Friday, 19 June 2026

धातु"पाचक" होते ही नही है!

धातु"पाचक" होते ही नही है!

The king is Naked ... The Parrot is Dead
राजा निर्वस्त्र है ... तोता मर गया है
Picture credit Chatgpt AI 

लेखक ✍🏼 : 

वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे, 

एम डी आयुर्वेद संहिता, 

एम ए संस्कृत. 

आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे & नाशिक. 

मोबाईल 9422016871


विषमज्वर कषाय पंचक को, "धातुपाचक" ऐसा "कहकर समझकर" व्यवहार करना, अत्यंत "अशास्त्रीय अनार्ष प्रक्षिप्त असत्य असिद्ध" है!


यह लेख पढने से पहले मूल चरक संहिता आपके पास उपलब्ध है और आपने च चि 3 ज्वर चिकित्सित अध्याय ओपन करके रखा है , यह सुनिश्चित करे


सद्यकालीन व्यवहार इस प्रकार से है की


कलिङ्गकाः पटोलस्य पत्रं कटुकरोहिणी ॥२००॥ = संततज्वर = रस पाचक


पटोलः सारिवा मुस्तं पाठा कटुकरोहिणी । = सततज्वर = रक्तपाचक


निम्बः पटोलस्त्रिफला मृद्वीका मुस्तवत्सकौ ॥२०१॥ = अन्येद्युष्क = मांसपाचक 


किराततिक्तममृता चन्दनं विश्वभेषजम् । = तृतीयक = (मेदोपाचक ऐसा शब्द संस्कृत भाषा मे सिद्ध नही होता है क्योंकि विसर्ग के आगे प आ जाये तो विसर्ग का ओ नही होता है उपध्मानीय होता है इसलिये) = मेदःपाचक! किंतु जो "धातुपाचक" जैसे अस्तित्वहीन & अशास्त्रीय संज्ञा का निर्माण और प्रयोग कर सकते है , उनको मेदोपाचक गलत है और मेदःपाचक यह शब्द उचित है, इतना ज्ञान होगा ऐसे संभव ही नही!)


गुडूच्यामलकं मुस्तमर्धश्लोकसमापनाः ॥२०२॥ = चतुर्थक = अस्थिमज्जापाचक 


कषायाः शमयन्त्याशु पञ्च पञ्चविधाञ्ज्वरान् ।

सन्ततं सततान्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकान् ॥२०३॥

👆🏼

प्रस्तुत इन उपरोक्त तीन श्लोकों में कही पर भी "क्रमात्" यह शब्द लिखा हुआ नही है. यद्यपि "क्रमात्" ऐसा शब्द इसमे लिखना अनुष्ठुभ् छंद की दृष्टि से संभव है, तथापि "नही लिखा" है 


और इन 3 श्लोक मे "शमयन्ति" ऐसा शब्द है "पाचयन्ति" ऐसा शब्द नही है !


विषमज्वर में आम की उपस्थिती नही होती है, किसी पाचन की आवश्यकता होती ही नहीं, इसलिये "शमन कषायों" को, मूढबुद्धि की तरह, धातु"पाचक" संज्ञा देकर व्यवहार मे लाना, यही मूलतः अशास्त्रीय है!


आपको ब्रेन वॉशिंग या मेंटल कंडिशनिंग हुआ है कि धातुपाचक उस धातु पर काम करते हैं... मूलतः धातुपाचक पर क्रिटिकली विचार करना चाहिए, श्रद्धा से नहीं।


एक ज्येष्ठ वैद्य का धातुपाचक के बारे में वीडियो सुना, उसमें उन्होंने धातुपाचक कषाय (या मूल बायवारू के लेख का नाम ज्वरपंचक कषाय), यह रूक्ष तेज के संदर्भ में आए हैं, ऐसा बताया।


मूलतः, वे श्लोक ठीक से पढ़े 

चरक चिकित्सा 3 / 200 से आगे 203 तक, 

तो यह संपूर्ण छह पंक्तियों का, 

तीन श्लोकों का भाग स्पष्ट रूप से "प्रक्षिप्त" है ऐसा निश्चित होता है।


इति क्रिया"क्रमः" सिद्धो ज्वरघ्नः सम्प्रकाशितः ॥१७७॥

येषां त्वेष "क्रमः" तानि द्रव्याण्यूर्ध्वमतः शृणु ।


ऐसा कहकर जिस क्रिया"क्रम" का तात्विक उल्लेख चरक संहिता चिकित्सा 3 में होता है, उस तात्विक "क्रम" से, आगे द्रव्य = कषाय/कल्प आए हैं।


उस मूल 139 से शुरू होने वाले, तात्विक "क्रम" में विषमज्वर बहुत ही बाद में, करीब करीब अंत में है.


और 160 श्लोक कषाय पान (क्रिया"क्रम") बताता है। 


"प्रत्यक्ष कषाय वर्णन" 197 पर आता है।


और "विषमज्वर नाशना" यह श्लोक क्रमांक 297 यहाँ है। 


उसके बाद फिर 315 पर धातुगतज्वर के कषाय आते हैं या उपचार आते हैं, ऐसा स्पष्ट "अच्छा क्रम" होते हुए.. 


श्लोक 197 पर , "सामान्य ज्वर" के योग चालू होते हुए, "बीच में ही असंबद्ध", "अप्रस्तुत", "क्रमभंग" करके ऐसे 200 से 203 श्लोक आते हैं, वे "प्रक्षिप्त" ही है! ... क्योंकि 297 पर प्रतिज्ञा = विषयप्रस्तावना करके , फिर उसके पश्चात ही, "विषमज्वर नाशना" योग हैं।


यह, "निदान क्रम से विसंगत" (inconsistent/non concurrent), विषय "क्रमभंग" वाग्भट में भी हमें मिलता है, अहृचि1/श्लोक 48-50।


और वह "रूक्ष तेज ज्वरकर" यह आगे, "स्नेहवध्य अनिल" के अनुरोधानुसार (in the context of) "जीर्णज्वर में घृतपान" के लिए आए श्लोक हैं, उसका उस "तथाकथित धातुपाचक" श्लोकों से थोड़ा भी संबंध नहीं है।


तथाकथित स्थापित ट्रेड, व्यापार, व्यवसाय, धंधा इसमें जमे हुए, जमाए हुए, गलतफहमियां फैलाए हुए, ऐसे यह सब "धातुपाचक" नाम के जो स्थापित कल्प हैं, उनका संबंध धातुओं से नहीं है, विषमज्वरों का संबंध भी "एक से एक = 1:1 =one is to one" ऐसा धातुओं से निश्चित दृढ (firm & fixed) नहीं है!


पाँच (5) विषमज्वर और छह (6) धातु इनका एक-दूसरे से कोई संबंध स्थापित नहीं होता है।


यह छह धातुओं से, "एक को एक = 1:1" इस पद्धति से बंधे हुए नहीं हैं। 


1.

संतत रस में न होकर वह द्वादश आश्रय = 12 भावों के आश्रयों से होता है ...

द्वादशैते समुद्दिष्टाः सन्ततस्याश्रयास्तदा ।


2.

तो संततज्वर रक्त, मांस दोनों जगह हो सकता है 


3

और अगले तीन ज्वर अगले-पिछले दो-दो धातुओं में इधर-उधर खिसक सकते हैं, 


4.

ऐसी चरक की स्वयं की श्लोकों में स्पष्टोक्ति है।

👇🏼

अन्येद्युष्कं ज्वरं कुर्यादपि संश्रित्य शोणितम् ॥६५॥

मांसस्रोतांस्यनुगतो जनयेत्तु तृतीयकम् ।

संश्रितो मेदसो मार्गं दोषश्चापि चतुर्थकम्


5.

ऐसा होते हुए, केवल एक लेख में, अत्यंत कम रोगी संख्या पर रखे गए, एक संभावित निरीक्षण के कारण, इतना प्रचंड ढांचा (structure) दृढ़ आत्मविश्वास से खड़ा करना, यह अत्यंत अशास्त्रीय है, 


और यह केवल परंपरागत विवशता (helplessness) और कोई भी शास्त्रीय आधार न रखने वाली … श्रद्धा, भक्ति, आरती, कीर्तन, गोंधळ, भारुड (folk performances) ऐसी अज्ञानी लोगों की भीड़ (gathering) है।



उसमें उन्हें सिर्फ सकारात्मक (affirmative) विधान ही पसंद आते हैं!!! 


जब कोई उससे प्रश्न पूछे, उसे कोई अस्वीकार करे / रिव्हॅलिडेट / व्हेरिफाय / चॅलेंज करे कि, ऐसा इन लोगों का पित्त भड़कता है! कि यह सारी पारंपरिक शरणागत गतानुगतिक मंडली हिंसक, आक्रमक, अतिरेकी हो जाती है!! 


शास्त्र का अध्ययन करते समय भावना, परंपरा, श्रद्धा, भक्ति को एक तरफ रखकर, सीधा व्यवहार देखें, क्या संदर्भ हैं वह ठीक से पढ़ें।



कोई एक हाँऽऽऽऽ बोले, इसलिए उसके सुर में सुर मिलाकर सबको गला निकालना (cry out/agree) बंद करना चाहिए, यह सीधा साधा विचार किसी को भी नहीं सूझता। 


एम्परर विथ नो क्लाॅथ्स, यह जो एक प्रसिद्ध प्रकार है, वह अपने यहाँ आयुर्वेद क्षेत्र में बहुत ही अधिक है!!! एक बार किसीने "अहो रुपम्" कहा तो बाकी सबको “अहो ध्वनि” कहना है 🙆🏻‍♂️🤦🏻‍♂️


अरे , लेकिन वह मूल मुद्दा, सच में, उतनी योग्यता का, पात्रता का, मूल्य का है क्या, यह एक बार तो, खनखनाता सिक्का है या नहीं, जाँच कर देखने में क्या आपत्ति है???


केवल परंपरा के नाम पर, व्यवसाय हो रहा है इसलिए, रगड़ते बैठना (continuously practicing it), यह ... कम से कम, जिन्हें संहिताएँ समझती हैं, संस्कृत समझता है, वर्षों से सिखाया है, वर्षों से पेशेंट देखे हैं... उन्हें तो विचार चिंतन अध्ययन करना चाहिए... ✅️


6.

एक बार तो साहस करके, एक बार तो अकेली (single drug) वह क्या कैसी "धातुपाचकें" है, उनका उपयोग करके, दो चार रिजल्ट लेकर दिखाओ। खालमुंडी पाताळ धुंडी (deeply engrossed/overly focused) प्रकार चल रहे होते हैं बस।

👇🏼

On a lighter note...

ये क्या जगह है दोस्तों,

ये कौन सा दयार है

हद-ए-निगाह तक जहां

गुबार ही गुबार है ...

ये क्या जगह है दोस्तों 🤔

https://youtu.be/GW-nYoihQaY

👆🏼

After 10 years ... reading & writing, in various Ayurveda groups 😇


7.

... और क्या वह "मीमांसा शास्त्र" के आधार पर एक्स्प्लेनेशन किया, इसलिए उसकी प्रशंसा करनी है ??? 

किसे समझता है मीमांसा शास्त्र!? 

जिन्हें मीमांसा शास्त्र नहीं समझता, उनके सामने कितना भी आप बताएं तो भी, उन्हें आप सच बता रहे हैं या झूठ, गलत या सही, उचित या अनुचित, अपूर्ण या संपूर्ण (complete) यह कैसे मालूम पड़ेगा ???


इंग्लिश समझने वाले सब लोगों के सामने कोई मराठी में जाकर शुद्ध मराठी ज्ञानेश्वरी का निरूपण बताए कि ऐसा है तो, क्या वह इंग्लिश लोगों को मालूम पड़ेगा कि, आपने गलत बताया या सही?


इसलिए वह क्या, जो मूल लेख हैं, वह मीमांसा शास्त्र के अनुसार बताए, उससे हमें क्या फर्क पड़ता है ??? 


8.

आयुर्वेद के नियमानुसार, आयुर्वेद की संहिता श्लोक, विषय, अधिकरण, क्रमांक के अनुसार, यह तथाकथित ज्वरपंचकषाय = "धातु पाचक" कहलाने वाले श्लोक प्रक्षिप्त हैं ...


9.

और प्रक्षिप्त न भी हों …

तो भी उन्हीं श्लोकों से ...

अमुक कषाय = अमुक धातु के लिए, 

ऐसा 1:1 सिद्ध नहीं होता... 


10.

क्योंकि मूलतः ही पाँच विषमज्वर ये, अमुक पाँच(/छह 🙃😇) धातुओं से एक को एक 1:1 सुसंगति से होते हैं, ऐसा शास्त्रीय रूप से लिख रखा ही नहीं गया है।


द्वादशैते समुद्दिष्टाः सन्ततस्याश्रयास्तदा ।

अन्येद्युष्कं ज्वरं कुर्यादपि संश्रित्य शोणितम् ॥६५॥

मांसस्रोतांस्यनुगतो जनयेत्तु तृतीयकम् ।

संश्रितो मेदसो मार्गं दोषश्चापि चतुर्थकम्


इस अनुसार तो, वह अनिश्चित (randomn) ऐसा ही है।


11.

खैर, उसके भी परे, पिछले 20,30,50,70 वर्षों में किसने विषमज्वर देखे है?? 

टेंपरेचर आने के बाद वह कितने इंटरवल से आते हैं ??

एक दिन छोड़कर, दो दिन छोड़कर ...? 

इतना देखने के लिए पेशेंट के पास समय/संयम कहाँ है??? 

तब तक वह काउंटर पर जाकर पेरासिटामोल लेकर आता है! 


12.

