Friday, 20 March 2026

शिरोधारा का वास्तव !?

शिरोधारा का वास्तव?!


लेखक : वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे

एम डी आयुर्वेद संहिता जामनगर 1998

आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे & नाशिक 


शिरोधारा आज आयुर्वेद क्लिनिक का बोधचिन्ह या लोगो बन गया है!


शिरोधारा इस संज्ञा से शास्त्र मे कही पर भी उल्लेख या संदर्भ नही है! 


मूलतः मूर्धतैलम् यह अष्टांगहृदय सूत्र स्थान 22 मे 4 प्रकार मे से एक मूर्धा सेक/ मूर्धा परिषेक यह आज शिरोधारा के रूप मे लोकप्रिय है.


मूर्धतैल के 4 प्रकार है ... 

1. अभ्यंग 

2. सेक = परिषेक = शिरोधारा

3. पिचु और 

4. बस्ति! 


Indications/Benefits :


1. अभ्यंग for रौक्ष्य कण्डू मल

2. सेक/परिषेक = शिरोधारा for अरूंषिका शिरस्तोद दाह पाक व्रण 

3. पिचु for केशशात स्फुटन धूपन नेत्रस्तम्भ

4. बस्ति for प्रसुप्ति अर्दित जागर नासास्यशोष तिमिर शिरोरोग दारुण


तो ऍक्च्युली जिस अवस्था के लिए सेक परिफेक शिरोधारा या शास्त्र मे बताई गई है उसके लिए तो आज उसका पेशंट मे उपयोग होता हुआ दिखाई नही देता है !

आज केवल मार्केटिंग के रूप मे इसका स्ट्रेस मे अच्छा है, नींद के लिये उपयोग होता है, ऐसा है गोबेल थेअरी के द्वारा "प्रस्थापित" किया गया है जो की असत्य शास्त्रीय और झूठ है पेशंट को अच्छा लगता है पेशंट डिमांड करते है इसलिये हम शिरोधारा करते है यह जस्टीफिकेशन शास्त्रीय न होकर कमर्शियल यह शास्त्रीय "सोचना" न होकर , यह केवल "बेचना" इस प्रकार की की वृत्ती है


आयुर्वेद शास्त्रीय प्रॅक्टिस या चिकित्सा उपचार इनका उद्देश पेशंट क्या "चाहता", है पेशंट को क्या "अच्छा लगता" है, पेशंट की क्या "डिमांड" है ... इस पर नही चलता है !


वस्तुतः, पेशंट की "आवश्यकता" क्या है "need" क्या है , इस पर शास्त्रीय प्रॅक्टिस = चिकित्सा व्यवहार आधारित होता है!!!


अगर हम पेशंट की "डिमांड" की पूर्ती के लिए कुछ कर रहे है, तो फिर हम कि प्रॅक्टिस नही कर रहे है ... हम रिसॉर्ट स्पा सलून पार्लर इस प्रकार की सेवा व्यवस्था = सर्विस इंडस्ट्री चला रहे ... किंतु, हमने तो डिग्री एक प्रोफेशनल कन्सल्टंट = आरोग्य मार्गदर्शक के रूप मे कार्यरत होने के लिए ली है!


मूर्धतैल के 4 प्रकारों के नामों का सभी का पर्यायी नाम देखेंगे तो ... मूर्धा की जगह शिरस् ऐसा शब्द रखके शिरोभ्यंग, शिरः परिषेक (= शिरोधारा), शिरःपिचु & शिरोबस्ति ... ये यथोतर बलवान है अर्थात अधिक परिणामकारक है


अभ्यंग और पिचु ये उतने लोकप्रिय नही रहे 


किंतु अगर पिछली पिढी में देखा जाये तो... शिरोभ्यंग यह विधी; चंपी/तेलमालिश के रूप में तथा नवजात शिशुओं के शिरःपूरण (टाळू भरणे) = हर घर मे एक वर्ष तक, शिर मूर्धा अभ्यंग करना यह एक सामाजिक रूढी भी थी ... और लोकप्रिय गाना देखेंगे तो ... "सर जो तेरा चकराये या दिल डूबा जाये" ... इस जॉनी लिव्हर पर चित्रित, मोहम्मद रफी का गाना, चंपी तेलमालिश के रूप मे शिरोभ्यंग का स्मरण करता है 


दूसरी तरफ शिरोबस्ती अत्यंत प्रभावी होने पर भी उसके लिए जो यंत्रणा जो प्रिपरेशन करना पडता है वह अधिक दुष्कर है... सर्वाधिक दुष्कर और अप्रिय अवांछित बात तो ये है कि शिरोबस्ती के लिये शिर के सभी बाल निकालने पडते है अर्थात गंजा टक्कल खल्वाट bald इस स्थिती मे आना पडता है, जो किसी भी व्यक्ति को मान्य नही होता है, सहसा!


इसीलिये यह शिरोबस्ति सामाजिक व्यवहार मे कभी भी लोकप्रिय नही रहा !


"तलम्" नाम से कुछ इसका परिवर्तित स्वरूप दक्षिण भारत मे व्यवहार में है 


"शिरोभ्यंग" करते समय, उतने समय तक करने वाले परिचारक/therapist व्यक्ती को समय व्यय और शारीरिक कष्ट होते है ... labor & time!


"शिरःपिचु" विधि में स्नेह से आप्लावित कार्पास पिचु या कोई कपडा फोल्ड करके रखना , इतना सुखावह या हॅपनिंग या फील गुड या लक्झरी या स्पा ट्रीटमेंट की तरह नही लगता है ... इसलिये!!!


परिचारक का समय बंधा ना रहे (occupied& busy therapist) और कोई विशेष दुष्कर यंत्रणा करनी ना पडे और सबसे इम्पॉर्टंट जो फील गुड हॅपनिंग रिसॉर्ट इस प्रकार का लक्झरी ट्रीटमेंट "लगे .."

यह मूर्धा अभिषेक या शिरः परिषेक या "मार्केटिंग" मे बहुत ज्यादा "हाईप" किया गया, झूठे लाभ प्रचारित करके "प्रस्थापित" किया गया ... शिरोधारा यह उसी का भ्रष्ट स्वरूप है !


