आयुर्वेद : एक कला/Art या शास्त्र/science?
🖊 वैद्य हृषीकेश म्हेत्रे
एम डी आयुर्वेद, एम ए संस्कृत
आयुर्वेद क्लिनिक @ पुणे & नाशिक
6.1.2026
9422016871
🎯
This is what I intend to *ESTABLISH*. ✅
यही वह बात है, जिसे मैं *स्थापित* करना चाहता हूँ। ✅
आयुर्वेद के क्षेत्र में प्रायः यह देखा जाता है कि *कोई एक ही वैद्य अत्यंत अधिक सफल हो जाता है*। जिन रोगियों का उपचार वह *"एक ही वैद्य"* सफलतापूर्वक कर पाता है, वैसा उपचार *"अन्य अनेक अथवा बहुसंख्य वैद्य"* नहीं कर पाते।
इसी कारण वह *एक वैद्य* अत्यधिक सफल, लोकप्रिय और कीर्तिमंत बन जाता है। यद्यपि यह वैयक्तिक उपलब्धि के रूप मे उस एक वैद्य के लिए अभिमानास्पद और अभिनंदनीय है ...
तथापि... *शास्त्रीय दृष्टि से यह स्थिति न तो हितकारी है, न उचित है और न ही प्रगतिशील*।
किसी भी क्षेत्र में यदि *केवल एक ही व्यक्ति अत्यंत सफल होता है*, तो यह उस क्षेत्र के *कला होने का लक्षण* है, "न कि शास्त्र/science होने का"।
शास्त्र (Science) वह होता है जो *सभी को, सभी काल में, समान अनुभव और समान परिणाम* देता है।
जैसे, बटन दबाने पर fan, iorn/इस्त्री, फ्रीज, AC, TV चालू या बंद हो जाता है, यह शास्त्र है।
जिस cricket ground पर तेंडुलकर शतक/century बना सकता है, वही पर ... उसी cricket ground पर, एक सामान्य व्यक्ति क्लीन बोल्ड होता है, यह *व्यक्तिगत कला* है।
यदि आयुर्वेद वास्तव में *शास्त्र* है, तो उसकी *अनुभूति, प्रमाण, परीक्षण और पुनरावृत्ति* सभी वैद्यों और सभी रोगियों के लिए समान होनी चाहिए।
अतः जब *निदान निश्चित हो*, तो *उपचार भी निश्चित होना चाहिए*, और *निश्चित औषधियों से निश्चित परिणाम अवश्य प्राप्त होने चाहिए*।
इसी को *प्रोटोकॉल* कहा जाता है।
इसी कारण *मॉडर्न मेडिसिन शास्त्र (Science) है, कला नहीं*।
इसलिए मॉडर्न मेडिसिन में ऐसा नहीं होता कि, केवल एक ही डॉक्टर अत्यंत सफल हो, बल्कि *विश्वभर में असंख्य डॉक्टर समान प्रकार के रोगियों का सफल उपचार करते दिखाई देते हैं*, बिना भाषा, प्रदेश, देश या वंश की किसी सीमा के।
अतः यदि आयुर्वेद को *शास्त्र =science बनना है*, तो उसे *सभी को, सभी काल में, सभी स्थानों पर समान प्रमाण और अनुभूति* देनी होगी।
परंतु वर्तमान में आयुर्वेद क्षेत्र में ऐसा नहीं होता।
इसके विपरीत, *कोई एक ही आयुर्वेद प्रॅक्टिशनर अत्यधिक सफल और प्रसिद्ध हो जाता है*।
इसी कारण आज आयुर्वेद की स्थिति *कला के समान* है, "शास्त्र/science के समान नहीं।"
उदाहरणार्थ...
नाडी देखने मात्र से बहुसंख्य आयुर्वेद चिकित्सकों को कुछ भी स्पष्ट रूप से समझ में नहीं आता, जबकि कुछ ही लोग वात-पित्त-कफ तथा उनके पाँच-पाँच प्रकार भी जान लेने का दावा करते हैं ...*यह कला है, शास्त्र नहीं*।
फिर लोग पुरुषं पुरुषं वीक्ष्य पर्सनॅलाईजड मेडिसिन, कस्टमाइज्ड ट्रीटमेंट की कॅसेट बजाने लगते है गुहार लगाते है, और यही विविधता आयुर्वेद का सौंदर्य है ऐसा गरियाते है.
