एअर सायकलिंग + स्पायनल ट्विस्ट = सर्वांगीण व्यायाम Complete Exercise ✅️
आज मैं ऊपर, आसमां नीचे + मुड़ मुड़के "हां" देख, मुड़मुड़ के = सर्वांगीण व्यायाम Complete Exercise ✅️
एअर सायकलिंग + स्पायनल ट्विस्ट = सर्वांगीण व्यायाम
✍🏼 वैद्य हृषिकेश म्हेत्रे, एमडी आयुर्वेद, एम ए संस्कृत
आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे एंड नाशिक
मोबाइल नंबर 9422016871
05/12/2024
चलना, दौड़ना, वॉकिंग, रनिंग, बैडमिंटन, क्रिकेट, जिम, ज़ुम्बा, योगा, स्विमिंग, सायकलिंग ... इन सबसे उत्तम, हितकारक, सुरक्षित और मुख्य बात यह कि "सर्वांगीण व्यायाम यानी एअर सायकलिंग और स्पायनल ट्विस्ट" है।
व्यायाम कब, किसे, कितना, किस तरीके से करना चाहिए और किसे नहीं करना चाहिए, इसके विधि-निषेध (= Do & Don't) हमने संक्षेप में, लेकिन आसानी से समझ में आने वाले सुबोध तरीके से देखे हैं।
सर्वांगीण व्यायाम होना शरीर के लिए आवश्यक और निश्चित रूप से हितकर होता है!
विशेष रूप से, प्राकृतिक रूप से उत्साह के कारण, कौतूहल के कारण, जिज्ञासा के कारण, शरीर की चैतन्यता के कारण... सहज रूप से होने वाली हलचल = खेल, कूद, दंगा-मस्ती, शरारतें, भाग-दौड़, यह सब आमतौर पर बचपन समाप्त होते समय और युवावस्था की दहलीज पर खत्म हो जाता है...
और साधारणतः बच्चे जब नौवीं-दसवीं में जाते हैं, तब से उनका मैदानी खेल, व्यायाम और विभिन्न कारणों से सहज रूप से होने वाली शारीरिक हलचल, पढ़ाई के विस्तार और अनावश्यक प्रेशर के कारण जो रुकती है; वह प्रायः उनके आगे के जीवन में फिर कभी शुरू ही नहीं होती, ऐसा पिछली पीढ़ी तक था!!!
लेकिन अब, बिल्कुल नासमझ उम्र से ही, मासूम और अजान उम्र से ही, हाथ में मोबाइल या सामने लैपटॉप, टैब, टीवी जैसे विभिन्न स्क्रीन लगातार होने के कारण, बच्चों की शारीरिक हलचल, व्यायाम और मैदानी खेल लगभग बंद हो चुके हैं!
कुछ जागरूक और आर्थिक रूप से संपन्न माता-पिता, बच्चों को एक-दो घंटे के लिए पैसे देकर ग्राउंड जॉइन करवाते हैं... लेकिन उनकी संख्या अत्यंत कम है!!!
पिछली पीढ़ी के बच्चों, किशोरों और युवाओं ने भी घर के काम... यहाँ तक कि जो भी काम सामने आए, बिना किसी शिकायत के, बड़ों की आज्ञा के कारण किए हैं... उसमें झाड़ू लगाना, बिस्तरे बिछाना और समेटना (क्योंकि खुद का बेडरूम जैसा नखरा उस समय नहीं था), घड़ा, कलश, बाल्टी से पानी भरकर लाना (नल चालू किया कि धड़ाधड़ पानी बह रहा है, ऐसा उस समय नहीं था), किराना, केरोसिन, राशन, गैस सिलेंडर की लाइनों में खड़े रहना और उसके लिए कई किलोमीटर पैदल चलना या साइकिल चलाना, यह सभी के मामले में हो रहा था!!!
