ज्वर : कन्फ्युजन ही कन्फ्युजन!😇
ज्वर जो उष्मा के बिना नही हो सकता, और जो ऊष्मा पित्त के बिना नही हो सकता, वह ज्वर, वात और कफ ऐसे दो शीत गुण के दोषों से होता है!!
पित्त ज्वर मे लिखा है कि "द्रवत्वात् अग्निम् उपहत्य"... तो वातज और कफज ज्वर में अग्नि का उपहनन "कैसे" होता है, ये क्यूं नही लिखा?? वहां अपने आप ही, "जादू से" अग्नी उपहनन होता है?
फिर वात अग्नि को "केवलम्" = पूरी तरह से पक्तिस्थान से खींच कर = घसीट कर = "निरस्य" ले जाता है ... ठीक है ! वात चलगुण है तो ले जाता होगा. लेकिन पित्त अग्नि को कैसे ले जाता है? पित्त & अग्नि तो एक ही है!!! पित्त ने अगर द्रवत्व के कारण अग्नि का हनन किया है , तो वहां से और कहीं पर जायेगा कैसे ??
और कफ जो आत्यंतिक स्थिर है मंद है, वो किसी चीज को स्वयं ले कैसे जा सकता है???
अकेले वाग्भट ने ये हिम्मत दिखाई है कि "आमम्-अनुगम्य" क्यू की आमाशय में आम ही होता है ... पर चरक ने लिखा है कि, आमाशय में "आद्य आहारपरिणामधातु रसनामानम् अन्ववेत्य" ... अरे भाई, रस नाम का आहार परिणाम धातू आमाशय मे कहा से होगा ... जब तक पक्व नही होगा, "पक्व आशय" मे नही आयेगा, तब तक उसे "आहार परिणाम आद्य रस धातु" कैसे कहेंगे ???
बाकी आहार से आहार रस और आहार रस से रसरक्तादि धातु निर्माण होते है... या सीधा आहार से ही रस धातु निर्माण होता है, ये तो कन्फ्युजन है ही! कभी देखे जरा चरक सूत्र 28 & चचि15 मे कितना कन्फ्युजन है !?
अगर ये ज्वर संप्राप्ति के अनुसार, आमाशय मे ही आहार परिणाम आद्य धातु रस निर्माण होने वाला है, तो रसाग्नि किस पर काम करता है भाई???
दो ही स्रोतस् क्यू "पिधाय" = बंद होते है? बाकी आजूबाजू के, आगे पीछे के, रक्त मांस के बंद क्यू नही होता? पुरीषवह मूत्रवह क्यूं बंद नही होता ? और स्वेद वह बंद होता है, तो मेदोवह क्यू नही बंद होता ???
ठीक है, स्वेद बंद/अवरोध होकर ज्वर होता है और पित्त ज्वर मे स्वेद नाम का लक्षण होता है 🤣, ये कैसे होता है ?! अगर स्वेद अवरोध, ज्वर का प्रत्यात्मलक्षण है, ज्वर & पित्त दोष अविना भाव संबंध है, तो ऐसे पित्तज्वर में (स्वेदावरोध की जगह) स्वेद यह लक्षण कैसे आता है ??
और सबसे विचित्र बात ये है कि वातज पित्तज कफज इन् सभी ज्वरों के लक्षणों मे ज्वर का उल्लेख ही नही है ... सारे लक्षण वात दोष के , पित्तदोष के , कफ दोष के वृद्धिके या वैगुण्य ने के है !
वैसे देखा जाये तो पूरे आयुर्वेद शास्त्र मे किसी व्याधी का लक्षण तो दिया ही नही है. आप कोई भी व्याधी देख लीजिए , तीनो दोषों से, हो सके तो संनिपात से, हो सके तो द्विदोषों से, ऐसे कम से कम 3 या 4 या 7 प्रकार का होता है ... अरे भाई , "सभी/हर/प्रत्येक/किसी भी" दोष से अगर वह व्याधी होने वाला है, तो उसको अपना कोई "स्वयं का मूलभूत संघटन basic constition" है की नही?! जैसे ... ज्वर = ऊष्मा = पित्त ✅️
प्रमेह कफ से ही होना चाहिये ... वात से पित्त से कैसे हो(सक)ता है ? रक्तपित्त पित्त से ही होना चाहिए , वात कफ से कैसे हो(सक)ता है और अगर सभी व्याधी सभी दोषों से होते है, तो वातव्याधी ... कफज पित्तच क्यूं नही होते है? केवल वातव्याधी वातज होते है , वे भी कफजन्य पित्तजन्य द्विदोषजन्य संनिपातजन्य वात व्याधी क्यू नही होते है?? रक्तपित्त वातरक्त क्यूं होता आहे , कफरक्त क्यू नही होता है? केवळ वातरक्त क्यू होता है, वातमेद वातमज्जा वातपुरीष वातमूत्र वातरस ये क्यू नही होते है ??
ज्वर तो छोड दीजिए, पूरी आयुर्वेद की नैदानिक संकल्पना ही, असिद्ध असत्य अशास्त्रीय वस्तुस्थिती से परे अवास्तविक अनरियलिस्टिक कल्पनारम्य, इस प्रकार की है.
आयुर्वेद मे वर्णित जो व्याधी है, वो प्रायः लक्षण है किसी अंडरलाईंग विकृती के! जिन्हें आयुर्वेद व्याधी समजता है ... ज्वर रक्तपित्त कास श्वास पांडू उदर ये सभी , एक्चुअली अन्य किसी रोग के ये लक्षण है.