नहीं तो ... "चरकस्तु चिकित्सिते" कहने वाले सारे आयुर्वेदिक वैद्य ट्रिकी 😬 देते हैं!!! 😆🤣 (कौन से तीन भुवनों में कीर्ति फैली उस ट्रिकी की, किसे पता??? 

पड़ोस की 10 सोसाइटी में पूछा तो एक को भी त्रिभुवन कीर्ति नहीं मालूम... और कहें त्रिभुवन कीर्ति... यह तो आश्चर्य की बात है 👎🏼)

तो ट्रिकी दे देते हैं... 


13.

इसलिए पेशंट और वैद्य यह दोनों ओर से, इस प्रकार का दीर्घकालीन इंटरवल रहकर, विषमज्वर निदान होना, यह मूलतः संभव ही नहीं है... 

वहाँ आप उसके ऊपर के ज्वर पंचक कषाय उपयोग करेंगे और फिर वह सिद्ध होगा... 

यह बऽऽऽऽऽऽहुत दूर की बातें... 

इन जैसी सारी आश्रयासिद्ध (unproven/dependent on unproven ground) बातों पर ढाँचे खड़े करना, हम कब बंद करेंगे , कौन जाने!!!


14.

बाकी... लेख, विशेषांक (special issue), रिसर्च पेपर, वेबिनार, सेमिनार, निरूपण के लिए यह चलने दीजिए। उसके लिए यह सब चलन वाला सिक्का (currency), पर्याप्त खाद्य, कागजी घोड़े के रूप में ठीक है 😬😇🙃


15.

मूलतः गड़बड़ी ऐसी है कि ...

जिनके शमन के लिए यह पाँच कषाय आए हैं (धातु "पाचक" "कहे" जाने वाले)

वह जो पाँच विषमज्वर हैं

वह अमुक धातु में, अमुक ही विषमज्वर होता है, ऐसा भी निश्चित नहीं है

इसलिए "अमुक कषाय" यह "अमुक धातु के लिए है”, ऐसा ही "मूलतः निश्चित नहीं है"


16.

देखें 

👇🏼

दोषा गुरवो रसवाहिभिः ॥५३॥

सर्वदेहानुगाः स्तब्धा ज्वरं कुर्वन्ति सन्ततम् ।


संतत में , रसवह स्रोतस् के द्वारा, पूरे देहभर जाते हैं ... सिर्फ रसधातु नहीं


द्वादशैते समुद्दिष्टाः सन्ततस्याश्रयास्तदा ।


संतत "सिर्फ रस में नहीं" ... बल्कि 12 भावों में होता है


17.

रक्तधात्वाश्रयः प्रायो दोषः सततकं ज्वरम्


रक्त = संतत ✅ ऐसा लगेगा 


लेकिन आगे देखें

अन्येद्युष्कं ज्वरं कुर्यादपि संश्रित्य शोणितम् 😇


18.

फिर और विचित्र बाद देखिये

अन्येद्युष्कं ज्वरं दोषो रुद्ध्वा मेदोवहाः सिराः ॥६३॥


अन्येद्यु = मांस ❌️ 😇 मेद ✅️😬 ... 

तो फिर अब, मांसपाचक, ठीक कौन सा 🙃🤔❓


19.

सप्रत्यनीको जनयत्येककालमहर्निशि ।

दोषोऽस्थिमज्जगः कुर्यात्तृतीयकचतुर्थकौ ॥६४॥


अस्थि मज्जा = तृतीयक & चतुर्थक both ✅️= मेद नहीं है क्या?... 


20.

तृतीयक चतुर्थक ये दोनों अस्थि मज्जा से यानी दोनों से होते हैं , 

या एक अकेले , एक एक से, क्या पता???


21.

गतिद्‌र्व्येकान्तराऽन्येद्युर्दोषस्योक्ताऽन्यथा परैः ।

अन्येद्युष्कं ज्वरं कुर्यादपि संश्रित्य शोणितम् ॥६५॥

अन्येद्यु = रक्त ✅️, मांस ❌️


22.

मांसस्रोतांस्यनुगतो जनयेत्तु तृतीयकम् ।

तृतीयक = मांस✅️ मेद❌️


23.

संश्रितो मेदसो मार्गं दोषश्चापि चतुर्थकम्

चतुर्थक = मेद✅️ अस्थिमज्जा❌️


👆🏼

ऐसे उपलब्ध "अधिकृत संदर्भों" के कारण ...

जो प्रचलित "यह काढ़ा और यह धातु", 

ऐसी स्थापित व्यवस्था है, 

वह वैसी सुसंगत एवं शास्त्रीय संदर्भ अनुसार योग्य नहीं है, 

यह ध्यान में आएगा ही।


24

किसके रिजल्ट आते हैं?? कैसे??? 

उसका ऑब्जेक्टिव्ह असेसमेंट है क्या? 

अकेला धातुपाचक single drug उपयोग किया क्या?? 

पेशेंट की संख्या कितनी??? 

निदान निश्चिति "धातु" इस स्वरूप में ही, की गई थी क्या??? 

धातु पाचक के रूप में जो कुछ अभी मान्य है, उसके अतिरिक्त, उसके साथ में, अन्य कोई कल्प दिए थे क्या??? 

जो रिजल्ट आए , उसका कालावधि कितना???

लक्षणों का रिकरन्स हुआ अथवा नहीं हुआ, इसका डाटा कितना??? 

तभी यह बोलना चाहिए... कि, फैंटैस्टिक रिजल्ट आते हैं... पेशंट को बहुत अच्छा लगा... यह तो सब्जेक्टिव्ह है ... सब बेकार का ... असिद्ध!!


25.

वह हम वर्षों से, पीढ़ियों से करते आए हैं... उसका कोई अर्थ नहीं... उससे शास्त्र की कोई प्रगति और समृद्धि नहीं होती... कृपा करके ऐसे भोंगळ (hollow/vague) और सब्जेक्टिव्ह साँचे से हम अब तो बाहर निकलें, कम से कम इस पीढ़ी ने तो!


26.

धातुपाचक तो होते ही नही है ... यह अनेको बार ससंदर्भ सतर्क स्पष्ट करने के बाद भी, विषमज्वर कषाय पंचक को धातुपाचक समझकर, व्यवहार करने की भ्रांती नष्ट नही होती है.



27.

अगर हम औषधों को केवल "बेचने" के साथ हि, औषध "सोचने" पर काम करेंगे तो ... linking ourself with scientific thinking, will be surely possible



28.

कषायाः शमयन्त्याशु पञ्च पञ्चविधान् *क्रमात्* (~ज्वरान्~) ।


सन्ततं सततान्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकान् ॥


चरक👆🏼




पञ्चैते सन्ततादीनां पञ्चानां शमना *क्रमात्* (~मताः।~)


वाग्भट 👆🏼




मूल श्लोक/ चरण लिखते समय "क्रमात्" यह शब्द लिखकर, स्पष्ट रूप से, "अमुक कषाय ... अमुक विषमज्वर के लिए" ऐसा लिख सकते थे✅️, लेकिन ऐसे लिखा हुआ नही है 



29.

और तो और ज्वर चिकित्सा वर्णन का क्रम भंग इन श्लोकविन्यास मे हुआ है , इसको पुन्हा एक बार सुसंगत सविस्तर संदर्भ और सतर्क प्रस्तुत करते है 




ये ⬆️ मै नही कहता, किताबों 📖📚 में लिखा है, यारो ...



30.

चरकोक्त विषमज्वर कषाय पंचक का, किसी भी धातू के साथ, निश्चित संबंध नही है, यह हमने स्पष्ट कर दिया है ... *चरक संहिता के ही संदर्भों के अनुसार!* 



31.

चरक के विषमज्वर यह धातु मे दोष का प्राबल्य इस संकल्पना पर आधारित है.



32.

इस कारण से संततादी पाच ज्वरों का निश्चित धातु अधिष्ठान वहां पर निर्धारित हि नही है



33

चरक की निम्नोक्त पंक्तिया देखेंगे, तो ये पता चलता है कि कौन सा भी विषमज्वर, किसी भी धातु मे आश्रित होकर निर्माण हो सकता है.

👇🏼

रक्तधात्वाश्रयः प्रायो दोषः सततकं ज्वरम् 


रक्त = सतत ✅️


अन्येद्युष्कं ज्वरं दोषो रुद्ध्वा मेदोवहाः सिराः ॥


अन्येद्युष्क = मेदस् 🤔⁉️ मांस ❌️


दोषोऽस्थिमज्जगः कुर्यात्तृतीयकचतुर्थकौ 


तृतीयक = अस्थिमज्जा 🤔 ⁉️ मेदस् ❌️


अन्येद्युष्कं ज्वरं कुर्यादपि संश्रित्य शोणितम् ॥


अन्येद्युष्क = रक्त 🙃😇🤔⁉️ मांस ❌️


मांसस्रोतांस्यनुगतो जनयेत्तु तृतीयकम् ।


तृतीयक = मांस 🤔⁉️ मेदस ❌️


संश्रितो मेदसो मार्गं दोषश्चापि चतुर्थकम् 


चतुर्थक = मेदस् 🤔 ⁉️ अस्थिमज्जा ❌️


34.

और तो और चरक संहिता मे हि,


संततज्वर केवल रसधात्वाश्रित न होकर, 


(संतत = रस ❌️)


संतत द्वादशाश्रयी ज्वर है ✅️ 

12 भाव आश्रय ✅️


संतत = 12 भाव = 7 धातू + 2 मल + 3 दोष


द्वादशाश्रयी का अर्थ केवल रसके साथ नही, अपितु द्वादश✅️ = 7 धातू 2 मल 3 दोषों के साथ जुडा है , ऐसे लेना चाहिए 


यथा धातूंस्तथा मूत्रं पुरीषं चानिलादयः ॥


द्वादशैते समुद्दिष्टाः सन्ततस्याश्रयास्तदा ।✅️


द्वादशेति सप्त धातवस्त्रयो दोषा मूत्रं पुरीषं च।


35.

उपरोक्त संदर्भ से यह पता चलता है की ,

5 विषमज्वरों का, क्रमशः 5 धातुओं से "निश्चित संबंध" चरक संहिता मे उल्लेखित हि नहीं है. 


36.

तो फिर … शास्त्रीय दृष्टी से , शास्त्रीय संदर्भ के अनुसार तो … अमुक धातू के लिए, अमुक धातू पाचक काढा ऐसे हो हि नही सकता !


37.

जो आज का व्यवहार चल रहा है , यह केवल एक कही सुनी, प्रस्थापित, रूढीजन्य, व्यावसायिक बात है और और इस विषमज्वर का, धातुपाचक का एवं शरीरस्थ धातूओं का कोई भी परस्पर निश्चित शास्त्रीय संबंध कुछ भी नही है ... ❌️🚫⛔️


38

इस कारण से जो आज प्रस्थापित लोकप्रिय , 

*किंतु अशास्त्रीय* एवं _मात्र रूढीजन्य_ धातुपाचक(🤔⁉️) व्यवहार मे उपयोग मे लाये जाते है, उन धातुपाचकों का वस्तुतः शास्त्रीय रूप मे, उस उस धातु से कुछ भी निश्चित संबंध है ही नही है ...नही है … नही है … !


39.

अगर हम औषधों को केवल "बेचने" के साथ हि, औषध "सोचने" पर काम करेंगे तो ... linking ourself with scientific thinking, will be surely possible✅️✅️✅️


40.

गुरुजी बायवारूं के प्रति कितना भी आदर क्यों न हो, उनके द्वारा रखे गए विचार को प्राथमिक कदम मानना चाहिए... अंतिम गंतव्य स्थान नहीं।


41.

आज धातुपाचक नाम की स्थापित संकल्पना और उसका व्यवहार एक असिद्ध अपरिक्षित अभ्युपगम assumed considered believed suposed अध्याहृत स्वीकृत ऐसे विचार पर आधारित है।


42.

भले ही उस मूल लेख में "उपरुग्ण पद्धति से देखा गया" ऐसा कहा गया हो, फिर भी सैंपल साइज़ और फॉलोअप अत्यंत छोटा, अपर्याप्त और अशास्त्रीय है।


43.

बायवारू गुरुजी के अनुभव और उसके पीछे के विचार कुछ भी हों... लेकिन अकेला धातुपाचक देकर उस धातु पर वृद्धि / क्षय के स्वरूप के या गुणांतर के स्वरूप के या वैगुण्य नाशक के स्वरूप के परिणाम, निश्चित रूप से और बार-बार प्राप्त हुए हों, तभी उस विचार को शास्त्रीयता और सार्थकता है।


44.

अन्यथा हम परंपरा से, श्रद्धा से, गतानुगतिक रूप से, पहले वाले उपयोग करते थे, इसलिए अभी के वैद्य... अभी के वैद्य उपयोग करते हैं, इसलिए आगे वाले वैद्य, इस पद्धति से धातुपाचक उपयोग करते हैं।


45.

“Right is right even if no one is doing it; wrong is wrong even if everyone is doing it.


46.

तथाकथित धातुपाचक के इन्क्लुजन और एक्स्क्लुजन के कारण, कुछ विशेष उल्लेखनीय परिणाम मिलते हों, तभी उसे उसका श्रेय देना, शास्त्रीय मानदंडों पर उचित होगा।


47.

अन्यथा व्यवहार, व्यापार, व्यवसाय, बिक्री, मार्केटिंग और लेख लिखना, व्याख्यान देना ... ऐसे अशास्त्रीय परंतु वाणिज्यिक व बोल-घेवड्या (बातूनी) उद्योगों के लिए वह ठीक है... वह वैसा ही चलता रहेगा।


48.