टू-व्हीलर वाला घर कोई एकाध ही होता था और फोर-व्हीलर तो अमूमन पूरे गाँव में एकाध-दो ही होती थी... इसलिए युवावस्था में भी, या कुछ लोग तो रिटायर होने तक चलना या साइकिल चलाना करते ही रहते थे...
लेकिन अब की पीढ़ी में घर का काम करना आवश्यक ही नहीं रहा है या माता-पिता के अत्यधिक लाड-प्यार के कारण, लड़कों को तो छोड़िए, अब की लड़कियों को भी घर के काम की बिल्कुल आदत नहीं है! इसके विपरीत, उन्हें (लड़कियों को) घर का काम करना शर्मनाक, इन्फीरियर (घटिया), 'काकूबाई' (पिछड़ा), बैकवर्ड और पिछड़ापन लगता है!
इसीलिए बहुत कम उम्र में आज की कई लड़कियाँ बहुत मोटी, वजन से थुलथुली, भारी और बेडौल हो रही हैं या उन्हें विभिन्न हार्मोनल बीमारियाँ हो रही हैं। स्वाभाविक रूप से उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बहुत कम है।
पिछली पीढ़ी में होटल का और खरीदा हुआ खाना खाने का प्रकार 99% घरों में था ही नहीं...
अब तो वीकेंड पर घर में खाना पकाना ही नहीं है, बाहर जाकर ही खाना है और अन्य वीक डेज पर भी जब मर्जी हो/जैसे जमे, अपनी पसंद के अनुसार, घर के अन्य बड़ों को बिना पूछे, बिना अनुमति लिए ही, ऑनलाइन फूड ऑर्डर करना दिखाई दे रहा है।
घर का पौष्टिक, शुद्ध, ताजा, माँ के हाथ का खाना खाने का प्रमाण कम हो गया है और खरीदा हुआ, होटल का, खुले का, रास्ते का, जंक, फास्ट, स्ट्रीट ऐसा "फूड" खाने का फैड (चलन) हर तरफ फैल गया है!!!
इस सब के कारण अनावश्यक फालतू चर्बी का, स्थूलता का, मोटापे का "महामारी (प्रकोप)" हर तरफ दिख रहा है और स्वाभाविक रूप से इसके कारण प्रतिरोधक क्षमता कम और हार्मोनल डिसीज ज्यादा हो गए हैं।
इसलिए छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को "शारीरिक हलचल करनी पड़े", इस तरह उनके दिनचर्या में कुछ बातें शामिल करना आवश्यक है।
व्यायाम का नाम लेते ही, तुरंत कई लोग महंगे जूते, ट्रैक सूट पहनकर जॉगिंग, रनिंग, सायकलिंग करना या बहुत पैसे देकर एसी जिम में ट्रेडमिल पर दौड़ना, न जाने कैसे-कैसे वेट (वजन) उठाना या पैसे देकर ज़ुम्बा, योगा जैसे क्लासेस में जाना या वीकेंड पर मूर्खों की तरह खतरनाक अनजान पहाड़ों पर ट्रेकिंग के लिए जाना, पागल की तरह पूरी दुनिया दौड़ रही है इसलिए मैराथन में भागना... ऐसे अशास्त्रीय, दिशाहीन और ढोंगी प्रकार चालू हैं।
परंतु शरीर के सभी अंगों को, सभी मसल्स को, सभी जोड़ों को पर्याप्त आवश्यक व्यायाम मिलेगा... ऐसा उपरोक्त किसी भी प्रकार में निश्चित रूप से, सुरक्षित रूप से और नियमित रूप से नहीं होता!
देखा जाए तो पिछली पीढ़ी में युवाओं के लिए अखाड़े (तालीम) जाना, अखाड़े न जाकर भी घर के घर में दंड-बैठक, पुश-अप्स, रस्सी कूदना और निश्चित रूप से घर का काम, इतना व्यायाम पर्याप्त होता था। शादी के बाद और करियर में सेटल होने के बाद, युवा से लेकर प्रौढ़ उम्र के सभी लोग प्रायः पैदल या साइकिल से जाते थे, इसलिए वैसे भी भरपूर व्यायाम हो ही जाता था...
