्हा अन्नातून तिसऱ्या अवस्था पाकात वात निर्माण होत असेल, तर शरीर काही दिवसात "वायुरूपच" व्हायला पाहिजे!!!


शरीरात तीन (3) दोष नसतात ... शरीरात शून्य(0) दोष असतात ... शरीरात सहा धातू असतात ...अन्नापासून सहा(6) धातू निर्माण होतात आणि ते 6 धातू शरीर उभारतात, सांभाळतात आणि चालवतात ... अन्नातून त्यातून दोन(2)च मल निर्माण होतात, ते म्हणजे मूत्र आणि पुरीष ... एवढेच सत्य आहे !!!


बाकी तीन दोष = वात पित्त कफ नसतात !

रस नावाचा धातू नसतो 

स्वेद नावाचा मल नसतो ...

4 महाभूत असतात 

6 धातु असतात 

2 मल असतात

स्रोतस् नसते, ओजस् नसते 


हे आपण जोपर्यंत स्वीकारत नाही, 

तोपर्यंत ही जी काही आयुर्वेदातली अनागोंदीची गोंधळाची परिस्थिती आहे ती बदलणार नाही!!!


Think rational. Quit illusion


शरीरात जी गती हालचाली होतात त्या मसल्स च्या आकुंचन प्रसारणामुळे होतात 


मसल्स ना नेमकं काय म्हणायचं हा फार मोठा प्रश्न आहे. त्यांचं स्नायू हे भाषांतर आयुर्वेदातल्या शारीर कल्पनेची जुळत नाही आणि पेशी असं म्हणावं तर सध्या रूड भाषेत पेशी म्हणजे सेल cell असल्याने त्याच्याशीही जुळत नाही 


सबब मसलला स्नायू किंवा पेशी म्हणण्याऐवजी मसल म्हणूया 


मसल हे मांसापासून म्हणजे पृथ्वी महाभूतापासून बनतात ही गोष्ट सत्य आहे 


त्यामुळे गती ही त्या मसल मांस पृथ्वी यामुळे असते आणि या आकुंचन प्रसारणाला जी एनर्जी ऊर्जा आवश्यक असते ती अन्ना मधूनच येते आणि अन्न हे पृथ्वी जल प्रधान असतं 


कार किंवा टू व्हीलर पळते तेव्हा इंजिनामध्ये इंधनाचा स्फोट होतो 


इंधन हे पेट्रोल डिझेल या स्वरूपातील असतं की जे पुन्हा पार्थिव मिनरल खनिज असंच आहे 


अगदी एलपीजी किंवा सीएनजी असं म्हटलं तरी सुद्धा ते पार्थिव मिनरल खनिज असेच आहेत 


पेट्रोल डिझेल किंवा गॅस या सगळ्यांना वजन आहे ते लिटर किंवा केजी मध्ये मोजले जातात म्हणजेच ते घन वस्तुमान मास असलेले पृथ्वी प्रधान भाव पदार्थ आहेत 


त्यामुळे व्यवहारातली गती असो किंवा शरीरातली गती असो, ती कल्पना रम्य अस्तित्वहीन वातामुळे नसून, ती पृथ्वी जल अशा प्रत्यक्ष इंधनाच्या ज्वलनामुळे निर्माण होते, हीच वस्तुस्थिती आहे 


जसे टू व्हीलर आणि कार यांची सर्व संरचना बॉडी कॉन्स्टिट्यूशन पार्टस हे सुद्धा मेटॅलिक किंवा प्लास्टिकचे असतात म्हणजेच पृथ्वी महाभूतांपासून बनलेले असतात


तसेच संपूर्ण शरीर घटक हे सुद्धा सहा धातूंपासून बनताना मुख्यतः मांस आणि मेद यापासून बनतात म्हणजेच प्रोटीन फॅट म्हणजेच पृथ्वी जल यापासून बनतात 


त्यामुळे उगीचच कफ पित्त वात या अस्तित्वात नसलेल्या कल्पना रम्य , शास्त्रीय संज्ञा आणि लोकभाषेतील अर्थ या दोन्ही दृष्टीने "दोषच" असलेली, ही गोष्ट पूर्णतः त्याचे अस्तित्वहीन अशास्त्रीय कल्पनारम्य म्हणजेच इल्युजन आहे


Think rational. Quit illusion

Monday, 12 January 2026

ऑटोमेटेड स्वयंचलित शिरोभ्यंग मशीन… हाँ कहा जाए तो व्यापार 💰💵🪙 … नहीं कहा जाए तो मज़ाक 😇😃😆 … पढ़कर “बेचो” 💵 या हँसकर “सोचो” जो मर्ज़ी आए ... करो

ऑटोमेटेड स्वयंचलित शिरोभ्यंग मशीन…

हाँ कहा जाए तो व्यापार 💰💵🪙 …

नहीं कहा जाए तो मज़ाक 😇😃😆 …

पढ़कर “बेचो” 💵

या हँसकर “सोचो”

जो मर्ज़ी आए ... करो

Picture Credit Chatgpt AI 

We , MhetreAyurveda, are sowing seeds of Ideas, after ploughing enthusiasts' brains ...

हम, म्हेत्रेआयुर्वेद MhetreAyurveda,

जिज्ञासू लोगों के बुद्धि को जोतकर

उसमें विचारों के बीज बो रहे हैं …

जैसे आयुर्वेद में अब **कांस्य थाली से पादाभ्यंग** और उसी तरह **कांस्य थाली से हस्त अभ्यंग** करने वाली **गोल-गोल घूमने वाली मशीनें** आ गई हैं, 

उसी प्रकार **सिर की मालिश** के लिए भी एक मशीन बनाई जा सकती है।

ऐसी मशीन बनाई जानी चाहिए जो **सिर में फिट बैठे या सिर पर ठीक से बैठ सके**, 

जिसका आकार **बड़ी कटोरी या कढ़ाही जैसा** हो। 

उसके अंदर की तरफ **कुछ उभार बनाए जाएँ**, जैसे **पादाभ्यंग और हस्ताभ्यंग की मशीनों में होते हैं**।

वह कटोरी या कढ़ाही जैसी मशीन **इस प्रकार घूमती रहे कि वह सिर पर मालिश करती रहे**। 

यदि ऐसा यंत्र बनाया जाए, तो आयुर्वेद को **“शिरोभ्यंग” नाम का एक और आसान व्यवसाय** मिल जाएगा, 

जिसमें **शिरोधारा जैसा बहुत बड़ा सेट-अप करने की आवश्यकता नहीं होगी**, 

और **थेरेपिस्ट की भी आवश्यकता नहीं होगी**।

बस **एक बटन दबाना होगा**, 

और **सिर पर बैठने वाली वह कटोरी-कढ़ाही जैसी मशीन घूमने लगेगी**, 

और अभ्यंग होने के कारण **पेशंट को भी अच्छा और आरामदायक महसूस होगा**।

Automated Shiro-abhyanga Head massage machine… If you say yes, then it is business 💰💵🪙 … If you say no, then it is a joke 😇😃😆 …

Automated Shiro-abhyanga machine…

If you say yes, then it is business 💰💵🪙 …

If you say no, then it is a joke 😇😃😆 …

After reading, “sell it” 💵

or laughing, “think about it”

do whatever you feel like

Picture Credit Chatgpt AI 

We , MhetreAyurveda, are sowing seeds of Ideas, after ploughing enthusiasts' brains ...

Just as in Ayurveda there are now round rotating machines for **foot massage using a bronze plate**, and similarly **hand massage using a bronze plate**, in the same way a machine can be made for **head massage = shiro abhyanga**.


Such a machine should be made in a form that can **fit on the head**, shaped like a **large bowl or a kadhai (wok-like vessel)**. 


On the inner side of it, some **raised projections** should be made, just like those present in the **foot-massage and hand-massage machines**.


That bowl- or kadhai-shaped device should **keep rotating in such a manner that it massages the head**. 


If such a device is made, then Ayurveda will gain **one more simple business called “Shiro-abhyanga”**, 

in which there will be **no need for a very large setup like Shirodhara**, 

and **no therapist will be required**.


One only has to **press a button**, and that **bowl- or kadai-shaped machine that fits on the head will start rotating**, 

and because abhyanga (oil massage) happens, **the patient will also feel nice and relieved**.



ऑटोमेटेड स्वयंचलित शिरोभ्यंग मशीन ... होय म्हटलं तर व्यापार💰💵🪙 ... नाही म्हटलं तर विनोद😇😃😆 ... पढकर "बेचो" 💵 या हँसकर "सोचो" ... जो मर्जी आये करो

शिरोभ्यंग मशीन ... 

होय म्हटलं तर व्यापार💰💵🪙 ... 

नाही म्हटलं तर विनोद😇😃😆 ... 

पढकर "बेचो" 💵 या हँसकर "सोचो" 

जो मर्जी आये करो

Picture credit Chatgpt AI 

आम्ही, म्हेत्रेआयुर्वेद MhetreAyurveda, 
जिज्ञासू लोकांची बुद्धि नांगरून
त्यामध्ये विचारांची बीजे पेरत आहोत …

We , MhetreAyurveda, are sowing seeds of Ideas, after ploughing enthusiasts' brains ...

जसे आयुर्वेदात कांस्य थाळी पादाभ्यंग... आता कांस्य थाळी हस्त अभ्यंग ... अशी गोल फिरणारी मशीन यंत्र आलेली आहेत ... तसे एक यंत्र "डोक्याच्या मसाज = शिरोभ्यंग" साठी करता येईल !!

डोक्यात बसेल / डोक्यावर बसेल , अशा आकाराचे मोठ्या वाटीसारखे किंवा कढई सारखे पात्र करून , आत मधून त्याला काही उंचवटे करावेत ... जसे पादाभ्यंग हस्ताभ्यंग मशीनला असतात तसेच... आणि ते वाटी कढई सारखे यंत्र डोक्यावर मालिश करेल अशा पद्धतीने फिरत राहील अशी व्यवस्था करावी! 

म्हणजे आयुर्वेदाला, अजून एक "शिरोभ्यंग नावाचा सोपा बिजनेस" मिळेल ...

ज्यामध्ये शिरोधारेसारखा खूप मोठा सेटअप करावा लागणार नाही ...

