Monday, 13 April 2026

सभी पेशंट के लिये चिकित्सा के आरंभ में सामान्य नियम

सभी पेशंट के लिये चिकित्सा के आरंभ में सामान्य नियम

किसी भी लक्षण या व्याधी के लिए या रिपोर्ट के लिए ट्रीटमेंट देने से पहले या साथ मे ...

पेशंट को दो प्रश्न पूछना चाहिए ॲसिडिटी है क्या और कॉन्स्टिपेशन है क्या?



ॲसिडिटी या उससे संबंधित या सदृश समान लक्षण हो तो उसको पहले ठीक करे उसके लिए यथा संभव भूनिंबादि या वासागुडूच्यादि या यष्टी सारिवा इसका प्रयोग करे 


कॉन्स्टिपेशन मलावरोध गॅसेस या उससे संबंधित उसके सदृश या समान लक्षण है तो कोई मृदु अनुलोमन जो आपके प्रॅक्टिस मे आपको अच्छा अनुभव हो वह अपान काल में देना चाहिए 


आमाशय और पक्वाशय इनका स्वास्थ्य अगर हमने ठीक रखा तो, बाकी जो भी हम आहार या औषध देंगे उसका शीघ्र और अच्छा परिणाम प्राप्त होता है 


तो किसी भी लक्षण को औषध देने से पहले इन दो आशयों का व्यापार ठीक से चल रहा है इसकी सुनिश्चित व्यवस्था या रिपेअर, जो आवश्यक है, वो करे... उसके लिए जो औषध और आहार विहार मे परिवर्तन करना है , वो अन्य लक्षण के लिए दिया जाने वाले औषध के साथ ही दे दे 


आमाशय के लिए औषध या तो भोजन के बीच मे या भोजन के पश्चात दे दे 


और पक्वाशय के लिये औषध भोजन के प्रारंभ मे देना

Friday, 27 March 2026

The Reality of Viddhakarma 📌📍 & Marma Chikitsa(?) ! Intellectual Robbery of Acupuncture & Varma Chikitsa in Siddha!

The Reality of Viddhakarma 📌📍 & Marma Chikitsa(?) ! Intellectual Robbery of Acupuncture & Varma Chikitsa in Siddha!






Presented/spread in the interest of all patients, well-wishers of Ayurveda, students, and young Vaidyas!!!

In the "Ashtavidha Shastra Karma" (eight types of surgical procedures) mentioned by Sushruta, there are words like "Vyadha" or "Vedhan"... however, these are in the context of "Siravedha," meaning as a type of "Raktamokshana" (bloodletting). But apart from Siravyadha, the word "Viddha" is not mentioned anywhere else as a form of treatment. The word "Viddha" has appeared in the context of certain procedures in Marma, Srotas, Karna (ear), and Drushti (vision) diseases.

However, today, based on popularity and crowd/throng, the way a fake narrative is being created, and for that, from top Ayurveda institutes to presentations happening in general-level seminars or colleges—everywhere—people are running behind this, becoming crazy! This is a matter of surprise, but also of misfortune!

In reality, what is considered today in the field of Ayurveda as a means of gaining popularity and gathering a crowd by the name of "Viddha Karma"... that is, in reality, a theft, robbery, and loot committed at an intellectual level! There is another science named Acupuncture; because only BAMS degree holders are practicing it, it is being given a local name and established as Viddha Karma in Ayurveda through Goebbels’ theory, by repeatedly telling lies.

It may be true that the results of what is done in the field of Ayurveda today in the name of Viddha Karma are good... but there are results and people with BAMS degrees perform it; that does not mean that Viddha Karma—which has been brought here by dragging it, by stealing, looting, and committing dacoity of the science of Acupuncture = "Intellectual Robbery"—is Ayurveda!

I have no objection to anyone’s popularity or their skill in gathering a crowd.

But while doing that, “in the name of Ayurveda science,” committing intellectual theft = Intellectual Robbery of another science, and using it on patients boldly in an unethical, non-ethical, and non-moral manner in broad daylight... this is an extremely improper, prohibited, censurable, contemptible, and rejectable tendency!

I have no opposition to any individual...

But I am an extreme opponent of this tendency of "selling" a method of another science, which was never in the Ayurveda science, "in the name of Ayurveda."

To commit this kind of "Intellectual Robbery" is, in my view, a hypocrisy (Pakhanda), and it is the exploitation and misleading of the patient who is our breadwinner (Annadata)... so such unethical things should not be done... and if someone is doing it, then the competent authority/competent institution/Regulatory Authority should put a ban/restriction/BAN on it...

However, instead of this happening, due to the pressure of popularity and the crowd, the top institutes of the Ayurveda field and their experienced and senior heads are dancing with this Viddha Karma on their heads... seeing this, we have completely failed in our "loyalty" toward the science and "thinking" from the perspective of the science, and we have nothing to do with the science... we don't want to "think" anything for the science! ... We want to "sell" every "thing" that "makes money" in the name of Ayurveda, "by any means possible"!

I condemn this "selling," "business-minded," and "selfish" tendency in the strongest possible words.

And the tendency of "selling" the skills or methods of other sciences in the name of Ayurveda is not only about this Viddha Karma... rather, this tendency is also regarding popular things like Yoga, Rasashastra, and Nadi... which have no connection—not even distantly—with the original Samhitas of Ayurveda, its principles, clinical examination methods, or the principles of Bhaishajya Kalpana!

A therapy by the name of Marma Chikitsa is also run in the field of Ayurveda "in the name of Ayurveda"... but that is actually inspired by the "Varma" therapy of the "Siddha" branch of Ayush! In Ayurveda, the number of Marma is only 107! In this Siddha system, the "Varma" number is 108... or according to various references in the Siddha system, the Varma number (not Marma) is 251, 500, or 8000, which is much more than the Marmas mentioned in Ayurveda.