वस्तुतः ये जो चारो मूर्ध तैल है ...

ये मूर्धा पर अर्थात शिरके सर्वोच्च स्थान पर करने है, इसे व्हर्टेक्स vertex रोमावर्त अधिपति या उसके आसपास का प्रदेश कहेंगे ...


किंतु जैसे की सभी को ज्ञात है की ... "शिरोधारा" यह "आज का जो लोकप्रिय हॅपेनिंग ट्रीटमेंट" है , यह मूर्धा = शिरस् पर नही किया जाता ... यह आज ॲक्च्युअली कपाल भाल ललाट फोरहेड पर ... भ्रू भवें eye brow के थोडा पीछे , धारा की जाती है ... तो इसे शिरोधारा न कहते हुए , भालधारा कपालधारा ललाटधारा forehead oil stream कहना चाहिए!


आयुर्वेद की आज के व्यवहार में पेशंट को इस विधी से क्या लाभ होगा यह "सोचना" उतना आवश्यक नही समजा जाता , जितना की पैसा बटोरने के लिए क्या "बेचना" अधिक फायदेमंद होगा इसका विचार अधिक होता है !!!


वैसे देखा जाये तो शिरोधारा यह अन्य तीन मूर्धतैल प्रकारों की तुलना मे "अत्यंत अल्पकाल और कोई भी प्रेशर दिए बिना" , ॲक्च्युअली मूर्धा या शिरस् से अत्यल्प संपर्क होकर ही तैल का निर्गमन होने वाली विधि है !


अभ्यंग मे हात का प्रेशर और बहुत दीर्घकाल तक ॲक्च्युअली मूर्धा या शिरस् की त्वचा = स्काल्प इसके साथ तैल का संपर्क रहता है 


शिरःपिचु में ... जितना तेल है, पिचु के आकार के शिरःप्रदेश मूर्धाप्रदेश स्काल्प त्वचा इनके संपर्क में तैल रहता है 


शिरोबस्ति में अत्यंतिक/अत्यधिक मात्रा मे तेल का बहुत बडा स्तंभ , scalp = शिरस्त्वचा से एक अंगुल उपर तक उसका स्तर या लेवल बहुत दीर्घकाल तक धारण किया जाता है; 

तो अभ्यंग, पिचु और बस्ति ये जो मूर्धतैल के प्रकार है इनमें, तैल एवं scalp/शिरोभूमि इनका परस्पर संपर्क का कालावधी और उसका प्रेशर यह तुलना मे अधिक रहता है !


जहां पर शिरोधारा मे तैल बहता रहता है और मूर्धा तक आता ही नही ... वह कपाल पर गिरता है और वहा से बालो मे जाकर शिरस्त्वचा को जैसे तैसे संपर्क करके या बिना संपर्क किये निकल जाता है. 


क्यूकी बाल तो निकाले हुए नही रहते है , बाल तो जैसे है वैसे ही होते है और पिचु अभ्यंग या बस्ति की तरह ग्रॅव्हिटी या हस्त स्पर्श इनका प्रेशर भी तेल को स्काल्प के संपर्क मे आने की सहायता नही करता है 


क्योंकि शिरोधारा मे समांतर parallel गती में बह जाता है निकल जाता है ... ऐसा होने के बावजूद शिरस् अभ्यंग शिरःपिचु शिरोबस्ति इनका प्रचलन आज के व्यवहार मे नही है!


क्यूकी इन तीनो प्रकारो मे समय, मटेरियल, कौशल्य इनके साथ साथ परिचारक की संपूर्ण काळ व्यक्तिगत फिजिकल उपस्थिती इनकी आवश्यकता होती है और उसमे फील गुड हॅपनिंग स्पा ऐसे वेलनेस ट्रीटमेंट का अनुभव नही आता है ... जो की शिरोधारा मे पेशंट को बेड पर आराम से लिटाकर मॅन्युअली या यांत्रिक रूप में लूप मे रिपीटेशन आवर्तन में रोटेशन के रूप मे तेल की धारा कपाल पर डाली जा सकती है , उसको ऑटोमेटेड यांत्रिक भी बनाया जा सकता है , जिसे की परिचारक का समय उसने बंधा ना रहे और थोडासा मंद प्रकाश & कोई संगीत लगाया तो पेशंट को भी फील गुड होता है!!


वस्तुतः यह शिरोधारा शिरस पर नहीं अपितु कपाल भाल ललाट फोर हेड पर की जाती है 


मैने कुछ वर्ष पूर्व सजेस्ट किया था कि पेशंट को पीठ के बल supine = facing upwards लिटाने के बजाये , उसको पेट के बल prone लिटाये, उसका जो मुंह मुद्रा चेहरा है जमीन की तरफ करे facing downward जिस से की जहां पर तैल का संपर्क आना "शास्त्र को अभिप्रेत है" = उस व्हर्टेक्स अधिपति रोमावर्त मूर्धा पर शिरस् के सर्वोच्च बिंदू पर ... तेल की धारा गिरती रहेगी 

❌️

✅️

✅️


और वहा से ग्रॅव्हिटी की दिशा से अधोगमन करते हुई वह शिरके संपूर्ण प्रदेश को संपूर्ण scalp त्वचा को तैल का संयोग संपर्क आप्लावन होकर वह नीचे निकल जायेगी ! ✅️


तो किसी ने कहा कि ऐसे पेट की बल की स्थिती मे विपरीत शयन prone/facing downward की स्थिती मे मूर्धा पर व्हर्टेक्स पर ॲक्च्युली डाला हुआ तैल आंखो मे जाने की संभावना है ! 🙄


आज की जो शिरोधारा = कपाल धारा करते है , उसमे भी आंखो पर कॉटन का पिचु रखते ही है !!!


किंतु, नही !!!

जो प्रस्थापित है जो मार्केटेड है वही हमे करना है ... चाहे वो कितना शास्त्रीय हो कितना भी कमर्शियल हो कितना भी गलत हो ! हम नही सुधरेंगे !!!