थेरपीस्टही लागणार नाही 

नुसतं बटन दाबलं की ते डोक्यात बसणारे वाटी कढई सारखं मशीन फिरेल 

आणि अभ्यंग झाल्यामुळे पेशंटला ही छान बरं वाटेल !!!

Thursday, 8 January 2026

द्रव्य गुण या निघंटु इनकी अनावश्यकता/निष्प्रयोजनता

 🤔⁉️

Picture credit Chatgpt AI 


द्रव्य गुण या निघंटु इनका प्रादुर्भाव संहिता काल मे क्यू नही हुआ होगा 🤔⁉️


मूलतः चरकने तो नामरूप ज्ञान का वैसे देखा जाये तो उपहास😆 ही किया है, नामरूप ज्ञान होने वालों की तुलना अविप अजप गोप असे सामान्य जनों से की है


ओषधीर्नामरूपाभ्यां जानते ह्यजपा वने ।

अविपाश्चैव गोपाश्च ये चान्ये वनवासिनः ॥😁😬

न नामज्ञानमात्रेण रूपज्ञानेन वा पुनः ।🤣😂

ओषधीनां परां प्राप्तिं कश्चिद्वेदितुमर्हति ॥


केवल गुण ज्ञान और योग ज्ञान को ही महत्व दिया है 


हरीतकी (और उसके समान गुण कर्म विपाक ऐसे आमलकी इन 2)का गुणकर्म वर्णन छोड दिया, तो अन्य किसी भी औषधी द्रव्य का सविस्तर गुणवर्णन संहिता मे उपलब्ध नही है 


कुछ लोगों का "क्लेम" है की उसको संहिता को संलग्न निघंटु अस्तित्व भी था


किंतु संहिता के पहले के उपनिषद् वेदों के भी मॅन्युस्क्रिप्ट उपलब्ध है ... किंतु संहिता के तत्कालीन समांतर अपेंडिक्स ॲनेक्जर के रूप मे निघंटु होने का कोई अस्तित्व या प्रमाण नहीं मिलता है 


सबसे प्राचीन निघंटु, धन्वंतरी निघण्टु भी आठवी शती का माना जाता है 


तो उसके पहले तो सारी संहितायें लिखकर पूर्ण हो गयी थी ... फिर भी औषधे द्रव्य के गुणकर्मों के वर्णन का कही पर अस्तित्व तथा आवश्यकता दिखाई नही देती है


 अभी तो डायरेक्टली औषधी के वनस्पतीयों के गण का समूह का गुण कर्म वर्णन उपलब्ध होता है जसे की महाकषाय गण या उस उस रोग की चिकित्सा अधिकार में विविध कल्पों का कषाय क्वाथ अवलेह स्नेह इत्यादि का वर्णन तो उपलब्ध है


क्या द्रव्य के गुण कर्म वर्णन की & निघण्टु की आवश्यकता ही नही है??🤔⁉️ 


संभवतः नही ही है 

क्योंकि गणों के अध्याय के अंत मे, जो उचित लगे उसको जोडिये, जो अनुचित लगे उसको छोडिये, ऐसा श्लोक आता है 


इसका अर्थ यह होता है कि द्रव्य का महत्व उतना नही है, जितना की उसमें धारण किये हुये गुण कर्म का है


आज व्यवहार मे सबसे पॉप्युलर उपलब्ध और फॉलो किया जाने वाला निघंटु देखा जाये तो वो भावप्रकाश है, जिसका प्रारंभ करते समय, हरीतकी के गुणकर्म वर्णन के प्रसंग मे यह स्पष्ट रूप से लिखता है की ... 

इसमे कोई शास्त्रीयता = व्हाय & हाऊ why & how ढूंढने का प्रयास न करे ... जो भी द्रव्य का गुणकर्म है वह "प्रभाव से" होता है ... उसमे कारण मीमांसा , नये से , शिष्य के बोधन के लिए , करना आवश्यक & उपयोगी दोनो नही है, "जो है, वो लिख दिया है" ... 

👇🏼

स्वादुतिक्तकषायत्वात्पित्तहृत्कफहृत्तु सा |

कटुतिक्तकषायत्वादम्लत्वाद्वातहृच्छिवा ||✅

पित्तकृत्कटुकाम्लत्वाद्वातकृन्न कथं शिवा |🤔⁉️

प्रभावाद्दोषहन्तृत्वं सिद्धं यत्तत्प्रकाश्यते |😇

हेतुभिः शिष्यबोधार्थं नाऽपूर्वं क्रियतेऽधुना ||🙊

कर्मान्यत्वं गुणैः साम्यं दृष्टमाश्रयभेदतः |

यतस्ततो नेति चिन्त्यं 🤐😵‍💫😷🥴🙄😳 = hence & therefore ... why & how ... should not be "pondered" upon


इसका अर्थ यह होता है कि द्रव्य गुण यह शास्त्र न होकर , केवल "कॉपी पेस्ट" के रूप मे लिखा गया है ... तो निघंटु का सारा अस्तित्वही "कुछ किये बिना" सीधा कॉपी पेस्ट किया है, ऐसा लगता है! 


क्योंकि सितोपलादी के गुणकर्म वर्णन मे शार्ङ्गधर ने जो गडबडी करके रखी है ... वह चरक के राजयक्ष्मा चिकित्सा के श्लोक नंबर 104 & 105 का इंटरमिंगलिंग है ... इसके संदर्भ मे हमने सविस्तर व्हिडिओ पहले ही प्रसिद्ध किया है ... जिसकी लिंक आगे दी है ... उत्सुक जिज्ञासू पड सकते है और इस संदर्भ मे अधिक ज्ञान प्राप्त कर सकते है ...

👇🏼

https://youtu.be/dFOWohsMAnk?si=0OMtNQz405OL1mhU


तो कहने का मूल उद्देश यह है की द्रव्य गुण और निघंटु की आवश्यकता उपयोगिता और महत्व, संहिताकारों को कभी लगा ही नही ... इसलिये संपूर्ण संहिता मे आपको औषधियों के गुण कर्म का वर्णन प्राप्त होता नही और इसलिये चरक भी "योगज्ञान" जिसे है , उसको ही श्रेष्ठ समजता है

👇🏼

योगवित्त्वप्यरूपज्ञस्तासां तत्त्वविदुच्यते ।

किं पुनर्यो विजानीयादोषधीः सर्वथा भिषक् ॥

योगमासां तु यो विद्याद्देशकालोपपादितम् ।

स ज्ञेयो भिषगुत्तमः ॥

Wednesday, 7 January 2026

हिंदी भाषा में # संहिता-उल्लेखित त्रिविध अथवा शार्ङ्गधर-उल्लेखित पंचविध पाक, उनका प्रयोजन, घन-सार, रसशास्त्र तथा दैनन्दिन स्वयंपाक रसोई गृह्य पाककर्म

संहिता-उल्लेखित त्रिविध अथवा शार्ङ्गधर-उल्लेखित पंचविध पाक, उनका प्रयोजन, घन-सार, रसशास्त्र तथा दैनन्दिन गृह्य पाककर्म स्वयंपाक रसोई**

picture credit ChatGPT AI**

🖊⌨️ **लेखक :** वैद्य हृषीकेश बालकृष्ण म्हेत्रे

एम.डी. आयुर्वेद, एम.ए. संस्कृत

९४२२०१६८७१

आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे (रविवार) एवं नाशिक (मंगलवार से शुक्रवार)


**२७.१२.२०२५ शनिवार**


---


### **१.**


स्नेहपाक को त्रिविध जानना चाहिए — मृदु, मध्यम और खर।

खरपाक अभ्यंग के लिए स्मरण किया गया है; मृदुपाक नस्य के लिए।

मध्यमपाक पान और बस्ति के लिए प्रयोज्य है।


☝🏼 **चरक संहिता**


तीन पाक होते हैं — **मृदु, मध्यम, खर**।


इनमें से **केवल “मध्यम पाक” ही आन्तरिक उपयोग हेतु स्वीकार्य एवं उपयोगी प्रतीत होता है।**


---


### **२.**

Picture credit Google Gemini AI


शार्ङ्गधर में उपर्युक्त तीन के साथ दो अन्य पाकों का वर्णन मिलता है।


स्नेहपाक यदि जल जाता है तो दग्ध-पाक होता है, जो दाहकारक एवं निष्प्रयोजन है।


आम-पाक वीर्यहीन होता है, जठराग्नि का क्षय करता है और गुरु होता है।


शार्ङ्गधर में इसके अतिरिक्त, आम-पाक का अर्थ यह भी है कि **औषधि में जलांश शेष रहता है।**


अतः आम-पाक **गुरु = कठिन पाच्य एवं जठराग्नि को दुर्बल करने वाला** होता है।


और **दग्ध-पाक** का अर्थ है — अग्नि की अधिकता (काल या मात्रा में) के कारण, जलांश के साथ-साथ **औषध द्रव्य भी जलकर नष्ट हो जाता है**।

इसलिए दग्ध-पाक **निष्प्रयोजन एवं दाहकारक** होता है।


---


### **३.**


यद्यपि प्रथम दृष्टि में ये त्रिविध या पंचविध पाक केवल स्नेहकल्पना के लिए प्रतीत होते हैं, **वास्तव में ये सभी औषध कल्पनाओं पर लागू होते हैं** — अर्थात् अरिष्ट, अवलेह, गुटी, वटी एवं क्वाथ पर भी।


इतना ही नहीं, आधुनिक **कल्प = शर्करा कण (जैसे प्रसिद्ध शतावरी कल्प)** भी इसी के अंतर्गत आते हैं।


और गुटी-वटी निर्माण में भी **बलाधान प्रक्रिया हेतु यह आवश्यक है**।


👇🏼

अग्नियों द्वारा पकाकर जब रस निकल जाए, तब उसे “अनुपदग्ध” रूप में ग्रहण करना चाहिए।

(चरक चिकित्सा १/३/३)


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### **४.**


चाहे स्नेह हो या अन्य कोई औषध निर्माण, **यदि थोड़ा भी जलांश शेष रहता है**, तो कुछ ही घंटों/दिनों में खट्टा गंध, किण्वन, सड़न, फफूँद, कवक वृद्धि होकर वह **“फेंकने योग्य”** हो जाता है।