उपरोक्त संदर्भ से यह पता चलता है की …

5 विषमज्वरों का क्रमशः 5 धातुओं से "निश्चित संबंध" चरक संहिता मे उल्लेखित हि नहीं है. 


तो फिर अमुक धातू के लिए, अमुक धातू पाचक काढा ऐसे हो हि नही सकता, शास्त्रीय दृष्टी से , शास्त्रीय संदर्भ के अनुसार तो! 


49.

जो आज का व्यवहार चल रहा है , यह केवल एक कही सुनी, प्रस्थापित, रूढीजन्य, व्यावसायिक बात है और और इस विषमज्वर का, धातुपाचक का एवं शरीरस्थ धातूओं का कोई भी परस्पर निश्चित शास्त्रीय संबंध कुछ भी नही है ... ❌️🚫⛔️


50.

इस कारण से , विषमज्वर कषाय पंचक को धातुपाचक कहकर व्यवहार करना, अत्यंत अशास्त्रीय अनार्ष प्रक्षिप्त असत्य असिद्ध है.


लेखक ✍🏼 : 

वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे, 

एम डी आयुर्वेद संहिता, 

एम ए संस्कृत. 

आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे & नाशिक. 

मोबाईल 9422016871




Friday, 29 May 2026

English: Air Cycling + Spinal Twist = All-round Exercise Complete Exercise ✅️

 

Air Cycling + Spinal Twist = All-round Exercise Complete Exercise ✅️

Aaj mai upar, aasman neeche + Mud mudke "haan" dekh, mudmud ke = All-round Exercise Complete Exercise ✅️

Air Cycling + Spinal Twist = All-round Exercise

✍🏼 Vaidya Hrishikesh Mhetre. MD Ayurveda, MA Sanskrit

Ayurveda Clinics @ Pune And Nashik

Mobile Number 9422016871

05/12/2024



Walking, running, jogging, badminton, cricket, gym, zumba, yoga, swimming, cycling... better, more beneficial, safer and most importantly than all of these, the "all-round exercise means Air Cycling and Spinal Twist."

When, who, how much, in what manner one should and should not perform exercise—its rules and prohibitions (= Do & Don't)—we have seen in brief, yet in a simple, easily understandable manner.

Getting an all-round exercise is definitely necessary and beneficial for the body!

Especially, movements that happen naturally due to enthusiasm, curiosity, inquisitiveness, and the vitality in the body... spontaneous movements = sports, games, fun and frolic, mischief, running around, all of this generally ends when childhood finishes and on the threshold of youth...

And generally, from the time children enter the 9th or 10th standard, their outdoor games, exercise, and physical movements that could happen easily for various reasons, stop due to the expansion of studies and unnecessary pressure; that stopped movement usually never restarts in their future life, this was the case until the previous generation!!!

Now, however, right from an innocent age, a naive and unknowing age, because of having a mobile in hand or a laptop, tab, TV screen constantly in front of them, children's physical movement, exercise, and outdoor games have almost completely stopped!

Some aware and financially wealthy parents put their children on paid sports grounds for an hour or two... but their number is extremely small!!!

Children and adolescents, and even youth of the previous generation, did household chores... absolutely any work that came their way, without any complaints, for the sake of the elders' command... which included sweeping, spreading and removing beddings (because having one's own bedroom kind of luxury did not exist in those days), fetching water in pots, pitchers, and buckets (it wasn't like modern times where you turn on a tap and water flows heavily), standing in lines for groceries, kerosene, rations, gas cylinders and for that, walking or cycling for several kilometers, this was happening in everyone's case!!!

A house having a two-wheeler was rare, and a four-wheeler was mostly just one or two in the entire village... therefore, even in youth or some people even until retirement, used to keep walking or cycling...

In the current generation, however, doing household work is no longer necessary or due to the excessive pampering by parents, boys are out of the question, but even today's girls have absolutely no habit of household work! On the contrary, to them (girls), doing household work feels embarrassing, inferior, aunt-like (kakubai), backward, and a sign of being outdated!

Because of this, at a very young age, many of today's girls are becoming very fat, obese by weight, bulky, awkward, or are suffering from various hormonal diseases. Naturally, their immunity is also very low.

In the previous generation, hoteling and buying food was non-existent in 99% of homes...

Now, however, on weekends, food is not to be cooked at all at home, one has to go out and eat, and even on other weekdays, whenever it suits/as they feel like, according to their own preference, without asking or taking permission from other elders in the house, ordering food online is being seen.

The consumption of nutritious, unadulterated, fresh food cooked by the mother's hand at home has reduced, and the fad of eating purchased, hotel, open-air, roadside, junk, fast, street such "food" has spread everywhere!!!

Because of all this, an epidemic of unnecessary, excessive fat, flabbiness, and obesity is visible everywhere and naturally, due to this, immunity has decreased and hormonal diseases have increased.

Therefore, it is necessary to include certain things in the daily routine of everyone, from children to the elderly, in such a way that they "have to do physical movement."

The moment exercise is mentioned, immediately many people wear expensive shoes, tracksuits and go for jogging, running, cycling, or pay a lot of money to run on a treadmill in an AC gym, lifting all sorts of weights, or paying money to go to classes like zumba and yoga, or on weekends like fools going for trekking on dangerous unknown mountains, running in marathons just because the whole world is running like crazy... such unscientific, directionless, and pretentious types are going on.

However, sufficient necessary exercise for all organs, all muscles, all joints of the body... definitely, safely, and regularly does not happen in any of the above-mentioned types!

Truth be told, in the previous generation, going to the traditional gym (talim) for youth, and even without going to the talim, doing squats (baithak), push-ups (dand), skipping ropes at home, and of course, household work, was sufficient exercise. After marriage and getting settled in a career, everyone from youth to middle age mostly went on foot or by bicycle, so plenty of exercise happened anyway...

But now, the situation is such that sufficient exercise does not happen at any age.

The exercise types that are currently popular and established are either one-sided, meaning they are for one part or organ of the body, or they are such that they become dangerous immediately or over time... such as cricket, badminton, table tennis, running, skipping rope, trekking, climbing forts... in all of these, we do not know what the next movement of which organ, which joint, which muscle is going to be!

This means that in all these exercises/sports; a jerk, shock, unexpected, unplanned movement is likely to happen the very next second!

However, "Exercise = physical activity, this activity should be for stability and increasing strength" (Shareer cheshta ya cheshta sthairyaartha balavardhini)—it should be of this nature...

Meaning, exercise should be such movements of the body that are desired, i.e., expected, safe, and wanted...

And by those movements, the stability = stamina and force, capacity, strength of the body parts must increase!!!

Even in pranayama (= kapalabhati, bhastrika, surya bhedan), undue, unexpected tension, force, pressure, jerk, shock, such health-destroying impacts keep happening on the chest, lungs, respiratory system, heart, blood circulation system and to some extent on our stomach, intestines, navel, and nearby organs.

In yoga asanas too, a certain amount of danger of this nature is possible, because if there is not enough training, enough capacity, enough flexibility in the body parts, joints, and muscles,

then instead of gaining benefit by doing yoga asanas, the possibility of unexpected harm cannot be ruled out...

And in yoga asanas, because of the state "Sthira Sukham Asanam" (steady and comfortable posture), the body can get flexibility; but the body does not get exercise, this is an absolute truth!!!

Today's yoga and today's pranayama, meaning (different pose, posture and breathing exercise), are mostly stationary = devoid of movement!!!

In yoga and pranayama, because sufficient all-round movement of body parts, joints, and muscles does not happen at all...

thinking that by doing yoga and pranayama, we can get the benefits of exercise or reduce weight, reduce sugar, reduce cholesterol, BP...

is an illusion, a misconception, ignorance, and misleading, this should definitely be known and understood...

And one should accept this truth, and not remain in some trance or ignorance.

If an all-round exercise is to be achieved, then instead of the popular exercise of walking...

in reality, "acceptance, establishment, spread, awakening, and encouragement of two types of exercises should happen in the society"!

The first among them, known to all, traditional and yet scientific, multi-utilitarian, and safe type of exercise is Suryanamaskar!!!

But Suryanamaskar does not suit everyone. Especially those who have trouble with pain, swelling, degeneration of the waist, knees, neck, and shoulders, cannot manage to do Suryanamaskar daily for a long duration!!!

Therefore, a very simple exercise that any person of any age can definitely manage ✅️... if these "two types of exercises" are performed daily,

all people of all ages in society... by definitely doing sufficient exercise, will remain continuously healthy, without a doubt!!!

The first type of exercise among these is...

Air Cycling

And the second type of exercise is...

Spinal Twist

Air Cycling means...

walking in the air or doing something like riding a bicycle in the air!

Immediately people say, "Then shall we buy the stationary bicycle available for home or go for cycling daily????... then the answer is... no, absolutely not!!!

Because buying a stationary bicycle for home or going out for cycling exercise, in both these types, our entire body above the waist is "comfortably seated" on the bicycle seat. Moreover, the entire body above the waist is bent forward (forward bending) as usual, whereas in reality, "bending backward = backward bending" (like Suryanamaskar) is necessary + useful!!!

Secondly...

below the waist, only the thigh and calf muscles work in cycling...

and once the bicycle gains momentum, the exercise to the thigh and calf also stops, because the bicycle moves automatically... there is no need to pedal... therefore cycling, whether it is going out for actual cycling to roam around or a stationary bicycle inside the house... these flaws are present in both!

The fat that accumulates, first accumulates on the belly, stomach... then on the waist... then on the seat (hips)... then on the thighs... and finally on the arms, chest, throat!!!

This means, an exercise should happen that puts strain on these organs, which does not happen in a stationary bicycle or going out to do cycling!

On the contrary, where fat does not accumulate at all, those legs are crushed, resulting only in exhaustion = hardship... exercise does not happen... meaning leaving the thief and hanging the saint!!! Where is the fat accumulated???

It is on the thigh, calf, seat, chest, throat, and arms... who is doing the exercise, hardship, and movement???... the calf muscles of the legs... meaning this becomes a situation of 'fire at Rameswaram and fire engine at Someswaram' (treating the wrong place)!!

Therefore, a system where all organs below the waist will definitely get exercise is Air Cycling!!! ✅

For that, just like we always sleep... absolutely in bed or by spreading a mat on the floor or on the sofa, (or if you go for a walk on the ground, then by the side of the track or on some bench there) sleeping flat on your back (supine) as usual, lifting your legs up from the waist, you should literally do "cycling in the air" / walk "in the air"... 'Aaj mai upar, aasman neeche... chaloon seedhi ki ulti chaloon?!'...

Because of doing cycling in the air/ because of walking in the air...

the foot, ankle, calf, knee, thigh, buttocks (= seat), up to the waist... all joints, bones, and muscles get sufficient and simultaneous exercise at one single time, but the weight (burden) of the body does not fall at all on the joints, bones, and muscles of the waist, knee, ankle, leg, calves, thigh... because they are in the air...

On the contrary, while walking on the ground as usual, the entire weight of our whole body falls on the waist, knee, and ankle... therefore, those whose age is 40 plus and whose knees have started degenerating or women who are around menopause, due to the exercise of walking on the ground, can get troubles like increased knee pain, degeneration, and swelling... therefore, those who have back pain, knee pain, whose vertebrae and knees are degenerated... they too can definitely and easily perform this exercise of "cycling in the air/ walking in the air/ air cycling / air walking... in sufficient quantities and its hundred percent (100%) benefits happen to them definitely!!!

While doing air cycling, while riding a bicycle in the air... one should ride the bicycle forward three times and backward three times, meaning forward and backward three times each... when ten such sets of three-three are done (3+3 × 10), keep the legs down... take two deep breaths... relax, and as per capacity, keep doing sets of riding the bicycle forward and backward three times each, ten times again... try to do this up to 100!!!

While walking or running on the ground, playing games like badminton... all our blood flow, blood, lactic acid, lymph, goes downwards towards the legs due to gravity... it accumulates there, can stay accumulated, can stop!!! We have only one pump installed in the body = the heart, which is placed in the chest...

but from the legs, against the direction of gravity = gravity's opposite direction, in the upward direction, to bring blood to the heart, no other pump is installed!

Therefore, according to the laws of physics, due to gravity, if legs are left hanging down, if there are suspended legs, if there is a sedentary job = sitting business or if you are driving, standing and working... kitchen, teaching, watchman or table work, then in all of these, our body's blood, lymph, lactic acid, blood flow, keeps going in the downward direction throughout the day! All such individuals, meaning from students to managers, watchmen, teachers to household housewives... everyone, mostly throughout the day, is in a standing position or legs left hanging = suspended legs, in such a state... and additionally, those who suffer from varicose veins too...

Therefore, if all such people perform Air Cycling, this exercise, then the blood, blood flow, lymph, lactic acid that went in the direction of the legs will easily come towards the heart... and complaints like leg pain, swelling of legs, throbbing of legs, heel pain will stop permanently!!!

45° Leg Lift Up Padottan !!!

After completing air cycling, for some time, or before starting air cycling... if the stomach is empty... one should lie down on the floor below and lift both legs together = at once, lifting them at only a 45-degree angle, and place them on a sofa or a chair. When you feel pins and needles (tingling) in your toes, know that all the blood, lymph, lactic acid accumulated at that tip has returned and new, fresh, clean blood has reached there... know it to be so ✅

... and then start air cycling or get up and carry on with your activities!