The classification of these Varmas in the Siddha system is also very different from the Ayurveda Marma classification!

In Ayurveda, Marma is mentioned only for diagnosis (Nidana)! The use of Marma as a treatment (Chikitsa) is not mentioned anywhere in the Ayurveda science at all.

By again committing Intellectual Robbery = intellectual theft from the other medical system named Siddha, these things are run in the name of Marma therapy. This is similarly an unethical, non-moral, and unethical tendency!

Varma or Marma therapy is possibly a corrupted form, copy, imitation, or mockery of Acupressure itself.

One does not even know how to study one's own Ayurveda science... because it is not understood, because the original Sanskrit Samhitas, commentaries, and original Ayurveda science do not enter anyone's head... therefore, after taking a BAMS degree, in the name of Ayurveda, "marketing" and "selling" things of any other science "only to make money" and "by making fools of people" is an extremely censurable, rejectable, prohibited, and contemptible tendency.

The scientific validity of any thing is not determined by its popularity or its crowd-pulling capacity... scientific validity is determined by whether it is consistent with the principles of that science or not! Determining the scientific validity of something based on the majority is not as simple as democracy!

Scientific validity is decided on principles, not on popularity and crowds... Be careful!

विद्धकर्म 📌📍 & मर्म चिकित्सा(?) का वास्तव! ॲक्युपंक्चर & सिद्ध के वर्म चिकित्सा की, की गई बौद्धिक चोरी = इंटेलेक्च्युअल रॉबरी

विद्धकर्म 📍📌 & मर्म चिकित्सा(?) का वास्तव! ॲक्युपंक्चर & सिद्ध के वर्म चिकित्सा की, की गई बौद्धिक चोरी = इंटेलेक्च्युअल रॉबरी




सभी पेशंट तथा आयुर्वेद के हितचिंतक विद्यार्थी एवं नवतरुण वैद्यों के हित में प्रसृत / प्रस्तुत !!!


सुश्रुतोक्त अष्टविध शस्त्र कर्म मे "व्यध या वेधन" ऐसे शब्द है ... किंतु ये सिरा वेधके संदर्भ में अर्थात रक्तमोक्षण का एक प्रकार इस रूप मे है. किंतु सिराव्यध छोडकर, अन्य कही पर भी विद्ध शब्द उपचार के रूप मे उल्लेखित नही है. विद्ध शब्द मर्म स्रोतस कर्ण दृष्टि रोग मे कुछ प्रक्रिया के संदर्भ मे आया है. 


किंतु आज जिस प्रकार से लोकप्रियता & भीड/crowd के आधार पर एक फेक नॅरेटिव्ह बनाया जा रहा है और उसके लिए शीर्ष आयुर्वेद संस्थान से लेकर सामान्य स्तर के सेमिनार या कॉलेज तक में होने वाले प्रस्तुतीकरण यहां तक, सभी जगह, लोग इसके पीछे पागल होते हुए दौड रहे है! यह आश्चर्य की किंतु दुर्दैव की बात है !


वस्तुतः आज जिसे आयुर्वेद क्षेत्र में विद्ध कर्म नाम से लोकप्रियता और भीड जमा करने का साधन माना जाता है ... वह वस्तुतः, बौद्धिक स्तर पर की गई, एक चोरी डकैती लूट है! ॲक्युपंक्चर नाम का जो कोई अन्य एक शास्त्र है, उसको केवल BAMS डिग्रीधारक कर रहे है, इसलिये उसको यहां का नाम देकर आयुर्वेद में विद्ध कर्म इस प्रकार से, गोबेल्स थिअरी के द्वारा , बार बार झूठ बोल कर प्रस्थापित किया गया है.


यह सत्य हो सकता है की विद्ध कर्म नाम से आज आयुर्वेद के क्षेत्र में, जो किया जाता है, उसके रिजल्ट अच्छे है ... किंतु रिझल्ट है और BAMS की डिग्री है वो लोग इसे करते है; इसका अर्थ वह विद्धकर्म, जो ॲक्युपंक्चर शास्त्र को चुरा कर , लूट कर , डकैती करके = "इंटेलेक्च्युअल रॉबरी" करके, यहां घसीट कर लाया गया है ... वह आयुर्वेद नही है!


मुझे किसी की लोकप्रियता या भीड जमा करने का कौशल्य इस पर कोई आपत्ती नही है 


किंतु वह करते समय, *"आयुर्वेद शास्त्र के नाम पर"* , किसी अन्य शास्त्र की बौद्धिक चोरी = इंटेलेक्च्युअल रॉबरी करके, उसका अनैतिक नाॅन एथिकल नॉन मॉरल रूप मे, दिनदहाडे, पेशंट पर धडल्ले से उपयोग किये जा रहे है ... यह अत्यंत अनुचित निषेधार्ह निंद्य गर्हणीय त्याज्य वर्ज्य इस प्रकार की यह वृत्ती है !


मेरा किसी व्यक्ति को कोई विरोध नही है ...


किंतु आयुर्वेद शास्त्र मे जो कभी था ही नही , ऐसी पर शास्त्र की विधि को, *"आयुर्वेद के नाम पर" ... "बेचना"* इस वृत्ती का मैं आत्यंतिक विरोधी हूँ. 


इस प्रकार की "इंटेलेक्च्युअल रॉबरी" करना, यह मेरी दृष्टी से एक पाखंड है और जो पेशंट हमारा अन्नदाता है उसका यह एक्स्प्लाॅयटेशन है, दिशाभूल है ... तो ऐसी अनैतिक अनएथिकल चीजे नही करनी चाहिए ... और अगर कोई कर रहा है तो उसको सक्षम अधिकारी/ सक्षम संस्था/ Regulatory Authority ने , उस पर पाबंदी/रोक/BAN लगाना चाहिये ...