अतः **आम-पाक त्याज्य है।**


---


### **५.**


और मृदु-पाक, उससे अत्यन्त समीप होने के कारण, **केवल नस्य के लिए ही उपयुक्त माना गया है**, क्योंकि नासिका एक कोमल, संवेदनशील, मर्म-सदृश स्थान है।


---


### **६.**


दग्ध-पाक में **औषध स्वयं जल जाती है**, अतः वह निष्प्रयोजन एवं अनुपयोगी हो जाती है, इसलिए त्याज्य है।

और यदि प्रयोग किया जाए तो निश्चित रूप से दाह उत्पन्न करेगी, क्योंकि वह **विदग्ध अवस्था** में होती है — जली हुई, भस्मीकृत, चूर्णवत।


---


### **७.**


खर-पाक, दग्ध-पाक से ठीक पूर्व अवस्था है; परंतु उसके समान उसमें भी दोष, वीर्य हानि एवं क्रिया-दुष्प्रभाव संभव हैं।

इसलिए उसका प्रयोग **केवल बाह्य उपचार, जैसे त्वचा अभ्यंग** के लिए कहा गया है — और वह उचित एवं समझने योग्य है।


---


### **८.**


इस प्रकार प्रारम्भ के दो — **आम + मृदु**, और अंतिम के दो — **खर + दग्ध**,

या तो जलांश शेष रहने के कारण, या औषध जलने के कारण, **अधिक स्वीकार्य नहीं हैं**।


---


### **९.**


अतः आन्तरिक उपयोग — अर्थात् पान, सेवन, निगलन एवं बस्ति — के लिए **केवल मध्यम-पाक**, जिसे अन्य ग्रन्थों में **“चिक्कण-पाक”** भी कहा गया है, वही उपयुक्त है।


यही वह बिन्दु है जहाँ **जल समाप्त होने और औषध जलने के बीच की अत्यन्त सूक्ष्म, अदृश्य, निर्णायक रेखा** होती है, जहाँ हाथ से अग्नि नियंत्रित कर ठीक उसी क्षण रोक पाना लगभग असम्भव है।


इसी कारण मध्यम/चिक्कण-पाक में मृदु से खर तक **सीमित मान्य विचलन** स्वीकार किया गया है — मानव त्रुटि के कारण — परन्तु वह आदर्श नहीं है।


---


### **१०.**


संक्षेप में, जल माध्यम से औषध निर्माण में —

**यदि जल शेष → आम = गुरु, वीर्य अपूर्ण निष्कर्षण, जठराग्नि हानि।**


---


### **११.**


दूसरी ओर, जल पूर्णतः समाप्त होने के बाद भी यदि अग्नि चलती रही और औषध जल गई — तो वह निष्प्रयोजन एवं दाहकारक हो जाती है।


---


### **१२.**


आम-पाक और पूर्ण आदर्श मध्यम-चिक्कण-पाक के बीच **मृदु-पाक सीमित स्वीकार्य** है।


---


### **१३.**


पूर्ण मध्यम-चिक्कण-पाक और दग्ध-पाक के बीच **खर-पाक केवल बाह्य उपयोग हेतु सीमित स्वीकार्य** है।


---


### **१४.**


आधुनिक उन्नत औषध निर्माण उद्योग निश्चित रूप से **औषध जलने से ठीक पहले के क्षण** को पहचानकर, अग्नि को सटीक रूप से रोक सकता है।


---


### **१५.**


अन्यथा, यदि जलांश शेष रहा, चाहे गुटी-वटी हो, स्नेह हो, या आसव-अरिष्ट — **कुछ ही दिनों में खट्टा गंध एवं फफूँद उत्पन्न हो जाती है।**


---


### **१६.**


यदि जल के साथ औषध भी जल गई, तो क्वाथ घन-सार की ओर जाता है; परंतु अनेक लोग अनुभव करते हैं कि ऐसा घन-वटी बाद में चिपचिपा या नरम हो जाता है।

अतः घन-सार वास्तव में क्वाथ का **दग्ध-पाक अथवा कम से कम खर-पाक** है — आन्तरिक उपयोग हेतु नहीं।


---


### **१७.**


यदि शर्करा-आधारित कल्प दग्ध-पाक में चला जाए, तो **उससे बड़ा मानसिक कष्ट कुछ नहीं**!

कण निर्माण के समय मन्द अग्नि एवं निरन्तर चलाना अत्यन्त कौशलसाध्य है — अन्यथा वह पत्थर-सा कठोर हो जाता है।


---


### **१८.**


यदि स्नेह-कल्पना दग्ध-पाक में चली जाए, तो **तेल पर जले हुए काले कण तैरने लगते हैं।**


---


### **१९.**


यदि आसव-अरिष्ट खर-पाक में चला जाए, तो वह **विदग्ध = शुक्त (खट्टा)** हो जाता है।


---


### **२०.**


केवल औषध निर्माण में ही नहीं, बल्कि पाचन में भी **विदग्ध अजीर्ण का उपचार वमन है।**

पित्तप्रधान होने पर भी विरेचन नहीं कहा गया — अर्थात् उसे ऊपर की ओर बलपूर्वक निकालना होता है।


---


### **२०-अ.**

Picture credit ChatGPT AI 


यही **दो और तीन = पाँच पाक**, प्रतिदिन त्रिकाल, स्वयंपाक करते समय भी —

**रोटी, भाजी, दाल-चावल, पुरण, कुरडई, भजिया, शंकरपाले, अनारसे, यहाँ तक कि ऑमलेट और पिज़्ज़ा** —

इन सभी में भी दिखाई देते हैं।


इसका अनुभव **हर खाने वाले ने**, और वास्तव में **विशेष रूप से हर पकाने वाले ने** किया होता है।


---


### **अस्वीकरण**


लेखक पूर्णतः निरपवाद होने का दावा नहीं करता।

ये व्यक्तिगत दृष्टिकोण एवं समझ हैं; त्रुटियाँ सम्भव हैं और स्वीकार्य हैं।

Saṁhitā-mentioned threefold or Śārṅgadhara-mentioned fivefold pāka, their purpose, ghana-sāra, Rasaśāstra, and daily household cooking

Saṁhitā-mentioned threefold or Śārṅgadhara-mentioned fivefold pāka, their purpose, ghana-sāra, Rasaśāstra, and daily household cooking

Picture credit: ChatGPT AI

🖊⌨️ Author: Vaidya Hr̥ṣīkeśa Bāḷakr̥ṣṇa Mhetre

MD Ayurveda, MA Sanskrit

9422016871

Ayurveda Clinics @ Pune (Sunday) & Nashik (Tuesday to Friday)


27.12.2025 Saturday


1.


Snehapāka is to be known as threefold — soft, middle, and hard.

Hard pāka is remembered for abhyanga; soft for nasal procedures.

Middle pāka is to be employed for drinking and for basti.


☝🏼 Charaka Saṁhitā


There are three pākas — Mr̥du, Madhya, Khara.


Out of these, only “Madhya pāka” alone appears acceptable and usable for internal application.


2.


In Śārṅgadhara, description of the above three plus two other pākas is found.


Snehapāka when burnt becomes Dagdha-pāka, causing burning and being purposeless.


Ama-pāka is devoid of potency, causes diminution of digestive fire, and is heavy.


In Śārṅgadhara, apart from this, Ama-pāka means that water portion still remains in the medicine.


Therefore Ama-pāka is heavy = difficult to digest and causes weakening of digestive fire.


And Dagdha-pāka means due to excess of fire (in time or quantity), along with the water portion, the medicinal portion also burns, chars, and gets destroyed.

Therefore Dagdha-pāka is purposeless and burning-causing.

Picture credit: Google Gemini AI


3.


Although at first glance these threefold or fivefold pākas appear to be meant for snehakalpanā, in reality these threefold or fivefold pākas apply to all medicinal preparations, that is, arishta, avaleha, guti, vati, and kvātha as well!


Not only this, but even modern kalpa = sugar granules (like popular Shatavari Kalpa) also fall under this!


And even in guti-vati preparation, for balādhāna process also this is necessary!


👇🏼

By fires one should cook till the juice is removed, then take it as “anupadagdha”

(Charaka Chikitsa 1/3/3)


4.


Whether it is sneha or any other medicinal preparation, if even a small portion of water remains, then within a few hours/days it develops sour smell, fermentation, rotting, decay, mold, fungal growth, and becomes “fit to be thrown away.”


Therefore Ama-pāka is rejectable.


5.


And Mr̥du-pāka being very close to it, its use is advised only for nasya, which is a delicate, sensitive, marma-like site; therefore Mr̥du-pāka medicine is used there.


6.


In Dagdha-pāka, the medicine itself burns, therefore it becomes purposeless and useless, hence rejectable.

And even if used, it will surely cause burning, because it is in vidagdha condition — burnt, charred, turned into ash and powder.


7.


Khara-pāka is slightly before Dagdha-pāka, but like it, it can have defects, potency issues, action side-effects.

Therefore its application is said only for external treatment like skin abhyanga, and that is correct and understandable.


8.


Thus the first two — Ama + Mr̥du, and the last two — Khara + Dagdha, because either water remains or medicinal portion burns, are not very acceptable.


9.


Therefore for internal use — meaning drinking, consumption, ingestion, and basti — only Madhya-pāka, also called “Chikkana pāka” in other texts, is advised.


This is the point where the extremely subtle, nearly invisible, crucial narrow thin line exists between water ending and medicine burning, where manually controlling fire and stopping instantly is almost impossible.


Therefore Madhya/Chikkana pāka has a standard deviation from Mr̥du to Khara, allowing limited acceptance elsewhere due to possible human error — but not as ideal.


10.


In short, when preparing medicine using water as a medium, if water remains → Ama = heavy, potency not fully extracted, digestive-fire weakening.


11.


On the other extreme, after complete evaporation of water, if fire continues and medicinal portion burns, it becomes purposeless and burning-causing.


12.


Between Ama-pāka and perfect ideal Madhya Chikkana pāka, Mr̥du-pāka is allowed with limited acceptance.


13.