Legs should be kept up at forty-five degrees (45°) only... they should not be lifted up to 90° by placing them against a wall... because, after the age of thirty-five, forty (35+, 40+), lifting legs from the waist in a 90° angle and putting them against a wall in this manner (this is fine for those who have skill, proficiency, training in yoga asanas in the sense of Sarvangasana, but for others).. it can be an invitation to an accident = catching a twist in the waist or neck, getting a sprain, it can cause this... therefore, lying down below on the ground, one should keep both legs lifted at only a 45° angle on a sofa or a chair for some time, meaning for 15 minutes until tingling occurs at the tips of the legs!

Doing this daily is beneficial... after your day's work is over, on an empty stomach, before having night dinner or one and a half to two hours after having night dinner!!!

The second such all-round exercise type is Spinal Twist (= spinal twist) which...

is an all-round exercise for that part of the body which does not get exercised in air cycling... meaning the part above the waist!!!

Spinal Twist (= spinal twist)

For this... watch the video using the link provided along with it.

Preferably, one should sit on the ground with both legs joined together, stretching them forward, keeping the spine erect... in short, sit in a right angle L-shape...

just as told in Bhagavad Gita Chapter 6: Abhyasa Yoga... Samam kaayashirogreevam dhaarayan, achalam sthirah.... one should sit like this...

After sitting in such an L-shape, stretch both your hands in line with the shoulders, at 180 degrees, like spreading wings (spreaded wings), as straight as possible... and in that position, twist your spine... as much as possible, from left to right and again from right to left... do this ten times with hands fully spread, wings spread, wing-spread position... then relax... take two deep breaths... and do it ten times again... by doing such sets of ten-ten, perform this exercise 100 times, spinal twist = wringing the spine = just like doing Ardha Matsyendrasana alternately!!! ✅

In this exercise, a complete, all-round, and sufficiently useful exercise definitely happens to all bones, joints, and muscles of the head, neck, shoulders, hands, entire back, and up to the waist!!!

In short, Air Cycling / Air Walking / walking in the air / cycling in the air, this type of exercise is an exercise for all joints, bones, and muscles "below the waist up to the feet", whereas...

Spinal Twist is an exercise for all joints, bones, and muscles "above the waist up to the neck and head"!!!

In this way, "Spinal Twist and Air Cycling" are satisfactorily useful for the all-round, sufficient exercise of bones, joints, and muscles of the entire body of individuals of all age groups.

Just as it is told to perform the Spinal Twist exercise by sitting on the ground in an L-shape...

similarly, those who cannot sit on the ground, should perform this exercise sitting on a chair... however, the Spinal Twist exercise should not be done sitting on a stool... because, due to no support to the back, there is a possibility of losing balance.

One should not sit in an office chair or an easy chair (recliner)... because they bring a curve / bend to the spine...

forward bending happens like that...

Therefore, sit in a dining chair, which is at a 90-degree right angle, so that we can keep the spine erect at 90°...

Yet another third option is for two persons in the house to sit back-to-back, shoulder-to-shoulder on the ground in an L-shape... and turn to the left to pass a small object such as a ball (or a small pot or four-five books together) to the person sitting back-to-back with us... and that person should turn to the right and give it back to us, and we should receive it... thus, in the manner of 'let us help each other' (Ekmeikaan saahya karoon), sitting back-to-back, stretching legs straight and erect, in an L-shape, sitting at 90 degrees, the Spinal Twist exercise can be performed!!!

While exercising alone, many times some people get bored, they feel 'it would be better if there is some partner!!', for them, this is a remedy / alternative = option...

However, still, stretching both hands straight and erect at 180 degrees like wings, like spreaded wings, and wringing the spine more and more to both sides, meaning wringing it at 270 degrees, is of greater utility!!!

So, best wishes to everyone for an all-round exercise!!!

Come on then... from tomorrow... chee, chee, why from tomorrow!?... from today, "right from now itself", let us keep doing both exercises, Air Cycling and Spinal Twist together, daily, regularly, without a break, like 100 counts (sittings)!!!

It is raining outside, it is very sunny, the sun hasn't risen yet, now it has become very dark, there is mud, road work is going on, there are potholes, there is too much traffic, I feel scared alone, knees hurt... waist hurts... neck hurts!!!; keeping aside all such pretexts, reasons, fuss, and excuses... according to our convenience... in our convenient place / on our bed itself, performing these both exercises "Air Cycling and Spinal Twist" is definitely possible.

# Aaj mai upar, aasma neeche

+

Mud mudke haan dekh... mudmud ke

All-round Exercise Complete Exercise ✅️

Air Cycling + Spinal Twist = All-round Exercise Complete Exercise ✅️

#exercise #workout #gym #sixpack #running #jogging #pranayama #kapalabhati #कपालभाति #trekking #mountaineering #hasyaclub #laughter #coaching #receptionist #teaching #teacher #sex #walking #marathon #triathlon #cricket #badminton #tabletennis #football #saucer #soccer #volleyball #weightlifting #weighttraining #treadmill

✍🏼 Vaidya Hrishikesh Mhetre. MD Ayurveda, MA Sanskrit

Ayurveda Clinics @ Pune And Nashik

9422016871

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www.MhetreAyurveda.com

+91 94 220 16 871

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05/12/2024



हिंदी : एअर सायकलिंग + स्पायनल ट्विस्ट = सर्वांगीण व्यायाम Complete Exercise ✅️

 एअर सायकलिंग + स्पायनल ट्विस्ट = सर्वांगीण व्यायाम Complete Exercise ✅️

आज मैं ऊपर, आसमां नीचे + मुड़ मुड़के "हां" देख, मुड़मुड़ के = सर्वांगीण व्यायाम Complete Exercise ✅️

एअर सायकलिंग + स्पायनल ट्विस्ट = सर्वांगीण व्यायाम

✍🏼 वैद्य हृषिकेश म्हेत्रे, एमडी आयुर्वेद, एम ए संस्कृत

आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे एंड नाशिक

मोबाइल नंबर 9422016871

05/12/2024



चलना, दौड़ना, वॉकिंग, रनिंग, बैडमिंटन, क्रिकेट, जिम, ज़ुम्बा, योगा, स्विमिंग, सायकलिंग ... इन सबसे उत्तम, हितकारक, सुरक्षित और मुख्य बात यह कि "सर्वांगीण व्यायाम यानी एअर सायकलिंग और स्पायनल ट्विस्ट" है।

व्यायाम कब, किसे, कितना, किस तरीके से करना चाहिए और किसे नहीं करना चाहिए, इसके विधि-निषेध (= Do & Don't) हमने संक्षेप में, लेकिन आसानी से समझ में आने वाले सुबोध तरीके से देखे हैं।

सर्वांगीण व्यायाम होना शरीर के लिए आवश्यक और निश्चित रूप से हितकर होता है!

विशेष रूप से, प्राकृतिक रूप से उत्साह के कारण, कौतूहल के कारण, जिज्ञासा के कारण, शरीर की चैतन्यता के कारण... सहज रूप से होने वाली हलचल = खेल, कूद, दंगा-मस्ती, शरारतें, भाग-दौड़, यह सब आमतौर पर बचपन समाप्त होते समय और युवावस्था की दहलीज पर खत्म हो जाता है...

और साधारणतः बच्चे जब नौवीं-दसवीं में जाते हैं, तब से उनका मैदानी खेल, व्यायाम और विभिन्न कारणों से सहज रूप से होने वाली शारीरिक हलचल, पढ़ाई के विस्तार और अनावश्यक प्रेशर के कारण जो रुकती है; वह प्रायः उनके आगे के जीवन में फिर कभी शुरू ही नहीं होती, ऐसा पिछली पीढ़ी तक था!!!

लेकिन अब, बिल्कुल नासमझ उम्र से ही, मासूम और अजान उम्र से ही, हाथ में मोबाइल या सामने लैपटॉप, टैब, टीवी जैसे विभिन्न स्क्रीन लगातार होने के कारण, बच्चों की शारीरिक हलचल, व्यायाम और मैदानी खेल लगभग बंद हो चुके हैं!

कुछ जागरूक और आर्थिक रूप से संपन्न माता-पिता, बच्चों को एक-दो घंटे के लिए पैसे देकर ग्राउंड जॉइन करवाते हैं... लेकिन उनकी संख्या अत्यंत कम है!!!

पिछली पीढ़ी के बच्चों, किशोरों और युवाओं ने भी घर के काम... यहाँ तक कि जो भी काम सामने आए, बिना किसी शिकायत के, बड़ों की आज्ञा के कारण किए हैं... उसमें झाड़ू लगाना, बिस्तरे बिछाना और समेटना (क्योंकि खुद का बेडरूम जैसा नखरा उस समय नहीं था), घड़ा, कलश, बाल्टी से पानी भरकर लाना (नल चालू किया कि धड़ाधड़ पानी बह रहा है, ऐसा उस समय नहीं था), किराना, केरोसिन, राशन, गैस सिलेंडर की लाइनों में खड़े रहना और उसके लिए कई किलोमीटर पैदल चलना या साइकिल चलाना, यह सभी के मामले में हो रहा था!!!

टू-व्हीलर वाला घर कोई एकाध ही होता था और फोर-व्हीलर तो अमूमन पूरे गाँव में एकाध-दो ही होती थी... इसलिए युवावस्था में भी, या कुछ लोग तो रिटायर होने तक चलना या साइकिल चलाना करते ही रहते थे...

लेकिन अब की पीढ़ी में घर का काम करना आवश्यक ही नहीं रहा है या माता-पिता के अत्यधिक लाड-प्यार के कारण, लड़कों को तो छोड़िए, अब की लड़कियों को भी घर के काम की बिल्कुल आदत नहीं है! इसके विपरीत, उन्हें (लड़कियों को) घर का काम करना शर्मनाक, इन्फीरियर (घटिया), 'काकूबाई' (पिछड़ा), बैकवर्ड और पिछड़ापन लगता है!

इसीलिए बहुत कम उम्र में आज की कई लड़कियाँ बहुत मोटी, वजन से थुलथुली, भारी और बेडौल हो रही हैं या उन्हें विभिन्न हार्मोनल बीमारियाँ हो रही हैं। स्वाभाविक रूप से उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बहुत कम है।

पिछली पीढ़ी में होटल का और खरीदा हुआ खाना खाने का प्रकार 99% घरों में था ही नहीं...

अब तो वीकेंड पर घर में खाना पकाना ही नहीं है, बाहर जाकर ही खाना है और अन्य वीक डेज पर भी जब मर्जी हो/जैसे जमे, अपनी पसंद के अनुसार, घर के अन्य बड़ों को बिना पूछे, बिना अनुमति लिए ही, ऑनलाइन फूड ऑर्डर करना दिखाई दे रहा है।

घर का पौष्टिक, शुद्ध, ताजा, माँ के हाथ का खाना खाने का प्रमाण कम हो गया है और खरीदा हुआ, होटल का, खुले का, रास्ते का, जंक, फास्ट, स्ट्रीट ऐसा "फूड" खाने का फैड (चलन) हर तरफ फैल गया है!!!

इस सब के कारण अनावश्यक फालतू चर्बी का, स्थूलता का, मोटापे का "महामारी (प्रकोप)" हर तरफ दिख रहा है और स्वाभाविक रूप से इसके कारण प्रतिरोधक क्षमता कम और हार्मोनल डिसीज ज्यादा हो गए हैं।

इसलिए छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को "शारीरिक हलचल करनी पड़े", इस तरह उनके दिनचर्या में कुछ बातें शामिल करना आवश्यक है।

व्यायाम का नाम लेते ही, तुरंत कई लोग महंगे जूते, ट्रैक सूट पहनकर जॉगिंग, रनिंग, सायकलिंग करना या बहुत पैसे देकर एसी जिम में ट्रेडमिल पर दौड़ना, न जाने कैसे-कैसे वेट (वजन) उठाना या पैसे देकर ज़ुम्बा, योगा जैसे क्लासेस में जाना या वीकेंड पर मूर्खों की तरह खतरनाक अनजान पहाड़ों पर ट्रेकिंग के लिए जाना, पागल की तरह पूरी दुनिया दौड़ रही है इसलिए मैराथन में भागना... ऐसे अशास्त्रीय, दिशाहीन और ढोंगी प्रकार चालू हैं।

परंतु शरीर के सभी अंगों को, सभी मसल्स को, सभी जोड़ों को पर्याप्त आवश्यक व्यायाम मिलेगा... ऐसा उपरोक्त किसी भी प्रकार में निश्चित रूप से, सुरक्षित रूप से और नियमित रूप से नहीं होता!

देखा जाए तो पिछली पीढ़ी में युवाओं के लिए अखाड़े (तालीम) जाना, अखाड़े न जाकर भी घर के घर में दंड-बैठक, पुश-अप्स, रस्सी कूदना और निश्चित रूप से घर का काम, इतना व्यायाम पर्याप्त होता था। शादी के बाद और करियर में सेटल होने के बाद, युवा से लेकर प्रौढ़ उम्र के सभी लोग प्रायः पैदल या साइकिल से जाते थे, इसलिए वैसे भी भरपूर व्यायाम हो ही जाता था...

लेकिन अब किसी भी उम्र में पर्याप्त व्यायाम नहीं होता, ऐसी स्थिति है।

अभी के जो कुछ लोकप्रिय स्थापित व्यायाम प्रकार हैं, वे या तो एकांगी (वन-साइडेड) हैं यानी शरीर के किसी एक अंग या हिस्से के लिए हैं, या फिर वे तुरंत या आगे चलकर खतरनाक साबित होने वाले हैं... जैसे कि क्रिकेट, बैडमिंटन, टेबल टेनिस, दौड़ना, रस्सी कूदना, ट्रेकिंग करना, किले चढ़ना... इन सब में हमारी अगली हलचल किस अंग की, किस जोड़ की, किस मसल की होने वाली है, यह पता नहीं होता!

