Friday, 19 June 2026

धातु"पाचक" होते ही नही है!

धातु"पाचक" होते ही नही है!

The king is Naked ... The Parrot is Dead
राजा निर्वस्त्र है ... तोता मर गया है
Picture credit Chatgpt AI 

लेखक ✍🏼 : 

वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे, 

एम डी आयुर्वेद संहिता, 

एम ए संस्कृत. 

आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे & नाशिक. 

मोबाईल 9422016871


विषमज्वर कषाय पंचक को, "धातुपाचक" ऐसा "कहकर समझकर" व्यवहार करना, अत्यंत "अशास्त्रीय अनार्ष प्रक्षिप्त असत्य असिद्ध" है!


यह लेख पढने से पहले मूल चरक संहिता आपके पास उपलब्ध है और आपने च चि 3 ज्वर चिकित्सित अध्याय ओपन करके रखा है , यह सुनिश्चित करे


सद्यकालीन व्यवहार इस प्रकार से है की


कलिङ्गकाः पटोलस्य पत्रं कटुकरोहिणी ॥२००॥ = संततज्वर = रस पाचक


पटोलः सारिवा मुस्तं पाठा कटुकरोहिणी । = सततज्वर = रक्तपाचक


निम्बः पटोलस्त्रिफला मृद्वीका मुस्तवत्सकौ ॥२०१॥ = अन्येद्युष्क = मांसपाचक 


किराततिक्तममृता चन्दनं विश्वभेषजम् । = तृतीयक = (मेदोपाचक ऐसा शब्द संस्कृत भाषा मे सिद्ध नही होता है क्योंकि विसर्ग के आगे प आ जाये तो विसर्ग का ओ नही होता है उपध्मानीय होता है इसलिये) = मेदःपाचक! किंतु जो "धातुपाचक" जैसे अस्तित्वहीन & अशास्त्रीय संज्ञा का निर्माण और प्रयोग कर सकते है , उनको मेदोपाचक गलत है और मेदःपाचक यह शब्द उचित है, इतना ज्ञान होगा ऐसे संभव ही नही!)


गुडूच्यामलकं मुस्तमर्धश्लोकसमापनाः ॥२०२॥ = चतुर्थक = अस्थिमज्जापाचक 


कषायाः शमयन्त्याशु पञ्च पञ्चविधाञ्ज्वरान् ।

सन्ततं सततान्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकान् ॥२०३॥

👆🏼

प्रस्तुत इन उपरोक्त तीन श्लोकों में कही पर भी "क्रमात्" यह शब्द लिखा हुआ नही है. यद्यपि "क्रमात्" ऐसा शब्द इसमे लिखना अनुष्ठुभ् छंद की दृष्टि से संभव है, तथापि "नही लिखा" है 


और इन 3 श्लोक मे "शमयन्ति" ऐसा शब्द है "पाचयन्ति" ऐसा शब्द नही है !


विषमज्वर में आम की उपस्थिती नही होती है, किसी पाचन की आवश्यकता होती ही नहीं, इसलिये "शमन कषायों" को, मूढबुद्धि की तरह, धातु"पाचक" संज्ञा देकर व्यवहार मे लाना, यही मूलतः अशास्त्रीय है!


आपको ब्रेन वॉशिंग या मेंटल कंडिशनिंग हुआ है कि धातुपाचक उस धातु पर काम करते हैं... मूलतः धातुपाचक पर क्रिटिकली विचार करना चाहिए, श्रद्धा से नहीं।


एक ज्येष्ठ वैद्य का धातुपाचक के बारे में वीडियो सुना, उसमें उन्होंने धातुपाचक कषाय (या मूल बायवारू के लेख का नाम ज्वरपंचक कषाय), यह रूक्ष तेज के संदर्भ में आए हैं, ऐसा बताया।


मूलतः, वे श्लोक ठीक से पढ़े 

चरक चिकित्सा 3 / 200 से आगे 203 तक, 

तो यह संपूर्ण छह पंक्तियों का, 

तीन श्लोकों का भाग स्पष्ट रूप से "प्रक्षिप्त" है ऐसा निश्चित होता है।


इति क्रिया"क्रमः" सिद्धो ज्वरघ्नः सम्प्रकाशितः ॥१७७॥

येषां त्वेष "क्रमः" तानि द्रव्याण्यूर्ध्वमतः शृणु ।


ऐसा कहकर जिस क्रिया"क्रम" का तात्विक उल्लेख चरक संहिता चिकित्सा 3 में होता है, उस तात्विक "क्रम" से, आगे द्रव्य = कषाय/कल्प आए हैं।


उस मूल 139 से शुरू होने वाले, तात्विक "क्रम" में विषमज्वर बहुत ही बाद में, करीब करीब अंत में है.