Between perfect Madhya Chikkana pāka and burning into Dagdha-pāka, Khara-pāka is allowed with limited acceptance only for external use.


14.


Modern advanced pharmaceutical industry can definitely determine the exact moment just before medicinal burning, and stop heat precisely.


15.


Otherwise, if water remains, whether guti-vati, sneha, asava-arishta — sour smell and fungal growth appear within days.


16.


If water burns off and medicinal portion also burns, kvātha moves toward ghana-sāra, but many experience that such ghana-vati becomes sticky or soft later.

Thus ghana-sāra is actually kvātha’s Dagdha-pāka, or at least Khara-pāka — not for internal use.


17.


If sugar-based kalpa goes into Dagdha-pāka, no greater mental agony exists!

During granule formation, maintaining mild fire and constant stirring is highly skillful — otherwise it becomes rock-hard irreversibly.


18.


If sneha kalpanā goes into Dagdha-pāka, burnt black particles float on the oil.


19.


If asava-arishta goes into Khara-pāka, it becomes vidagdha = shukta (sour).


20.


Not only in profession, but even during digestion, vidagdha indigestion’s treatment is vamana.


Despite being pitta-dominant, virechana is not advised — meaning it must be expelled forcibly upward.


20A.

Picture credit ChatGPT AI

Exactly these two plus three = five pākas, daily thrice, even while cooking roti, vegetable, dal-rice, puran, kurdai, bhaji, shankarpale, anarse, omelette, pizza, are seen!

Every eater — and especially every cook — has experienced this.


Disclaimer


The author does not claim absolute correctness.

These are personal views and understandings; errors are possible and accepted.

For pain at different regions in the body

For pain at different regions in the body

⬇️


Duralabhadi vedanashamaka

👆🏼

All body


DrutavilambitGo 

👆🏼

Waist and lower extremity


Mustaadi

👇🏼

Gynec pain


Rasnapanchaka/rasnasaptaka

👆🏼

Pain with swelling stiffness


5tikta/Yashti guduchi/Yashti Laakshaa 

👇🏼

Degenerative pain in knee or other joints or avn


Shatavari Gokshura/kooshmaanda

👇🏼

Bladder/urinary 


Bhoonimbaadi/vaasaaguduchyaadi

👆🏼

Gastric intestinal pain


Pathyaadi

👆🏼

Headache/ophthalmic 


Grudhrasinashaka 

👆🏼

Sciatica, lumbar / cervical spondylitis, disc buldge etc spine problems


Shaliparni

👇🏼

Heart related pain chronic


Yashti saarivaa

👇🏼

Throat or inflammation/burning pain


Yashti Kashmari 

👇🏼

Pelvic or spinal or generalized moderate Pain in pregnancy


1)Degenerative knee jt pain


यष्टी लाक्षा टॅबलेट 

यष्टी गुडूची ग्रॅन्युल्स 

पंचतिक्त ग्रॅन्युल्स 


अपान काली


2) Weight gain knee jt pain


वेदनाशामक दुरालभादि टॅबलेट 

द्रुतविलंबितगो टॅबलेट 

स्थौल्यहर त्रिफला अभया


3)old age leg- muscle pain


विदार्यादि


4)पोटर्यां मध्ये गोळे येणे 

विदार्यादि


5) General Bodyache

वेदनाशामक दुरालभादि वातजज्वर 


6)Sam joint pain 

रास्नापञ्चक 

रास्नासप्तक 

वचाहरिद्रादि 


7)Niram joint pain 

वेदनाशामक दुरालभादि टॅबलेट 

द्रुतविलंबितगो टॅबलेट 

यष्टी लाक्षा टॅबलेट 

यष्टी गुडूची ग्रॅन्युल्स 

पंचतिक्त ग्रॅन्युल्स


8) Sciatica 

गृध्रसी हर टॅबलेट 


वेदनाशामक दुरालभादि टॅबलेट 

द्रुतविलंबितगो टॅबलेट 

लशुन ग्रॅन्युल्स 

5tikta granules 


सर या सर्व कंडिशन्स पेशंट हिस्ट्री वगैरे तर घेऊन, पथ्य वगैरे पण सांगणे. पण एक सर्वसाधारण आयडिया येण्यासाठी नेमके कुठले योग (व्याधी प्रत्यनीक) द्यायचे, ते वरती लिहिले आहे

Tuesday, 6 January 2026

आयुर्वेद : एक कला/Art या शास्त्र/science?

आयुर्वेद : एक कला/Art या शास्त्र/science?

🖊 वैद्य हृषीकेश म्हेत्रे 

एम डी आयुर्वेद, एम ए संस्कृत

आयुर्वेद क्लिनिक @ पुणे & नाशिक

6.1.2026

9422016871


Picture Credit Chatgpt AI 


🎯

This is what I intend to *ESTABLISH*. ✅


यही वह बात है, जिसे मैं *स्थापित* करना चाहता हूँ। ✅


आयुर्वेद के क्षेत्र में प्रायः यह देखा जाता है कि *कोई एक ही वैद्य अत्यंत अधिक सफल हो जाता है*। जिन रोगियों का उपचार वह *"एक ही वैद्य"* सफलतापूर्वक कर पाता है, वैसा उपचार *"अन्य अनेक अथवा बहुसंख्य वैद्य"* नहीं कर पाते।


इसी कारण वह *एक वैद्य* अत्यधिक सफल, लोकप्रिय और कीर्तिमंत बन जाता है। यद्यपि यह वैयक्तिक उपलब्धि के रूप मे उस एक वैद्य के लिए अभिमानास्पद और अभिनंदनीय है ...


तथापि... *शास्त्रीय दृष्टि से यह स्थिति न तो हितकारी है, न उचित है और न ही प्रगतिशील*।


किसी भी क्षेत्र में यदि *केवल एक ही व्यक्ति अत्यंत सफल होता है*, तो यह उस क्षेत्र के *कला होने का लक्षण* है, "न कि शास्त्र/science होने का"।


शास्त्र (Science) वह होता है जो *सभी को, सभी काल में, समान अनुभव और समान परिणाम* देता है।

जैसे, बटन दबाने पर fan, iorn/इस्त्री, फ्रीज, AC, TV चालू या बंद हो जाता है, यह शास्त्र है।


जिस cricket ground पर तेंडुलकर शतक/century बना सकता है, वही पर ... उसी cricket ground पर, एक सामान्य व्यक्ति क्लीन बोल्ड होता है, यह *व्यक्तिगत कला* है।


यदि आयुर्वेद वास्तव में *शास्त्र* है, तो उसकी *अनुभूति, प्रमाण, परीक्षण और पुनरावृत्ति* सभी वैद्यों और सभी रोगियों के लिए समान होनी चाहिए।


अतः जब *निदान निश्चित हो*, तो *उपचार भी निश्चित होना चाहिए*, और *निश्चित औषधियों से निश्चित परिणाम अवश्य प्राप्त होने चाहिए*।

इसी को *प्रोटोकॉल* कहा जाता है।


इसी कारण *मॉडर्न मेडिसिन शास्त्र (Science) है, कला नहीं*।

इसलिए मॉडर्न मेडिसिन में ऐसा नहीं होता कि, केवल एक ही डॉक्टर अत्यंत सफल हो, बल्कि *विश्वभर में असंख्य डॉक्टर समान प्रकार के रोगियों का सफल उपचार करते दिखाई देते हैं*, बिना भाषा, प्रदेश, देश या वंश की किसी सीमा के।


अतः यदि आयुर्वेद को *शास्त्र =science बनना है*, तो उसे *सभी को, सभी काल में, सभी स्थानों पर समान प्रमाण और अनुभूति* देनी होगी।


परंतु वर्तमान में आयुर्वेद क्षेत्र में ऐसा नहीं होता।


इसके विपरीत, *कोई एक ही आयुर्वेद प्रॅक्टिशनर अत्यधिक सफल और प्रसिद्ध हो जाता है*।


इसी कारण आज आयुर्वेद की स्थिति *कला के समान* है, "शास्त्र/science के समान नहीं।"


उदाहरणार्थ...

नाडी देखने मात्र से बहुसंख्य आयुर्वेद चिकित्सकों को कुछ भी स्पष्ट रूप से समझ में नहीं आता, जबकि कुछ ही लोग वात-पित्त-कफ तथा उनके पाँच-पाँच प्रकार भी जान लेने का दावा करते हैं ...*यह कला है, शास्त्र नहीं*।


फिर लोग पुरुषं पुरुषं वीक्ष्य पर्सनॅलाईजड मेडिसिन, कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट की कॅसेट बजाने लगते है गुहार लगाते है, और यही विविधता आयुर्वेद का सौंदर्य है ऐसा गरियाते है. 


शास्त्र मे ही अमुक हेतू समूह से अमुक लक्षण समूह निर्माण होता है, उसे अमुक रोग कहते है, उस पर अमुक चिकित्सा सूत्र / अमुक चिकित्सा अनुक्रम और अमुक चिकित्सा कल्प औषध समूह ... "यह यदि अध्याय मे लिखा हुआ है" ... तो सारा स्टॅंडर्ड डेव्हिएशन, विभिन्नता, कष्टमायझेशन, पर्सनलायझेशन, यह सब मान्य करने के बाद भी, कुछ तो समानता शेष रहती होगी, जिसके आधार पर, शतकों पहले ही, अध्याय में, उस "सामान्य & निश्चित common & fixed"; हेतु लक्षण औषध, इस त्रिस्कंध के आधार पर लिखे गये हैं. 


"यस्य कस्य तरोर्मूलम् 

येन केनाऽपि मिश्रितम्। यस्मै तस्मै प्रदातव्यं ... यद्वा तद्वा भविष्यति" ... इस random unpredictable uncertainty से

*इदमेवौषधम् अस्मै , अनेनैव हि मिश्रितम् ।*

*कालेsस्मिन्नेव दत्तम् स्यात् , इदमेव भविष्यति ।।*

यहां तक हम कभी पहुचेंगे भी???