इसका मतलब यह है कि इन सभी व्यायामों/खेलों में; जर्क, झटका, अनपेक्षित (अचानक) और बिना तय की गई हलचल अगले ही पल होने की संभावना होती है!

परंतु, "व्यायाम = शरीर चेष्टा या चेष्टा स्थैर्यार्था बलवर्धिनी" इस स्वरूप का होना चाहिए...

यानी व्यायाम शरीर की ऐसी हलचलें होनी चाहिए, जो इष्ट यानी अपेक्षित, सुरक्षित और चाही गई स्वरूप की हों...

और उन हलचलों से, शरीर के अंगों की स्थिरता = स्टैमिना (सहनशक्ति) और बल, क्षमता, सामर्थ्य बढ़ना चाहिए!!!

यहाँ तक कि प्राणायाम (= कपालभाति, भस्त्रिका, सूर्य भेदन) में भी छाती, फेफड़े, श्वसन प्रणाली, हृदय, रक्त परिसंचरण तंत्र और कुछ हद तक हमारे आमाशय, आंतें, नाभि और उसके आसपास के अंगों पर अकारण, अनपेक्षित ऐसा तनाव, ज़ोर, धक्का, जर्क, झटका जैसे स्वास्थ्य नाशक आघात होते रहते हैं।

योगासनों में भी कुछ हद तक इस प्रकार का खतरा संभव है, क्योंकि यदि शरीर के अंगों में, जोड़ों में, मसल्स में पर्याप्त ट्रेनिंग, पर्याप्त क्षमता, पर्याप्त लचीलापन = फ्लेक्सिबिलिटी न हो,

तो योगासन करके लाभ होने के बजाय अनपेक्षित हानि होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता...

और योगासनों में, "स्थिर सुखम आसनम" ऐसी स्थिति होने के कारण, शरीर को लचीलापन = फ्लेक्सिबिलिटी मिल सकती है; परंतु शरीर का व्यायाम नहीं होता, यह त्रिकाल सत्य है!!!

आजकल का योगा और आजकल का प्राणायाम यानी (डिफरेंट पोज, पोस्चर एंड ब्रीदिंग एक्सरसाइज) ये अधिकांशतः स्थिर = हलचल रहित ही होते हैं!!!

योगा और प्राणायाम में, शरीर के अंगों की, जोड़ों की, मसल्स की पर्याप्त सर्वांगीण हलचल बिल्कुल नहीं होने के कारण...

योगा और प्राणायाम करके हम व्यायाम का लाभ पा सकेंगे या वजन कम कर सकेंगे, शुगर कम कर सकेंगे, कोलेस्ट्रॉल, बीपी कम कर सकेंगे...

यह भ्रम है, गलतफहमी है, अज्ञान है, भ्रामक है, यह निश्चित रूप से जान लेना चाहिए, समझ लेना चाहिए...

और इस सत्य को स्वीकार करना चाहिए, किसी भी भ्रम या अज्ञान में नहीं रहना चाहिए।

यदि सर्वांगीण व्यायाम होना है, तो लोकप्रिय हो चुके चलने (वॉक) के व्यायाम के बजाय...

वास्तव में, "दो व्यायाम प्रकारों की समाज में स्वीकृति, स्थापना, प्रसार, प्रबोधन और प्रोत्साहन होना चाहिए"!

उसमें पहला, सबको ज्ञात, पारंपरिक और फिर भी वैज्ञानिक, बहुउपयोगी और सुरक्षित व्यायाम प्रकार है—सूर्यनमस्कार!!!

लेकिन सूर्यनमस्कार हर किसी को जमे, ऐसा नहीं है। विशेष रूप से जिन्हें कमर, घुटने, गर्दन, कंधे में दर्द, सूजन या घिसावट (degeneration) की समस्या है, उन्हें प्रतिदिन लंबे समय तक सूर्यनमस्कार करना नहीं जमता!!!

इसलिए एक बहुत ही आसान, जो किसी भी उम्र के, किसी भी व्यक्ति को निश्चित रूप से जमेगा ही ✅️... ऐसे "दो व्यायाम प्रकार" रोज़ करने पर, समाज के सभी उम्र के, सभी व्यक्ति... निश्चित रूप से पर्याप्त व्यायाम करने से हमेशा स्वस्थ रहेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं!!!

इसमें पहला व्यायाम प्रकार है...

एअर सायकलिंग (Air Cycling)

और दूसरा व्यायाम प्रकार है...

स्पायनल ट्विस्ट (Spinal Twist)

एअर सायकलिंग का मतलब है...

हवा में ही चलना या साइकिल चलाने जैसा करना!

तुरंत लोग कहते हैं, "तो क्या हम घर में जो स्थिर (स्टेशनरी) साइकिल मिलती है वह ले लें या रोज़ सायकलिंग के लिए बाहर जाएँ???... तो उसका उत्तर है... नहीं, बिल्कुल नहीं!!!

क्योंकि घर की स्थिर साइकिल या बाहर सायकलिंग के व्यायाम के लिए जाना, इन दोनों प्रकारों में, कमर के ऊपर का हमारा पूरा शरीर साइकिल की सीट पर "आराम से बैठा" होता है। इसके अलावा, कमर के ऊपर का पूरा शरीर हमेशा की तरह आगे झुका हुआ (forward bending) होता है, जबकि वास्तव में "पीछे झुकना = backward bending" (सूर्यनमस्कार की तरह) आवश्यक और उपयोगी होता है!!!

दूसरा...

कमर के नीचे के, सिर्फ जांघ और पिंडली के स्नायु (मसल्स) ही सायकलिंग में काम करते हैं...

और एक बार साइकिल को गति मिल गई, तो जांघ और पिंडली का व्यायाम भी बंद हो जाता है, क्योंकि साइकिल अपने आप चलती है... पैडल मारने की आवश्यकता नहीं रहती... इसलिए सायकलिंग , चाहे वह बाहर वास्तव में घूमने जाने वाली सायकलिंग हो या घर के अंदर की स्थिर साइकिल हो... दोनों में ये दोष हैं ही!

चर्बी (मेद) जो जमा होती है, वह सबसे पहले तोंद पर, पेट पर... फिर कमर पर... फिर हिप्स (सीट) पर... फिर जांघों पर... और अंत में बाहों, छाती, गले पर जमा होती है!!!

इसका मतलब है, इन अंगों पर खिंचाव पड़े, ऐसा व्यायाम होना चाहिए, जो स्थिर साइकिल या बाहर सायकलिंग करने जाने में नहीं होता!

इसके विपरीत, जहाँ चर्बी बिल्कुल जमा नहीं होती, ऐसे पैरों का कचरा हो जाता है, केवल थकान = कष्ट होता है... व्यायाम नहीं होता... यानी चोर को छोड़कर संन्यासी को फाँसी!!! चर्बी कहाँ जमा है???

तो जांघ, पिंडली, सीट, छाती, गले और बाहों पर... व्यायाम, कष्ट और हलचल कौन कर रहा है???... तो पैरों के, पिंडलियों के मसल्स... यानी यह 'आग रामेश्वरी और बम्ब सोमेश्वरी' (बीमारी कहीं, इलाज कहीं) जैसा प्रकार हो जाता है!!

इसलिए कमर के नीचे के सभी अंगों को निश्चित रूप से व्यायाम मिले, ऐसी व्यवस्था यानी एअर सायकलिंग है!!! ✅

इसके लिए हम जैसे हमेशा सोते हैं वैसे ही... बिल्कुल बेड पर ही या ज़मीन पर चटाई बिछाकर या सोफे पर, (या ग्राउंड पर घूमने गए, तो ट्रैक के किनारे या वहाँ के किसी बेंच पर) हमेशा की तरह पीठ के बल सीधे (उतान) लेटकर, अपने पैरों को कमर से ऊपर उठाकर, सीधे "हवा में ही सायकलिंग करनी चाहिए" / हवा में ही चलना चाहिए... 'आज मैं ऊपर, आसमां नीचे... चलूं सीधी की उल्टी चलूं?!'...

हवा में ही सायकलिंग करने से/ हवा में ही चलने से...

पैर, टखना (घोटा), पिंडली, घुटना, जांघ, नितंब (= सीट), कमर तक के... सभी जोड़ों, हड्डियों और मसल्स को पर्याप्त और एक साथ, एक ही समय पर व्यायाम होता है... परंतु शरीर का वजन (भार) मात्र कमर, घुटने, टखने, पैर, पिंडलियों और जांघों के जोड़ों, हड्डियों और स्नायुओं पर बिल्कुल नहीं पड़ता... क्योंकि वे हवा में होते हैं...

इसके विपरीत, हमेशा की तरह ज़मीन पर चलते समय, हमारे पूरे शरीर का पूरा भार कमर, घुटने और टखने पर पड़ता है... इसलिए जिनका उम्र 40+ है और जिनके घुटने घिसने शुरू हो गए हैं या जो महिलाएँ मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति) के आसपास हैं, उन्हें ज़मीन पर चलने के व्यायाम के कारण घुटनों में अधिक दर्द, घिसावट और सूजन जैसी परेशानियाँ हो सकती हैं... इसलिए जिन्हें कमर दर्द, घुटना दर्द है, जिनके मटके (मनके/कशेरुका) और घुटने घिस चुके हैं... उन्हें भी यह "हवा में सायकलिंग करने का/ हवा में चलने का/ एअर सायकलिंग / एअर वॉकिंग... यह व्यायाम निश्चित रूप से, आसानी से, पर्याप्त मात्रा में किया जा सकता है और इसके सौ प्रतिशत (100%) लाभ उन्हें मिलते ही हैं!!!

एअर सायकलिंग करते समय, हवा में साइकिल चलाते समय... आगे तीन बार साइकिल चलानी चाहिए और पीछे तीन बार, यानी फॉरवर्ड और बैकवर्ड ऐसे तीन-तीन बार साइकिल चलानी चाहिए... ऐसे तीन-तीन के दस सेट हो गए (3+3 × 10) तो पैर नीचे रखने चाहिए... दो लंबी साँसें लेनी चाहिए... रिलैक्स होना चाहिए और क्षमता के अनुसार, फिर से दस-दस के तीन-तीन बार आगे-पीछे साइकिल चलाने के सेट करते रहना चाहिए... ऐसा 100 तक करने का प्रयास करना चाहिए!!!

ज़मीन पर चलते-दौड़ते समय, बैडमिंटन जैसे खेल खेलते समय... हमारे शरीर का सारा रक्त प्रवाह, रक्त, लैक्टिक एसिड, लिम्फ यह सब पैरों की दिशा में, गुरुत्वाकर्षण (ग्रेविटी) के कारण नीचे जाता है... वहीं जमा होता है, जमा रह सकता है, रुक सकता है!!! हमारे शरीर में एक ही पंप = हृदय, छाती में बैठाया गया है...

परंतु पैरों की तरफ से गुरुत्वाकर्षण के = ग्रेविटी के विपरीत दिशा में, ऊपर की दिशा में, हृदय तक रक्त लाने के लिए कोई दूसरा पंप नहीं बैठाया गया है!

इसलिए फिजिक्स के नियम के अनुसार, ग्रेविटी के कारण, पैर नीचे लटके हुए छोड़ दिए हों, सस्पेंडेड लेग्स हों, सेडेंटरी जॉब = बैठा व्यवसाय हो या ड्राइविंग कर रहे हों, खड़े रहकर काम हो... किचन, टीचिंग, वॉचमैन या टेबल वर्क हो, तो इन सभी में हमारे शरीर का रक्त, लिम्फ, लैक्टिक एसिड, रक्त प्रवाह, नीचे की दिशा में दिनभर जाता रहता है! ऐसे सभी व्यक्ति यानी छात्रों से लेकर मैनेजर्स तक, वॉचमैन, टीचर्स से लेकर घर की गृहणियों तक... सभी लोग प्रायः दिनभर खड़े या पैर लटकाकर बैठे हुए = सस्पेंडेड लेग्स, ऐसी स्थिति में होते हैं... और इसके अलावा जिन्हें वैरिकोज वेन्स की समस्या है उन्होंने भी...

इसलिए इन सभी ने अगर एअर सायकलिंग यह व्यायाम किया, तो पैरों की दिशा में गया हुआ रक्त, रक्त प्रवाह, लिम्फ, लैक्टिक एसिड यह सब आसानी से हृदय की दिशा में आएगा... और पैरों का दर्द, पैरों में सूजन, पैरों का ठसठसाना, एड़ी का दर्द जैसी शिकायतें हमेशा के लिए बंद हो जाएँगी!!!

45° Leg Lift Up पादोत्थान !!!

एअर सायकलिंग करने के बाद कुछ समय, या एअर सायकलिंग शुरू करने से पहले... पेट खाली होने पर... नीचे ज़मीन पर लेटना चाहिए और अपने दोनों पैरों को एक साथ = एकमुश्त उठाकर सिर्फ 45 अंश के कोण (डिग्री) में उठाकर सोफे या कुर्सी पर रख देना चाहिए। जब हमारे पैरों की उंगलियों में चींटियाँ चलती (मुंग्या) जैसी महसूस हों, तब समझें कि उस छोर पर जमा हुआ सारा रक्त, लिम्फ, लैक्टिक एसिड वापस आ गया है और नया, ताजा, स्वच्छ रक्त वहाँ पहुँच गया है... ऐसा जानना चाहिए ✅

... और फिर एअर सायकलिंग शुरू करनी चाहिए या उठकर अपने काम करने चाहिए!