और 160 श्लोक कषाय पान (क्रिया"क्रम") बताता है। 


"प्रत्यक्ष कषाय वर्णन" 197 पर आता है।


और "विषमज्वर नाशना" यह श्लोक क्रमांक 297 यहाँ है। 


उसके बाद फिर 315 पर धातुगतज्वर के कषाय आते हैं या उपचार आते हैं, ऐसा स्पष्ट "अच्छा क्रम" होते हुए.. 


श्लोक 197 पर , "सामान्य ज्वर" के योग चालू होते हुए, "बीच में ही असंबद्ध", "अप्रस्तुत", "क्रमभंग" करके ऐसे 200 से 203 श्लोक आते हैं, वे "प्रक्षिप्त" ही है! ... क्योंकि 297 पर प्रतिज्ञा = विषयप्रस्तावना करके , फिर उसके पश्चात ही, "विषमज्वर नाशना" योग हैं।


यह, "निदान क्रम से विसंगत" (inconsistent/non concurrent), विषय "क्रमभंग" वाग्भट में भी हमें मिलता है, अहृचि1/श्लोक 48-50।


और वह "रूक्ष तेज ज्वरकर" यह आगे, "स्नेहवध्य अनिल" के अनुरोधानुसार (in the context of) "जीर्णज्वर में घृतपान" के लिए आए श्लोक हैं, उसका उस "तथाकथित धातुपाचक" श्लोकों से थोड़ा भी संबंध नहीं है।


तथाकथित स्थापित ट्रेड, व्यापार, व्यवसाय, धंधा इसमें जमे हुए, जमाए हुए, गलतफहमियां फैलाए हुए, ऐसे यह सब "धातुपाचक" नाम के जो स्थापित कल्प हैं, उनका संबंध धातुओं से नहीं है, विषमज्वरों का संबंध भी "एक से एक = 1:1 =one is to one" ऐसा धातुओं से निश्चित दृढ (firm & fixed) नहीं है!


पाँच (5) विषमज्वर और छह (6) धातु इनका एक-दूसरे से कोई संबंध स्थापित नहीं होता है।


यह छह धातुओं से, "एक को एक = 1:1" इस पद्धति से बंधे हुए नहीं हैं। 


1.

संतत रस में न होकर वह द्वादश आश्रय = 12 भावों के आश्रयों से होता है ...

द्वादशैते समुद्दिष्टाः सन्ततस्याश्रयास्तदा ।


2.

तो संततज्वर रक्त, मांस दोनों जगह हो सकता है 


3

और अगले तीन ज्वर अगले-पिछले दो-दो धातुओं में इधर-उधर खिसक सकते हैं, 


4.

ऐसी चरक की स्वयं की श्लोकों में स्पष्टोक्ति है।

👇🏼

अन्येद्युष्कं ज्वरं कुर्यादपि संश्रित्य शोणितम् ॥६५॥

मांसस्रोतांस्यनुगतो जनयेत्तु तृतीयकम् ।

संश्रितो मेदसो मार्गं दोषश्चापि चतुर्थकम्


5.

ऐसा होते हुए, केवल एक लेख में, अत्यंत कम रोगी संख्या पर रखे गए, एक संभावित निरीक्षण के कारण, इतना प्रचंड ढांचा (structure) दृढ़ आत्मविश्वास से खड़ा करना, यह अत्यंत अशास्त्रीय है, 


और यह केवल परंपरागत विवशता (helplessness) और कोई भी शास्त्रीय आधार न रखने वाली … श्रद्धा, भक्ति, आरती, कीर्तन, गोंधळ, भारुड (folk performances) ऐसी अज्ञानी लोगों की भीड़ (gathering) है।



उसमें उन्हें सिर्फ सकारात्मक (affirmative) विधान ही पसंद आते हैं!!! 