लेकिन अब किसी भी उम्र में पर्याप्त व्यायाम नहीं होता, ऐसी स्थिति है।
अभी के जो कुछ लोकप्रिय स्थापित व्यायाम प्रकार हैं, वे या तो एकांगी (वन-साइडेड) हैं यानी शरीर के किसी एक अंग या हिस्से के लिए हैं, या फिर वे तुरंत या आगे चलकर खतरनाक साबित होने वाले हैं... जैसे कि क्रिकेट, बैडमिंटन, टेबल टेनिस, दौड़ना, रस्सी कूदना, ट्रेकिंग करना, किले चढ़ना... इन सब में हमारी अगली हलचल किस अंग की, किस जोड़ की, किस मसल की होने वाली है, यह पता नहीं होता!
इसका मतलब यह है कि इन सभी व्यायामों/खेलों में; जर्क, झटका, अनपेक्षित (अचानक) और बिना तय की गई हलचल अगले ही पल होने की संभावना होती है!
परंतु, "व्यायाम = शरीर चेष्टा या चेष्टा स्थैर्यार्था बलवर्धिनी" इस स्वरूप का होना चाहिए...
यानी व्यायाम शरीर की ऐसी हलचलें होनी चाहिए, जो इष्ट यानी अपेक्षित, सुरक्षित और चाही गई स्वरूप की हों...
और उन हलचलों से, शरीर के अंगों की स्थिरता = स्टैमिना (सहनशक्ति) और बल, क्षमता, सामर्थ्य बढ़ना चाहिए!!!
यहाँ तक कि प्राणायाम (= कपालभाति, भस्त्रिका, सूर्य भेदन) में भी छाती, फेफड़े, श्वसन प्रणाली, हृदय, रक्त परिसंचरण तंत्र और कुछ हद तक हमारे आमाशय, आंतें, नाभि और उसके आसपास के अंगों पर अकारण, अनपेक्षित ऐसा तनाव, ज़ोर, धक्का, जर्क, झटका जैसे स्वास्थ्य नाशक आघात होते रहते हैं।
योगासनों में भी कुछ हद तक इस प्रकार का खतरा संभव है, क्योंकि यदि शरीर के अंगों में, जोड़ों में, मसल्स में पर्याप्त ट्रेनिंग, पर्याप्त क्षमता, पर्याप्त लचीलापन = फ्लेक्सिबिलिटी न हो,
तो योगासन करके लाभ होने के बजाय अनपेक्षित हानि होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता...
और योगासनों में, "स्थिर सुखम आसनम" ऐसी स्थिति होने के कारण, शरीर को लचीलापन = फ्लेक्सिबिलिटी मिल सकती है; परंतु शरीर का व्यायाम नहीं होता, यह त्रिकाल सत्य है!!!
आजकल का योगा और आजकल का प्राणायाम यानी (डिफरेंट पोज, पोस्चर एंड ब्रीदिंग एक्सरसाइज) ये अधिकांशतः स्थिर = हलचल रहित ही होते हैं!!!
योगा और प्राणायाम में, शरीर के अंगों की, जोड़ों की, मसल्स की पर्याप्त सर्वांगीण हलचल बिल्कुल नहीं होने के कारण...
योगा और प्राणायाम करके हम व्यायाम का लाभ पा सकेंगे या वजन कम कर सकेंगे, शुगर कम कर सकेंगे, कोलेस्ट्रॉल, बीपी कम कर सकेंगे...
यह भ्रम है, गलतफहमी है, अज्ञान है, भ्रामक है, यह निश्चित रूप से जान लेना चाहिए, समझ लेना चाहिए...