पैर पैंतालीस अंश (45°) में ही ऊपर रखने चाहिए... उन्हें दीवार से लगाकर 90° तक नहीं उठाना चाहिए... क्योंकि, पैंतीस-चालीस (35+, 40+) की उम्र के बाद, इस तरह से 90° के कोण में कमर से पैर उठाकर दीवार से लगाना (यह सर्वांगासन के अर्थ में योगासनों का कौशल, प्रवीणता, प्रशिक्षण रखने वालों के लिए ठीक है, लेकिन दूसरों के लिए)... वह दुर्घटना को आमंत्रण = कमर, गर्दन में लचक आ जाना, मोच (स्प्रेन) आ जाना, इसके लिए कारण बन सकता है... इसलिए ज़मीन पर नीचे लेटकर अपने दोनों पैर सिर्फ 45° के कोण में उठाकर सोफे या कुर्सी पर कुछ समय के लिए, यानी 15 मिनट में पैरों के छोर पर चींटियाँ आने तक, रखने चाहिए!

यह प्रतिदिन करना हितकर होता है... अपना दिनभर का काम खत्म होने के बाद, खाली पेट, रात का खाना खाने से पहले या रात का खाना खाने के डेढ़ से दो घंटे बाद!!!

दूसरा ऐसा ही सर्वांगीण व्यायाम प्रकार यानी स्पायनल ट्विस्ट (= spinal twist) है, जो...

एअर सायकलिंग में शरीर के जिस हिस्से का व्यायाम नहीं होता... उस हिस्से का... यानी कमर के ऊपर के हिस्से का... यह सर्वांगीण व्यायाम है!!!

स्पायनल ट्विस्ट (= spinal twist)

इसके लिए... साथ में दिए गए लिंक का उपयोग करके वीडियो देखें।

संभव हो तो ज़मीन पर दोनों पैर जोड़कर, उन्हें आगे फैलाकर, रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर बैठना चाहिए... संक्षेप में समकोण में एल शेप (L shape) में बैठना चाहिए...

जैसा कि भगवद्गीता अध्याय 6: अभ्यास योग में बताया गया है... समं कायशिरोग्रीवं धारयन्, अचलं स्थिरः।... ऐसा बैठना चाहिए...

ऐसे एल शेप में बैठने के बाद, अपने दोनों हाथ कंधों की सीध में, 180 अंश में, पंख फैलाने की तरह (spreaded wings), जितना हो सके सीधा फैलाना चाहिए... और उस स्थिति में, अपनी रीढ़ की हड्डी... जितना संभव हो सके अधिक से अधिक, बाईं से दाईं ओर और फिर दाईं से बाईं ओर... ऐसे हाथ पूरे फैले हुए, पंख फैले हुए विंग स्प्रेड स्थिति में... दस बार करना चाहिए... फिर रिलैक्स होना चाहिए... दो लंबी साँसें लेनी चाहिए... और फिर से दस बार करना चाहिए... ऐसे दस-दस के सेट करके, सौ बार स्पायनल ट्विस्ट = रीढ़ की हड्डी को मरोड़ना = मानो अर्धमत्स्येंद्रासन अदल-बदल कर करने की तरह... यह व्यायाम करना चाहिए!!! ✅

इस व्यायाम में सिर, गर्दन, कंधे, हाथ, पूरी पीठ और कमर तक की सभी हड्डियों, जोड़ों और मसल्स का पूरी तरह से सर्वांगीण और पर्याप्त उपयोगी... ऐसा व्यायाम निश्चित रूप से होता है!!!

संक्षेप में, एअर सायकलिंग / एअर वॉकिंग / हवा में चलना / हवा में साइकिल चलाना यह व्यायाम प्रकार "कमर के नीचे पैरों की उंगलियों तक के" सभी जोड़ों, हड्डियों और मसल्स का व्यायाम है, तो...

स्पायनल ट्विस्ट यह "कमर के ऊपर गर्दन तक, सिर तक के" सभी जोड़ों, हड्डियों और मसल्स का व्यायाम है!!!

इस प्रकार, "स्पायनल ट्विस्ट और एअर सायकलिंग " सभी आयु वर्ग के व्यक्तियों के पूरे शरीर के हड्डियों, जोड़ों और मसल्स के सर्वांगीण पर्याप्त व्यायाम के लिए संतोषजनक रूप से उपयोगी हैं।

स्पायनल ट्विस्ट यह व्यायाम जैसे ज़मीन पर एल शेप में बैठकर करने के लिए कहा गया है...

वैसे ही जिन्हें ज़मीन पर बैठना नहीं जमता, उन्होंने कुर्सी पर बैठकर यह व्यायाम करना चाहिए... परंतु स्पायनल ट्विस्ट यह व्यायाम स्टूल पर बैठकर नहीं करना चाहिए... क्योंकि पीठ को सहारा न होने से संतुलन (तोल) बिगड़ने की संभावना होती है।

ऑफिस चेयर, आराम कुर्सी (रॉकिंग/रिक्लाइनर) में नहीं बैठना चाहिए... क्योंकि वे रीढ़ की हड्डी में झुकाव / मोड़ (bend) लाती हैं...

Forward bending (आगे की ओर झुकना) ऐसा होता है...

इसलिए डाइनिंग चेयर, जो समकोण में 90 अंश पर होती है, उसमें बैठना चाहिए ताकि हम रीढ़ की हड्डी को 90° में सीधा रख सकें...

एक और तीसरा ऑप्शन यानी घर के दो व्यक्तियों को पीठ से पीठ सटाकर, कंधे से कंधा मिलाकर एल शेप में ज़मीन पर बैठना चाहिए... और कोई छोटी वस्तु जैसे कि गेंद (या छोटा पतीला या चार-पांच किताबें एक साथ), बाईं ओर मुड़कर, अपनी पीठ से पीठ सटाकर बैठे व्यक्ति को देनी चाहिए... और उस व्यक्ति ने दाईं ओर मुड़कर फिर से हमें देनी चाहिए, हमने उसे स्वीकार करना चाहिए... ऐसे, 'एकमेकां साह्य करूं' (एक दूसरे की मदद करें) इस पद्धति से, एक-दूसरे की पीठ से पीठ सटाकर, सीधे तने हुए पैर फैलाकर, एल शेप में, 90 अंश में बैठकर स्पायनल ट्विस्ट यह व्यायाम किया जा सकता है!!!

अकेले व्यायाम करते समय अक्सर कुछ लोगों को बोरियत होती है, 'कोई पार्टनर हो तो अच्छा रहेगा!!', ऐसा लगता है... उनके लिए यह उपाय / विकल्प = ऑप्शन है...

परंतु फिर भी दोनों हाथों को पंखों की तरह स्प्रेडेड विंग्स के रूप में 180 अंश में सीधा फैलाकर, रीढ़ की हड्डी को दोनों ओर अधिक से अधिक मरोड़ना यानी 270 अंश में मरोड़ना, यह अधिक उपयोगी है!!!

तो, सभी को सर्वांगीण व्यायाम के लिए शुभकामनाएँ!!!

चलो फिर... कल से... छिः छिः, कल से क्यों!?... आज से, "अभी से" ही एअर सायकलिंग और स्पायनल ट्विस्ट, ये दोनों व्यायाम एक साथ, रोज़, नियमित रूप से, बिना किसी रुकावट के, 100 काउंट्स (सीटिंग) की तरह करते रहते हैं!!!

बाहर बारिश हो रही है, बहुत धूप है, अभी सूरज नहीं उगा है, अब बहुत अंधेरा हो गया है, कीचड़ है, सड़क का काम चल रहा है, गड्ढे हैं, ट्रैफिक बहुत है, अकेले डर लगता है, घुटने दुखते हैं... कमर दुखती है... गर्दन दुखती है!!!; ऐसे सभी बहानों, कारणों, बखेड़ों और एक्सक्यूजेस को किनारे रखकर... अपनी सुविधानुसार... अपनी सुविधा की जगह पर / अपने बेड पर ही, ये दोनों व्यायाम "एअर सायकलिंग और स्पायनल ट्विस्ट" करना निश्चित रूप से संभव है।

# आज मैं ऊपर, आसमा नीचे

+

मुड़ मुड़के हाँ देख... मुड़मुड़ के

सर्वांगीण व्यायाम Complete Exercise ✅️

एअर सायकलिंग + स्पायनल ट्विस्ट = सर्वांगीण व्यायाम Complete Exercise ✅️

#exercise #workout #gym #sixpack #running #jogging #pranayama #kapalabhati #कपालभाति #trekking #mountaineering #hasyaclub #laughter #coaching #receptionist #teaching #teacher #sex #walking #marathon #triathlon #cricket #badminton #tabletennis #football #saucer #soccer #volleyball #weightlifting #weighttraining #treadmill

✍🏼 वैद्य हृषिकेश म्हेत्रे, एमडी आयुर्वेद, एम ए संस्कृत

आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे एंड नाशिक

9422016871

www.YouTube.com/MhetreAyurved/

www.MhetreAyurveda.com

+91 94 220 16 871

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05/12/2024

Monday, 13 April 2026

सभी पेशंट के लिये चिकित्सा के आरंभ में सामान्य नियम

सभी पेशंट के लिये चिकित्सा के आरंभ में सामान्य नियम

किसी भी लक्षण या व्याधी के लिए या रिपोर्ट के लिए ट्रीटमेंट देने से पहले या साथ मे ...

पेशंट को दो प्रश्न पूछना चाहिए ॲसिडिटी है क्या और कॉन्स्टिपेशन है क्या?



ॲसिडिटी या उससे संबंधित या सदृश समान लक्षण हो तो उसको पहले ठीक करे उसके लिए यथा संभव भूनिंबादि या वासागुडूच्यादि या यष्टी सारिवा इसका प्रयोग करे 


कॉन्स्टिपेशन मलावरोध गॅसेस या उससे संबंधित उसके सदृश या समान लक्षण है तो कोई मृदु अनुलोमन जो आपके प्रॅक्टिस मे आपको अच्छा अनुभव हो वह अपान काल में देना चाहिए 


आमाशय और पक्वाशय इनका स्वास्थ्य अगर हमने ठीक रखा तो, बाकी जो भी हम आहार या औषध देंगे उसका शीघ्र और अच्छा परिणाम प्राप्त होता है 


तो किसी भी लक्षण को औषध देने से पहले इन दो आशयों का व्यापार ठीक से चल रहा है इसकी सुनिश्चित व्यवस्था या रिपेअर, जो आवश्यक है, वो करे... उसके लिए जो औषध और आहार विहार मे परिवर्तन करना है , वो अन्य लक्षण के लिए दिया जाने वाले औषध के साथ ही दे दे 


आमाशय के लिए औषध या तो भोजन के बीच मे या भोजन के पश्चात दे दे 


और पक्वाशय के लिये औषध भोजन के प्रारंभ मे देना

Friday, 27 March 2026

The Reality of Viddhakarma 📌📍 & Marma Chikitsa(?) ! Intellectual Robbery of Acupuncture & Varma Chikitsa in Siddha!

The Reality of Viddhakarma 📌📍 & Marma Chikitsa(?) ! Intellectual Robbery of Acupuncture & Varma Chikitsa in Siddha!






Presented/spread in the interest of all patients, well-wishers of Ayurveda, students, and young Vaidyas!!!

In the "Ashtavidha Shastra Karma" (eight types of surgical procedures) mentioned by Sushruta, there are words like "Vyadha" or "Vedhan"... however, these are in the context of "Siravedha," meaning as a type of "Raktamokshana" (bloodletting). But apart from Siravyadha, the word "Viddha" is not mentioned anywhere else as a form of treatment. The word "Viddha" has appeared in the context of certain procedures in Marma, Srotas, Karna (ear), and Drushti (vision) diseases.

However, today, based on popularity and crowd/throng, the way a fake narrative is being created, and for that, from top Ayurveda institutes to presentations happening in general-level seminars or colleges—everywhere—people are running behind this, becoming crazy! This is a matter of surprise, but also of misfortune!

In reality, what is considered today in the field of Ayurveda as a means of gaining popularity and gathering a crowd by the name of "Viddha Karma"... that is, in reality, a theft, robbery, and loot committed at an intellectual level! There is another science named Acupuncture; because only BAMS degree holders are practicing it, it is being given a local name and established as Viddha Karma in Ayurveda through Goebbels’ theory, by repeatedly telling lies.

It may be true that the results of what is done in the field of Ayurveda today in the name of Viddha Karma are good... but there are results and people with BAMS degrees perform it; that does not mean that Viddha Karma—which has been brought here by dragging it, by stealing, looting, and committing dacoity of the science of Acupuncture = "Intellectual Robbery"—is Ayurveda!

I have no objection to anyone’s popularity or their skill in gathering a crowd.

But while doing that, “in the name of Ayurveda science,” committing intellectual theft = Intellectual Robbery of another science, and using it on patients boldly in an unethical, non-ethical, and non-moral manner in broad daylight... this is an extremely improper, prohibited, censurable, contemptible, and rejectable tendency!

I have no opposition to any individual...

But I am an extreme opponent of this tendency of "selling" a method of another science, which was never in the Ayurveda science, "in the name of Ayurveda."

To commit this kind of "Intellectual Robbery" is, in my view, a hypocrisy (Pakhanda), and it is the exploitation and misleading of the patient who is our breadwinner (Annadata)... so such unethical things should not be done... and if someone is doing it, then the competent authority/competent institution/Regulatory Authority should put a ban/restriction/BAN on it...

However, instead of this happening, due to the pressure of popularity and the crowd, the top institutes of the Ayurveda field and their experienced and senior heads are dancing with this Viddha Karma on their heads... seeing this, we have completely failed in our "loyalty" toward the science and "thinking" from the perspective of the science, and we have nothing to do with the science... we don't want to "think" anything for the science! ... We want to "sell" every "thing" that "makes money" in the name of Ayurveda, "by any means possible"!

