Wednesday, 7 January 2026

हिंदी भाषा में # संहिता-उल्लेखित त्रिविध अथवा शार्ङ्गधर-उल्लेखित पंचविध पाक, उनका प्रयोजन, घन-सार, रसशास्त्र तथा दैनन्दिन स्वयंपाक रसोई गृह्य पाककर्म

संहिता-उल्लेखित त्रिविध अथवा शार्ङ्गधर-उल्लेखित पंचविध पाक, उनका प्रयोजन, घन-सार, रसशास्त्र तथा दैनन्दिन गृह्य पाककर्म स्वयंपाक रसोई**

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🖊⌨️ **लेखक :** वैद्य हृषीकेश बालकृष्ण म्हेत्रे

एम.डी. आयुर्वेद, एम.ए. संस्कृत

९४२२०१६८७१

आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे (रविवार) एवं नाशिक (मंगलवार से शुक्रवार)


**२७.१२.२०२५ शनिवार**


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### **१.**


स्नेहपाक को त्रिविध जानना चाहिए — मृदु, मध्यम और खर।

खरपाक अभ्यंग के लिए स्मरण किया गया है; मृदुपाक नस्य के लिए।

मध्यमपाक पान और बस्ति के लिए प्रयोज्य है।


☝🏼 **चरक संहिता**


तीन पाक होते हैं — **मृदु, मध्यम, खर**।


इनमें से **केवल “मध्यम पाक” ही आन्तरिक उपयोग हेतु स्वीकार्य एवं उपयोगी प्रतीत होता है।**


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### **२.**

Picture credit Google Gemini AI


शार्ङ्गधर में उपर्युक्त तीन के साथ दो अन्य पाकों का वर्णन मिलता है।


स्नेहपाक यदि जल जाता है तो दग्ध-पाक होता है, जो दाहकारक एवं निष्प्रयोजन है।


आम-पाक वीर्यहीन होता है, जठराग्नि का क्षय करता है और गुरु होता है।


शार्ङ्गधर में इसके अतिरिक्त, आम-पाक का अर्थ यह भी है कि **औषधि में जलांश शेष रहता है।**


अतः आम-पाक **गुरु = कठिन पाच्य एवं जठराग्नि को दुर्बल करने वाला** होता है।


और **दग्ध-पाक** का अर्थ है — अग्नि की अधिकता (काल या मात्रा में) के कारण, जलांश के साथ-साथ **औषध द्रव्य भी जलकर नष्ट हो जाता है**।

इसलिए दग्ध-पाक **निष्प्रयोजन एवं दाहकारक** होता है।


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### **३.**


यद्यपि प्रथम दृष्टि में ये त्रिविध या पंचविध पाक केवल स्नेहकल्पना के लिए प्रतीत होते हैं, **वास्तव में ये सभी औषध कल्पनाओं पर लागू होते हैं** — अर्थात् अरिष्ट, अवलेह, गुटी, वटी एवं क्वाथ पर भी।


इतना ही नहीं, आधुनिक **कल्प = शर्करा कण (जैसे प्रसिद्ध शतावरी कल्प)** भी इसी के अंतर्गत आते हैं।


और गुटी-वटी निर्माण में भी **बलाधान प्रक्रिया हेतु यह आवश्यक है**।


👇🏼

अग्नियों द्वारा पकाकर जब रस निकल जाए, तब उसे “अनुपदग्ध” रूप में ग्रहण करना चाहिए।

(चरक चिकित्सा १/३/३)


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### **४.**


चाहे स्नेह हो या अन्य कोई औषध निर्माण, **यदि थोड़ा भी जलांश शेष रहता है**, तो कुछ ही घंटों/दिनों में खट्टा गंध, किण्वन, सड़न, फफूँद, कवक वृद्धि होकर वह **“फेंकने योग्य”** हो जाता है।


अतः **आम-पाक त्याज्य है।**


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### **५.**


और मृदु-पाक, उससे अत्यन्त समीप होने के कारण, **केवल नस्य के लिए ही उपयुक्त माना गया है**, क्योंकि नासिका एक कोमल, संवेदनशील, मर्म-सदृश स्थान है।


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### **६.**


दग्ध-पाक में **औषध स्वयं जल जाती है**, अतः वह निष्प्रयोजन एवं अनुपयोगी हो जाती है, इसलिए त्याज्य है।

और यदि प्रयोग किया जाए तो निश्चित रूप से दाह उत्पन्न करेगी, क्योंकि वह **विदग्ध अवस्था** में होती है — जली हुई, भस्मीकृत, चूर्णवत।


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### **७.**


खर-पाक, दग्ध-पाक से ठीक पूर्व अवस्था है; परंतु उसके समान उसमें भी दोष, वीर्य हानि एवं क्रिया-दुष्प्रभाव संभव हैं।

इसलिए उसका प्रयोग **केवल बाह्य उपचार, जैसे त्वचा अभ्यंग** के लिए कहा गया है — और वह उचित एवं समझने योग्य है।