किंतु ऐसा न होते हुए लोकप्रियता और भीड का दबाव इस कारण से, आयुर्वेद क्षेत्र के शीर्ष संस्थान & उनके अनुभवी और ज्येष्ठ प्रमुख, इस विद्धकर्म को सर पर लेकर नाच रहे है ... ये देखते हुए हमारी शास्त्र के प्रति "निष्ठा" और शास्त्र की दृष्टी से "सोचना", इसमे हम पूर्णतः असफल हुए है और हमे शास्त्र से कुछ भी लेना देना नही है... शास्त्र के लिए हमे कुछ भी "सोचना" नही है ! ... हमे , "जैसे भी हो सके" , आयुर्वेद के नाम पर, "पैसा बनाने वाली" हर "चीज" को *"बेचना"* है! 


मै इस "बेचने" वाली , "धंदा" करने की "स्वार्थी" वृत्ती का अत्यंत तीव्र शब्द मे निषेध करता हूँ. 


और अन्य शास्त्र के कौशल्य को या विधियों को, आयुर्वेद के नाम पर "बेचना" यह वृत्ती, केवल इस विद्ध कर्म के बारेमे ही नही है ... अपितु, यह वृत्ती ; योग रसशास्त्र नाडी इन लोकप्रिय चीजों के बारे मे भी है ... की जिनका आयुर्वेद की मूल संहिताओ से, तत्त्वों से, नैदानिक परीक्षण विधियों से, भैषज्य कल्पना के सिद्धांतों से ... दूर दूर तक ... कोई भी संबंध नही है!


एक मर्मचिकित्सा नाम से भी एक थेरेपी आयुर्वेद क्षेत्र में "आयुर्वेद के नाम पर" चलाई जाती है ... लेकिन वो ॲक्च्युली "सिद्ध" इस आयुष् अंगके "वर्म" चिकित्सा यहा से प्रेरित है ! आयुर्वेद में मर्म संख्या केवल 107 है! इस सिद्ध पद्धती में "वर्म" संख्या 108 है ... या विविध संदर्भों को अनुसार सिद्ध पद्धती में वर्म संख्या (मर्म नही) 251, 500 या 8000 ऐसी आयुर्वेदोक्त मर्मों से अधिक है. 


इन वर्मों का वर्गीकरण भी सिद्ध पद्धती में, आयुर्वेद मर्म वर्गीकरण से बहुत ही अलग है!


आयुर्वेद मे मर्म यह केवल निदान के लिए उल्लेखित है! मर्म का चिकित्सा के रूप मे कोई भी उपयोग कही पर भी आयुर्वेद शास्त्र मे उल्लेखित है ही नही. 


सिद्धनामक अन्यचिकित्सा पद्धती से फिरसे इंटेलेक्च्युअल रॉबरी = बौद्धिक चोरी करके ये मर्म चिकित्सा नाम से चीजे चलाई जाती है. ये इसी प्रकार से एक अन् एथिकल नॉन मॉरल अनैतिक वृत्ती है !


वर्म या मर्म चिकित्सा, संभवतः ॲक्युप्रेशर का ही एक कॉपी नकल अनुकरण इमिटेशन भ्रष्ट स्वरूप होने की संभावना है


स्वयंके आयुर्वेद शास्त्र का अनुशीलन करना तो आता ही नही है ... क्यूकी वह समजता नहीं, क्यूंकि मूल संस्कृत संहिता टीका मूल आयुर्वेद शास्त्र किसी के पल्ले पडता ही नही ... इसलिये BAMS डिग्री लेकर आयुर्वेद के नाम पर किसी भी अन्य शास्त्र की चीजों को "सिर्फ पैसाबनाने के लिए" , "लोगों को मूर्ख बनाकर" उन चीजों को "मार्केटिंग" कर कर के "बेचना" यह आत्यंतिक निंद्य त्याज्य वर्ज्य गर्हणीय त्याज्य वृत्ती है


किसी भी चीज की शास्त्रीयता उसकी लोकप्रियता या भेट जमा करने की कपॅसिटी क्राउड पुलिंग कॅपॅसिटी इस पर निर्धारित नही होता है ... शास्त्रीयता , उस शास्त्र के सिद्धांत से सुसंगत है या नही, इस पर निर्धारित होती है! बहुसंख्या पर किसी चीज की शास्त्रीयता निर्धारित करना, यह डेमोक्रसी जितना सरल नही है ! 


शास्त्रीयता यह सिद्धांत पर निश्चित होती है, न की लोकप्रियता पर और भीड पर ... सावधान रहे!

Friday, 20 March 2026

शिरोधारा का वास्तव !?

शिरोधारा का वास्तव?!


लेखक : वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे

एम डी आयुर्वेद संहिता जामनगर 1998

आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे & नाशिक 


शिरोधारा आज आयुर्वेद क्लिनिक का बोधचिन्ह या लोगो बन गया है!


शिरोधारा इस संज्ञा से शास्त्र मे कही पर भी उल्लेख या संदर्भ नही है! 


मूलतः मूर्धतैलम् यह अष्टांगहृदय सूत्र स्थान 22 मे 4 प्रकार मे से एक मूर्धा सेक/ मूर्धा परिषेक यह आज शिरोधारा के रूप मे लोकप्रिय है.


मूर्धतैल के 4 प्रकार है ... 

1. अभ्यंग 

2. सेक = परिषेक = शिरोधारा

3. पिचु और 

4. बस्ति! 


Indications/Benefits :


1. अभ्यंग for रौक्ष्य कण्डू मल

2. सेक/परिषेक = शिरोधारा for अरूंषिका शिरस्तोद दाह पाक व्रण 

3. पिचु for केशशात स्फुटन धूपन नेत्रस्तम्भ

4. बस्ति for प्रसुप्ति अर्दित जागर नासास्यशोष तिमिर शिरोरोग दारुण


तो ऍक्च्युली जिस अवस्था के लिए सेक परिफेक शिरोधारा या शास्त्र मे बताई गई है उसके लिए तो आज उसका पेशंट मे उपयोग होता हुआ दिखाई नही देता है !