जब कोई उससे प्रश्न पूछे, उसे कोई अस्वीकार करे / रिव्हॅलिडेट / व्हेरिफाय / चॅलेंज करे कि, ऐसा इन लोगों का पित्त भड़कता है! कि यह सारी पारंपरिक शरणागत गतानुगतिक मंडली हिंसक, आक्रमक, अतिरेकी हो जाती है!! 


शास्त्र का अध्ययन करते समय भावना, परंपरा, श्रद्धा, भक्ति को एक तरफ रखकर, सीधा व्यवहार देखें, क्या संदर्भ हैं वह ठीक से पढ़ें।



कोई एक हाँऽऽऽऽ बोले, इसलिए उसके सुर में सुर मिलाकर सबको गला निकालना (cry out/agree) बंद करना चाहिए, यह सीधा साधा विचार किसी को भी नहीं सूझता। 


एम्परर विथ नो क्लाॅथ्स, यह जो एक प्रसिद्ध प्रकार है, वह अपने यहाँ आयुर्वेद क्षेत्र में बहुत ही अधिक है!!! एक बार किसीने "अहो रुपम्" कहा तो बाकी सबको “अहो ध्वनि” कहना है 🙆🏻‍♂️🤦🏻‍♂️


अरे , लेकिन वह मूल मुद्दा, सच में, उतनी योग्यता का, पात्रता का, मूल्य का है क्या, यह एक बार तो, खनखनाता सिक्का है या नहीं, जाँच कर देखने में क्या आपत्ति है???


केवल परंपरा के नाम पर, व्यवसाय हो रहा है इसलिए, रगड़ते बैठना (continuously practicing it), यह ... कम से कम, जिन्हें संहिताएँ समझती हैं, संस्कृत समझता है, वर्षों से सिखाया है, वर्षों से पेशेंट देखे हैं... उन्हें तो विचार चिंतन अध्ययन करना चाहिए... ✅️


6.

एक बार तो साहस करके, एक बार तो अकेली (single drug) वह क्या कैसी "धातुपाचकें" है, उनका उपयोग करके, दो चार रिजल्ट लेकर दिखाओ। खालमुंडी पाताळ धुंडी (deeply engrossed/overly focused) प्रकार चल रहे होते हैं बस।

👇🏼

On a lighter note...

ये क्या जगह है दोस्तों,

ये कौन सा दयार है

हद-ए-निगाह तक जहां

गुबार ही गुबार है ...

ये क्या जगह है दोस्तों 🤔

https://youtu.be/GW-nYoihQaY

👆🏼

After 10 years ... reading & writing, in various Ayurveda groups 😇


7.

... और क्या वह "मीमांसा शास्त्र" के आधार पर एक्स्प्लेनेशन किया, इसलिए उसकी प्रशंसा करनी है ??? 

किसे समझता है मीमांसा शास्त्र!? 

जिन्हें मीमांसा शास्त्र नहीं समझता, उनके सामने कितना भी आप बताएं तो भी, उन्हें आप सच बता रहे हैं या झूठ, गलत या सही, उचित या अनुचित, अपूर्ण या संपूर्ण (complete) यह कैसे मालूम पड़ेगा ???


इंग्लिश समझने वाले सब लोगों के सामने कोई मराठी में जाकर शुद्ध मराठी ज्ञानेश्वरी का निरूपण बताए कि ऐसा है तो, क्या वह इंग्लिश लोगों को मालूम पड़ेगा कि, आपने गलत बताया या सही?


इसलिए वह क्या, जो मूल लेख हैं, वह मीमांसा शास्त्र के अनुसार बताए, उससे हमें क्या फर्क पड़ता है ??? 


8.

आयुर्वेद के नियमानुसार, आयुर्वेद की संहिता श्लोक, विषय, अधिकरण, क्रमांक के अनुसार, यह तथाकथित ज्वरपंचकषाय = "धातु पाचक" कहलाने वाले श्लोक प्रक्षिप्त हैं ...