और इस सत्य को स्वीकार करना चाहिए, किसी भी भ्रम या अज्ञान में नहीं रहना चाहिए।
यदि सर्वांगीण व्यायाम होना है, तो लोकप्रिय हो चुके चलने (वॉक) के व्यायाम के बजाय...
वास्तव में, "दो व्यायाम प्रकारों की समाज में स्वीकृति, स्थापना, प्रसार, प्रबोधन और प्रोत्साहन होना चाहिए"!
उसमें पहला, सबको ज्ञात, पारंपरिक और फिर भी वैज्ञानिक, बहुउपयोगी और सुरक्षित व्यायाम प्रकार है—सूर्यनमस्कार!!!
लेकिन सूर्यनमस्कार हर किसी को जमे, ऐसा नहीं है। विशेष रूप से जिन्हें कमर, घुटने, गर्दन, कंधे में दर्द, सूजन या घिसावट (degeneration) की समस्या है, उन्हें प्रतिदिन लंबे समय तक सूर्यनमस्कार करना नहीं जमता!!!
इसलिए एक बहुत ही आसान, जो किसी भी उम्र के, किसी भी व्यक्ति को निश्चित रूप से जमेगा ही ✅️... ऐसे "दो व्यायाम प्रकार" रोज़ करने पर, समाज के सभी उम्र के, सभी व्यक्ति... निश्चित रूप से पर्याप्त व्यायाम करने से हमेशा स्वस्थ रहेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं!!!
इसमें पहला व्यायाम प्रकार है...
एअर सायकलिंग (Air Cycling)
और दूसरा व्यायाम प्रकार है...
स्पायनल ट्विस्ट (Spinal Twist)
एअर सायकलिंग का मतलब है...
हवा में ही चलना या साइकिल चलाने जैसा करना!
तुरंत लोग कहते हैं, "तो क्या हम घर में जो स्थिर (स्टेशनरी) साइकिल मिलती है वह ले लें या रोज़ सायकलिंग के लिए बाहर जाएँ???... तो उसका उत्तर है... नहीं, बिल्कुल नहीं!!!
क्योंकि घर की स्थिर साइकिल या बाहर सायकलिंग के व्यायाम के लिए जाना, इन दोनों प्रकारों में, कमर के ऊपर का हमारा पूरा शरीर साइकिल की सीट पर "आराम से बैठा" होता है। इसके अलावा, कमर के ऊपर का पूरा शरीर हमेशा की तरह आगे झुका हुआ (forward bending) होता है, जबकि वास्तव में "पीछे झुकना = backward bending" (सूर्यनमस्कार की तरह) आवश्यक और उपयोगी होता है!!!
दूसरा...
कमर के नीचे के, सिर्फ जांघ और पिंडली के स्नायु (मसल्स) ही सायकलिंग में काम करते हैं...
और एक बार साइकिल को गति मिल गई, तो जांघ और पिंडली का व्यायाम भी बंद हो जाता है, क्योंकि साइकिल अपने आप चलती है... पैडल मारने की आवश्यकता नहीं रहती... इसलिए सायकलिंग , चाहे वह बाहर वास्तव में घूमने जाने वाली सायकलिंग हो या घर के अंदर की स्थिर साइकिल हो... दोनों में ये दोष हैं ही!
चर्बी (मेद) जो जमा होती है, वह सबसे पहले तोंद पर, पेट पर... फिर कमर पर... फिर हिप्स (सीट) पर... फिर जांघों पर... और अंत में बाहों, छाती, गले पर जमा होती है!!!
इसका मतलब है, इन अंगों पर खिंचाव पड़े, ऐसा व्यायाम होना चाहिए, जो स्थिर साइकिल या बाहर सायकलिंग करने जाने में नहीं होता!