इसीलिए *म्हेत्रे आयुर्वेद* *सप्तधा बलाधान टॅबलेट* की संकल्पना को स्थापित करने, उसे दृढमूल करने और *सर्वमान्य रूप में प्रसारित* करने का प्रयास कर रहा है।


क्योंकि इसके माध्यम से *आयुर्वेद समाज में शास्त्र के रूप में स्वीकार और प्रतिष्ठित होगा*।


*सप्तधा बलाधान टॅबलेट* के द्वारा, *प्रस्थापित निदान* वाले सभी रोगियों में *समान और निश्चित परिणाम* प्राप्त होंगे।

इस प्रकार केवल *वैद्य म्हेत्रे* ही सफल, लोकप्रिय और कीर्तिमान न बनकर, बल्कि *इस चरकोक्त आयुर्वेदीय शास्त्रीय संकल्पना को अपनाने वाले सभी वैद्य*,

प्रस्थापित निदान हेतु प्रस्थापित उपचार करने में *सक्षम होंगे*,

निश्चित परिणाम प्राप्त करेंगे,

और *सभी वैद्य सफल होंगे*।


फलस्वरूप, मॉडर्न मेडिसिन की भाँति, *आयुर्वेद समाज में शास्त्र = science के रूप में स्वीकृत और प्रतिष्ठित होगा*।


अतः यदि *“म्हेत्रे आयुर्वेद” नाम* प्रसिद्ध होने के बजाय, *“सप्तधा बलाधान टॅबलेट ” की संकल्पना* को आप जैसे अनेक सहकर्मी आयुर्वेद चिकित्सक अपनाते हैं, तो यह संकल्पना *सभी को सफल बना सकती है*।


क्योंकि

*“मात्रा-कालाश्रया युक्तिः, सिद्धिः युक्तौ प्रतिष्ठिता”*

अर्थात् निश्चित मात्रा और निश्चित काल पर आधारित युक्ति में ही सिद्धि निहित होती है।


*सप्तधा बलाधान टॅबलेट* "निश्चित मात्रा और निश्चित कालावधि" पर आधारित उपचार संकल्पना है,

अतः यह *सिद्धि अर्थात् निश्चित सफलता* प्रदान करती है।

यह व्यक्ति-सापेक्ष नहीं, बल्कि *सार्वत्रिक* है,

और *सभी वैद्यों को सफलता प्रदान करने में सक्षम* है।


इस प्रकार यह *चरकोक्त सप्तधा बलाधान संकल्पना* आयुर्वेद को *सार्वकालिक और सार्वत्रिक रूप से शास्त्र (Science) के रूप में प्रतिष्ठा* प्रदान करेगी।


वैद्य हृषीकेश म्हेत्रे 

एम डी आयुर्वेद, एम ए संस्कृत

आयुर्वेद क्लिनिक @ पुणे & नाशिक

6.1.2026

9422016871

हम कलाकार है , भक्त है , या शास्त्रानुयायी?

हम कलाकार है , भक्त है , या शास्त्रानुयायी?

Picture credit Chatgpt AI 

12.01.2024

2 years ago... from today 6.1.2026

👇🏼

हमारे यहा केवल *एक हि व्यक्ति को ये आश्चर्यकारक यशस्विता irregularly irregular रूप में क्यू प्राप्त होती है?* सभी को क्यू नहीं? यह अपवाद क्यू है, निरपवाद नियम या सार्वत्रिक निश्चित अनुभूति एवं दृढ विश्वास क्यू नहीं?


*हम कलाकार है , भक्त है , या शास्त्रानुयायी?*


वैद्य हृषीकेश म्हेत्रे 

एम डी आयुर्वेद, एम ए संस्कृत

आयुर्वेद क्लिनिक पुणे & नाशिक

12.1.2024

9422016871


एक दिन श्वास पर कुछ प्रस्तुति हुई थी ग्रुप में , शायद वेगावस्था के बारे में।

कई विभिन्न और अन्यान्य योगों का उल्लेख हुआ।

किंतु शास्त्र/संहिता में उल्लेखित चिकित्सा क्रम एवं तत्रोक्त कल्प (वमन, अवश्यं स्वेदनीयानामस्वेद्यानामपि क्षणम्स्वेदयेत् , लवण युक्ततैल उर:पृष्ठअभ्यंग , इन बातो) का उल्लेख हि नहीं हुआ ।


कोई दुष्कर केस जब कोई सक्सेसफुली ट्रीट करता है, तो हमारे यहा आश्चर्य कुतूहल 😱🤔🙄 व्यक्त होता है । *"किंतु यह तो एक सामान्य बात होनी चाहिये ।"*


प्राय ऐसी केसेस एक सुनिश्चित सर्वमान्य सर्वज्ञात निदान *मॉडर्न मेडिसीन* में उपलब्ध होता है, जिसके तुलना/आधार से हि सक्सेसफुली ट्रीट की हुई केस का अभिनंदनमूल्य निश्चित होता है । *"अगर उसी चीज/केस का आयुर्वेद परिभाषामें निदान बताये तो अभिनंदनमूल्य अनायास हि कम या शून्य होता है ।"*


32 वर्ष पूर्व पुणे के एक वैद्य ने कॅन्सर ठीक किया ऐसी न्यूज पेपर में छपी थी । *"किंतु उसी वैद्यने जब उसने किया हुआ निदान, आयुर्वेद परिभाषामें बताया, तो फिर उस निदान का कोई अभिनंदनमूल्य नहीं बचा था।"*


आज भी पहले कोई आयुर्वेद निदान बताकर केस प्रेझेंट करे और कुछ देर बाद या दूसरे दिन उसका मॉडर्न डायग्नोसिस बताये तो अभिनंदनमूल्य भिन्न रहेगा ।


तो फिरसे मूल प्रश्न यह है कि,

*हम कलाकार है , भक्त है , या शास्त्रानुयायी?*


1

जिसका सभी को, सर्व काल, निरपवाद , एकसमान अनुभव आता है और उसका कार्यकारणभाव स्पष्ट रूप से प्रमेय(ज्ञेय) व अभिधेय(शब्दो में बता सकते) होता है , तथा जिस अनुभव को उसी रूप में पुनरावर्तित कर सकते है ; उसे *शास्त्र/सायन्स* कहते है (कह सकते है / कहना उचित होगा / होगा क्या?) ।

उदा. शीत से वात वृद्धि, उष्ण से वातशमन

2+2=4

100℃ में पानी बाष्प होता है, 0℃ में पानी जम जाता है

विद्युतप्रवाह शुरू है ऐसी अनावृत्त तार को अनावृत्त हात से छूने पर झटका लगता है


2

कला या भक्ति वह है जो साधन /करण समान होने पर भी हर व्यक्ति को भिन्न अनुभव होता है ।

गायन वादन नृत्य क्रिकेट 

तबला वही हो, झाकीर हुसेन बजाये तो और मैं या आप बजावो तो आनेवाला अनुभव भिन्न है

बॅट बॉल वही है, तेंडुलकर खेले तो 4 या 6 , मैं या आप खेलो तो क्लीन बोल्ड


3

मॉडर्न मेडिसीन में रुग्ण परीक्षण , निदान, ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल दुनिया सभी जगह एकसमान होता है । चाहे वहा पर हेतु लक्षण व औषध की विभिन्नता अनंत है, फिर भी सार्वत्रिक मतैक्य/एकवाक्यता होता है ।


4

हमारा *किस्सी भी* चीज पर मतैक्य/एकवाक्यता *कभ्भी भी* होता हि नहीं है, हम उलझते हि जाते है, हम *कभी किसी निर्णय पर तो आते हि नहीं है* । और हमारे यहा तो दोष धातु मल गुण रस महाभूत इनकी संख्या मर्यादा/निश्चित है । 

फिर भी ...

हेतु, दोष, दूष्य, धातु, अवस्था, साध्यता, संभाव्य उपद्रव/रोग्यसंकर/complications, चिकित्साक्रम, चिकित्साकल्प, उपशय कालावधी, लाभ स्वरूप, लाभ मर्यादा इन में से हर चीज पर मतभिन्नता या दुविधा या अनिश्चिती !?!?


4

किसी दुष्कर case को ट्रीट करने पर मॉडर्न मेडिसीन में आश्चर्य नहीं होता है । क्यूकि ऐसी कल्पनातीत केसेस को रोज पूरी दुनिया में सैकडो जगह ट्रीट किया जा रहा होता है ।


5

किसी दुष्कर case को ट्रीट करने पर , हमारे यहा पूरा दिन 👍🏼💐👌🏼👍🏼👏🏼 चलता रहता है । *होना तो आत्मविश्वास/निश्चितबुद्धि चाहिये । ... पर होता आश्चर्य या विभ्रम हि ।*


जिसे उस केस कि यशस्वितापर विश्वासहो जाता है, उसे *आश्चर्य* लगता है।वह 👍🏼💐👌🏼👍🏼👏🏼 करता है ।


वह जिसे विश्वास नहीं हो पाता है , वह *विभ्रम* में पडकर उस पर स्वयं के मॉडर्न मेडिसीन के ज्ञान के आधार पर यथासंभव उस केस की यशस्विता को असिद्ध / झुठलाने / अपर्याप्त बताने का प्रयास करता है।


क्या हम कभी 

"यस्य कस्य तरोर्मूलम् ... यद्वा तद्वा भविष्यति" ... से

*इदमेवौषधम् अस्मै , अनेनैव हि मिश्रितम् ।*

*कालेsस्मिन्नेव दत्तम् स्यात् , इदमेव भविष्यति ।।*

यहा तक कब पहुचेंगे ???


सारांश

1

प्रस्थापित/पूर्वज्ञात निदान जो मॉडर्न मेडिसिन द्वारा किया गया है, उसकी उपलब्धता पर हि हमारा अभिनंदनमूल्य/यशस्विता/benchmark निर्धारित होता रहेगा क्या?

2

मॉडर्न मेडिसिन कृत निदान/डायग्नोसिस के बिना , किये गये आयुर्वेदीय निदान एवं चिकित्सा की validity/सत्यापना/assessment criteria कैसे स्वीकार होगी?