जैसे आज कल देखिये ... चाकण मे वाघोली मे शिरवळ मे याने पुणे से 30 35 किलोमीटर जो लोग दूर रहते है, वे कहते समझते मानते है की हम पुणे मे रहते है... वसई विरार से लेकर अलिबाग तक वाशी तक खारघर तक रहने वाले लोग कहते समझते मानते है की मुंबई मे रहते है ... मुंबई से पचास से सौ किलोमीटर दूर रहकर की भी!!


वैसे ही कपाल भाल ललाट फोर हेडफर धारा करके हम कहते समझते मानते है की, हम शिरोधारा करते है!


कपाल ललाट भाल फोरहेड यहां पर धारा करके हम स्वयं को शास्त्र को आप्तों को पेशंट को समाज को ईश्वर को फंसा रहे है वंचना कर रहे है प्रतारणा कर रहे है कि हम शिरोधारा कर रहे है ... जितकी वस्तुतः यह धारा शिरस् पर नही कपाल पर होती है 


इस नए से मार्केट किये गये लोकप्रिय किये गये प्रस्थापित किये गये अशास्त्रीय झूठ असत्य शिरोधारा के आज के व्यवहार में तेल का संपर्क मूर्धा से शिरसे "आताही नही है" !!!


... तो सभी पेशंट को और सभी वैद्यों को कभी शास्त्रीयता और नैतिकता इस रूप मे है सोचना चाहिए की क्या हम सही मे आयुर्वेद शास्त्र का अवलंबन कर रहे है या आयुर्वेद के नाम पर हम कुछ अलग ही "बेच रहे है" ?!


हम पेशंट को कस्टमर क्लाएंट समज रहे है ... या पेशंट हमारा अन्नदाता स्वरूप भगवंत है ???


हम पैसा बटोरने के लिए शिरोधारा कहकर कपाल ललाट भाग फोरहेड पर तेल उंडेल रहे है, जिसका वस्तुतः "कोई उपयोग नही है" हम उसको आज मनःशांती स्ट्रेस रिलिव्हर नींद का उपाय और न जाने क्या क्या बडबडाते रहते है ...


और पेशंट को भी "वह परिणाम", प्लासीबो या कंडिशनिंग सायकोथेरपी के रूप मे "सच्चे लगते है"!


 लेकिन यह शास्त्र नही है ... यह दिगभ्रम है दिशा भूल है वंचना है प्रतारणा है 


हां, इससे पैसा बन सकता है...  किंतु यह आयुर्वेद नही है!! 


अगर हमे सत्य स्वरूप मे शिरोधारा करनी है तो आज जैसे वह पीठ के लिटाकर facing upwards, कपाल पर करते है...

उसकी बजाये विपरीत शयन करके पेट के बल लिटाकर जमीन की ओर चेहरा करके facing downward करके मूर्धा व्हर्टेक्स रोमावर्त अधिपती मर्म शिरस् का सर्वोच्च बिंदू यहां पर होना चाहिये ✅️✅️✅️


और इस तथाकथित शिरोधारा की तुलना मे, जिसका कभी प्रचार ✅️ /मार्केटिंग(?) हुआ ही नही ऐसे शिरो अभ्यंग, शिरःपिचु & प्राचीन काल का सर्वाधिक प्रभावी शिरोबस्ति; वह कई गुना अधिक परिणामकारक अधिक शास्त्रीय है!


लेकिन सच बतायेगा कौन? 

झूठ को उजागर कौन करेगा ?

सच सुनने की किसकी इच्छा है? 

और सही क्या गलत क्या शास्त्र क्या मार्केट क्या ... भोले भाले आयुर्वेद पर विश्वास रखने वाले पेशंट को क्या पता है !!??


इसलिये जिनको शास्त्र के प्रति निष्ठा है प्रेम है, उन वैद्यों ने आयुर्वेद प्रॅक्टिशनर्स ने और जिन पेशंट को आयुर्वेद शास्त्र मे शास्त्रीय क्या है, मार्केटिंग क्या है , सत्य क्या है असत्य क्या है ... पेशंट के लिए "सोच" कर कौनसा उपचार किया जाता है & पेशंट को कुछ "बेचकर" कोई आर्थिक लाभ स्वयं का कैसे कर लेता है ... यह बताने के लिए आज का यह प्रयास है !


जागृत रहिये ... और सत्य का अवलंबन करे!!!

Monday, 19 January 2026

दोष an illusion. दोष नसतात. "Nir"Dosha Ayurveda "नि"र्दोष आयुर्वेद

दोष an illusion. दोष नसतात. "Nir"Dosha Ayurveda "नि"र्दोष आयुर्वेद 

Picture Credit Chatgpt AI 

Think rational. Quit illusion ते गुल्मनिदान आणि संप्राप्ती याच्यावर लेक्चर देणारे लोकांचे मला भयंकर कौतुक वाटतं! म्हणजे सशाला शिंग असतं, पुरुषाला गर्भाशय असतं !!! ... अशा "आश्रय असिद्ध" गोष्टींवरती लोक लेक्चर देतात, याच्याविषयी मला भयंकर आदर आहे! 


ठीक आहे ...


म्हणजे शास्त्रामध्ये लिहिलेलं आहे, म्हणून ते वाचायला पाहिजे, याबाबत काही शंका नाही 


... पण काही गोष्टी कालबाह्य आहेत त्या अस्तित्वात असू शकत नाहीत, हे काही विशिष्ट कालावधीनंतर स्पष्टपणे मान्य करायला काय हरकत आहे ??


त्यातल्या त्यात वात दोष ही एक भयंकर अशक्य संकल्पना आयुर्वेदामध्ये आहे... 