आज केवल मार्केटिंग के रूप मे इसका स्ट्रेस मे अच्छा है, नींद के लिये उपयोग होता है, ऐसा है गोबेल थेअरी के द्वारा "प्रस्थापित" किया गया है जो की असत्य शास्त्रीय और झूठ है पेशंट को अच्छा लगता है पेशंट डिमांड करते है इसलिये हम शिरोधारा करते है यह जस्टीफिकेशन शास्त्रीय न होकर कमर्शियल यह शास्त्रीय "सोचना" न होकर , यह केवल "बेचना" इस प्रकार की की वृत्ती है


आयुर्वेद शास्त्रीय प्रॅक्टिस या चिकित्सा उपचार इनका उद्देश पेशंट क्या "चाहता", है पेशंट को क्या "अच्छा लगता" है, पेशंट की क्या "डिमांड" है ... इस पर नही चलता है !


वस्तुतः, पेशंट की "आवश्यकता" क्या है "need" क्या है , इस पर शास्त्रीय प्रॅक्टिस = चिकित्सा व्यवहार आधारित होता है!!!


अगर हम पेशंट की "डिमांड" की पूर्ती के लिए कुछ कर रहे है, तो फिर हम कि प्रॅक्टिस नही कर रहे है ... हम रिसॉर्ट स्पा सलून पार्लर इस प्रकार की सेवा व्यवस्था = सर्विस इंडस्ट्री चला रहे ... किंतु, हमने तो डिग्री एक प्रोफेशनल कन्सल्टंट = आरोग्य मार्गदर्शक के रूप मे कार्यरत होने के लिए ली है!


मूर्धतैल के 4 प्रकारों के नामों का सभी का पर्यायी नाम देखेंगे तो ... मूर्धा की जगह शिरस् ऐसा शब्द रखके शिरोभ्यंग, शिरः परिषेक (= शिरोधारा), शिरःपिचु & शिरोबस्ति ... ये यथोतर बलवान है अर्थात अधिक परिणामकारक है


अभ्यंग और पिचु ये उतने लोकप्रिय नही रहे 


किंतु अगर पिछली पिढी में देखा जाये तो... शिरोभ्यंग यह विधी; चंपी/तेलमालिश के रूप में तथा नवजात शिशुओं के शिरःपूरण (टाळू भरणे) = हर घर मे एक वर्ष तक, शिर मूर्धा अभ्यंग करना यह एक सामाजिक रूढी भी थी ... और लोकप्रिय गाना देखेंगे तो ... "सर जो तेरा चकराये या दिल डूबा जाये" ... इस जॉनी लिव्हर पर चित्रित, मोहम्मद रफी का गाना, चंपी तेलमालिश के रूप मे शिरोभ्यंग का स्मरण करता है 


दूसरी तरफ शिरोबस्ती अत्यंत प्रभावी होने पर भी उसके लिए जो यंत्रणा जो प्रिपरेशन करना पडता है वह अधिक दुष्कर है... सर्वाधिक दुष्कर और अप्रिय अवांछित बात तो ये है कि शिरोबस्ती के लिये शिर के सभी बाल निकालने पडते है अर्थात गंजा टक्कल खल्वाट bald इस स्थिती मे आना पडता है, जो किसी भी व्यक्ति को मान्य नही होता है, सहसा!


इसीलिये यह शिरोबस्ति सामाजिक व्यवहार मे कभी भी लोकप्रिय नही रहा !


"तलम्" नाम से कुछ इसका परिवर्तित स्वरूप दक्षिण भारत मे व्यवहार में है 


"शिरोभ्यंग" करते समय, उतने समय तक करने वाले परिचारक/therapist व्यक्ती को समय व्यय और शारीरिक कष्ट होते है ... labor & time!


"शिरःपिचु" विधि में स्नेह से आप्लावित कार्पास पिचु या कोई कपडा फोल्ड करके रखना , इतना सुखावह या हॅपनिंग या फील गुड या लक्झरी या स्पा ट्रीटमेंट की तरह नही लगता है ... इसलिये!!!


परिचारक का समय बंधा ना रहे (occupied& busy therapist) और कोई विशेष दुष्कर यंत्रणा करनी ना पडे और सबसे इम्पॉर्टंट जो फील गुड हॅपनिंग रिसॉर्ट इस प्रकार का लक्झरी ट्रीटमेंट "लगे .."

यह मूर्धा अभिषेक या शिरः परिषेक या "मार्केटिंग" मे बहुत ज्यादा "हाईप" किया गया, झूठे लाभ प्रचारित करके "प्रस्थापित" किया गया ... शिरोधारा यह उसी का भ्रष्ट स्वरूप है !


वस्तुतः ये जो चारो मूर्ध तैल है ...

ये मूर्धा पर अर्थात शिरके सर्वोच्च स्थान पर करने है, इसे व्हर्टेक्स vertex रोमावर्त अधिपति या उसके आसपास का प्रदेश कहेंगे ...


किंतु जैसे की सभी को ज्ञात है की ... "शिरोधारा" यह "आज का जो लोकप्रिय हॅपेनिंग ट्रीटमेंट" है , यह मूर्धा = शिरस् पर नही किया जाता ... यह आज ॲक्च्युअली कपाल भाल ललाट फोरहेड पर ... भ्रू भवें eye brow के थोडा पीछे , धारा की जाती है ... तो इसे शिरोधारा न कहते हुए , भालधारा कपालधारा ललाटधारा forehead oil stream कहना चाहिए!


आयुर्वेद की आज के व्यवहार में पेशंट को इस विधी से क्या लाभ होगा यह "सोचना" उतना आवश्यक नही समजा जाता , जितना की पैसा बटोरने के लिए क्या "बेचना" अधिक फायदेमंद होगा इसका विचार अधिक होता है !!!


