शिरोधारा का वास्तव?!
लेखक : वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे
एम डी आयुर्वेद संहिता जामनगर 1998
आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे & नाशिक
शिरोधारा आज आयुर्वेद क्लिनिक का बोधचिन्ह या लोगो बन गया है!
शिरोधारा इस संज्ञा से शास्त्र मे कही पर भी उल्लेख या संदर्भ नही है!
मूलतः मूर्धतैलम् यह अष्टांगहृदय सूत्र स्थान 22 मे 4 प्रकार मे से एक मूर्धा सेक/ मूर्धा परिषेक यह आज शिरोधारा के रूप मे लोकप्रिय है.
मूर्धतैल के 4 प्रकार है ...
1. अभ्यंग
2. सेक = परिषेक = शिरोधारा
3. पिचु और
4. बस्ति!
Indications/Benefits :
1. अभ्यंग for रौक्ष्य कण्डू मल
2. सेक/परिषेक = शिरोधारा for अरूंषिका शिरस्तोद दाह पाक व्रण
3. पिचु for केशशात स्फुटन धूपन नेत्रस्तम्भ
4. बस्ति for प्रसुप्ति अर्दित जागर नासास्यशोष तिमिर शिरोरोग दारुण
तो ऍक्च्युली जिस अवस्था के लिए सेक परिफेक शिरोधारा या शास्त्र मे बताई गई है उसके लिए तो आज उसका पेशंट मे उपयोग होता हुआ दिखाई नही देता है !
आज केवल मार्केटिंग के रूप मे इसका स्ट्रेस मे अच्छा है, नींद के लिये उपयोग होता है, ऐसा है गोबेल थेअरी के द्वारा "प्रस्थापित" किया गया है जो की असत्य शास्त्रीय और झूठ है पेशंट को अच्छा लगता है पेशंट डिमांड करते है इसलिये हम शिरोधारा करते है यह जस्टीफिकेशन शास्त्रीय न होकर कमर्शियल यह शास्त्रीय "सोचना" न होकर , यह केवल "बेचना" इस प्रकार की की वृत्ती है
आयुर्वेद शास्त्रीय प्रॅक्टिस या चिकित्सा उपचार इनका उद्देश पेशंट क्या "चाहता", है पेशंट को क्या "अच्छा लगता" है, पेशंट की क्या "डिमांड" है ... इस पर नही चलता है !
वस्तुतः, पेशंट की "आवश्यकता" क्या है "need" क्या है , इस पर शास्त्रीय प्रॅक्टिस = चिकित्सा व्यवहार आधारित होता है!!!
अगर हम पेशंट की "डिमांड" की पूर्ती के लिए कुछ कर रहे है, तो फिर हम कि प्रॅक्टिस नही कर रहे है ... हम रिसॉर्ट स्पा सलून पार्लर इस प्रकार की सेवा व्यवस्था = सर्विस इंडस्ट्री चला रहे ... किंतु, हमने तो डिग्री एक प्रोफेशनल कन्सल्टंट = आरोग्य मार्गदर्शक के रूप मे कार्यरत होने के लिए ली है!
मूर्धतैल के 4 प्रकारों के नामों का सभी का पर्यायी नाम देखेंगे तो ... मूर्धा की जगह शिरस् ऐसा शब्द रखके शिरोभ्यंग, शिरः परिषेक (= शिरोधारा), शिरःपिचु & शिरोबस्ति ... ये यथोतर बलवान है अर्थात अधिक परिणामकारक है
अभ्यंग और पिचु ये उतने लोकप्रिय नही रहे
किंतु अगर पिछली पिढी में देखा जाये तो... शिरोभ्यंग यह विधी; चंपी/तेलमालिश के रूप में तथा नवजात शिशुओं के शिरःपूरण (टाळू भरणे) = हर घर मे एक वर्ष तक, शिर मूर्धा अभ्यंग करना यह एक सामाजिक रूढी भी थी ... और लोकप्रिय गाना देखेंगे तो ... "सर जो तेरा चकराये या दिल डूबा जाये" ... इस जॉनी लिव्हर पर चित्रित, मोहम्मद रफी का गाना, चंपी तेलमालिश के रूप मे शिरोभ्यंग का स्मरण करता है
दूसरी तरफ शिरोबस्ती अत्यंत प्रभावी होने पर भी उसके लिए जो यंत्रणा जो प्रिपरेशन करना पडता है वह अधिक दुष्कर है... सर्वाधिक दुष्कर और अप्रिय अवांछित बात तो ये है कि शिरोबस्ती के लिये शिर के सभी बाल निकालने पडते है अर्थात गंजा टक्कल खल्वाट bald इस स्थिती मे आना पडता है, जो किसी भी व्यक्ति को मान्य नही होता है, सहसा!