की आपण अन्न खाल्ल्यानंतर तिसऱ्या अवस्था पाकामध्ये वात "निर्माण" होतो...🤔⁉️ 


म्हणजे हे मला अजिबात आजपर्यंत न कळलेलं कोडं आहे की, जो वात शरीरामधल्या सगळ्या हालचाली घडवतो , की जो चल रूक्ष शीत अशा गुणांचा असतो, तो वात अन्नाच्या तिसऱ्या अवस्था पाकामध्ये आपण "खाल्लेल्या अन्नामधून निर्माण" होतो 😇


आता मूळ गोष्ट अशी आहे की, आपण जे अन्न खातो, ते अन्न पृथ्वी महाभूत प्रधान आहे, त्याच्या सोबत आपण थोडाफार पाणी पितो किंवा काही जेवणामध्ये द्रव पदार्थ असतात हे जल प्रधान आहेत ...णत्यामुळे त्यातून "शरीर अस्तित्वात ठेवणारे घटक = धातु" निर्माण होतात, हे निश्चितपणे मान्य करायला हवं ...


पण आपण खाल्लेल्या पृथ्वी जल प्रधान अन्नातून आपलं अख्खं शरीर चालवेल, गतिमान ठेवेल, असा "वातदोष निर्माण" होतो, ही अत्यंत प्राथमिक ज्ञान ज्याला आहे , त्याला सुद्धा न समजणारी, न कळणारी, न पटणारी गोष्ट आहे!!! 


... वायूचे जर गुण रूक्ष चल शीत असे असतील तर अशा गुणांचा भाव पदार्थ निर्माण होणारे पदार्थ , आपण असे किती प्रमाणात खातो , की ज्यातून आयुष्यभर ... जन्मल्यापासून आपण मरेपर्यंत ... आपलं हृदय आपलं फुफ्फुस ही, "कधीही न थांबणारी दोन यंत्र सतत गतिमान राहतील?" ... आणि अन्य सर्व वेळेला आपण जागृत असतो तेव्हा आपल्या शरीरातील सर्व हालचाली ज्या आपल्याला ऐच्छिक दृष्टीने करायच्या, त्या करता येतात ... हे वातामुळे होतं एवढी अखंड अविरत गती, ज्या वाताला attribute करण्यात आलेली आहे , तेवढा वात, आपण खात असलेल्या अन्नातून निर्माण होत असेल, ही अशक्यप्राय गोष्ट आहे !!! ... एवढं रूक्ष एवढं चल आणि एवढं शीत गुण असलेलं अन्न आपण खातो, अशी वस्तुस्थिती अजिबात नाही...!!! 

👶🏻

जन्माला आलेलं लहान मूल फक्त आईचं दूधच पिते की जे आईचं दूध हे निश्चितपणे पृथ्वी जल स्निग्ध गुरु संतर्पण बृंहण असे आहे आणि बाळ जोपर्यंत जागं आहे, तोपर्यंत सतत हात पाय हलवत असतं आणि बाळ गर्भाशयात सहा आठवड्याचं असल्यापासून (चौथ्या महिन्यात नव्हे) त्याचे हृदय धडधडत असते आणि जन्माला आल्यापासून फुफ्फुस आकुंचन प्रसरण पावत असते, एवढ्या सगळ्या गती, चल गुण अविरतपणे सुरू असताना, त्यासाठी लागणारा वात बाळाने घेतलेल्या आहारातून म्हणजे आईच्या दुधातून निर्माण होतो, असं म्हणणं हे पंचमहाभूत सिद्धांताला नाकारण्यासारखा आहे, त्याच्याशी विसंगत आहे, अशास्त्रीय आहे 

दोष नसतात 


धातू असतात 

मल असतात 

महाभूत असतात 


आणि दोष आहारातून निर्माण होत नाहीत


मुळात , "दोष हे अन्नातून निर्माण होतात", ही मूलभूत गोष्टच चुकीची आहे!!! 

वातामुळे , चल गुणामुळे हालचाल होते? की हालचाल झाल्यामुळे, व्यायाम केल्यामुळे वात वाढतो ?

जर रोजच्या हालचालींमुळे, शारीरिक क्रियांमुळे ... वात वाढत असेल, (चल गुणामुळे) , तर हृदय आणि फुफ्फुस येथे जीवनभर हालचाल सुरू असते म्हणजे वात वाढलाच पाहिजे ! असं असताना , पुन्हा अन्नातून तिसऱ्या अवस्था पाकात वात निर्माण होत असेल, तर शरीर काही दिवसात "वायुरूपच" व्हायला पाहिजे!!!


शरीरात तीन (3) दोष नसतात ... शरीरात शून्य(0) दोष असतात ... शरीरात सहा धातू असतात ...अन्नापासून सहा(6) धातू निर्माण होतात आणि ते 6 धातू शरीर उभारतात, सांभाळतात आणि चालवतात ... अन्नातून त्यातून दोन(2)च मल निर्माण होतात, ते म्हणजे मूत्र आणि पुरीष ... एवढेच सत्य आहे !!!


बाकी तीन दोष = वात पित्त कफ नसतात !

रस नावाचा धातू नसतो 

स्वेद नावाचा मल नसतो ...

4 महाभूत असतात 

6 धातु असतात 

2 मल असतात

स्रोतस् नसते, ओजस् नसते 


हे आपण जोपर्यंत स्वीकारत नाही, 

तोपर्यंत ही जी काही आयुर्वेदातली अनागोंदीची गोंधळाची परिस्थिती आहे ती बदलणार नाही!!!


Think rational. Quit illusion


शरीरात जी गती हालचाली होतात त्या मसल्स च्या आकुंचन प्रसारणामुळे होतात 


मसल्स ना नेमकं काय म्हणायचं हा फार मोठा प्रश्न आहे. त्यांचं स्नायू हे भाषांतर आयुर्वेदातल्या शारीर कल्पनेची जुळत नाही आणि पेशी असं म्हणावं तर सध्या रूड भाषेत पेशी म्हणजे सेल cell असल्याने त्याच्याशीही जुळत नाही 


सबब मसलला स्नायू किंवा पेशी म्हणण्याऐवजी मसल म्हणूया 


मसल हे मांसापासून म्हणजे पृथ्वी महाभूतापासून बनतात ही गोष्ट सत्य आहे 


त्यामुळे गती ही त्या मसल मांस पृथ्वी यामुळे असते आणि या आकुंचन प्रसारणाला जी एनर्जी ऊर्जा आवश्यक असते ती अन्ना मधूनच येते आणि अन्न हे पृथ्वी जल प्रधान असतं 