वैसे देखा जाये तो शिरोधारा यह अन्य तीन मूर्धतैल प्रकारों की तुलना मे "अत्यंत अल्पकाल और कोई भी प्रेशर दिए बिना" , ॲक्च्युअली मूर्धा या शिरस् से अत्यल्प संपर्क होकर ही तैल का निर्गमन होने वाली विधि है !


अभ्यंग मे हात का प्रेशर और बहुत दीर्घकाल तक ॲक्च्युअली मूर्धा या शिरस् की त्वचा = स्काल्प इसके साथ तैल का संपर्क रहता है 


शिरःपिचु में ... जितना तेल है, पिचु के आकार के शिरःप्रदेश मूर्धाप्रदेश स्काल्प त्वचा इनके संपर्क में तैल रहता है 


शिरोबस्ति में अत्यंतिक/अत्यधिक मात्रा मे तेल का बहुत बडा स्तंभ , scalp = शिरस्त्वचा से एक अंगुल उपर तक उसका स्तर या लेवल बहुत दीर्घकाल तक धारण किया जाता है; 

तो अभ्यंग, पिचु और बस्ति ये जो मूर्धतैल के प्रकार है इनमें, तैल एवं scalp/शिरोभूमि इनका परस्पर संपर्क का कालावधी और उसका प्रेशर यह तुलना मे अधिक रहता है !


जहां पर शिरोधारा मे तैल बहता रहता है और मूर्धा तक आता ही नही ... वह कपाल पर गिरता है और वहा से बालो मे जाकर शिरस्त्वचा को जैसे तैसे संपर्क करके या बिना संपर्क किये निकल जाता है. 


क्यूकी बाल तो निकाले हुए नही रहते है , बाल तो जैसे है वैसे ही होते है और पिचु अभ्यंग या बस्ति की तरह ग्रॅव्हिटी या हस्त स्पर्श इनका प्रेशर भी तेल को स्काल्प के संपर्क मे आने की सहायता नही करता है 


क्योंकि शिरोधारा मे समांतर parallel गती में बह जाता है निकल जाता है ... ऐसा होने के बावजूद शिरस् अभ्यंग शिरःपिचु शिरोबस्ति इनका प्रचलन आज के व्यवहार मे नही है!


क्यूकी इन तीनो प्रकारो मे समय, मटेरियल, कौशल्य इनके साथ साथ परिचारक की संपूर्ण काळ व्यक्तिगत फिजिकल उपस्थिती इनकी आवश्यकता होती है और उसमे फील गुड हॅपनिंग स्पा ऐसे वेलनेस ट्रीटमेंट का अनुभव नही आता है ... जो की शिरोधारा मे पेशंट को बेड पर आराम से लिटाकर मॅन्युअली या यांत्रिक रूप में लूप मे रिपीटेशन आवर्तन में रोटेशन के रूप मे तेल की धारा कपाल पर डाली जा सकती है , उसको ऑटोमेटेड यांत्रिक भी बनाया जा सकता है , जिसे की परिचारक का समय उसने बंधा ना रहे और थोडासा मंद प्रकाश & कोई संगीत लगाया तो पेशंट को भी फील गुड होता है!!


वस्तुतः यह शिरोधारा शिरस पर नहीं अपितु कपाल भाल ललाट फोर हेड पर की जाती है 


मैने कुछ वर्ष पूर्व सजेस्ट किया था कि पेशंट को पीठ के बल supine = facing upwards लिटाने के बजाये , उसको पेट के बल prone लिटाये, उसका जो मुंह मुद्रा चेहरा है जमीन की तरफ करे facing downward जिस से की जहां पर तैल का संपर्क आना "शास्त्र को अभिप्रेत है" = उस व्हर्टेक्स अधिपति रोमावर्त मूर्धा पर शिरस् के सर्वोच्च बिंदू पर ... तेल की धारा गिरती रहेगी 

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और वहा से ग्रॅव्हिटी की दिशा से अधोगमन करते हुई वह शिरके संपूर्ण प्रदेश को संपूर्ण scalp त्वचा को तैल का संयोग संपर्क आप्लावन होकर वह नीचे निकल जायेगी ! ✅️


तो किसी ने कहा कि ऐसे पेट की बल की स्थिती मे विपरीत शयन prone/facing downward की स्थिती मे मूर्धा पर व्हर्टेक्स पर ॲक्च्युली डाला हुआ तैल आंखो मे जाने की संभावना है ! 🙄


आज की जो शिरोधारा = कपाल धारा करते है , उसमे भी आंखो पर कॉटन का पिचु रखते ही है !!!


किंतु, नही !!!

जो प्रस्थापित है जो मार्केटेड है वही हमे करना है ... चाहे वो कितना शास्त्रीय हो कितना भी कमर्शियल हो कितना भी गलत हो ! हम नही सुधरेंगे !!!


जैसे आज कल देखिये ... चाकण मे वाघोली मे शिरवळ मे याने पुणे से 30 35 किलोमीटर जो लोग दूर रहते है, वे कहते समझते मानते है की हम पुणे मे रहते है... वसई विरार से लेकर अलिबाग तक वाशी तक खारघर तक रहने वाले लोग कहते समझते मानते है की मुंबई मे रहते है ... मुंबई से पचास से सौ किलोमीटर दूर रहकर की भी!!


वैसे ही कपाल भाल ललाट फोर हेडफर धारा करके हम कहते समझते मानते है की, हम शिरोधारा करते है!