9.

और प्रक्षिप्त न भी हों …

तो भी उन्हीं श्लोकों से ...

अमुक कषाय = अमुक धातु के लिए, 

ऐसा 1:1 सिद्ध नहीं होता... 


10.

क्योंकि मूलतः ही पाँच विषमज्वर ये, अमुक पाँच(/छह 🙃😇) धातुओं से एक को एक 1:1 सुसंगति से होते हैं, ऐसा शास्त्रीय रूप से लिख रखा ही नहीं गया है।


द्वादशैते समुद्दिष्टाः सन्ततस्याश्रयास्तदा ।

अन्येद्युष्कं ज्वरं कुर्यादपि संश्रित्य शोणितम् ॥६५॥

मांसस्रोतांस्यनुगतो जनयेत्तु तृतीयकम् ।

संश्रितो मेदसो मार्गं दोषश्चापि चतुर्थकम्


इस अनुसार तो, वह अनिश्चित (randomn) ऐसा ही है।


11.

खैर, उसके भी परे, पिछले 20,30,50,70 वर्षों में किसने विषमज्वर देखे है?? 

टेंपरेचर आने के बाद वह कितने इंटरवल से आते हैं ??

एक दिन छोड़कर, दो दिन छोड़कर ...? 

इतना देखने के लिए पेशेंट के पास समय/संयम कहाँ है??? 

तब तक वह काउंटर पर जाकर पेरासिटामोल लेकर आता है! 


12.

नहीं तो ... "चरकस्तु चिकित्सिते" कहने वाले सारे आयुर्वेदिक वैद्य ट्रिकी 😬 देते हैं!!! 😆🤣 (कौन से तीन भुवनों में कीर्ति फैली उस ट्रिकी की, किसे पता??? 

पड़ोस की 10 सोसाइटी में पूछा तो एक को भी त्रिभुवन कीर्ति नहीं मालूम... और कहें त्रिभुवन कीर्ति... यह तो आश्चर्य की बात है 👎🏼)

तो ट्रिकी दे देते हैं... 


13.

इसलिए पेशंट और वैद्य यह दोनों ओर से, इस प्रकार का दीर्घकालीन इंटरवल रहकर, विषमज्वर निदान होना, यह मूलतः संभव ही नहीं है... 

वहाँ आप उसके ऊपर के ज्वर पंचक कषाय उपयोग करेंगे और फिर वह सिद्ध होगा... 

यह बऽऽऽऽऽऽहुत दूर की बातें... 

इन जैसी सारी आश्रयासिद्ध (unproven/dependent on unproven ground) बातों पर ढाँचे खड़े करना, हम कब बंद करेंगे , कौन जाने!!!


14.

बाकी... लेख, विशेषांक (special issue), रिसर्च पेपर, वेबिनार, सेमिनार, निरूपण के लिए यह चलने दीजिए। उसके लिए यह सब चलन वाला सिक्का (currency), पर्याप्त खाद्य, कागजी घोड़े के रूप में ठीक है 😬😇🙃


15.

मूलतः गड़बड़ी ऐसी है कि ...

जिनके शमन के लिए यह पाँच कषाय आए हैं (धातु "पाचक" "कहे" जाने वाले)

वह जो पाँच विषमज्वर हैं

वह अमुक धातु में, अमुक ही विषमज्वर होता है, ऐसा भी निश्चित नहीं है

इसलिए "अमुक कषाय" यह "अमुक धातु के लिए है”, ऐसा ही "मूलतः निश्चित नहीं है"


16.

देखें 

👇🏼

दोषा गुरवो रसवाहिभिः ॥५३॥

सर्वदेहानुगाः स्तब्धा ज्वरं कुर्वन्ति सन्ततम् ।


संतत में , रसवह स्रोतस् के द्वारा, पूरे देहभर जाते हैं ... सिर्फ रसधातु नहीं


द्वादशैते समुद्दिष्टाः सन्ततस्याश्रयास्तदा ।


संतत "सिर्फ रस में नहीं" ... बल्कि 12 भावों में होता है


17.