कार किंवा टू व्हीलर पळते तेव्हा इंजिनामध्ये इंधनाचा स्फोट होतो 


इंधन हे पेट्रोल डिझेल या स्वरूपातील असतं की जे पुन्हा पार्थिव मिनरल खनिज असंच आहे 


अगदी एलपीजी किंवा सीएनजी असं म्हटलं तरी सुद्धा ते पार्थिव मिनरल खनिज असेच आहेत 


पेट्रोल डिझेल किंवा गॅस या सगळ्यांना वजन आहे ते लिटर किंवा केजी मध्ये मोजले जातात म्हणजेच ते घन वस्तुमान मास असलेले पृथ्वी प्रधान भाव पदार्थ आहेत 


त्यामुळे व्यवहारातली गती असो किंवा शरीरातली गती असो, ती कल्पना रम्य अस्तित्वहीन वातामुळे नसून, ती पृथ्वी जल अशा प्रत्यक्ष इंधनाच्या ज्वलनामुळे निर्माण होते, हीच वस्तुस्थिती आहे 


जसे टू व्हीलर आणि कार यांची सर्व संरचना बॉडी कॉन्स्टिट्यूशन पार्टस हे सुद्धा मेटॅलिक किंवा प्लास्टिकचे असतात म्हणजेच पृथ्वी महाभूतांपासून बनलेले असतात


तसेच संपूर्ण शरीर घटक हे सुद्धा सहा धातूंपासून बनताना मुख्यतः मांस आणि मेद यापासून बनतात म्हणजेच प्रोटीन फॅट म्हणजेच पृथ्वी जल यापासून बनतात 


त्यामुळे उगीचच कफ पित्त वात या अस्तित्वात नसलेल्या कल्पना रम्य , शास्त्रीय संज्ञा आणि लोकभाषेतील अर्थ या दोन्ही दृष्टीने "दोषच" असलेली, ही गोष्ट पूर्णतः त्याचे अस्तित्वहीन अशास्त्रीय कल्पनारम्य म्हणजेच इल्युजन आहे


Think rational. Quit illusion

Monday, 12 January 2026

ऑटोमेटेड स्वयंचलित शिरोभ्यंग मशीन… हाँ कहा जाए तो व्यापार 💰💵🪙 … नहीं कहा जाए तो मज़ाक 😇😃😆 … पढ़कर “बेचो” 💵 या हँसकर “सोचो” जो मर्ज़ी आए ... करो

ऑटोमेटेड स्वयंचलित शिरोभ्यंग मशीन…

हाँ कहा जाए तो व्यापार 💰💵🪙 …

नहीं कहा जाए तो मज़ाक 😇😃😆 …

पढ़कर “बेचो” 💵

या हँसकर “सोचो”

जो मर्ज़ी आए ... करो

Picture Credit Chatgpt AI 

We , MhetreAyurveda, are sowing seeds of Ideas, after ploughing enthusiasts' brains ...

हम, म्हेत्रेआयुर्वेद MhetreAyurveda,

जिज्ञासू लोगों के बुद्धि को जोतकर

उसमें विचारों के बीज बो रहे हैं …

जैसे आयुर्वेद में अब **कांस्य थाली से पादाभ्यंग** और उसी तरह **कांस्य थाली से हस्त अभ्यंग** करने वाली **गोल-गोल घूमने वाली मशीनें** आ गई हैं, 

उसी प्रकार **सिर की मालिश** के लिए भी एक मशीन बनाई जा सकती है।

ऐसी मशीन बनाई जानी चाहिए जो **सिर में फिट बैठे या सिर पर ठीक से बैठ सके**, 

जिसका आकार **बड़ी कटोरी या कढ़ाही जैसा** हो। 

उसके अंदर की तरफ **कुछ उभार बनाए जाएँ**, जैसे **पादाभ्यंग और हस्ताभ्यंग की मशीनों में होते हैं**।

वह कटोरी या कढ़ाही जैसी मशीन **इस प्रकार घूमती रहे कि वह सिर पर मालिश करती रहे**। 

यदि ऐसा यंत्र बनाया जाए, तो आयुर्वेद को **“शिरोभ्यंग” नाम का एक और आसान व्यवसाय** मिल जाएगा, 

जिसमें **शिरोधारा जैसा बहुत बड़ा सेट-अप करने की आवश्यकता नहीं होगी**, 

और **थेरेपिस्ट की भी आवश्यकता नहीं होगी**।

बस **एक बटन दबाना होगा**, 

और **सिर पर बैठने वाली वह कटोरी-कढ़ाही जैसी मशीन घूमने लगेगी**, 

और अभ्यंग होने के कारण **पेशंट को भी अच्छा और आरामदायक महसूस होगा**।

Automated Shiro-abhyanga Head massage machine… If you say yes, then it is business 💰💵🪙 … If you say no, then it is a joke 😇😃😆 …

Automated Shiro-abhyanga machine…

If you say yes, then it is business 💰💵🪙 …

If you say no, then it is a joke 😇😃😆 …

After reading, “sell it” 💵

or laughing, “think about it”

do whatever you feel like

Picture Credit Chatgpt AI 

We , MhetreAyurveda, are sowing seeds of Ideas, after ploughing enthusiasts' brains ...

Just as in Ayurveda there are now round rotating machines for **foot massage using a bronze plate**, and similarly **hand massage using a bronze plate**, in the same way a machine can be made for **head massage = shiro abhyanga**.


Such a machine should be made in a form that can **fit on the head**, shaped like a **large bowl or a kadhai (wok-like vessel)**. 


On the inner side of it, some **raised projections** should be made, just like those present in the **foot-massage and hand-massage machines**.


That bowl- or kadhai-shaped device should **keep rotating in such a manner that it massages the head**. 


If such a device is made, then Ayurveda will gain **one more simple business called “Shiro-abhyanga”**, 

in which there will be **no need for a very large setup like Shirodhara**, 

and **no therapist will be required**.


One only has to **press a button**, and that **bowl- or kadai-shaped machine that fits on the head will start rotating**, 

and because abhyanga (oil massage) happens, **the patient will also feel nice and relieved**.