कपाल ललाट भाल फोरहेड यहां पर धारा करके हम स्वयं को शास्त्र को आप्तों को पेशंट को समाज को ईश्वर को फंसा रहे है वंचना कर रहे है प्रतारणा कर रहे है कि हम शिरोधारा कर रहे है ... जितकी वस्तुतः यह धारा शिरस् पर नही कपाल पर होती है 


इस नए से मार्केट किये गये लोकप्रिय किये गये प्रस्थापित किये गये अशास्त्रीय झूठ असत्य शिरोधारा के आज के व्यवहार में तेल का संपर्क मूर्धा से शिरसे "आताही नही है" !!!


... तो सभी पेशंट को और सभी वैद्यों को कभी शास्त्रीयता और नैतिकता इस रूप मे है सोचना चाहिए की क्या हम सही मे आयुर्वेद शास्त्र का अवलंबन कर रहे है या आयुर्वेद के नाम पर हम कुछ अलग ही "बेच रहे है" ?!


हम पेशंट को कस्टमर क्लाएंट समज रहे है ... या पेशंट हमारा अन्नदाता स्वरूप भगवंत है ???


हम पैसा बटोरने के लिए शिरोधारा कहकर कपाल ललाट भाग फोरहेड पर तेल उंडेल रहे है, जिसका वस्तुतः "कोई उपयोग नही है" हम उसको आज मनःशांती स्ट्रेस रिलिव्हर नींद का उपाय और न जाने क्या क्या बडबडाते रहते है ...


और पेशंट को भी "वह परिणाम", प्लासीबो या कंडिशनिंग सायकोथेरपी के रूप मे "सच्चे लगते है"!


 लेकिन यह शास्त्र नही है ... यह दिगभ्रम है दिशा भूल है वंचना है प्रतारणा है 


हां, इससे पैसा बन सकता है...  किंतु यह आयुर्वेद नही है!! 


अगर हमे सत्य स्वरूप मे शिरोधारा करनी है तो आज जैसे वह पीठ के लिटाकर facing upwards, कपाल पर करते है...

उसकी बजाये विपरीत शयन करके पेट के बल लिटाकर जमीन की ओर चेहरा करके facing downward करके मूर्धा व्हर्टेक्स रोमावर्त अधिपती मर्म शिरस् का सर्वोच्च बिंदू यहां पर होना चाहिये ✅️✅️✅️


और इस तथाकथित शिरोधारा की तुलना मे, जिसका कभी प्रचार ✅️ /मार्केटिंग(?) हुआ ही नही ऐसे शिरो अभ्यंग, शिरःपिचु & प्राचीन काल का सर्वाधिक प्रभावी शिरोबस्ति; वह कई गुना अधिक परिणामकारक अधिक शास्त्रीय है!


लेकिन सच बतायेगा कौन? 

झूठ को उजागर कौन करेगा ?

सच सुनने की किसकी इच्छा है? 

और सही क्या गलत क्या शास्त्र क्या मार्केट क्या ... भोले भाले आयुर्वेद पर विश्वास रखने वाले पेशंट को क्या पता है !!??


इसलिये जिनको शास्त्र के प्रति निष्ठा है प्रेम है, उन वैद्यों ने आयुर्वेद प्रॅक्टिशनर्स ने और जिन पेशंट को आयुर्वेद शास्त्र मे शास्त्रीय क्या है, मार्केटिंग क्या है , सत्य क्या है असत्य क्या है ... पेशंट के लिए "सोच" कर कौनसा उपचार किया जाता है & पेशंट को कुछ "बेचकर" कोई आर्थिक लाभ स्वयं का कैसे कर लेता है ... यह बताने के लिए आज का यह प्रयास है !


जागृत रहिये ... और सत्य का अवलंबन करे!!!

Monday, 19 January 2026

दोष an illusion. दोष नसतात. "Nir"Dosha Ayurveda "नि"र्दोष आयुर्वेद

दोष an illusion. दोष नसतात. "Nir"Dosha Ayurveda "नि"र्दोष आयुर्वेद 

Picture Credit Chatgpt AI 

Think rational. Quit illusion ते गुल्मनिदान आणि संप्राप्ती याच्यावर लेक्चर देणारे लोकांचे मला भयंकर कौतुक वाटतं! म्हणजे सशाला शिंग असतं, पुरुषाला गर्भाशय असतं !!! ... अशा "आश्रय असिद्ध" गोष्टींवरती लोक लेक्चर देतात, याच्याविषयी मला भयंकर आदर आहे! 


ठीक आहे ...


म्हणजे शास्त्रामध्ये लिहिलेलं आहे, म्हणून ते वाचायला पाहिजे, याबाबत काही शंका नाही 


... पण काही गोष्टी कालबाह्य आहेत त्या अस्तित्वात असू शकत नाहीत, हे काही विशिष्ट कालावधीनंतर स्पष्टपणे मान्य करायला काय हरकत आहे ??


त्यातल्या त्यात वात दोष ही एक भयंकर अशक्य संकल्पना आयुर्वेदामध्ये आहे... 


की आपण अन्न खाल्ल्यानंतर तिसऱ्या अवस्था पाकामध्ये वात "निर्माण" होतो...🤔⁉️ 


म्हणजे हे मला अजिबात आजपर्यंत न कळलेलं कोडं आहे की, जो वात शरीरामधल्या सगळ्या हालचाली घडवतो , की जो चल रूक्ष शीत अशा गुणांचा असतो, तो वात अन्नाच्या तिसऱ्या अवस्था पाकामध्ये आपण "खाल्लेल्या अन्नामधून निर्माण" होतो 😇


आता मूळ गोष्ट अशी आहे की, आपण जे अन्न खातो, ते अन्न पृथ्वी महाभूत प्रधान आहे, त्याच्या सोबत आपण थोडाफार पाणी पितो किंवा काही जेवणामध्ये द्रव पदार्थ असतात हे जल प्रधान आहेत ...णत्यामुळे त्यातून "शरीर अस्तित्वात ठेवणारे घटक = धातु" निर्माण होतात, हे निश्चितपणे मान्य करायला हवं ...