3

मॉडर्न मेडिसिन के निदान उपकरण (सोनोग्राफी MRI), निदान प्रक्रिया (blood investigation, histopathology, PET Scan) के बिना मात्र आयुर्वेदनिदान विधी से malignancy pcos हॉर्मोनविकृती या कम से कम प्रेग्नन्सीका *सुनिश्चित अव्यभिचारी निदान* (मॉडर्न या आयुर्वेद परिभाषा में हि सही) करना संभव है ? और जो भी निदान किया है , उसका फलमूल्य (असेसमेंट of result) भी क्या हम तय करने की क्षमता रखते है, क्या हम ये पेशंट को आश्वस्त कर सकते है कि वह रोगमुक्त है (पूर्णतः या इतने अंश तक), जैसे मॉडर्न मेडिसिन बता सकता है और वह बतायी हुई बात पेशंट एवं उसके परिवार को भी स्वीकृत होती है ।

4

हम प्रस्तुत clinical condition का जो भी आकलन/निदान करे, आयुर्वेद या मॉडर्न परिभाषामें ; क्या उसका एक सर्वमान्य सर्वाsनुनेय चिकित्साक्रम एवं हो सके तो चिकित्साकल्प तथा उनका मात्रानिर्धारण व उपचार कालावधी यह सब सर्वसमान सर्वस्वीकार्य मतैक्य के रूप में (प्रोटोकॉल) क्यू नहीं है? और देश, काल, वंश, आहार, (प्राय:) वय, लिंग आदि के निरपेक्ष; पूरी दुनिया में एकसमान है ।


हमारे यहा केवल *एक हि व्यक्ति को ये आश्चर्यकारक यशस्विता irregularly irregular रूप में क्यू प्राप्त होती है?* सभी को क्यू नहीं? यह अपवाद क्यू है, निरपवाद नियम या सार्वत्रिक निश्चित अनुभूति एवं दृढ विश्वास क्यू नहीं?


हेतु संप्राप्ती दोष दूष्य निर्धारण (ये सब को होता भी है?!) तथा चिकित्साक्रम कल्प मात्रा कालावधी तथा अपेक्षित परिणाम इनमे विभिन्नता मतभेद का spectrum इतना विस्तृत है कि एकवाक्यता का संभावना कम से कम इस शती में तो नहीं है ।


और शास्त्र तो परादि गुणो को चिकित्साके सिद्ध्युपाय कहता है , जिसमे *निश्चित कथन* को महत्त्व दिया है ।

👆🏼

वैद्य हृषीकेश म्हेत्रे 

एम डी आयुर्वेद, एम ए संस्कृत

आयुर्वेद क्लिनिक पुणे & नाशिक

12.1.2024

9422016871

Saturday, 3 January 2026

ज्वर : कन्फ्युजन ही कन्फ्युजन!😇

 ज्वर : कन्फ्युजन ही कन्फ्युजन!😇

Picture credit Chatgpt AI 

Picture credit Chatgpt AI 

ज्वर जो उष्मा के बिना नही हो सकता, और जो ऊष्मा पित्त के बिना नही हो सकता, वह ज्वर, वात और कफ ऐसे दो शीत गुण के दोषों से होता है!! 


पित्त ज्वर मे लिखा है कि "द्रवत्वात् अग्निम् उपहत्य"... तो वातज और कफज ज्वर में अग्नि का उपहनन "कैसे" होता है, ये क्यूं नही लिखा?? वहां अपने आप ही, "जादू से" अग्नी उपहनन होता है? 


फिर वात अग्नि को "केवलम्" = पूरी तरह से पक्तिस्थान से खींच कर = घसीट कर = "निरस्य" ले जाता है ... ठीक है ! वात चलगुण है तो ले जाता होगा. लेकिन पित्त अग्नि को कैसे ले जाता है? पित्त & अग्नि तो एक ही है!!! पित्त ने अगर द्रवत्व के कारण अग्नि का हनन किया है , तो वहां से और कहीं पर जायेगा कैसे ??


और कफ जो आत्यंतिक स्थिर है मंद है, वो किसी चीज को स्वयं ले कैसे जा सकता है???


अकेले वाग्भट ने ये हिम्मत दिखाई है कि "आमम्-अनुगम्य" क्यू की आमाशय में आम ही होता है ... पर चरक ने लिखा है कि, आमाशय में "आद्य आहारपरिणामधातु रसनामानम् अन्ववेत्य" ... अरे भाई, रस नाम का आहार परिणाम धातू आमाशय मे कहा से होगा ... जब तक पक्व नही होगा, "पक्व आशय" मे नही आयेगा, तब तक उसे "आहार परिणाम आद्य रस धातु" कैसे कहेंगे ??? 


बाकी आहार से आहार रस और आहार रस से रसरक्तादि धातु निर्माण होते है... या सीधा आहार से ही रस धातु निर्माण होता है, ये तो कन्फ्युजन है ही! कभी देखे जरा चरक सूत्र 28 & चचि15 मे कितना कन्फ्युजन है !?


अगर ये ज्वर संप्राप्ति के अनुसार, आमाशय मे ही आहार परिणाम आद्य धातु रस निर्माण होने वाला है, तो रसाग्नि किस पर काम करता है भाई???


दो ही स्रोतस् क्यू "पिधाय" = बंद होते है? बाकी आजूबाजू के, आगे पीछे के, रक्त मांस के बंद क्यू नही होता? पुरीषवह मूत्रवह क्यूं बंद नही होता ? और स्वेद वह बंद होता है, तो मेदोवह क्यू नही बंद होता ???


ठीक है, स्वेद बंद/अवरोध होकर ज्वर होता है और पित्त ज्वर मे स्वेद नाम का लक्षण होता है 🤣, ये कैसे होता है ?! अगर स्वेद अवरोध, ज्वर का प्रत्यात्मलक्षण है, ज्वर & पित्त दोष अविना भाव संबंध है, तो ऐसे पित्तज्वर में (स्वेदावरोध की जगह) स्वेद यह लक्षण कैसे आता है ??


और सबसे विचित्र बात ये है कि वातज पित्तज कफज इन् सभी ज्वरों के लक्षणों मे ज्वर का उल्लेख ही नही है ... सारे लक्षण वात दोष के , पित्तदोष के , कफ दोष के वृद्धिके या वैगुण्य ने के है !


वैसे देखा जाये तो पूरे आयुर्वेद शास्त्र मे किसी व्याधी का लक्षण तो दिया ही नही है. आप कोई भी व्याधी देख लीजिए , तीनो दोषों से, हो सके तो संनिपात से, हो सके तो द्विदोषों से, ऐसे कम से कम 3 या 4 या 7 प्रकार का होता है ... अरे भाई , "सभी/हर/प्रत्येक/किसी भी" दोष से अगर वह व्याधी होने वाला है, तो उसको अपना कोई "स्वयं का मूलभूत संघटन basic constition" है की नही?! जैसे ... ज्वर = ऊष्मा = पित्त ✅️

प्रमेह कफ से ही होना चाहिये ... वात से पित्त से कैसे हो(सक)ता है ? रक्तपित्त पित्त से ही होना चाहिए , वात कफ से कैसे हो(सक)ता है और अगर सभी व्याधी सभी दोषों से होते है, तो वातव्याधी ... कफज पित्तच क्यूं नही होते है? केवल वातव्याधी वातज होते है , वे भी कफजन्य पित्तजन्य द्विदोषजन्य संनिपातजन्य वात व्याधी क्यू नही होते है?? रक्तपित्त वातरक्त क्यूं होता आहे , कफरक्त क्यू नही होता है? केवळ वातरक्त क्यू होता है, वातमेद वातमज्जा वातपुरीष वातमूत्र वातरस ये क्यू नही होते है ??


ज्वर तो छोड दीजिए, पूरी आयुर्वेद की नैदानिक संकल्पना ही, असिद्ध असत्य अशास्त्रीय वस्तुस्थिती से परे अवास्तविक अनरियलिस्टिक कल्पनारम्य, इस प्रकार की है.


आयुर्वेद मे वर्णित जो व्याधी है, वो प्रायः लक्षण है किसी अंडरलाईंग विकृती के! जिन्हें आयुर्वेद व्याधी समजता है ... ज्वर रक्तपित्त कास श्वास पांडू उदर ये सभी , एक्चुअली अन्य किसी रोग के ये लक्षण है.


ज्वर के निदान के अध्याय मे 44 श्लोक या परिच्छेद है, उसमे से 15 श्लोक तो निदान की सैद्धांतिक परिभाषा बताने मे लगे है! ... तो भाई, एक अलग अध्याय लिख लेते, जैसे वाग्भट ने लिखा... सर्व रोग निदान !!!


ज्वर के निदान मे जो 44 में से, 29 श्लोक लिखा है, उससे "4.75 गुना ज्वरनिदान" तो आपने ज्वर के "चिकित्सा के अध्याय" मे लिखा है. 


चिकित्सा स्थान मे और बडी विचित्र बात देखिये, निदान स्थान का पहला अध्याय ज्वर है, लेकिन चिकित्सा का पहला अध्याय रसायन ... कितना विचित्र क्रमभंग है!!! 


ज्वर चिकित्सा का वर्णन 3rd अध्याय में है. आयुर्वेद के जो अंतिम दो अंग है, वो काय चिकित्सा के आद्य & सबसे महत्वपूर्ण रोग की चिकित्सा के पहले, "क्रमभंग करके", बताने की क्या आवश्यकता है?? 


क्रमानुगतार्थम् यह शास्त्र का निकष/सद्गुण है ! 


इंद्रिय स्थान मे, व्यक्ति मृत्यु के समीप है, ऐसे लक्षण बताने के बाद, रसायन बताया थोडा बहुत ठीक लेकिन उसके बाद वाजीकरण बताने की क्या आवश्यकता है!? कम से कम उसको तो अंत मे रखते ... लेकिन नही !!!


मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं ... मेरी मर्जी !

कोकोनट मे लस्सी मिला के ... ऐसा सारा ये प्रकार है! 


लेकिन लोगों को अत्यंत भक्ती आरती अभिषेक भंडारा प्रसाद नमस्कार लोटांगण इसमें ही मजा आता है, इंटरेस्ट है. चरक पर उंगली दिखाओ, उसके दोष दिखाओ, तो ये भक्त लोग जो है भडक 🔥 जाते है.


अरे, सोचो ना, कम से कम ... अगर उपर सिर मे ब्रेन 🧠 नाम का कोई चीज है तो ! वैसे तो आयुर्वेद में, शिर में ब्रेन होता है, ये पता ही नही है! इसमे आपकी भी कोई गलती नही है ...