ऑटोमेटेड स्वयंचलित शिरोभ्यंग मशीन ... होय म्हटलं तर व्यापार💰💵🪙 ... नाही म्हटलं तर विनोद😇😃😆 ... पढकर "बेचो" 💵 या हँसकर "सोचो" ... जो मर्जी आये करो

शिरोभ्यंग मशीन ... 

होय म्हटलं तर व्यापार💰💵🪙 ... 

नाही म्हटलं तर विनोद😇😃😆 ... 

पढकर "बेचो" 💵 या हँसकर "सोचो" 

जो मर्जी आये करो

Picture credit Chatgpt AI 

आम्ही, म्हेत्रेआयुर्वेद MhetreAyurveda, 
जिज्ञासू लोकांची बुद्धि नांगरून
त्यामध्ये विचारांची बीजे पेरत आहोत …

We , MhetreAyurveda, are sowing seeds of Ideas, after ploughing enthusiasts' brains ...

जसे आयुर्वेदात कांस्य थाळी पादाभ्यंग... आता कांस्य थाळी हस्त अभ्यंग ... अशी गोल फिरणारी मशीन यंत्र आलेली आहेत ... तसे एक यंत्र "डोक्याच्या मसाज = शिरोभ्यंग" साठी करता येईल !!

डोक्यात बसेल / डोक्यावर बसेल , अशा आकाराचे मोठ्या वाटीसारखे किंवा कढई सारखे पात्र करून , आत मधून त्याला काही उंचवटे करावेत ... जसे पादाभ्यंग हस्ताभ्यंग मशीनला असतात तसेच... आणि ते वाटी कढई सारखे यंत्र डोक्यावर मालिश करेल अशा पद्धतीने फिरत राहील अशी व्यवस्था करावी! 

म्हणजे आयुर्वेदाला, अजून एक "शिरोभ्यंग नावाचा सोपा बिजनेस" मिळेल ...

ज्यामध्ये शिरोधारेसारखा खूप मोठा सेटअप करावा लागणार नाही ...

थेरपीस्टही लागणार नाही 

नुसतं बटन दाबलं की ते डोक्यात बसणारे वाटी कढई सारखं मशीन फिरेल 

आणि अभ्यंग झाल्यामुळे पेशंटला ही छान बरं वाटेल !!!

Thursday, 8 January 2026

द्रव्य गुण या निघंटु इनकी अनावश्यकता/निष्प्रयोजनता

 🤔⁉️

Picture credit Chatgpt AI 


द्रव्य गुण या निघंटु इनका प्रादुर्भाव संहिता काल मे क्यू नही हुआ होगा 🤔⁉️


मूलतः चरकने तो नामरूप ज्ञान का वैसे देखा जाये तो उपहास😆 ही किया है, नामरूप ज्ञान होने वालों की तुलना अविप अजप गोप असे सामान्य जनों से की है


ओषधीर्नामरूपाभ्यां जानते ह्यजपा वने ।

अविपाश्चैव गोपाश्च ये चान्ये वनवासिनः ॥😁😬

न नामज्ञानमात्रेण रूपज्ञानेन वा पुनः ।🤣😂

ओषधीनां परां प्राप्तिं कश्चिद्वेदितुमर्हति ॥


केवल गुण ज्ञान और योग ज्ञान को ही महत्व दिया है 


हरीतकी (और उसके समान गुण कर्म विपाक ऐसे आमलकी इन 2)का गुणकर्म वर्णन छोड दिया, तो अन्य किसी भी औषधी द्रव्य का सविस्तर गुणवर्णन संहिता मे उपलब्ध नही है 


कुछ लोगों का "क्लेम" है की उसको संहिता को संलग्न निघंटु अस्तित्व भी था


किंतु संहिता के पहले के उपनिषद् वेदों के भी मॅन्युस्क्रिप्ट उपलब्ध है ... किंतु संहिता के तत्कालीन समांतर अपेंडिक्स ॲनेक्जर के रूप मे निघंटु होने का कोई अस्तित्व या प्रमाण नहीं मिलता है 


सबसे प्राचीन निघंटु, धन्वंतरी निघण्टु भी आठवी शती का माना जाता है 


तो उसके पहले तो सारी संहितायें लिखकर पूर्ण हो गयी थी ... फिर भी औषधे द्रव्य के गुणकर्मों के वर्णन का कही पर अस्तित्व तथा आवश्यकता दिखाई नही देती है


 अभी तो डायरेक्टली औषधी के वनस्पतीयों के गण का समूह का गुण कर्म वर्णन उपलब्ध होता है जसे की महाकषाय गण या उस उस रोग की चिकित्सा अधिकार में विविध कल्पों का कषाय क्वाथ अवलेह स्नेह इत्यादि का वर्णन तो उपलब्ध है


क्या द्रव्य के गुण कर्म वर्णन की & निघण्टु की आवश्यकता ही नही है??🤔⁉️ 


संभवतः नही ही है 

क्योंकि गणों के अध्याय के अंत मे, जो उचित लगे उसको जोडिये, जो अनुचित लगे उसको छोडिये, ऐसा श्लोक आता है 


इसका अर्थ यह होता है कि द्रव्य का महत्व उतना नही है, जितना की उसमें धारण किये हुये गुण कर्म का है


आज व्यवहार मे सबसे पॉप्युलर उपलब्ध और फॉलो किया जाने वाला निघंटु देखा जाये तो वो भावप्रकाश है, जिसका प्रारंभ करते समय, हरीतकी के गुणकर्म वर्णन के प्रसंग मे यह स्पष्ट रूप से लिखता है की ... 

इसमे कोई शास्त्रीयता = व्हाय & हाऊ why & how ढूंढने का प्रयास न करे ... जो भी द्रव्य का गुणकर्म है वह "प्रभाव से" होता है ... उसमे कारण मीमांसा , नये से , शिष्य के बोधन के लिए , करना आवश्यक & उपयोगी दोनो नही है, "जो है, वो लिख दिया है" ... 