इसके विपरीत, जहाँ चर्बी बिल्कुल जमा नहीं होती, ऐसे पैरों का कचरा हो जाता है, केवल थकान = कष्ट होता है... व्यायाम नहीं होता... यानी चोर को छोड़कर संन्यासी को फाँसी!!! चर्बी कहाँ जमा है???
तो जांघ, पिंडली, सीट, छाती, गले और बाहों पर... व्यायाम, कष्ट और हलचल कौन कर रहा है???... तो पैरों के, पिंडलियों के मसल्स... यानी यह 'आग रामेश्वरी और बम्ब सोमेश्वरी' (बीमारी कहीं, इलाज कहीं) जैसा प्रकार हो जाता है!!
इसलिए कमर के नीचे के सभी अंगों को निश्चित रूप से व्यायाम मिले, ऐसी व्यवस्था यानी एअर सायकलिंग है!!! ✅
इसके लिए हम जैसे हमेशा सोते हैं वैसे ही... बिल्कुल बेड पर ही या ज़मीन पर चटाई बिछाकर या सोफे पर, (या ग्राउंड पर घूमने गए, तो ट्रैक के किनारे या वहाँ के किसी बेंच पर) हमेशा की तरह पीठ के बल सीधे (उतान) लेटकर, अपने पैरों को कमर से ऊपर उठाकर, सीधे "हवा में ही सायकलिंग करनी चाहिए" / हवा में ही चलना चाहिए... 'आज मैं ऊपर, आसमां नीचे... चलूं सीधी की उल्टी चलूं?!'...
हवा में ही सायकलिंग करने से/ हवा में ही चलने से...
पैर, टखना (घोटा), पिंडली, घुटना, जांघ, नितंब (= सीट), कमर तक के... सभी जोड़ों, हड्डियों और मसल्स को पर्याप्त और एक साथ, एक ही समय पर व्यायाम होता है... परंतु शरीर का वजन (भार) मात्र कमर, घुटने, टखने, पैर, पिंडलियों और जांघों के जोड़ों, हड्डियों और स्नायुओं पर बिल्कुल नहीं पड़ता... क्योंकि वे हवा में होते हैं...
इसके विपरीत, हमेशा की तरह ज़मीन पर चलते समय, हमारे पूरे शरीर का पूरा भार कमर, घुटने और टखने पर पड़ता है... इसलिए जिनका उम्र 40+ है और जिनके घुटने घिसने शुरू हो गए हैं या जो महिलाएँ मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति) के आसपास हैं, उन्हें ज़मीन पर चलने के व्यायाम के कारण घुटनों में अधिक दर्द, घिसावट और सूजन जैसी परेशानियाँ हो सकती हैं... इसलिए जिन्हें कमर दर्द, घुटना दर्द है, जिनके मटके (मनके/कशेरुका) और घुटने घिस चुके हैं... उन्हें भी यह "हवा में सायकलिंग करने का/ हवा में चलने का/ एअर सायकलिंग / एअर वॉकिंग... यह व्यायाम निश्चित रूप से, आसानी से, पर्याप्त मात्रा में किया जा सकता है और इसके सौ प्रतिशत (100%) लाभ उन्हें मिलते ही हैं!!!
एअर सायकलिंग करते समय, हवा में साइकिल चलाते समय... आगे तीन बार साइकिल चलानी चाहिए और पीछे तीन बार, यानी फॉरवर्ड और बैकवर्ड ऐसे तीन-तीन बार साइकिल चलानी चाहिए... ऐसे तीन-तीन के दस सेट हो गए (3+3 × 10) तो पैर नीचे रखने चाहिए... दो लंबी साँसें लेनी चाहिए... रिलैक्स होना चाहिए और क्षमता के अनुसार, फिर से दस-दस के तीन-तीन बार आगे-पीछे साइकिल चलाने के सेट करते रहना चाहिए... ऐसा 100 तक करने का प्रयास करना चाहिए!!!