पण आपण खाल्लेल्या पृथ्वी जल प्रधान अन्नातून आपलं अख्खं शरीर चालवेल, गतिमान ठेवेल, असा "वातदोष निर्माण" होतो, ही अत्यंत प्राथमिक ज्ञान ज्याला आहे , त्याला सुद्धा न समजणारी, न कळणारी, न पटणारी गोष्ट आहे!!! 


... वायूचे जर गुण रूक्ष चल शीत असे असतील तर अशा गुणांचा भाव पदार्थ निर्माण होणारे पदार्थ , आपण असे किती प्रमाणात खातो , की ज्यातून आयुष्यभर ... जन्मल्यापासून आपण मरेपर्यंत ... आपलं हृदय आपलं फुफ्फुस ही, "कधीही न थांबणारी दोन यंत्र सतत गतिमान राहतील?" ... आणि अन्य सर्व वेळेला आपण जागृत असतो तेव्हा आपल्या शरीरातील सर्व हालचाली ज्या आपल्याला ऐच्छिक दृष्टीने करायच्या, त्या करता येतात ... हे वातामुळे होतं एवढी अखंड अविरत गती, ज्या वाताला attribute करण्यात आलेली आहे , तेवढा वात, आपण खात असलेल्या अन्नातून निर्माण होत असेल, ही अशक्यप्राय गोष्ट आहे !!! ... एवढं रूक्ष एवढं चल आणि एवढं शीत गुण असलेलं अन्न आपण खातो, अशी वस्तुस्थिती अजिबात नाही...!!! 

👶🏻

जन्माला आलेलं लहान मूल फक्त आईचं दूधच पिते की जे आईचं दूध हे निश्चितपणे पृथ्वी जल स्निग्ध गुरु संतर्पण बृंहण असे आहे आणि बाळ जोपर्यंत जागं आहे, तोपर्यंत सतत हात पाय हलवत असतं आणि बाळ गर्भाशयात सहा आठवड्याचं असल्यापासून (चौथ्या महिन्यात नव्हे) त्याचे हृदय धडधडत असते आणि जन्माला आल्यापासून फुफ्फुस आकुंचन प्रसरण पावत असते, एवढ्या सगळ्या गती, चल गुण अविरतपणे सुरू असताना, त्यासाठी लागणारा वात बाळाने घेतलेल्या आहारातून म्हणजे आईच्या दुधातून निर्माण होतो, असं म्हणणं हे पंचमहाभूत सिद्धांताला नाकारण्यासारखा आहे, त्याच्याशी विसंगत आहे, अशास्त्रीय आहे 

दोष नसतात 


धातू असतात 

मल असतात 

महाभूत असतात 


आणि दोष आहारातून निर्माण होत नाहीत


मुळात , "दोष हे अन्नातून निर्माण होतात", ही मूलभूत गोष्टच चुकीची आहे!!! 

वातामुळे , चल गुणामुळे हालचाल होते? की हालचाल झाल्यामुळे, व्यायाम केल्यामुळे वात वाढतो ?

जर रोजच्या हालचालींमुळे, शारीरिक क्रियांमुळे ... वात वाढत असेल, (चल गुणामुळे) , तर हृदय आणि फुफ्फुस येथे जीवनभर हालचाल सुरू असते म्हणजे वात वाढलाच पाहिजे ! असं असताना , पुन्हा अन्नातून तिसऱ्या अवस्था पाकात वात निर्माण होत असेल, तर शरीर काही दिवसात "वायुरूपच" व्हायला पाहिजे!!!


शरीरात तीन (3) दोष नसतात ... शरीरात शून्य(0) दोष असतात ... शरीरात सहा धातू असतात ...अन्नापासून सहा(6) धातू निर्माण होतात आणि ते 6 धातू शरीर उभारतात, सांभाळतात आणि चालवतात ... अन्नातून त्यातून दोन(2)च मल निर्माण होतात, ते म्हणजे मूत्र आणि पुरीष ... एवढेच सत्य आहे !!!


बाकी तीन दोष = वात पित्त कफ नसतात !

रस नावाचा धातू नसतो 

स्वेद नावाचा मल नसतो ...

4 महाभूत असतात 

6 धातु असतात 

2 मल असतात

स्रोतस् नसते, ओजस् नसते 


हे आपण जोपर्यंत स्वीकारत नाही, 

तोपर्यंत ही जी काही आयुर्वेदातली अनागोंदीची गोंधळाची परिस्थिती आहे ती बदलणार नाही!!!


Think rational. Quit illusion


शरीरात जी गती हालचाली होतात त्या मसल्स च्या आकुंचन प्रसारणामुळे होतात 


मसल्स ना नेमकं काय म्हणायचं हा फार मोठा प्रश्न आहे. त्यांचं स्नायू हे भाषांतर आयुर्वेदातल्या शारीर कल्पनेची जुळत नाही आणि पेशी असं म्हणावं तर सध्या रूड भाषेत पेशी म्हणजे सेल cell असल्याने त्याच्याशीही जुळत नाही 


सबब मसलला स्नायू किंवा पेशी म्हणण्याऐवजी मसल म्हणूया 


मसल हे मांसापासून म्हणजे पृथ्वी महाभूतापासून बनतात ही गोष्ट सत्य आहे 


त्यामुळे गती ही त्या मसल मांस पृथ्वी यामुळे असते आणि या आकुंचन प्रसारणाला जी एनर्जी ऊर्जा आवश्यक असते ती अन्ना मधूनच येते आणि अन्न हे पृथ्वी जल प्रधान असतं 


कार किंवा टू व्हीलर पळते तेव्हा इंजिनामध्ये इंधनाचा स्फोट होतो 


इंधन हे पेट्रोल डिझेल या स्वरूपातील असतं की जे पुन्हा पार्थिव मिनरल खनिज असंच आहे 