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स्वादुतिक्तकषायत्वात्पित्तहृत्कफहृत्तु सा |

कटुतिक्तकषायत्वादम्लत्वाद्वातहृच्छिवा ||✅

पित्तकृत्कटुकाम्लत्वाद्वातकृन्न कथं शिवा |🤔⁉️

प्रभावाद्दोषहन्तृत्वं सिद्धं यत्तत्प्रकाश्यते |😇

हेतुभिः शिष्यबोधार्थं नाऽपूर्वं क्रियतेऽधुना ||🙊

कर्मान्यत्वं गुणैः साम्यं दृष्टमाश्रयभेदतः |

यतस्ततो नेति चिन्त्यं 🤐😵‍💫😷🥴🙄😳 = hence & therefore ... why & how ... should not be "pondered" upon


इसका अर्थ यह होता है कि द्रव्य गुण यह शास्त्र न होकर , केवल "कॉपी पेस्ट" के रूप मे लिखा गया है ... तो निघंटु का सारा अस्तित्वही "कुछ किये बिना" सीधा कॉपी पेस्ट किया है, ऐसा लगता है! 


क्योंकि सितोपलादी के गुणकर्म वर्णन मे शार्ङ्गधर ने जो गडबडी करके रखी है ... वह चरक के राजयक्ष्मा चिकित्सा के श्लोक नंबर 104 & 105 का इंटरमिंगलिंग है ... इसके संदर्भ मे हमने सविस्तर व्हिडिओ पहले ही प्रसिद्ध किया है ... जिसकी लिंक आगे दी है ... उत्सुक जिज्ञासू पड सकते है और इस संदर्भ मे अधिक ज्ञान प्राप्त कर सकते है ...

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https://youtu.be/dFOWohsMAnk?si=0OMtNQz405OL1mhU


तो कहने का मूल उद्देश यह है की द्रव्य गुण और निघंटु की आवश्यकता उपयोगिता और महत्व, संहिताकारों को कभी लगा ही नही ... इसलिये संपूर्ण संहिता मे आपको औषधियों के गुण कर्म का वर्णन प्राप्त होता नही और इसलिये चरक भी "योगज्ञान" जिसे है , उसको ही श्रेष्ठ समजता है

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योगवित्त्वप्यरूपज्ञस्तासां तत्त्वविदुच्यते ।

किं पुनर्यो विजानीयादोषधीः सर्वथा भिषक् ॥

योगमासां तु यो विद्याद्देशकालोपपादितम् ।

स ज्ञेयो भिषगुत्तमः ॥

Wednesday, 7 January 2026

हिंदी भाषा में # संहिता-उल्लेखित त्रिविध अथवा शार्ङ्गधर-उल्लेखित पंचविध पाक, उनका प्रयोजन, घन-सार, रसशास्त्र तथा दैनन्दिन स्वयंपाक रसोई गृह्य पाककर्म

संहिता-उल्लेखित त्रिविध अथवा शार्ङ्गधर-उल्लेखित पंचविध पाक, उनका प्रयोजन, घन-सार, रसशास्त्र तथा दैनन्दिन गृह्य पाककर्म स्वयंपाक रसोई**

picture credit ChatGPT AI**

🖊⌨️ **लेखक :** वैद्य हृषीकेश बालकृष्ण म्हेत्रे

एम.डी. आयुर्वेद, एम.ए. संस्कृत

९४२२०१६८७१

आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे (रविवार) एवं नाशिक (मंगलवार से शुक्रवार)


**२७.१२.२०२५ शनिवार**


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### **१.**


स्नेहपाक को त्रिविध जानना चाहिए — मृदु, मध्यम और खर।

खरपाक अभ्यंग के लिए स्मरण किया गया है; मृदुपाक नस्य के लिए।

मध्यमपाक पान और बस्ति के लिए प्रयोज्य है।


☝🏼 **चरक संहिता**


तीन पाक होते हैं — **मृदु, मध्यम, खर**।


इनमें से **केवल “मध्यम पाक” ही आन्तरिक उपयोग हेतु स्वीकार्य एवं उपयोगी प्रतीत होता है।**


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### **२.**

Picture credit Google Gemini AI


शार्ङ्गधर में उपर्युक्त तीन के साथ दो अन्य पाकों का वर्णन मिलता है।


स्नेहपाक यदि जल जाता है तो दग्ध-पाक होता है, जो दाहकारक एवं निष्प्रयोजन है।


आम-पाक वीर्यहीन होता है, जठराग्नि का क्षय करता है और गुरु होता है।


शार्ङ्गधर में इसके अतिरिक्त, आम-पाक का अर्थ यह भी है कि **औषधि में जलांश शेष रहता है।**


अतः आम-पाक **गुरु = कठिन पाच्य एवं जठराग्नि को दुर्बल करने वाला** होता है।


और **दग्ध-पाक** का अर्थ है — अग्नि की अधिकता (काल या मात्रा में) के कारण, जलांश के साथ-साथ **औषध द्रव्य भी जलकर नष्ट हो जाता है**।

इसलिए दग्ध-पाक **निष्प्रयोजन एवं दाहकारक** होता है।


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### **३.**


यद्यपि प्रथम दृष्टि में ये त्रिविध या पंचविध पाक केवल स्नेहकल्पना के लिए प्रतीत होते हैं, **वास्तव में ये सभी औषध कल्पनाओं पर लागू होते हैं** — अर्थात् अरिष्ट, अवलेह, गुटी, वटी एवं क्वाथ पर भी।


इतना ही नहीं, आधुनिक **कल्प = शर्करा कण (जैसे प्रसिद्ध शतावरी कल्प)** भी इसी के अंतर्गत आते हैं।


और गुटी-वटी निर्माण में भी **बलाधान प्रक्रिया हेतु यह आवश्यक है**।


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अग्नियों द्वारा पकाकर जब रस निकल जाए, तब उसे “अनुपदग्ध” रूप में ग्रहण करना चाहिए।

(चरक चिकित्सा १/३/३)


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### **४.**


चाहे स्नेह हो या अन्य कोई औषध निर्माण, **यदि थोड़ा भी जलांश शेष रहता है**, तो कुछ ही घंटों/दिनों में खट्टा गंध, किण्वन, सड़न, फफूँद, कवक वृद्धि होकर वह **“फेंकने योग्य”** हो जाता है।