आयुर्वेद के लोग ज्वर पर सेमिनार किये जा रहे है... उसमे "जयगंमत" नाम का रसकल्प दिया और मैने 103° डिग्री टेंपरेचर नीचे लाया ! अरे, कहां आयुर्वेद शास्त्र मे लिखा है "इतनी डिग्री/ फॅरनहाइट/centigrade" तक टेम्परेचर जाता है ?! स्वयं का कर्तृत्व(?) सिद्ध करने के लिए मॉडर्न मेडिसिन की परिभाषा का "बेंच मार्क" क्यूं "आवश्यक" लगता है, अगर आयुर्वेद के विषय मे सेमिनार कर रहे है तो!? क्यूं कि सभी को भी पता है, कि यदि वातज्वर पित्तज्वर संनिपातज ज्वर चतुर्थक प्रलेपक इस प्रकार का ज्वर ठीक किया, ऐसे स्टेज पर, माईक लेकर, बतायेंगे .... तो कोई तालियां applaud नही बजायेगा, किसी को कुछ हॅपनिंग / ग्रेट नही लगेगा! 😬


सेमिनार में तो ये बताना चाहिये था, क्या अभिन्यास हतौजस प्रलेपक संनिपातजन्य ऐसे "कितने" ज्वर ट्रीट किये है !? पूरी जिंदगी में किस्सी ने भी तृतीयक चतुर्थक ऍक्च्युली एक / दो दिन छोडकर होता है, ऐसा अनुभव नही किया है ... और ये ज्वर पर बाते करते रहते है. 


ज्वर सबसे महत्त्वपूर्ण और आद्य व्याधी है और "चरकस्तु चिकित्सिते" ऐसे "भजन" भी करते है, उस ज्वर की चिकित्सा किसी ने भी आज तक चरक ने लिखी हुई है, वैसे नही की है. सबसे पहले त्रिभुवन कीर्ति , ज्वरांकुश, मृत्युंजय या जयगंमत ये रसकल्प देंगे और कहेंगे की "आयुर्वेदीय" चिकित्सा की! यह तो एक कंट्री में, दूसरे कंट्री के करन्सी नोट चलाने जैसा है.


किसी ने भी विषमज्वर; चतुर्थक तृतीयक ये, तथाकथित ज्वरपंचकषाय यह "अकेला" औषध प्रयोग करके ठीक किये है कभी??? 


बडी बडी बाते तो करेंगे, वह भी मॉडर्न की परिभाषा मे 103 डिग्री! 104 डिग्री! वो क्या आयुर्वेद की परिभाषा है? आयुर्वेद शास्त्रोक्त लक्षण है? क्या आयुर्वेद संहिता मे लिखा है, कितने डिग्री टेंपरेचर होता है? एक मिनिट मे नाडी कितने बार पल्सेट pulsate करती है, यही तक पता नही है! तो डिग्री ° centigrade Fahrenheit कहा से पता होगा? पारद का रसशास्त्र में रसकल्प हजारो निर्माण किया, पर इतनी सिधी साधी बात कभी समझ मे नही आयी की उससे टेम्परेचर गिन सकते है, संख्या परिमाण परादि चिकित्सा सिद्ध्युपाय ! चिकित्सा यैरविदितैर्न यथावत् प्रवर्तते ॥ ये सब केवल बडबड करने की बाते है... वाग्वस्तुमात्र!


और आज ज्वर के सेमिनार मे फॅरेनहाईट और डिग्री सेंटिग्रेड मे बात करते हो, यही कितना बडा वदतो व्याघात है! लेकिन किसी ने कुछ कहना नही! जो कर रहे है, वही ठीक ! कुछ गलत कर रहे है, ये समझने के लिए बुद्धी की आवश्यकता होती है, वो तो है ही नही किसी के पास, सिर्फ "जय हो" करना है और आरती करना है और वहां पर दिया हुआ प्रसाद खाकर घर जाना है ! क्या मिला सेमिनार अटेंड करके, भगवान जाने!! बाकी फोटो फ्लेक्स करने के लिए सोशल मीडिया तो पडा ही है!


या "ज्वर" ऐसा व्हाट्सअप 9422016871 पर करें

Thursday, 1 January 2026

स्त्री शुक्र क्या है? रज या आर्तव या और हि कुछ?

 स्त्री शुक्र क्या है? रज या आर्तव या और हि कुछ?

लेखक : ✍️🏼 वैद्य हृषीकेश म्हेत्रे, एमडी आयुर्वेद, एम ए संस्कृत, आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे & नाशिक. महाराष्ट्र. भारत. +919422016871 MhetreAyurved@gmail.com 

Picture credit Chatgpt AI 


उसके पहले प्रश्न यह होना चाहिये की शुक्र क्या है


मूलतः शुक्र यह शब्दप्रयोग ही पुरुषदेह की पहचान है 

क्योंकि किशोरावस्था समाप्त होने के पश्चात पुरुष मे वीर्य या रेतस् इस स्वरूप मे शुक्र का उदीरण प्रत्यक्ष रूप मे दिखाई देता है 


किंतु आज हमे यह ज्ञात है कि उसमे बीज स्वरूप शुक्र, अंश / अल्प मात्रा में तथा उस बीज का पोषण करने के लिए आवश्यक, शेष सांद्र या द्रवद्रव्य बहुत प्रमाण मे होता है 


जैसे एक अंडा ... जिसमे केंद्रस्थ भाग केंद्रस्थ अंश से आगे जन्म लेने वाले पक्षी का शरीर निर्माण होता है और तब तक के लिये उस केंद्रस्थ अंश के बाहर जो पारदर्शक सेमी सॉलिड सांद्र पदार्थ होता है, वह उसका पोषण करता है 


इसी प्रकार से स्त्री के शरीर मे या योनी मे शुक्र का सिंचन होने के पश्चात बीज स्वरूप पुरूष शुक्र अर्थात स्पर्म का ओव्हम तक (प्रवास करके उसका भेदन करके उसका फलन /फर्टिलिटी /फर्टीलायझेशन होने तक) जो उसको आवश्यक पोषण न्यूट्रिशन है , वह अन्य सांद्र (या बादमे द्रवीभूत होने वाले) अंश से प्राप्त होता है 


हमे स्त्री शुक्र समजना है तो ...


 जैसे छ धातूओं के पश्चात , मज्जा के पश्चात पुरुष शरीर मे, शुक्र निर्माण होता है ... वैसे स्त्री शरीर मे आर्तव निर्माण होता है, इसलिये एक मास के बाद पुरुष मे शुक्र और स्त्री मे आर्तव उत्पत्ती होती है , ऐसा संदर्भ आता है 


यह आर्तव भी इसी दो प्रकार का है इसमे एक बीज स्वरूप अर्थ है और जिसे हम प्रत्यक्ष हर महिने रस जन्य तीन दिन स्रवित होते हुए देख पाते है , वह रज नाम से जाने वाला उसका माध्यम स्वरूप अंश है 


किंतु यह स्पष्टीकरण भी, पूर्व के दो उदाहरणों के अनुसार उचित नही है 


जो मासिक स्राव आता है , जो रक्त स्वरूप रज आता है, वह गर्भाशय से आता है और वह बीज नही है 


और जो बीज स्वरूप आता है वो ओव्हरी से आता है उसका थोडा प्रवास फॅलोपियन ट्यूब से होता है और ये दोनो अवयव पूर्व आचार्य को ज्ञात नही थे


12 वर्ष से प्रायः रजप्रवृत्ती आरंभ होती है, जिसे मेनार्क कहा जाता है = ऋतुप्राप्ती , ऐसा प्राचीन ग्रंथो मे जैसे उल्लेख हुआ है. उसमे पहले कुछ मास तो केवल गर्भाशय से ही रक्तस्त्राव या रजप्रवृत्ती होती है और बीज निर्मिती तब पहले कुछ मास तक ओव्हरी में नही होती है 


जैसे पुरुष शरीर मे वृषण से "बीज स्वरूप शुक्र" और प्रोस्टेट तथा सेमिनल वेसिकल से "माध्यम स्वरूप शुक्र" ये एक साथ मिलकर एक समय जननेंद्रिय से उत्सर्जित होते है ... उस प्रकार से यह रज आर्तव & स्त्री बीज के विषय मे नही होता है 


वस्तुतः प्राचीन आचार्य को स्त्री बीज ओव्हरी से निर्माण होता है यह (संभवतः) ज्ञात ही नही था त्रिआवर्ता योनी और गर्भाशय इतना ही संभवता उन्हे ज्ञात था 


उसके परे फॅलोपियन ट्यूब और उसके परे दोनो और एक एक ओव्हरी होती है, यह उन्हे ज्ञात होना असंभव लगता है. 


जैसे यकृत का कार्य, सेमिनल वेसिकल की उपस्थिती, फुप्फुस कार्य, हृदय मे चार भाग, pancreas, cerebrum, cerebellum, thyroid इनकी उपस्थिती और उनका कार्य, वृक्क का रक्त से और मूत्र से सुनिश्चित संबंध ज्ञात नही था


उलटा वृक्क का संबंध मेद से है, क्लोम नाम का कोई अवयव है, उदकवह और अन्न वह यह 2 स्रोत अलग अलग होते है , अन्न वह और पुरीषवह स्रोत दो दो होते है... ऐसी कुछ प्रत्यक्ष प्रमाण से सहजही बाधित होने वाली कल्पनारम्य तार्किक बाते उन्हें सत्य लगती थी, तो ऐसी स्थिती मे प्राचीन काल के आचार्य को ओव्हरी फेलोपियन ट्यूब , ओव्ह्युलेशन ये पता होगा , यह असंभव है


रज या आर्तव को कुछ हद समझ पाना संभव है, उसे गर्भाशयांतर्गत इंडोमेंटरीयम में ब्लीडिंग तथा ओव्हम ओव्ह्युलेशन यहा तक समतुल्य आकलन कर सकते है 

Picture credit Google Gemini AI 


किंतु आज भी स्त्री शुक्र को समजना, यह दुष्कर ही है !