शास्त्र मे ही अमुक हेतू समूह से अमुक लक्षण समूह निर्माण होता है, उसे अमुक रोग कहते है, उस पर अमुक चिकित्सा सूत्र / अमुक चिकित्सा अनुक्रम और अमुक चिकित्सा कल्प औषध समूह ... "यह यदि अध्याय मे लिखा हुआ है" ... तो सारा स्टॅंडर्ड डेव्हिएशन, विभिन्नता, कष्टमायझेशन, पर्सनलायझेशन, यह सब मान्य करने के बाद भी, कुछ तो समानता शेष रहती होगी, जिसके आधार पर, शतकों पहले ही, अध्याय में, उस "सामान्य & निश्चित common & fixed"; हेतु लक्षण औषध, इस त्रिस्कंध के आधार पर लिखे गये हैं.
"यस्य कस्य तरोर्मूलम्
येन केनाऽपि मिश्रितम्। यस्मै तस्मै प्रदातव्यं ... यद्वा तद्वा भविष्यति" ... इस random unpredictable uncertainty से
*इदमेवौषधम् अस्मै , अनेनैव हि मिश्रितम् ।*
*कालेsस्मिन्नेव दत्तम् स्यात् , इदमेव भविष्यति ।।*
यहां तक हम कभी पहुचेंगे भी???
इसीलिए *म्हेत्रे आयुर्वेद* *सप्तधा बलाधान टॅबलेट* की संकल्पना को स्थापित करने, उसे दृढमूल करने और *सर्वमान्य रूप में प्रसारित* करने का प्रयास कर रहा है।
क्योंकि इसके माध्यम से *आयुर्वेद समाज में शास्त्र के रूप में स्वीकार और प्रतिष्ठित होगा*।
*सप्तधा बलाधान टॅबलेट* के द्वारा, *प्रस्थापित निदान* वाले सभी रोगियों में *समान और निश्चित परिणाम* प्राप्त होंगे।
इस प्रकार केवल *वैद्य म्हेत्रे* ही सफल, लोकप्रिय और कीर्तिमान न बनकर, बल्कि *इस चरकोक्त आयुर्वेदीय शास्त्रीय संकल्पना को अपनाने वाले सभी वैद्य*,
प्रस्थापित निदान हेतु प्रस्थापित उपचार करने में *सक्षम होंगे*,
निश्चित परिणाम प्राप्त करेंगे,
और *सभी वैद्य सफल होंगे*।
फलस्वरूप, मॉडर्न मेडिसिन की भाँति, *आयुर्वेद समाज में शास्त्र = science के रूप में स्वीकृत और प्रतिष्ठित होगा*।
अतः यदि *“म्हेत्रे आयुर्वेद” नाम* प्रसिद्ध होने के बजाय, *“सप्तधा बलाधान टॅबलेट ” की संकल्पना* को आप जैसे अनेक सहकर्मी आयुर्वेद चिकित्सक अपनाते हैं, तो यह संकल्पना *सभी को सफल बना सकती है*।
क्योंकि
*“मात्रा-कालाश्रया युक्तिः, सिद्धिः युक्तौ प्रतिष्ठिता”*
अर्थात् निश्चित मात्रा और निश्चित काल पर आधारित युक्ति में ही सिद्धि निहित होती है।
*सप्तधा बलाधान टॅबलेट* "निश्चित मात्रा और निश्चित कालावधि" पर आधारित उपचार संकल्पना है,
अतः यह *सिद्धि अर्थात् निश्चित सफलता* प्रदान करती है।
यह व्यक्ति-सापेक्ष नहीं, बल्कि *सार्वत्रिक* है,
और *सभी वैद्यों को सफलता प्रदान करने में सक्षम* है।
इस प्रकार यह *चरकोक्त सप्तधा बलाधान संकल्पना* आयुर्वेद को *सार्वकालिक और सार्वत्रिक रूप से शास्त्र (Science) के रूप में प्रतिष्ठा* प्रदान करेगी।
वैद्य हृषीकेश म्हेत्रे
एम डी आयुर्वेद, एम ए संस्कृत
आयुर्वेद क्लिनिक @ पुणे & नाशिक
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