ज़मीन पर चलते-दौड़ते समय, बैडमिंटन जैसे खेल खेलते समय... हमारे शरीर का सारा रक्त प्रवाह, रक्त, लैक्टिक एसिड, लिम्फ यह सब पैरों की दिशा में, गुरुत्वाकर्षण (ग्रेविटी) के कारण नीचे जाता है... वहीं जमा होता है, जमा रह सकता है, रुक सकता है!!! हमारे शरीर में एक ही पंप = हृदय, छाती में बैठाया गया है...
परंतु पैरों की तरफ से गुरुत्वाकर्षण के = ग्रेविटी के विपरीत दिशा में, ऊपर की दिशा में, हृदय तक रक्त लाने के लिए कोई दूसरा पंप नहीं बैठाया गया है!
इसलिए फिजिक्स के नियम के अनुसार, ग्रेविटी के कारण, पैर नीचे लटके हुए छोड़ दिए हों, सस्पेंडेड लेग्स हों, सेडेंटरी जॉब = बैठा व्यवसाय हो या ड्राइविंग कर रहे हों, खड़े रहकर काम हो... किचन, टीचिंग, वॉचमैन या टेबल वर्क हो, तो इन सभी में हमारे शरीर का रक्त, लिम्फ, लैक्टिक एसिड, रक्त प्रवाह, नीचे की दिशा में दिनभर जाता रहता है! ऐसे सभी व्यक्ति यानी छात्रों से लेकर मैनेजर्स तक, वॉचमैन, टीचर्स से लेकर घर की गृहणियों तक... सभी लोग प्रायः दिनभर खड़े या पैर लटकाकर बैठे हुए = सस्पेंडेड लेग्स, ऐसी स्थिति में होते हैं... और इसके अलावा जिन्हें वैरिकोज वेन्स की समस्या है उन्होंने भी...
इसलिए इन सभी ने अगर एअर सायकलिंग यह व्यायाम किया, तो पैरों की दिशा में गया हुआ रक्त, रक्त प्रवाह, लिम्फ, लैक्टिक एसिड यह सब आसानी से हृदय की दिशा में आएगा... और पैरों का दर्द, पैरों में सूजन, पैरों का ठसठसाना, एड़ी का दर्द जैसी शिकायतें हमेशा के लिए बंद हो जाएँगी!!!
45° Leg Lift Up पादोत्थान !!!
एअर सायकलिंग करने के बाद कुछ समय, या एअर सायकलिंग शुरू करने से पहले... पेट खाली होने पर... नीचे ज़मीन पर लेटना चाहिए और अपने दोनों पैरों को एक साथ = एकमुश्त उठाकर सिर्फ 45 अंश के कोण (डिग्री) में उठाकर सोफे या कुर्सी पर रख देना चाहिए। जब हमारे पैरों की उंगलियों में चींटियाँ चलती (मुंग्या) जैसी महसूस हों, तब समझें कि उस छोर पर जमा हुआ सारा रक्त, लिम्फ, लैक्टिक एसिड वापस आ गया है और नया, ताजा, स्वच्छ रक्त वहाँ पहुँच गया है... ऐसा जानना चाहिए ✅
... और फिर एअर सायकलिंग शुरू करनी चाहिए या उठकर अपने काम करने चाहिए!
पैर पैंतालीस अंश (45°) में ही ऊपर रखने चाहिए... उन्हें दीवार से लगाकर 90° तक नहीं उठाना चाहिए... क्योंकि, पैंतीस-चालीस (35+, 40+) की उम्र के बाद, इस तरह से 90° के कोण में कमर से पैर उठाकर दीवार से लगाना (यह सर्वांगासन के अर्थ में योगासनों का कौशल, प्रवीणता, प्रशिक्षण रखने वालों के लिए ठीक है, लेकिन दूसरों के लिए)... वह दुर्घटना को आमंत्रण = कमर, गर्दन में लचक आ जाना, मोच (स्प्रेन) आ जाना, इसके लिए कारण बन सकता है... इसलिए ज़मीन पर नीचे लेटकर अपने दोनों पैर सिर्फ 45° के कोण में उठाकर सोफे या कुर्सी पर कुछ समय के लिए, यानी 15 मिनट में पैरों के छोर पर चींटियाँ आने तक, रखने चाहिए!