अतः **आम-पाक त्याज्य है।**


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### **५.**


और मृदु-पाक, उससे अत्यन्त समीप होने के कारण, **केवल नस्य के लिए ही उपयुक्त माना गया है**, क्योंकि नासिका एक कोमल, संवेदनशील, मर्म-सदृश स्थान है।


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### **६.**


दग्ध-पाक में **औषध स्वयं जल जाती है**, अतः वह निष्प्रयोजन एवं अनुपयोगी हो जाती है, इसलिए त्याज्य है।

और यदि प्रयोग किया जाए तो निश्चित रूप से दाह उत्पन्न करेगी, क्योंकि वह **विदग्ध अवस्था** में होती है — जली हुई, भस्मीकृत, चूर्णवत।


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### **७.**


खर-पाक, दग्ध-पाक से ठीक पूर्व अवस्था है; परंतु उसके समान उसमें भी दोष, वीर्य हानि एवं क्रिया-दुष्प्रभाव संभव हैं।

इसलिए उसका प्रयोग **केवल बाह्य उपचार, जैसे त्वचा अभ्यंग** के लिए कहा गया है — और वह उचित एवं समझने योग्य है।


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### **८.**


इस प्रकार प्रारम्भ के दो — **आम + मृदु**, और अंतिम के दो — **खर + दग्ध**,

या तो जलांश शेष रहने के कारण, या औषध जलने के कारण, **अधिक स्वीकार्य नहीं हैं**।


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### **९.**


अतः आन्तरिक उपयोग — अर्थात् पान, सेवन, निगलन एवं बस्ति — के लिए **केवल मध्यम-पाक**, जिसे अन्य ग्रन्थों में **“चिक्कण-पाक”** भी कहा गया है, वही उपयुक्त है।


यही वह बिन्दु है जहाँ **जल समाप्त होने और औषध जलने के बीच की अत्यन्त सूक्ष्म, अदृश्य, निर्णायक रेखा** होती है, जहाँ हाथ से अग्नि नियंत्रित कर ठीक उसी क्षण रोक पाना लगभग असम्भव है।


इसी कारण मध्यम/चिक्कण-पाक में मृदु से खर तक **सीमित मान्य विचलन** स्वीकार किया गया है — मानव त्रुटि के कारण — परन्तु वह आदर्श नहीं है।


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### **१०.**


संक्षेप में, जल माध्यम से औषध निर्माण में —

**यदि जल शेष → आम = गुरु, वीर्य अपूर्ण निष्कर्षण, जठराग्नि हानि।**


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### **११.**


दूसरी ओर, जल पूर्णतः समाप्त होने के बाद भी यदि अग्नि चलती रही और औषध जल गई — तो वह निष्प्रयोजन एवं दाहकारक हो जाती है।


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### **१२.**


आम-पाक और पूर्ण आदर्श मध्यम-चिक्कण-पाक के बीच **मृदु-पाक सीमित स्वीकार्य** है।


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### **१३.**


पूर्ण मध्यम-चिक्कण-पाक और दग्ध-पाक के बीच **खर-पाक केवल बाह्य उपयोग हेतु सीमित स्वीकार्य** है।


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### **१४.**


आधुनिक उन्नत औषध निर्माण उद्योग निश्चित रूप से **औषध जलने से ठीक पहले के क्षण** को पहचानकर, अग्नि को सटीक रूप से रोक सकता है।


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### **१५.**


अन्यथा, यदि जलांश शेष रहा, चाहे गुटी-वटी हो, स्नेह हो, या आसव-अरिष्ट — **कुछ ही दिनों में खट्टा गंध एवं फफूँद उत्पन्न हो जाती है।**


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### **१६.**


यदि जल के साथ औषध भी जल गई, तो क्वाथ घन-सार की ओर जाता है; परंतु अनेक लोग अनुभव करते हैं कि ऐसा घन-वटी बाद में चिपचिपा या नरम हो जाता है।

अतः घन-सार वास्तव में क्वाथ का **दग्ध-पाक अथवा कम से कम खर-पाक** है — आन्तरिक उपयोग हेतु नहीं।


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### **१७.**


यदि शर्करा-आधारित कल्प दग्ध-पाक में चला जाए, तो **उससे बड़ा मानसिक कष्ट कुछ नहीं**!

कण निर्माण के समय मन्द अग्नि एवं निरन्तर चलाना अत्यन्त कौशलसाध्य है — अन्यथा वह पत्थर-सा कठोर हो जाता है।


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### **१८.**


यदि स्नेह-कल्पना दग्ध-पाक में चली जाए, तो **तेल पर जले हुए काले कण तैरने लगते हैं।**


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### **१९.**


यदि आसव-अरिष्ट खर-पाक में चला जाए, तो वह **विदग्ध = शुक्त (खट्टा)** हो जाता है।


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### **२०.**


केवल औषध निर्माण में ही नहीं, बल्कि पाचन में भी **विदग्ध अजीर्ण का उपचार वमन है।**

पित्तप्रधान होने पर भी विरेचन नहीं कहा गया — अर्थात् उसे ऊपर की ओर बलपूर्वक निकालना होता है।


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### **२०-अ.**

Picture credit ChatGPT AI 


यही **दो और तीन = पाँच पाक**, प्रतिदिन त्रिकाल, स्वयंपाक करते समय भी —

**रोटी, भाजी, दाल-चावल, पुरण, कुरडई, भजिया, शंकरपाले, अनारसे, यहाँ तक कि ऑमलेट और पिज़्ज़ा** —

इन सभी में भी दिखाई देते हैं।


इसका अनुभव **हर खाने वाले ने**, और वास्तव में **विशेष रूप से हर पकाने वाले ने** किया होता है।


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### **अस्वीकरण**


लेखक पूर्णतः निरपवाद होने का दावा नहीं करता।

ये व्यक्तिगत दृष्टिकोण एवं समझ हैं; त्रुटियाँ सम्भव हैं और स्वीकार्य हैं।