I condemn this "selling," "business-minded," and "selfish" tendency in the strongest possible words.

And the tendency of "selling" the skills or methods of other sciences in the name of Ayurveda is not only about this Viddha Karma... rather, this tendency is also regarding popular things like Yoga, Rasashastra, and Nadi... which have no connection—not even distantly—with the original Samhitas of Ayurveda, its principles, clinical examination methods, or the principles of Bhaishajya Kalpana!

A therapy by the name of Marma Chikitsa is also run in the field of Ayurveda "in the name of Ayurveda"... but that is actually inspired by the "Varma" therapy of the "Siddha" branch of Ayush! In Ayurveda, the number of Marma is only 107! In this Siddha system, the "Varma" number is 108... or according to various references in the Siddha system, the Varma number (not Marma) is 251, 500, or 8000, which is much more than the Marmas mentioned in Ayurveda.

The classification of these Varmas in the Siddha system is also very different from the Ayurveda Marma classification!

In Ayurveda, Marma is mentioned only for diagnosis (Nidana)! The use of Marma as a treatment (Chikitsa) is not mentioned anywhere in the Ayurveda science at all.

By again committing Intellectual Robbery = intellectual theft from the other medical system named Siddha, these things are run in the name of Marma therapy. This is similarly an unethical, non-moral, and unethical tendency!

Varma or Marma therapy is possibly a corrupted form, copy, imitation, or mockery of Acupressure itself.

One does not even know how to study one's own Ayurveda science... because it is not understood, because the original Sanskrit Samhitas, commentaries, and original Ayurveda science do not enter anyone's head... therefore, after taking a BAMS degree, in the name of Ayurveda, "marketing" and "selling" things of any other science "only to make money" and "by making fools of people" is an extremely censurable, rejectable, prohibited, and contemptible tendency.

The scientific validity of any thing is not determined by its popularity or its crowd-pulling capacity... scientific validity is determined by whether it is consistent with the principles of that science or not! Determining the scientific validity of something based on the majority is not as simple as democracy!

Scientific validity is decided on principles, not on popularity and crowds... Be careful!

विद्धकर्म 📌📍 & मर्म चिकित्सा(?) का वास्तव! ॲक्युपंक्चर & सिद्ध के वर्म चिकित्सा की, की गई बौद्धिक चोरी = इंटेलेक्च्युअल रॉबरी

विद्धकर्म 📍📌 & मर्म चिकित्सा(?) का वास्तव! ॲक्युपंक्चर & सिद्ध के वर्म चिकित्सा की, की गई बौद्धिक चोरी = इंटेलेक्च्युअल रॉबरी




सभी पेशंट तथा आयुर्वेद के हितचिंतक विद्यार्थी एवं नवतरुण वैद्यों के हित में प्रसृत / प्रस्तुत !!!


सुश्रुतोक्त अष्टविध शस्त्र कर्म मे "व्यध या वेधन" ऐसे शब्द है ... किंतु ये सिरा वेधके संदर्भ में अर्थात रक्तमोक्षण का एक प्रकार इस रूप मे है. किंतु सिराव्यध छोडकर, अन्य कही पर भी विद्ध शब्द उपचार के रूप मे उल्लेखित नही है. विद्ध शब्द मर्म स्रोतस कर्ण दृष्टि रोग मे कुछ प्रक्रिया के संदर्भ मे आया है. 


किंतु आज जिस प्रकार से लोकप्रियता & भीड/crowd के आधार पर एक फेक नॅरेटिव्ह बनाया जा रहा है और उसके लिए शीर्ष आयुर्वेद संस्थान से लेकर सामान्य स्तर के सेमिनार या कॉलेज तक में होने वाले प्रस्तुतीकरण यहां तक, सभी जगह, लोग इसके पीछे पागल होते हुए दौड रहे है! यह आश्चर्य की किंतु दुर्दैव की बात है !


वस्तुतः आज जिसे आयुर्वेद क्षेत्र में विद्ध कर्म नाम से लोकप्रियता और भीड जमा करने का साधन माना जाता है ... वह वस्तुतः, बौद्धिक स्तर पर की गई, एक चोरी डकैती लूट है! ॲक्युपंक्चर नाम का जो कोई अन्य एक शास्त्र है, उसको केवल BAMS डिग्रीधारक कर रहे है, इसलिये उसको यहां का नाम देकर आयुर्वेद में विद्ध कर्म इस प्रकार से, गोबेल्स थिअरी के द्वारा , बार बार झूठ बोल कर प्रस्थापित किया गया है.


यह सत्य हो सकता है की विद्ध कर्म नाम से आज आयुर्वेद के क्षेत्र में, जो किया जाता है, उसके रिजल्ट अच्छे है ... किंतु रिझल्ट है और BAMS की डिग्री है वो लोग इसे करते है; इसका अर्थ वह विद्धकर्म, जो ॲक्युपंक्चर शास्त्र को चुरा कर , लूट कर , डकैती करके = "इंटेलेक्च्युअल रॉबरी" करके, यहां घसीट कर लाया गया है ... वह आयुर्वेद नही है!


मुझे किसी की लोकप्रियता या भीड जमा करने का कौशल्य इस पर कोई आपत्ती नही है 


किंतु वह करते समय, *"आयुर्वेद शास्त्र के नाम पर"* , किसी अन्य शास्त्र की बौद्धिक चोरी = इंटेलेक्च्युअल रॉबरी करके, उसका अनैतिक नाॅन एथिकल नॉन मॉरल रूप मे, दिनदहाडे, पेशंट पर धडल्ले से उपयोग किये जा रहे है ... यह अत्यंत अनुचित निषेधार्ह निंद्य गर्हणीय त्याज्य वर्ज्य इस प्रकार की यह वृत्ती है !


मेरा किसी व्यक्ति को कोई विरोध नही है ...


किंतु आयुर्वेद शास्त्र मे जो कभी था ही नही , ऐसी पर शास्त्र की विधि को, *"आयुर्वेद के नाम पर" ... "बेचना"* इस वृत्ती का मैं आत्यंतिक विरोधी हूँ. 


इस प्रकार की "इंटेलेक्च्युअल रॉबरी" करना, यह मेरी दृष्टी से एक पाखंड है और जो पेशंट हमारा अन्नदाता है उसका यह एक्स्प्लाॅयटेशन है, दिशाभूल है ... तो ऐसी अनैतिक अनएथिकल चीजे नही करनी चाहिए ... और अगर कोई कर रहा है तो उसको सक्षम अधिकारी/ सक्षम संस्था/ Regulatory Authority ने , उस पर पाबंदी/रोक/BAN लगाना चाहिये ...


किंतु ऐसा न होते हुए लोकप्रियता और भीड का दबाव इस कारण से, आयुर्वेद क्षेत्र के शीर्ष संस्थान & उनके अनुभवी और ज्येष्ठ प्रमुख, इस विद्धकर्म को सर पर लेकर नाच रहे है ... ये देखते हुए हमारी शास्त्र के प्रति "निष्ठा" और शास्त्र की दृष्टी से "सोचना", इसमे हम पूर्णतः असफल हुए है और हमे शास्त्र से कुछ भी लेना देना नही है... शास्त्र के लिए हमे कुछ भी "सोचना" नही है ! ... हमे , "जैसे भी हो सके" , आयुर्वेद के नाम पर, "पैसा बनाने वाली" हर "चीज" को *"बेचना"* है! 


मै इस "बेचने" वाली , "धंदा" करने की "स्वार्थी" वृत्ती का अत्यंत तीव्र शब्द मे निषेध करता हूँ. 


और अन्य शास्त्र के कौशल्य को या विधियों को, आयुर्वेद के नाम पर "बेचना" यह वृत्ती, केवल इस विद्ध कर्म के बारेमे ही नही है ... अपितु, यह वृत्ती ; योग रसशास्त्र नाडी इन लोकप्रिय चीजों के बारे मे भी है ... की जिनका आयुर्वेद की मूल संहिताओ से, तत्त्वों से, नैदानिक परीक्षण विधियों से, भैषज्य कल्पना के सिद्धांतों से ... दूर दूर तक ... कोई भी संबंध नही है!


एक मर्मचिकित्सा नाम से भी एक थेरेपी आयुर्वेद क्षेत्र में "आयुर्वेद के नाम पर" चलाई जाती है ... लेकिन वो ॲक्च्युली "सिद्ध" इस आयुष् अंगके "वर्म" चिकित्सा यहा से प्रेरित है ! आयुर्वेद में मर्म संख्या केवल 107 है! इस सिद्ध पद्धती में "वर्म" संख्या 108 है ... या विविध संदर्भों को अनुसार सिद्ध पद्धती में वर्म संख्या (मर्म नही) 251, 500 या 8000 ऐसी आयुर्वेदोक्त मर्मों से अधिक है. 


इन वर्मों का वर्गीकरण भी सिद्ध पद्धती में, आयुर्वेद मर्म वर्गीकरण से बहुत ही अलग है!


आयुर्वेद मे मर्म यह केवल निदान के लिए उल्लेखित है! मर्म का चिकित्सा के रूप मे कोई भी उपयोग कही पर भी आयुर्वेद शास्त्र मे उल्लेखित है ही नही. 


सिद्धनामक अन्यचिकित्सा पद्धती से फिरसे इंटेलेक्च्युअल रॉबरी = बौद्धिक चोरी करके ये मर्म चिकित्सा नाम से चीजे चलाई जाती है. ये इसी प्रकार से एक अन् एथिकल नॉन मॉरल अनैतिक वृत्ती है !


वर्म या मर्म चिकित्सा, संभवतः ॲक्युप्रेशर का ही एक कॉपी नकल अनुकरण इमिटेशन भ्रष्ट स्वरूप होने की संभावना है


स्वयंके आयुर्वेद शास्त्र का अनुशीलन करना तो आता ही नही है ... क्यूकी वह समजता नहीं, क्यूंकि मूल संस्कृत संहिता टीका मूल आयुर्वेद शास्त्र किसी के पल्ले पडता ही नही ... इसलिये BAMS डिग्री लेकर आयुर्वेद के नाम पर किसी भी अन्य शास्त्र की चीजों को "सिर्फ पैसाबनाने के लिए" , "लोगों को मूर्ख बनाकर" उन चीजों को "मार्केटिंग" कर कर के "बेचना" यह आत्यंतिक निंद्य त्याज्य वर्ज्य गर्हणीय त्याज्य वृत्ती है


किसी भी चीज की शास्त्रीयता उसकी लोकप्रियता या भेट जमा करने की कपॅसिटी क्राउड पुलिंग कॅपॅसिटी इस पर निर्धारित नही होता है ... शास्त्रीयता , उस शास्त्र के सिद्धांत से सुसंगत है या नही, इस पर निर्धारित होती है! बहुसंख्या पर किसी चीज की शास्त्रीयता निर्धारित करना, यह डेमोक्रसी जितना सरल नही है ! 


शास्त्रीयता यह सिद्धांत पर निश्चित होती है, न की लोकप्रियता पर और भीड पर ... सावधान रहे!

Friday, 20 March 2026

शिरोधारा का वास्तव !?

शिरोधारा का वास्तव?!


लेखक : वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे

एम डी आयुर्वेद संहिता जामनगर 1998

आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे & नाशिक 


शिरोधारा आज आयुर्वेद क्लिनिक का बोधचिन्ह या लोगो बन गया है!


शिरोधारा इस संज्ञा से शास्त्र मे कही पर भी उल्लेख या संदर्भ नही है! 


मूलतः मूर्धतैलम् यह अष्टांगहृदय सूत्र स्थान 22 मे 4 प्रकार मे से एक मूर्धा सेक/ मूर्धा परिषेक यह आज शिरोधारा के रूप मे लोकप्रिय है.


मूर्धतैल के 4 प्रकार है ... 

1. अभ्यंग 

2. सेक = परिषेक = शिरोधारा

3. पिचु और 

4. बस्ति! 


Indications/Benefits :


1. अभ्यंग for रौक्ष्य कण्डू मल

2. सेक/परिषेक = शिरोधारा for अरूंषिका शिरस्तोद दाह पाक व्रण 

3. पिचु for केशशात स्फुटन धूपन नेत्रस्तम्भ

4. बस्ति for प्रसुप्ति अर्दित जागर नासास्यशोष तिमिर शिरोरोग दारुण


तो ऍक्च्युली जिस अवस्था के लिए सेक परिफेक शिरोधारा या शास्त्र मे बताई गई है उसके लिए तो आज उसका पेशंट मे उपयोग होता हुआ दिखाई नही देता है !

आज केवल मार्केटिंग के रूप मे इसका स्ट्रेस मे अच्छा है, नींद के लिये उपयोग होता है, ऐसा है गोबेल थेअरी के द्वारा "प्रस्थापित" किया गया है जो की असत्य शास्त्रीय और झूठ है पेशंट को अच्छा लगता है पेशंट डिमांड करते है इसलिये हम शिरोधारा करते है यह जस्टीफिकेशन शास्त्रीय न होकर कमर्शियल यह शास्त्रीय "सोचना" न होकर , यह केवल "बेचना" इस प्रकार की की वृत्ती है


आयुर्वेद शास्त्रीय प्रॅक्टिस या चिकित्सा उपचार इनका उद्देश पेशंट क्या "चाहता", है पेशंट को क्या "अच्छा लगता" है, पेशंट की क्या "डिमांड" है ... इस पर नही चलता है !


वस्तुतः, पेशंट की "आवश्यकता" क्या है "need" क्या है , इस पर शास्त्रीय प्रॅक्टिस = चिकित्सा व्यवहार आधारित होता है!!!