यह प्रतिदिन करना हितकर होता है... अपना दिनभर का काम खत्म होने के बाद, खाली पेट, रात का खाना खाने से पहले या रात का खाना खाने के डेढ़ से दो घंटे बाद!!!
दूसरा ऐसा ही सर्वांगीण व्यायाम प्रकार यानी स्पायनल ट्विस्ट (= spinal twist) है, जो...
एअर सायकलिंग में शरीर के जिस हिस्से का व्यायाम नहीं होता... उस हिस्से का... यानी कमर के ऊपर के हिस्से का... यह सर्वांगीण व्यायाम है!!!
स्पायनल ट्विस्ट (= spinal twist)
इसके लिए... साथ में दिए गए लिंक का उपयोग करके वीडियो देखें।
संभव हो तो ज़मीन पर दोनों पैर जोड़कर, उन्हें आगे फैलाकर, रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर बैठना चाहिए... संक्षेप में समकोण में एल शेप (L shape) में बैठना चाहिए...
जैसा कि भगवद्गीता अध्याय 6: अभ्यास योग में बताया गया है... समं कायशिरोग्रीवं धारयन्, अचलं स्थिरः।... ऐसा बैठना चाहिए...
ऐसे एल शेप में बैठने के बाद, अपने दोनों हाथ कंधों की सीध में, 180 अंश में, पंख फैलाने की तरह (spreaded wings), जितना हो सके सीधा फैलाना चाहिए... और उस स्थिति में, अपनी रीढ़ की हड्डी... जितना संभव हो सके अधिक से अधिक, बाईं से दाईं ओर और फिर दाईं से बाईं ओर... ऐसे हाथ पूरे फैले हुए, पंख फैले हुए विंग स्प्रेड स्थिति में... दस बार करना चाहिए... फिर रिलैक्स होना चाहिए... दो लंबी साँसें लेनी चाहिए... और फिर से दस बार करना चाहिए... ऐसे दस-दस के सेट करके, सौ बार स्पायनल ट्विस्ट = रीढ़ की हड्डी को मरोड़ना = मानो अर्धमत्स्येंद्रासन अदल-बदल कर करने की तरह... यह व्यायाम करना चाहिए!!! ✅
इस व्यायाम में सिर, गर्दन, कंधे, हाथ, पूरी पीठ और कमर तक की सभी हड्डियों, जोड़ों और मसल्स का पूरी तरह से सर्वांगीण और पर्याप्त उपयोगी... ऐसा व्यायाम निश्चित रूप से होता है!!!
संक्षेप में, एअर सायकलिंग / एअर वॉकिंग / हवा में चलना / हवा में साइकिल चलाना यह व्यायाम प्रकार "कमर के नीचे पैरों की उंगलियों तक के" सभी जोड़ों, हड्डियों और मसल्स का व्यायाम है, तो...
स्पायनल ट्विस्ट यह "कमर के ऊपर गर्दन तक, सिर तक के" सभी जोड़ों, हड्डियों और मसल्स का व्यायाम है!!!
इस प्रकार, "स्पायनल ट्विस्ट और एअर सायकलिंग " सभी आयु वर्ग के व्यक्तियों के पूरे शरीर के हड्डियों, जोड़ों और मसल्स के सर्वांगीण पर्याप्त व्यायाम के लिए संतोषजनक रूप से उपयोगी हैं।
स्पायनल ट्विस्ट यह व्यायाम जैसे ज़मीन पर एल शेप में बैठकर करने के लिए कहा गया है...