इसीलिये यह शिरोबस्ति सामाजिक व्यवहार मे कभी भी लोकप्रिय नही रहा !
"तलम्" नाम से कुछ इसका परिवर्तित स्वरूप दक्षिण भारत मे व्यवहार में है
"शिरोभ्यंग" करते समय, उतने समय तक करने वाले परिचारक/therapist व्यक्ती को समय व्यय और शारीरिक कष्ट होते है ... labor & time!
"शिरःपिचु" विधि में स्नेह से आप्लावित कार्पास पिचु या कोई कपडा फोल्ड करके रखना , इतना सुखावह या हॅपनिंग या फील गुड या लक्झरी या स्पा ट्रीटमेंट की तरह नही लगता है ... इसलिये!!!
परिचारक का समय बंधा ना रहे (occupied& busy therapist) और कोई विशेष दुष्कर यंत्रणा करनी ना पडे और सबसे इम्पॉर्टंट जो फील गुड हॅपनिंग रिसॉर्ट इस प्रकार का लक्झरी ट्रीटमेंट "लगे .."
यह मूर्धा अभिषेक या शिरः परिषेक या "मार्केटिंग" मे बहुत ज्यादा "हाईप" किया गया, झूठे लाभ प्रचारित करके "प्रस्थापित" किया गया ... शिरोधारा यह उसी का भ्रष्ट स्वरूप है !
वस्तुतः ये जो चारो मूर्ध तैल है ...
ये मूर्धा पर अर्थात शिरके सर्वोच्च स्थान पर करने है, इसे व्हर्टेक्स vertex रोमावर्त अधिपति या उसके आसपास का प्रदेश कहेंगे ...
किंतु जैसे की सभी को ज्ञात है की ... "शिरोधारा" यह "आज का जो लोकप्रिय हॅपेनिंग ट्रीटमेंट" है , यह मूर्धा = शिरस् पर नही किया जाता ... यह आज ॲक्च्युअली कपाल भाल ललाट फोरहेड पर ... भ्रू भवें eye brow के थोडा पीछे , धारा की जाती है ... तो इसे शिरोधारा न कहते हुए , भालधारा कपालधारा ललाटधारा forehead oil stream कहना चाहिए!
आयुर्वेद की आज के व्यवहार में पेशंट को इस विधी से क्या लाभ होगा यह "सोचना" उतना आवश्यक नही समजा जाता , जितना की पैसा बटोरने के लिए क्या "बेचना" अधिक फायदेमंद होगा इसका विचार अधिक होता है !!!
वैसे देखा जाये तो शिरोधारा यह अन्य तीन मूर्धतैल प्रकारों की तुलना मे "अत्यंत अल्पकाल और कोई भी प्रेशर दिए बिना" , ॲक्च्युअली मूर्धा या शिरस् से अत्यल्प संपर्क होकर ही तैल का निर्गमन होने वाली विधि है !
अभ्यंग मे हात का प्रेशर और बहुत दीर्घकाल तक ॲक्च्युअली मूर्धा या शिरस् की त्वचा = स्काल्प इसके साथ तैल का संपर्क रहता है
शिरःपिचु में ... जितना तेल है, पिचु के आकार के शिरःप्रदेश मूर्धाप्रदेश स्काल्प त्वचा इनके संपर्क में तैल रहता है
शिरोबस्ति में अत्यंतिक/अत्यधिक मात्रा मे तेल का बहुत बडा स्तंभ , scalp = शिरस्त्वचा से एक अंगुल उपर तक उसका स्तर या लेवल बहुत दीर्घकाल तक धारण किया जाता है;
तो अभ्यंग, पिचु और बस्ति ये जो मूर्धतैल के प्रकार है इनमें, तैल एवं scalp/शिरोभूमि इनका परस्पर संपर्क का कालावधी और उसका प्रेशर यह तुलना मे अधिक रहता है !