अगर हम पेशंट की "डिमांड" की पूर्ती के लिए कुछ कर रहे है, तो फिर हम कि प्रॅक्टिस नही कर रहे है ... हम रिसॉर्ट स्पा सलून पार्लर इस प्रकार की सेवा व्यवस्था = सर्विस इंडस्ट्री चला रहे ... किंतु, हमने तो डिग्री एक प्रोफेशनल कन्सल्टंट = आरोग्य मार्गदर्शक के रूप मे कार्यरत होने के लिए ली है!


मूर्धतैल के 4 प्रकारों के नामों का सभी का पर्यायी नाम देखेंगे तो ... मूर्धा की जगह शिरस् ऐसा शब्द रखके शिरोभ्यंग, शिरः परिषेक (= शिरोधारा), शिरःपिचु & शिरोबस्ति ... ये यथोतर बलवान है अर्थात अधिक परिणामकारक है


अभ्यंग और पिचु ये उतने लोकप्रिय नही रहे 


किंतु अगर पिछली पिढी में देखा जाये तो... शिरोभ्यंग यह विधी; चंपी/तेलमालिश के रूप में तथा नवजात शिशुओं के शिरःपूरण (टाळू भरणे) = हर घर मे एक वर्ष तक, शिर मूर्धा अभ्यंग करना यह एक सामाजिक रूढी भी थी ... और लोकप्रिय गाना देखेंगे तो ... "सर जो तेरा चकराये या दिल डूबा जाये" ... इस जॉनी लिव्हर पर चित्रित, मोहम्मद रफी का गाना, चंपी तेलमालिश के रूप मे शिरोभ्यंग का स्मरण करता है 


दूसरी तरफ शिरोबस्ती अत्यंत प्रभावी होने पर भी उसके लिए जो यंत्रणा जो प्रिपरेशन करना पडता है वह अधिक दुष्कर है... सर्वाधिक दुष्कर और अप्रिय अवांछित बात तो ये है कि शिरोबस्ती के लिये शिर के सभी बाल निकालने पडते है अर्थात गंजा टक्कल खल्वाट bald इस स्थिती मे आना पडता है, जो किसी भी व्यक्ति को मान्य नही होता है, सहसा!


इसीलिये यह शिरोबस्ति सामाजिक व्यवहार मे कभी भी लोकप्रिय नही रहा !


"तलम्" नाम से कुछ इसका परिवर्तित स्वरूप दक्षिण भारत मे व्यवहार में है 


"शिरोभ्यंग" करते समय, उतने समय तक करने वाले परिचारक/therapist व्यक्ती को समय व्यय और शारीरिक कष्ट होते है ... labor & time!


"शिरःपिचु" विधि में स्नेह से आप्लावित कार्पास पिचु या कोई कपडा फोल्ड करके रखना , इतना सुखावह या हॅपनिंग या फील गुड या लक्झरी या स्पा ट्रीटमेंट की तरह नही लगता है ... इसलिये!!!


परिचारक का समय बंधा ना रहे (occupied& busy therapist) और कोई विशेष दुष्कर यंत्रणा करनी ना पडे और सबसे इम्पॉर्टंट जो फील गुड हॅपनिंग रिसॉर्ट इस प्रकार का लक्झरी ट्रीटमेंट "लगे .."

यह मूर्धा अभिषेक या शिरः परिषेक या "मार्केटिंग" मे बहुत ज्यादा "हाईप" किया गया, झूठे लाभ प्रचारित करके "प्रस्थापित" किया गया ... शिरोधारा यह उसी का भ्रष्ट स्वरूप है !


वस्तुतः ये जो चारो मूर्ध तैल है ...

ये मूर्धा पर अर्थात शिरके सर्वोच्च स्थान पर करने है, इसे व्हर्टेक्स vertex रोमावर्त अधिपति या उसके आसपास का प्रदेश कहेंगे ...


किंतु जैसे की सभी को ज्ञात है की ... "शिरोधारा" यह "आज का जो लोकप्रिय हॅपेनिंग ट्रीटमेंट" है , यह मूर्धा = शिरस् पर नही किया जाता ... यह आज ॲक्च्युअली कपाल भाल ललाट फोरहेड पर ... भ्रू भवें eye brow के थोडा पीछे , धारा की जाती है ... तो इसे शिरोधारा न कहते हुए , भालधारा कपालधारा ललाटधारा forehead oil stream कहना चाहिए!


आयुर्वेद की आज के व्यवहार में पेशंट को इस विधी से क्या लाभ होगा यह "सोचना" उतना आवश्यक नही समजा जाता , जितना की पैसा बटोरने के लिए क्या "बेचना" अधिक फायदेमंद होगा इसका विचार अधिक होता है !!!


वैसे देखा जाये तो शिरोधारा यह अन्य तीन मूर्धतैल प्रकारों की तुलना मे "अत्यंत अल्पकाल और कोई भी प्रेशर दिए बिना" , ॲक्च्युअली मूर्धा या शिरस् से अत्यल्प संपर्क होकर ही तैल का निर्गमन होने वाली विधि है !


अभ्यंग मे हात का प्रेशर और बहुत दीर्घकाल तक ॲक्च्युअली मूर्धा या शिरस् की त्वचा = स्काल्प इसके साथ तैल का संपर्क रहता है 


शिरःपिचु में ... जितना तेल है, पिचु के आकार के शिरःप्रदेश मूर्धाप्रदेश स्काल्प त्वचा इनके संपर्क में तैल रहता है 


शिरोबस्ति में अत्यंतिक/अत्यधिक मात्रा मे तेल का बहुत बडा स्तंभ , scalp = शिरस्त्वचा से एक अंगुल उपर तक उसका स्तर या लेवल बहुत दीर्घकाल तक धारण किया जाता है; 

तो अभ्यंग, पिचु और बस्ति ये जो मूर्धतैल के प्रकार है इनमें, तैल एवं scalp/शिरोभूमि इनका परस्पर संपर्क का कालावधी और उसका प्रेशर यह तुलना मे अधिक रहता है !


जहां पर शिरोधारा मे तैल बहता रहता है और मूर्धा तक आता ही नही ... वह कपाल पर गिरता है और वहा से बालो मे जाकर शिरस्त्वचा को जैसे तैसे संपर्क करके या बिना संपर्क किये निकल जाता है. 


क्यूकी बाल तो निकाले हुए नही रहते है , बाल तो जैसे है वैसे ही होते है और पिचु अभ्यंग या बस्ति की तरह ग्रॅव्हिटी या हस्त स्पर्श इनका प्रेशर भी तेल को स्काल्प के संपर्क मे आने की सहायता नही करता है 


क्योंकि शिरोधारा मे समांतर parallel गती में बह जाता है निकल जाता है ... ऐसा होने के बावजूद शिरस् अभ्यंग शिरःपिचु शिरोबस्ति इनका प्रचलन आज के व्यवहार मे नही है!


क्यूकी इन तीनो प्रकारो मे समय, मटेरियल, कौशल्य इनके साथ साथ परिचारक की संपूर्ण काळ व्यक्तिगत फिजिकल उपस्थिती इनकी आवश्यकता होती है और उसमे फील गुड हॅपनिंग स्पा ऐसे वेलनेस ट्रीटमेंट का अनुभव नही आता है ... जो की शिरोधारा मे पेशंट को बेड पर आराम से लिटाकर मॅन्युअली या यांत्रिक रूप में लूप मे रिपीटेशन आवर्तन में रोटेशन के रूप मे तेल की धारा कपाल पर डाली जा सकती है , उसको ऑटोमेटेड यांत्रिक भी बनाया जा सकता है , जिसे की परिचारक का समय उसने बंधा ना रहे और थोडासा मंद प्रकाश & कोई संगीत लगाया तो पेशंट को भी फील गुड होता है!!


वस्तुतः यह शिरोधारा शिरस पर नहीं अपितु कपाल भाल ललाट फोर हेड पर की जाती है 


मैने कुछ वर्ष पूर्व सजेस्ट किया था कि पेशंट को पीठ के बल supine = facing upwards लिटाने के बजाये , उसको पेट के बल prone लिटाये, उसका जो मुंह मुद्रा चेहरा है जमीन की तरफ करे facing downward जिस से की जहां पर तैल का संपर्क आना "शास्त्र को अभिप्रेत है" = उस व्हर्टेक्स अधिपति रोमावर्त मूर्धा पर शिरस् के सर्वोच्च बिंदू पर ... तेल की धारा गिरती रहेगी 

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और वहा से ग्रॅव्हिटी की दिशा से अधोगमन करते हुई वह शिरके संपूर्ण प्रदेश को संपूर्ण scalp त्वचा को तैल का संयोग संपर्क आप्लावन होकर वह नीचे निकल जायेगी ! ✅️


तो किसी ने कहा कि ऐसे पेट की बल की स्थिती मे विपरीत शयन prone/facing downward की स्थिती मे मूर्धा पर व्हर्टेक्स पर ॲक्च्युली डाला हुआ तैल आंखो मे जाने की संभावना है ! 🙄


आज की जो शिरोधारा = कपाल धारा करते है , उसमे भी आंखो पर कॉटन का पिचु रखते ही है !!!


किंतु, नही !!!

जो प्रस्थापित है जो मार्केटेड है वही हमे करना है ... चाहे वो कितना शास्त्रीय हो कितना भी कमर्शियल हो कितना भी गलत हो ! हम नही सुधरेंगे !!!


जैसे आज कल देखिये ... चाकण मे वाघोली मे शिरवळ मे याने पुणे से 30 35 किलोमीटर जो लोग दूर रहते है, वे कहते समझते मानते है की हम पुणे मे रहते है... वसई विरार से लेकर अलिबाग तक वाशी तक खारघर तक रहने वाले लोग कहते समझते मानते है की मुंबई मे रहते है ... मुंबई से पचास से सौ किलोमीटर दूर रहकर की भी!!


वैसे ही कपाल भाल ललाट फोर हेडफर धारा करके हम कहते समझते मानते है की, हम शिरोधारा करते है!


कपाल ललाट भाल फोरहेड यहां पर धारा करके हम स्वयं को शास्त्र को आप्तों को पेशंट को समाज को ईश्वर को फंसा रहे है वंचना कर रहे है प्रतारणा कर रहे है कि हम शिरोधारा कर रहे है ... जितकी वस्तुतः यह धारा शिरस् पर नही कपाल पर होती है 


इस नए से मार्केट किये गये लोकप्रिय किये गये प्रस्थापित किये गये अशास्त्रीय झूठ असत्य शिरोधारा के आज के व्यवहार में तेल का संपर्क मूर्धा से शिरसे "आताही नही है" !!!


... तो सभी पेशंट को और सभी वैद्यों को कभी शास्त्रीयता और नैतिकता इस रूप मे है सोचना चाहिए की क्या हम सही मे आयुर्वेद शास्त्र का अवलंबन कर रहे है या आयुर्वेद के नाम पर हम कुछ अलग ही "बेच रहे है" ?!


हम पेशंट को कस्टमर क्लाएंट समज रहे है ... या पेशंट हमारा अन्नदाता स्वरूप भगवंत है ???


हम पैसा बटोरने के लिए शिरोधारा कहकर कपाल ललाट भाग फोरहेड पर तेल उंडेल रहे है, जिसका वस्तुतः "कोई उपयोग नही है" हम उसको आज मनःशांती स्ट्रेस रिलिव्हर नींद का उपाय और न जाने क्या क्या बडबडाते रहते है ...


और पेशंट को भी "वह परिणाम", प्लासीबो या कंडिशनिंग सायकोथेरपी के रूप मे "सच्चे लगते है"!


 लेकिन यह शास्त्र नही है ... यह दिगभ्रम है दिशा भूल है वंचना है प्रतारणा है 


हां, इससे पैसा बन सकता है...  किंतु यह आयुर्वेद नही है!! 


अगर हमे सत्य स्वरूप मे शिरोधारा करनी है तो आज जैसे वह पीठ के लिटाकर facing upwards, कपाल पर करते है...

उसकी बजाये विपरीत शयन करके पेट के बल लिटाकर जमीन की ओर चेहरा करके facing downward करके मूर्धा व्हर्टेक्स रोमावर्त अधिपती मर्म शिरस् का सर्वोच्च बिंदू यहां पर होना चाहिये ✅️✅️✅️


और इस तथाकथित शिरोधारा की तुलना मे, जिसका कभी प्रचार ✅️ /मार्केटिंग(?) हुआ ही नही ऐसे शिरो अभ्यंग, शिरःपिचु & प्राचीन काल का सर्वाधिक प्रभावी शिरोबस्ति; वह कई गुना अधिक परिणामकारक अधिक शास्त्रीय है!


लेकिन सच बतायेगा कौन? 

झूठ को उजागर कौन करेगा ?

सच सुनने की किसकी इच्छा है? 

और सही क्या गलत क्या शास्त्र क्या मार्केट क्या ... भोले भाले आयुर्वेद पर विश्वास रखने वाले पेशंट को क्या पता है !!??


इसलिये जिनको शास्त्र के प्रति निष्ठा है प्रेम है, उन वैद्यों ने आयुर्वेद प्रॅक्टिशनर्स ने और जिन पेशंट को आयुर्वेद शास्त्र मे शास्त्रीय क्या है, मार्केटिंग क्या है , सत्य क्या है असत्य क्या है ... पेशंट के लिए "सोच" कर कौनसा उपचार किया जाता है & पेशंट को कुछ "बेचकर" कोई आर्थिक लाभ स्वयं का कैसे कर लेता है ... यह बताने के लिए आज का यह प्रयास है !


जागृत रहिये ... और सत्य का अवलंबन करे!!!