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### **८.**


इस प्रकार प्रारम्भ के दो — **आम + मृदु**, और अंतिम के दो — **खर + दग्ध**,

या तो जलांश शेष रहने के कारण, या औषध जलने के कारण, **अधिक स्वीकार्य नहीं हैं**।


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### **९.**


अतः आन्तरिक उपयोग — अर्थात् पान, सेवन, निगलन एवं बस्ति — के लिए **केवल मध्यम-पाक**, जिसे अन्य ग्रन्थों में **“चिक्कण-पाक”** भी कहा गया है, वही उपयुक्त है।


यही वह बिन्दु है जहाँ **जल समाप्त होने और औषध जलने के बीच की अत्यन्त सूक्ष्म, अदृश्य, निर्णायक रेखा** होती है, जहाँ हाथ से अग्नि नियंत्रित कर ठीक उसी क्षण रोक पाना लगभग असम्भव है।


इसी कारण मध्यम/चिक्कण-पाक में मृदु से खर तक **सीमित मान्य विचलन** स्वीकार किया गया है — मानव त्रुटि के कारण — परन्तु वह आदर्श नहीं है।


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### **१०.**


संक्षेप में, जल माध्यम से औषध निर्माण में —

**यदि जल शेष → आम = गुरु, वीर्य अपूर्ण निष्कर्षण, जठराग्नि हानि।**


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### **११.**


दूसरी ओर, जल पूर्णतः समाप्त होने के बाद भी यदि अग्नि चलती रही और औषध जल गई — तो वह निष्प्रयोजन एवं दाहकारक हो जाती है।


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### **१२.**


आम-पाक और पूर्ण आदर्श मध्यम-चिक्कण-पाक के बीच **मृदु-पाक सीमित स्वीकार्य** है।


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### **१३.**


पूर्ण मध्यम-चिक्कण-पाक और दग्ध-पाक के बीच **खर-पाक केवल बाह्य उपयोग हेतु सीमित स्वीकार्य** है।


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### **१४.**


आधुनिक उन्नत औषध निर्माण उद्योग निश्चित रूप से **औषध जलने से ठीक पहले के क्षण** को पहचानकर, अग्नि को सटीक रूप से रोक सकता है।


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### **१५.**


अन्यथा, यदि जलांश शेष रहा, चाहे गुटी-वटी हो, स्नेह हो, या आसव-अरिष्ट — **कुछ ही दिनों में खट्टा गंध एवं फफूँद उत्पन्न हो जाती है।**


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### **१६.**


यदि जल के साथ औषध भी जल गई, तो क्वाथ घन-सार की ओर जाता है; परंतु अनेक लोग अनुभव करते हैं कि ऐसा घन-वटी बाद में चिपचिपा या नरम हो जाता है।

अतः घन-सार वास्तव में क्वाथ का **दग्ध-पाक अथवा कम से कम खर-पाक** है — आन्तरिक उपयोग हेतु नहीं।


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### **१७.**


यदि शर्करा-आधारित कल्प दग्ध-पाक में चला जाए, तो **उससे बड़ा मानसिक कष्ट कुछ नहीं**!

कण निर्माण के समय मन्द अग्नि एवं निरन्तर चलाना अत्यन्त कौशलसाध्य है — अन्यथा वह पत्थर-सा कठोर हो जाता है।


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### **१८.**


यदि स्नेह-कल्पना दग्ध-पाक में चली जाए, तो **तेल पर जले हुए काले कण तैरने लगते हैं।**


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### **१९.**


यदि आसव-अरिष्ट खर-पाक में चला जाए, तो वह **विदग्ध = शुक्त (खट्टा)** हो जाता है।


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### **२०.**


केवल औषध निर्माण में ही नहीं, बल्कि पाचन में भी **विदग्ध अजीर्ण का उपचार वमन है।**

पित्तप्रधान होने पर भी विरेचन नहीं कहा गया — अर्थात् उसे ऊपर की ओर बलपूर्वक निकालना होता है।


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### **२०-अ.**

Picture credit ChatGPT AI 


यही **दो और तीन = पाँच पाक**, प्रतिदिन त्रिकाल, स्वयंपाक करते समय भी —

**रोटी, भाजी, दाल-चावल, पुरण, कुरडई, भजिया, शंकरपाले, अनारसे, यहाँ तक कि ऑमलेट और पिज़्ज़ा** —

इन सभी में भी दिखाई देते हैं।


इसका अनुभव **हर खाने वाले ने**, और वास्तव में **विशेष रूप से हर पकाने वाले ने** किया होता है।


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### **अस्वीकरण**


लेखक पूर्णतः निरपवाद होने का दावा नहीं करता।

ये व्यक्तिगत दृष्टिकोण एवं समझ हैं; त्रुटियाँ सम्भव हैं और स्वीकार्य हैं।

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