जहां पर शिरोधारा मे तैल बहता रहता है और मूर्धा तक आता ही नही ... वह कपाल पर गिरता है और वहा से बालो मे जाकर शिरस्त्वचा को जैसे तैसे संपर्क करके या बिना संपर्क किये निकल जाता है.
क्यूकी बाल तो निकाले हुए नही रहते है , बाल तो जैसे है वैसे ही होते है और पिचु अभ्यंग या बस्ति की तरह ग्रॅव्हिटी या हस्त स्पर्श इनका प्रेशर भी तेल को स्काल्प के संपर्क मे आने की सहायता नही करता है
क्योंकि शिरोधारा मे समांतर parallel गती में बह जाता है निकल जाता है ... ऐसा होने के बावजूद शिरस् अभ्यंग शिरःपिचु शिरोबस्ति इनका प्रचलन आज के व्यवहार मे नही है!
क्यूकी इन तीनो प्रकारो मे समय, मटेरियल, कौशल्य इनके साथ साथ परिचारक की संपूर्ण काळ व्यक्तिगत फिजिकल उपस्थिती इनकी आवश्यकता होती है और उसमे फील गुड हॅपनिंग स्पा ऐसे वेलनेस ट्रीटमेंट का अनुभव नही आता है ... जो की शिरोधारा मे पेशंट को बेड पर आराम से लिटाकर मॅन्युअली या यांत्रिक रूप में लूप मे रिपीटेशन आवर्तन में रोटेशन के रूप मे तेल की धारा कपाल पर डाली जा सकती है , उसको ऑटोमेटेड यांत्रिक भी बनाया जा सकता है , जिसे की परिचारक का समय उसने बंधा ना रहे और थोडासा मंद प्रकाश & कोई संगीत लगाया तो पेशंट को भी फील गुड होता है!!
वस्तुतः यह शिरोधारा शिरस पर नहीं अपितु कपाल भाल ललाट फोर हेड पर की जाती है
मैने कुछ वर्ष पूर्व सजेस्ट किया था कि पेशंट को पीठ के बल supine = facing upwards लिटाने के बजाये , उसको पेट के बल prone लिटाये, उसका जो मुंह मुद्रा चेहरा है जमीन की तरफ करे facing downward जिस से की जहां पर तैल का संपर्क आना "शास्त्र को अभिप्रेत है" = उस व्हर्टेक्स अधिपति रोमावर्त मूर्धा पर शिरस् के सर्वोच्च बिंदू पर ... तेल की धारा गिरती रहेगी
और वहा से ग्रॅव्हिटी की दिशा से अधोगमन करते हुई वह शिरके संपूर्ण प्रदेश को संपूर्ण scalp त्वचा को तैल का संयोग संपर्क आप्लावन होकर वह नीचे निकल जायेगी ! ✅️
तो किसी ने कहा कि ऐसे पेट की बल की स्थिती मे विपरीत शयन prone/facing downward की स्थिती मे मूर्धा पर व्हर्टेक्स पर ॲक्च्युली डाला हुआ तैल आंखो मे जाने की संभावना है ! 🙄
आज की जो शिरोधारा = कपाल धारा करते है , उसमे भी आंखो पर कॉटन का पिचु रखते ही है !!!
किंतु, नही !!!
जो प्रस्थापित है जो मार्केटेड है वही हमे करना है ... चाहे वो कितना शास्त्रीय हो कितना भी कमर्शियल हो कितना भी गलत हो ! हम नही सुधरेंगे !!!
जैसे आज कल देखिये ... चाकण मे वाघोली मे शिरवळ मे याने पुणे से 30 35 किलोमीटर जो लोग दूर रहते है, वे कहते समझते मानते है की हम पुणे मे रहते है... वसई विरार से लेकर अलिबाग तक वाशी तक खारघर तक रहने वाले लोग कहते समझते मानते है की मुंबई मे रहते है ... मुंबई से पचास से सौ किलोमीटर दूर रहकर की भी!!