वैसे ही जिन्हें ज़मीन पर बैठना नहीं जमता, उन्होंने कुर्सी पर बैठकर यह व्यायाम करना चाहिए... परंतु स्पायनल ट्विस्ट यह व्यायाम स्टूल पर बैठकर नहीं करना चाहिए... क्योंकि पीठ को सहारा न होने से संतुलन (तोल) बिगड़ने की संभावना होती है।
ऑफिस चेयर, आराम कुर्सी (रॉकिंग/रिक्लाइनर) में नहीं बैठना चाहिए... क्योंकि वे रीढ़ की हड्डी में झुकाव / मोड़ (bend) लाती हैं...
Forward bending (आगे की ओर झुकना) ऐसा होता है...
इसलिए डाइनिंग चेयर, जो समकोण में 90 अंश पर होती है, उसमें बैठना चाहिए ताकि हम रीढ़ की हड्डी को 90° में सीधा रख सकें...
एक और तीसरा ऑप्शन यानी घर के दो व्यक्तियों को पीठ से पीठ सटाकर, कंधे से कंधा मिलाकर एल शेप में ज़मीन पर बैठना चाहिए... और कोई छोटी वस्तु जैसे कि गेंद (या छोटा पतीला या चार-पांच किताबें एक साथ), बाईं ओर मुड़कर, अपनी पीठ से पीठ सटाकर बैठे व्यक्ति को देनी चाहिए... और उस व्यक्ति ने दाईं ओर मुड़कर फिर से हमें देनी चाहिए, हमने उसे स्वीकार करना चाहिए... ऐसे, 'एकमेकां साह्य करूं' (एक दूसरे की मदद करें) इस पद्धति से, एक-दूसरे की पीठ से पीठ सटाकर, सीधे तने हुए पैर फैलाकर, एल शेप में, 90 अंश में बैठकर स्पायनल ट्विस्ट यह व्यायाम किया जा सकता है!!!
अकेले व्यायाम करते समय अक्सर कुछ लोगों को बोरियत होती है, 'कोई पार्टनर हो तो अच्छा रहेगा!!', ऐसा लगता है... उनके लिए यह उपाय / विकल्प = ऑप्शन है...
परंतु फिर भी दोनों हाथों को पंखों की तरह स्प्रेडेड विंग्स के रूप में 180 अंश में सीधा फैलाकर, रीढ़ की हड्डी को दोनों ओर अधिक से अधिक मरोड़ना यानी 270 अंश में मरोड़ना, यह अधिक उपयोगी है!!!
तो, सभी को सर्वांगीण व्यायाम के लिए शुभकामनाएँ!!!
चलो फिर... कल से... छिः छिः, कल से क्यों!?... आज से, "अभी से" ही एअर सायकलिंग और स्पायनल ट्विस्ट, ये दोनों व्यायाम एक साथ, रोज़, नियमित रूप से, बिना किसी रुकावट के, 100 काउंट्स (सीटिंग) की तरह करते रहते हैं!!!
बाहर बारिश हो रही है, बहुत धूप है, अभी सूरज नहीं उगा है, अब बहुत अंधेरा हो गया है, कीचड़ है, सड़क का काम चल रहा है, गड्ढे हैं, ट्रैफिक बहुत है, अकेले डर लगता है, घुटने दुखते हैं... कमर दुखती है... गर्दन दुखती है!!!; ऐसे सभी बहानों, कारणों, बखेड़ों और एक्सक्यूजेस को किनारे रखकर... अपनी सुविधानुसार... अपनी सुविधा की जगह पर / अपने बेड पर ही, ये दोनों व्यायाम "एअर सायकलिंग और स्पायनल ट्विस्ट" करना निश्चित रूप से संभव है।
# आज मैं ऊपर, आसमा नीचे
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मुड़ मुड़के हाँ देख... मुड़मुड़ के
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✍🏼 वैद्य हृषिकेश म्हेत्रे, एमडी आयुर्वेद, एम ए संस्कृत
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