रक्तधात्वाश्रयः प्रायो दोषः सततकं ज्वरम्


रक्त = संतत ✅ ऐसा लगेगा 


लेकिन आगे देखें

अन्येद्युष्कं ज्वरं कुर्यादपि संश्रित्य शोणितम् 😇


18.

फिर और विचित्र बाद देखिये

अन्येद्युष्कं ज्वरं दोषो रुद्ध्वा मेदोवहाः सिराः ॥६३॥


अन्येद्यु = मांस ❌️ 😇 मेद ✅️😬 ... 

तो फिर अब, मांसपाचक, ठीक कौन सा 🙃🤔❓


19.

सप्रत्यनीको जनयत्येककालमहर्निशि ।

दोषोऽस्थिमज्जगः कुर्यात्तृतीयकचतुर्थकौ ॥६४॥


अस्थि मज्जा = तृतीयक & चतुर्थक both ✅️= मेद नहीं है क्या?... 


20.

तृतीयक चतुर्थक ये दोनों अस्थि मज्जा से यानी दोनों से होते हैं , 

या एक अकेले , एक एक से, क्या पता???


21.

गतिद्‌र्व्येकान्तराऽन्येद्युर्दोषस्योक्ताऽन्यथा परैः ।

अन्येद्युष्कं ज्वरं कुर्यादपि संश्रित्य शोणितम् ॥६५॥

अन्येद्यु = रक्त ✅️, मांस ❌️


22.

मांसस्रोतांस्यनुगतो जनयेत्तु तृतीयकम् ।

तृतीयक = मांस✅️ मेद❌️


23.

संश्रितो मेदसो मार्गं दोषश्चापि चतुर्थकम्

चतुर्थक = मेद✅️ अस्थिमज्जा❌️


👆🏼

ऐसे उपलब्ध "अधिकृत संदर्भों" के कारण ...

जो प्रचलित "यह काढ़ा और यह धातु", 

ऐसी स्थापित व्यवस्था है, 

वह वैसी सुसंगत एवं शास्त्रीय संदर्भ अनुसार योग्य नहीं है, 

यह ध्यान में आएगा ही।


24

किसके रिजल्ट आते हैं?? कैसे??? 

उसका ऑब्जेक्टिव्ह असेसमेंट है क्या? 

अकेला धातुपाचक single drug उपयोग किया क्या?? 

पेशेंट की संख्या कितनी??? 

निदान निश्चिति "धातु" इस स्वरूप में ही, की गई थी क्या??? 

धातु पाचक के रूप में जो कुछ अभी मान्य है, उसके अतिरिक्त, उसके साथ में, अन्य कोई कल्प दिए थे क्या??? 

जो रिजल्ट आए , उसका कालावधि कितना???

लक्षणों का रिकरन्स हुआ अथवा नहीं हुआ, इसका डाटा कितना??? 

तभी यह बोलना चाहिए... कि, फैंटैस्टिक रिजल्ट आते हैं... पेशंट को बहुत अच्छा लगा... यह तो सब्जेक्टिव्ह है ... सब बेकार का ... असिद्ध!!


25.

वह हम वर्षों से, पीढ़ियों से करते आए हैं... उसका कोई अर्थ नहीं... उससे शास्त्र की कोई प्रगति और समृद्धि नहीं होती... कृपा करके ऐसे भोंगळ (hollow/vague) और सब्जेक्टिव्ह साँचे से हम अब तो बाहर निकलें, कम से कम इस पीढ़ी ने तो!


26.

धातुपाचक तो होते ही नही है ... यह अनेको बार ससंदर्भ सतर्क स्पष्ट करने के बाद भी, विषमज्वर कषाय पंचक को धातुपाचक समझकर, व्यवहार करने की भ्रांती नष्ट नही होती है.



27.

अगर हम औषधों को केवल "बेचने" के साथ हि, औषध "सोचने" पर काम करेंगे तो ... linking ourself with scientific thinking, will be surely possible



28.

कषायाः शमयन्त्याशु पञ्च पञ्चविधान् *क्रमात्* (~ज्वरान्~) ।


सन्ततं सततान्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकान् ॥


चरक👆🏼




पञ्चैते सन्ततादीनां पञ्चानां शमना *क्रमात्* (~मताः।~)


वाग्भट 👆🏼




मूल श्लोक/ चरण लिखते समय "क्रमात्" यह शब्द लिखकर, स्पष्ट रूप से, "अमुक कषाय ... अमुक विषमज्वर के लिए" ऐसा लिख सकते थे✅️, लेकिन ऐसे लिखा हुआ नही है 



29.