वैसे ही कपाल भाल ललाट फोर हेडफर धारा करके हम कहते समझते मानते है की, हम शिरोधारा करते है!
कपाल ललाट भाल फोरहेड यहां पर धारा करके हम स्वयं को शास्त्र को आप्तों को पेशंट को समाज को ईश्वर को फंसा रहे है वंचना कर रहे है प्रतारणा कर रहे है कि हम शिरोधारा कर रहे है ... जितकी वस्तुतः यह धारा शिरस् पर नही कपाल पर होती है
इस नए से मार्केट किये गये लोकप्रिय किये गये प्रस्थापित किये गये अशास्त्रीय झूठ असत्य शिरोधारा के आज के व्यवहार में तेल का संपर्क मूर्धा से शिरसे "आताही नही है" !!!
... तो सभी पेशंट को और सभी वैद्यों को कभी शास्त्रीयता और नैतिकता इस रूप मे है सोचना चाहिए की क्या हम सही मे आयुर्वेद शास्त्र का अवलंबन कर रहे है या आयुर्वेद के नाम पर हम कुछ अलग ही "बेच रहे है" ?!
हम पेशंट को कस्टमर क्लाएंट समज रहे है ... या पेशंट हमारा अन्नदाता स्वरूप भगवंत है ???
हम पैसा बटोरने के लिए शिरोधारा कहकर कपाल ललाट भाग फोरहेड पर तेल उंडेल रहे है, जिसका वस्तुतः "कोई उपयोग नही है" हम उसको आज मनःशांती स्ट्रेस रिलिव्हर नींद का उपाय और न जाने क्या क्या बडबडाते रहते है ...
और पेशंट को भी "वह परिणाम", प्लासीबो या कंडिशनिंग सायकोथेरपी के रूप मे "सच्चे लगते है"!
लेकिन यह शास्त्र नही है ... यह दिगभ्रम है दिशा भूल है वंचना है प्रतारणा है
हां, इससे पैसा बन सकता है... किंतु यह आयुर्वेद नही है!!
अगर हमे सत्य स्वरूप मे शिरोधारा करनी है तो आज जैसे वह पीठ के लिटाकर facing upwards, कपाल पर करते है...
उसकी बजाये विपरीत शयन करके पेट के बल लिटाकर जमीन की ओर चेहरा करके facing downward करके मूर्धा व्हर्टेक्स रोमावर्त अधिपती मर्म शिरस् का सर्वोच्च बिंदू यहां पर होना चाहिये ✅️✅️✅️
और इस तथाकथित शिरोधारा की तुलना मे, जिसका कभी प्रचार ✅️ /मार्केटिंग(?) हुआ ही नही ऐसे शिरो अभ्यंग, शिरःपिचु & प्राचीन काल का सर्वाधिक प्रभावी शिरोबस्ति; वह कई गुना अधिक परिणामकारक अधिक शास्त्रीय है!
लेकिन सच बतायेगा कौन?
झूठ को उजागर कौन करेगा ?
सच सुनने की किसकी इच्छा है?
और सही क्या गलत क्या शास्त्र क्या मार्केट क्या ... भोले भाले आयुर्वेद पर विश्वास रखने वाले पेशंट को क्या पता है !!??
इसलिये जिनको शास्त्र के प्रति निष्ठा है प्रेम है, उन वैद्यों ने आयुर्वेद प्रॅक्टिशनर्स ने और जिन पेशंट को आयुर्वेद शास्त्र मे शास्त्रीय क्या है, मार्केटिंग क्या है , सत्य क्या है असत्य क्या है ... पेशंट के लिए "सोच" कर कौनसा उपचार किया जाता है & पेशंट को कुछ "बेचकर" कोई आर्थिक लाभ स्वयं का कैसे कर लेता है ... यह बताने के लिए आज का यह प्रयास है !
जागृत रहिये ... और सत्य का अवलंबन करे!!!