अगर हम स्त्री शुक्र की बजाय, यदि रजरूपी आर्तव को समझना चाहे तो सीधा उसे केवल गर्भाशय से होने वाला रक्तस्त्राव समजना चाहिए , मनुष्य की पुनरुत्पत्ती से प्रजोत्पादन से जननक्षमता से कोई सीधा संबंध नही है और वह रस का उपधातू है यहा तक उसको मान्य करना ठीक है 


स्त्री शुक्र यही संकल्पना समझनी है, तो जो ओव्हरीसे बीज = स्त्रीशुक्र के रूप मे आता है, हर महीने में एक बार अल्टरनेट ओव्हरी से, वही स्त्री शुक्र है , बीज स्वरूप मे और उसके साथ जो तत्कालीन अल्पकालीन न्यूट्रिशन पोषक अंश अत्यल्प मात्रा में होता है, उसे बीज माध्यम समझा जा सकता है 


स्त्री शुक्र और पुरुष शुक्र इन का, बीज और बीज माध्यम के अलावा, 

एक अन्य अर्थ ऐसा है की यदि प्रजोत्पादन के लिए बीज स्वरूप मे पुरुष या स्त्री के शरीर से उनकी व्यक्ती अभिव्यक्ती 12 और 16 साल के बाद होती है , तथापि शरीर तो जन्म से ही सप्तधातुयुक्त है, इसलिये 12 साल के पहले भी और पचास साल के बाद भी स्त्री शरीर मे भी शुक्र धातु तो होता ही है! चाहे रज आर्तव इनकी उपस्थिती हो या ना हो ! ऐसे भी गर्भिणी और सूतिका काल के शिशु को स्तनपान देने के काल मे कुछ महिनो तक रज प्रवृत्ती नही होती है और उसमे बीज स्वरूप स्त्री शुक्र अर्थात ओव्हरी से भी ओव्हम नही आता है, ऐसे सभी कालो मे भी अर्थात जन्म लेने के पश्चात प्रथम श्वास से अंतिम श्वास के पश्चात आने वाले मृत्यु तक , स्त्री और पुरुष दोनो शरीर मे , सातो धातू होते ही है , तो यह आजन्म आमरण , प्रथम श्वास से अंतिम श्वास तक , जो सप्तम धातू शुक्र स्वरूप, लिंग निरपेक्ष हर मनुष्य देहमें, स्त्री पुरुष उभय देह मे होता ही है, जो उसके शरीर के बाहर अन्य शरीर उत्पत्ती के लिये अर्थात अपत्य उत्पत्ती के लिये व्यक्त नही होता है, ऐसा जो शुक्र है जिसे हम आजीवन उपस्थित पुरुष शुक्र और आजीवन उपस्थित स्त्री शुक्र कहेंगे ... यह बीज स्वरूप + माध्यम स्वरूप ऐसे शुक्र या आर्तव से अलग है ... यह लिंगनिरपेक्ष, सर्व मनुष्य देहों मे उपस्थित होने वाला शुक्र, वह भाव है, जो "उस देह को, उसी देह मे" प्रतिक्षण प्रतिदिन प्रतिमास प्रतिवर्ष नया जन्म देता रहता है = इसका अर्थ क्या है? 


... कि यद्यपि शुक्र का श्रेष्ठ कर्म गर्भ उत्पादन बताया गया है , तथापि ...


आज से दो तीन जनरेशन पहले तक, एक दंपती को या एक स्त्री को, दस या बारा बार जीवन मे गर्भधारणा या अपत्यप्राप्ती होती थी, जो पिछली पिढी मे तीन या चार तक आ गई , हमारी पिढी मे एक या दो तक आ गई और आनेवाले पिढी मे संभवता हा एक या शून्य तक आ जायेगी!...


 तो अगर शुक्र का काम गर्भ उत्पादन यह है, तो इस प्रकार से दस बारा से एक शून्य तक गर्भधारणा अपत्य प्राप्ति की संख्या आ गई है तो, "यह शुक्र सप्तम धातु लिंगनिरपेक्ष मनुष्य देहमे स्त्री देह मे पुरुष देह मे क्या कार्य करता है , किस स्वरूप मे होता है?" 


... तो जो अन्न रोटी चावल सब्जी दाल हम रोज खाते है , वो तो अगले कुछ दिनो मे कुछ काल मे , शरीर से नष्ट हो जाता है . क्यूंकि शीर्यते तत् शरीरम्। 


फिर भी जो जनम से आगे पाच दस बीस 40 60 80 वर्षतक, "मै वही हू , मेरा हात वही है , मेरा नाक वही है , मेरा पाव वही है , मेरे शरीर पर कही अगर व्रण होकर वह भर गया है, तो उस व्रण का वैसे ही होना सालो तक उसी प्रकार से है ... यह "मेरा परिचय/identity मेरे जो भूतकाल मे थी, उसी प्रकार से आज वर्तकाल मे है & ... वर्तमान काल मे है, उसी प्रकार से आगे भविष्यकाल मे भी बनी रहेगी ... अनुबंध रूप मे रहेगी... इसको प्रति दिन प्रतिक्षण प्रति सप्ताह प्रतिमास प्रतिवर्ष "बनाये रखना", यह कार्य जो शरीरस्थ भाव करता है , उसे लिंगनिरपेक्ष मनुष्य देह का शुक्रधातु सप्तम धातु कहते है ... 


जो वंध्य है, इनके शरीर मे बीज निर्मिती होती ही नही, उनके भी शरीर मे शुक्र धातु तो होता ही है ॥


ऐसे बीज निर्मिती न होने वाले शरीर मे भी, शुक्र ...

उनके ही देह को, उनके ही अवयवो को, उनके ही धातुओं को , प्रतिदिन प्रतिवर्ष उसी स्वरूप मे , "प्रति रूप मे प्रतिबिंब की तरह आयडेंटीकली शरीर के अंतर्गत ही जन्म देता रहता है" 


जैसे मराठी मे गाना है , एकाच या जन्मी जणू फिरुनी नवे जन्मेन मी 


या 


गाईड फिल्म का जो गाना है ... आज फिर जीने की तमन्ना है , आज फिर मरने का इरादा है , उस प्रकार से खाये हुए अन्न से निर्माण होने वाले धाते कुछ काल के बाद , "मरते है" और खाये हुए अन्न से फिरसे नये धातु नया देह "जीता रहता है", तो यह मेरा ही... मेरे ही शरीर के अंदर ... नये से बनना , नये से उत्पन्न होना, नये से जन्म लेना ...यह कार्य निरंतर जो शरीरस्थ भाव करता है , उसे शुक्र कहते है.


इसलिये यह शुक्र, आज मॉडर्न सायन्स मॉडर्न बायोलॉजी के अनुसार, हर सेल का न्यूक्लिअस या जीन्स या डीएनए है, ऐसा समज सकते है.


रज या आर्तव... गर्भाशयस्थ मासिक स्त्राव स्वरूप रसजन्य उपधातु है इसीलिए उसका वर्ण रक्त है (हर उपधातू जिस धातू का उपधातू है उस धातू के अगले धातू के वर्ण का या स्वरूप जैसा होता है). यह तो बीज माध्यम स्वरूप भी नही है


रज नही , अपितु केवल आर्तव अर्थात ओव्हम , यह बीजरूप में अभिव्यक्त मॅनिफेस्ट होता है, जिसे पुरुष शुक्र के लिए चरक चिकित्सा 2 अंतिम पाद में रूपद्रव्य = (चरतो विश्वरूपस्य रूपद्रव्यम्) कहा गया है बीजरूप = रूपद्रव्य =स्त्री शुक्र है. 


रूपद्रव्यमिति रूपप्राक्तनकारणम्। एतेन, अव्यक्तस्यात्मनो व्यक्तशरीरनिर्वृत्तौ शुक्रं हेतुरित्युक्तं भवति। शुक्रं चेह प्रकरणागतत्वेनोक्तं; *तेन आर्तवमप्यात्मनो रूपद्रव्यं ज्ञेयम्॥*


इसीलिए ओव्हम को रज नही कहेंगे, क्योंकि उससे वस्त्र का रंजन नही होता है


मेंस्ट्रुअल ब्लीडिंग को ही रज कहेंगे क्योंकि उससे वस्त्र का रंजन होता है


ओव्हम को ही आर्तव कहेंगे, क्यू की वह ऋतु की तरह ही एक ओव्हरी मे दो महिने के बाद आता है


मेंस्ट्रुअल ब्लीडिंग को ही आर्तव नहीं कहेंगे क्योंकि वह तो हर महिने आता है 


किंतु ऋतु तो दो महीने के बाद आता बदलता है 


यद्यपी ऋतू बारा दिन का होता है , यह स्त्री देह के संदर्भ मे शारीर स्थान मे स्वीकृत स्व संज्ञा परिभाषा आयुर्वेद टर्मिनोलॉजी है


तथापि निसर्ग मे जो ऋतू होते है ये दो महिने के बाद बदलते है और एक्झॅक्टली उसी प्रकार से दो महीने के बाद उसी ओव्हरी मे फिरसे बीज उत्पत्ती होती है इसलिये ओव्हम को आर्तव कहना अधिक उचित है


और सबसे अंत में ...

जो इस प्रकार से ... ना तो, ब्लीडिंग = रज है 

ना हि अपत्य उत्पत्तीकारक बीजरूप रूप द्रव्य = ओव्हम है ...

वह स्त्री शुक्र जो स्त्री देह के प्रथम श्वास असे अंतिम श्वास तक आमरण स्त्री देह के अस्तित्व के आजीवन संपूर्ण कालावधी मे शरीर मे सर्वत्र उपलब्ध व्याप्त रहता है वह स्त्री शुक्र लिंगनिरपेक्ष मनुष्य देह मे उपस्थित प्राप्त अस्तित्व मे होने वाला हर सेल के केंद्र मे स्थित, न्यूक्लिअस या जीन्स या डीएनए, यही स्त्री शुक्र, निश्चित रूप से है


लेखक : ✍️🏼 वैद्य हृषीकेश म्हेत्रे, एमडी आयुर्वेद, एम ए संस्कृत, आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे & नाशिक. महाराष्ट्र. भारत. +919422016871 MhetreAyurved@gmail.com