और तो और ज्वर चिकित्सा वर्णन का क्रम भंग इन श्लोकविन्यास मे हुआ है , इसको पुन्हा एक बार सुसंगत सविस्तर संदर्भ और सतर्क प्रस्तुत करते है 




ये ⬆️ मै नही कहता, किताबों 📖📚 में लिखा है, यारो ...



30.

चरकोक्त विषमज्वर कषाय पंचक का, किसी भी धातू के साथ, निश्चित संबंध नही है, यह हमने स्पष्ट कर दिया है ... *चरक संहिता के ही संदर्भों के अनुसार!* 



31.

चरक के विषमज्वर यह धातु मे दोष का प्राबल्य इस संकल्पना पर आधारित है.



32.

इस कारण से संततादी पाच ज्वरों का निश्चित धातु अधिष्ठान वहां पर निर्धारित हि नही है



33

चरक की निम्नोक्त पंक्तिया देखेंगे, तो ये पता चलता है कि कौन सा भी विषमज्वर, किसी भी धातु मे आश्रित होकर निर्माण हो सकता है.

👇🏼

रक्तधात्वाश्रयः प्रायो दोषः सततकं ज्वरम् 


रक्त = सतत ✅️


अन्येद्युष्कं ज्वरं दोषो रुद्ध्वा मेदोवहाः सिराः ॥


अन्येद्युष्क = मेदस् 🤔⁉️ मांस ❌️


दोषोऽस्थिमज्जगः कुर्यात्तृतीयकचतुर्थकौ 


तृतीयक = अस्थिमज्जा 🤔 ⁉️ मेदस् ❌️


अन्येद्युष्कं ज्वरं कुर्यादपि संश्रित्य शोणितम् ॥


अन्येद्युष्क = रक्त 🙃😇🤔⁉️ मांस ❌️


मांसस्रोतांस्यनुगतो जनयेत्तु तृतीयकम् ।


तृतीयक = मांस 🤔⁉️ मेदस ❌️


संश्रितो मेदसो मार्गं दोषश्चापि चतुर्थकम् 


चतुर्थक = मेदस् 🤔 ⁉️ अस्थिमज्जा ❌️


34.

और तो और चरक संहिता मे हि,


संततज्वर केवल रसधात्वाश्रित न होकर, 


(संतत = रस ❌️)


संतत द्वादशाश्रयी ज्वर है ✅️ 

12 भाव आश्रय ✅️


संतत = 12 भाव = 7 धातू + 2 मल + 3 दोष


द्वादशाश्रयी का अर्थ केवल रसके साथ नही, अपितु द्वादश✅️ = 7 धातू 2 मल 3 दोषों के साथ जुडा है , ऐसे लेना चाहिए 


यथा धातूंस्तथा मूत्रं पुरीषं चानिलादयः ॥


द्वादशैते समुद्दिष्टाः सन्ततस्याश्रयास्तदा ।✅️


द्वादशेति सप्त धातवस्त्रयो दोषा मूत्रं पुरीषं च।


35.

उपरोक्त संदर्भ से यह पता चलता है की ,

5 विषमज्वरों का, क्रमशः 5 धातुओं से "निश्चित संबंध" चरक संहिता मे उल्लेखित हि नहीं है. 


36.

तो फिर … शास्त्रीय दृष्टी से , शास्त्रीय संदर्भ के अनुसार तो … अमुक धातू के लिए, अमुक धातू पाचक काढा ऐसे हो हि नही सकता !


37.