अगदी एलपीजी किंवा सीएनजी असं म्हटलं तरी सुद्धा ते पार्थिव मिनरल खनिज असेच आहेत 


पेट्रोल डिझेल किंवा गॅस या सगळ्यांना वजन आहे ते लिटर किंवा केजी मध्ये मोजले जातात म्हणजेच ते घन वस्तुमान मास असलेले पृथ्वी प्रधान भाव पदार्थ आहेत 


त्यामुळे व्यवहारातली गती असो किंवा शरीरातली गती असो, ती कल्पना रम्य अस्तित्वहीन वातामुळे नसून, ती पृथ्वी जल अशा प्रत्यक्ष इंधनाच्या ज्वलनामुळे निर्माण होते, हीच वस्तुस्थिती आहे 


जसे टू व्हीलर आणि कार यांची सर्व संरचना बॉडी कॉन्स्टिट्यूशन पार्टस हे सुद्धा मेटॅलिक किंवा प्लास्टिकचे असतात म्हणजेच पृथ्वी महाभूतांपासून बनलेले असतात


तसेच संपूर्ण शरीर घटक हे सुद्धा सहा धातूंपासून बनताना मुख्यतः मांस आणि मेद यापासून बनतात म्हणजेच प्रोटीन फॅट म्हणजेच पृथ्वी जल यापासून बनतात 


त्यामुळे उगीचच कफ पित्त वात या अस्तित्वात नसलेल्या कल्पना रम्य , शास्त्रीय संज्ञा आणि लोकभाषेतील अर्थ या दोन्ही दृष्टीने "दोषच" असलेली, ही गोष्ट पूर्णतः त्याचे अस्तित्वहीन अशास्त्रीय कल्पनारम्य म्हणजेच इल्युजन आहे


Think rational. Quit illusion

Monday, 12 January 2026

ऑटोमेटेड स्वयंचलित शिरोभ्यंग मशीन… हाँ कहा जाए तो व्यापार 💰💵🪙 … नहीं कहा जाए तो मज़ाक 😇😃😆 … पढ़कर “बेचो” 💵 या हँसकर “सोचो” जो मर्ज़ी आए ... करो

ऑटोमेटेड स्वयंचलित शिरोभ्यंग मशीन…

हाँ कहा जाए तो व्यापार 💰💵🪙 …

नहीं कहा जाए तो मज़ाक 😇😃😆 …

पढ़कर “बेचो” 💵

या हँसकर “सोचो”

जो मर्ज़ी आए ... करो

Picture Credit Chatgpt AI 

We , MhetreAyurveda, are sowing seeds of Ideas, after ploughing enthusiasts' brains ...

हम, म्हेत्रेआयुर्वेद MhetreAyurveda,

जिज्ञासू लोगों के बुद्धि को जोतकर

उसमें विचारों के बीज बो रहे हैं …

जैसे आयुर्वेद में अब **कांस्य थाली से पादाभ्यंग** और उसी तरह **कांस्य थाली से हस्त अभ्यंग** करने वाली **गोल-गोल घूमने वाली मशीनें** आ गई हैं, 

उसी प्रकार **सिर की मालिश** के लिए भी एक मशीन बनाई जा सकती है।

ऐसी मशीन बनाई जानी चाहिए जो **सिर में फिट बैठे या सिर पर ठीक से बैठ सके**, 

जिसका आकार **बड़ी कटोरी या कढ़ाही जैसा** हो। 

उसके अंदर की तरफ **कुछ उभार बनाए जाएँ**, जैसे **पादाभ्यंग और हस्ताभ्यंग की मशीनों में होते हैं**।

वह कटोरी या कढ़ाही जैसी मशीन **इस प्रकार घूमती रहे कि वह सिर पर मालिश करती रहे**। 

यदि ऐसा यंत्र बनाया जाए, तो आयुर्वेद को **“शिरोभ्यंग” नाम का एक और आसान व्यवसाय** मिल जाएगा, 

जिसमें **शिरोधारा जैसा बहुत बड़ा सेट-अप करने की आवश्यकता नहीं होगी**, 

और **थेरेपिस्ट की भी आवश्यकता नहीं होगी**।

बस **एक बटन दबाना होगा**, 

और **सिर पर बैठने वाली वह कटोरी-कढ़ाही जैसी मशीन घूमने लगेगी**, 

और अभ्यंग होने के कारण **पेशंट को भी अच्छा और आरामदायक महसूस होगा**।

Automated Shiro-abhyanga Head massage machine… If you say yes, then it is business 💰💵🪙 … If you say no, then it is a joke 😇😃😆 …

Automated Shiro-abhyanga machine…

If you say yes, then it is business 💰💵🪙 …

If you say no, then it is a joke 😇😃😆 …

After reading, “sell it” 💵

or laughing, “think about it”

do whatever you feel like

Picture Credit Chatgpt AI 

We , MhetreAyurveda, are sowing seeds of Ideas, after ploughing enthusiasts' brains ...

Just as in Ayurveda there are now round rotating machines for **foot massage using a bronze plate**, and similarly **hand massage using a bronze plate**, in the same way a machine can be made for **head massage = shiro abhyanga**.


Such a machine should be made in a form that can **fit on the head**, shaped like a **large bowl or a kadhai (wok-like vessel)**. 


On the inner side of it, some **raised projections** should be made, just like those present in the **foot-massage and hand-massage machines**.


That bowl- or kadhai-shaped device should **keep rotating in such a manner that it massages the head**. 


If such a device is made, then Ayurveda will gain **one more simple business called “Shiro-abhyanga”**, 

in which there will be **no need for a very large setup like Shirodhara**, 

and **no therapist will be required**.


One only has to **press a button**, and that **bowl- or kadai-shaped machine that fits on the head will start rotating**, 

and because abhyanga (oil massage) happens, **the patient will also feel nice and relieved**.