जो आज का व्यवहार चल रहा है , यह केवल एक कही सुनी, प्रस्थापित, रूढीजन्य, व्यावसायिक बात है और और इस विषमज्वर का, धातुपाचक का एवं शरीरस्थ धातूओं का कोई भी परस्पर निश्चित शास्त्रीय संबंध कुछ भी नही है ... ❌️🚫⛔️


38

इस कारण से जो आज प्रस्थापित लोकप्रिय , 

*किंतु अशास्त्रीय* एवं _मात्र रूढीजन्य_ धातुपाचक(🤔⁉️) व्यवहार मे उपयोग मे लाये जाते है, उन धातुपाचकों का वस्तुतः शास्त्रीय रूप मे, उस उस धातु से कुछ भी निश्चित संबंध है ही नही है ...नही है … नही है … !


39.

अगर हम औषधों को केवल "बेचने" के साथ हि, औषध "सोचने" पर काम करेंगे तो ... linking ourself with scientific thinking, will be surely possible✅️✅️✅️


40.

गुरुजी बायवारूं के प्रति कितना भी आदर क्यों न हो, उनके द्वारा रखे गए विचार को प्राथमिक कदम मानना चाहिए... अंतिम गंतव्य स्थान नहीं।


41.

आज धातुपाचक नाम की स्थापित संकल्पना और उसका व्यवहार एक असिद्ध अपरिक्षित अभ्युपगम assumed considered believed suposed अध्याहृत स्वीकृत ऐसे विचार पर आधारित है।


42.

भले ही उस मूल लेख में "उपरुग्ण पद्धति से देखा गया" ऐसा कहा गया हो, फिर भी सैंपल साइज़ और फॉलोअप अत्यंत छोटा, अपर्याप्त और अशास्त्रीय है।


43.

बायवारू गुरुजी के अनुभव और उसके पीछे के विचार कुछ भी हों... लेकिन अकेला धातुपाचक देकर उस धातु पर वृद्धि / क्षय के स्वरूप के या गुणांतर के स्वरूप के या वैगुण्य नाशक के स्वरूप के परिणाम, निश्चित रूप से और बार-बार प्राप्त हुए हों, तभी उस विचार को शास्त्रीयता और सार्थकता है।


44.

अन्यथा हम परंपरा से, श्रद्धा से, गतानुगतिक रूप से, पहले वाले उपयोग करते थे, इसलिए अभी के वैद्य... अभी के वैद्य उपयोग करते हैं, इसलिए आगे वाले वैद्य, इस पद्धति से धातुपाचक उपयोग करते हैं।


45.

“Right is right even if no one is doing it; wrong is wrong even if everyone is doing it.


46.

तथाकथित धातुपाचक के इन्क्लुजन और एक्स्क्लुजन के कारण, कुछ विशेष उल्लेखनीय परिणाम मिलते हों, तभी उसे उसका श्रेय देना, शास्त्रीय मानदंडों पर उचित होगा।


47.

अन्यथा व्यवहार, व्यापार, व्यवसाय, बिक्री, मार्केटिंग और लेख लिखना, व्याख्यान देना ... ऐसे अशास्त्रीय परंतु वाणिज्यिक व बोल-घेवड्या (बातूनी) उद्योगों के लिए वह ठीक है... वह वैसा ही चलता रहेगा।


48.

उपरोक्त संदर्भ से यह पता चलता है की …

5 विषमज्वरों का क्रमशः 5 धातुओं से "निश्चित संबंध" चरक संहिता मे उल्लेखित हि नहीं है. 


तो फिर अमुक धातू के लिए, अमुक धातू पाचक काढा ऐसे हो हि नही सकता, शास्त्रीय दृष्टी से , शास्त्रीय संदर्भ के अनुसार तो! 


49.

जो आज का व्यवहार चल रहा है , यह केवल एक कही सुनी, प्रस्थापित, रूढीजन्य, व्यावसायिक बात है और और इस विषमज्वर का, धातुपाचक का एवं शरीरस्थ धातूओं का कोई भी परस्पर निश्चित शास्त्रीय संबंध कुछ भी नही है ... ❌️🚫⛔️


50.

इस कारण से , विषमज्वर कषाय पंचक को धातुपाचक कहकर व्यवहार करना, अत्यंत अशास्त्रीय अनार्ष प्रक्षिप्त असत्य असिद्ध है.


लेखक ✍🏼 : 

वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे, 

एम डी आयुर्वेद संहिता, 

एम ए संस्कृत. 

आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे & नाशिक. 

मोबाईल 9422016871