ज्वर के निदान के अध्याय मे 44 श्लोक या परिच्छेद है, उसमे से 15 श्लोक तो निदान की सैद्धांतिक परिभाषा बताने मे लगे है! ... तो भाई, एक अलग अध्याय लिख लेते, जैसे वाग्भट ने लिखा... सर्व रोग निदान !!!
ज्वर के निदान मे जो 44 में से, 29 श्लोक लिखा है, उससे "4.75 गुना ज्वरनिदान" तो आपने ज्वर के "चिकित्सा के अध्याय" मे लिखा है.
चिकित्सा स्थान मे और बडी विचित्र बात देखिये, निदान स्थान का पहला अध्याय ज्वर है, लेकिन चिकित्सा का पहला अध्याय रसायन ... कितना विचित्र क्रमभंग है!!!
ज्वर चिकित्सा का वर्णन 3rd अध्याय में है. आयुर्वेद के जो अंतिम दो अंग है, वो काय चिकित्सा के आद्य & सबसे महत्वपूर्ण रोग की चिकित्सा के पहले, "क्रमभंग करके", बताने की क्या आवश्यकता है??
क्रमानुगतार्थम् यह शास्त्र का निकष/सद्गुण है !
इंद्रिय स्थान मे, व्यक्ति मृत्यु के समीप है, ऐसे लक्षण बताने के बाद, रसायन बताया थोडा बहुत ठीक लेकिन उसके बाद वाजीकरण बताने की क्या आवश्यकता है!? कम से कम उसको तो अंत मे रखते ... लेकिन नही !!!
मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं ... मेरी मर्जी !
कोकोनट मे लस्सी मिला के ... ऐसा सारा ये प्रकार है!
लेकिन लोगों को अत्यंत भक्ती आरती अभिषेक भंडारा प्रसाद नमस्कार लोटांगण इसमें ही मजा आता है, इंटरेस्ट है. चरक पर उंगली दिखाओ, उसके दोष दिखाओ, तो ये भक्त लोग जो है भडक 🔥 जाते है.
अरे, सोचो ना, कम से कम ... अगर उपर सिर मे ब्रेन 🧠 नाम का कोई चीज है तो ! वैसे तो आयुर्वेद में, शिर में ब्रेन होता है, ये पता ही नही है! इसमे आपकी भी कोई गलती नही है ...
आयुर्वेद के लोग ज्वर पर सेमिनार किये जा रहे है... उसमे "जयगंमत" नाम का रसकल्प दिया और मैने 103° डिग्री टेंपरेचर नीचे लाया ! अरे, कहां आयुर्वेद शास्त्र मे लिखा है "इतनी डिग्री/ फॅरनहाइट/centigrade" तक टेम्परेचर जाता है ?! स्वयं का कर्तृत्व(?) सिद्ध करने के लिए मॉडर्न मेडिसिन की परिभाषा का "बेंच मार्क" क्यूं "आवश्यक" लगता है, अगर आयुर्वेद के विषय मे सेमिनार कर रहे है तो!? क्यूं कि सभी को भी पता है, कि यदि वातज्वर पित्तज्वर संनिपातज ज्वर चतुर्थक प्रलेपक इस प्रकार का ज्वर ठीक किया, ऐसे स्टेज पर, माईक लेकर, बतायेंगे .... तो कोई तालियां applaud नही बजायेगा, किसी को कुछ हॅपनिंग / ग्रेट नही लगेगा! 😬
सेमिनार में तो ये बताना चाहिये था, क्या अभिन्यास हतौजस प्रलेपक संनिपातजन्य ऐसे "कितने" ज्वर ट्रीट किये है !? पूरी जिंदगी में किस्सी ने भी तृतीयक चतुर्थक ऍक्च्युली एक / दो दिन छोडकर होता है, ऐसा अनुभव नही किया है ... और ये ज्वर पर बाते करते रहते है.
ज्वर सबसे महत्त्वपूर्ण और आद्य व्याधी है और "चरकस्तु चिकित्सिते" ऐसे "भजन" भी करते है, उस ज्वर की चिकित्सा किसी ने भी आज तक चरक ने लिखी हुई है, वैसे नही की है. सबसे पहले त्रिभुवन कीर्ति , ज्वरांकुश, मृत्युंजय या जयगंमत ये रसकल्प देंगे और कहेंगे की "आयुर्वेदीय" चिकित्सा की! यह तो एक कंट्री में, दूसरे कंट्री के करन्सी नोट चलाने जैसा है.
किसी ने भी विषमज्वर; चतुर्थक तृतीयक ये, तथाकथित ज्वरपंचकषाय यह "अकेला" औषध प्रयोग करके ठीक किये है कभी???
बडी बडी बाते तो करेंगे, वह भी मॉडर्न की परिभाषा मे 103 डिग्री! 104 डिग्री! वो क्या आयुर्वेद की परिभाषा है? आयुर्वेद शास्त्रोक्त लक्षण है? क्या आयुर्वेद संहिता मे लिखा है, कितने डिग्री टेंपरेचर होता है? एक मिनिट मे नाडी कितने बार पल्सेट pulsate करती है, यही तक पता नही है! तो डिग्री ° centigrade Fahrenheit कहा से पता होगा? पारद का रसशास्त्र में रसकल्प हजारो निर्माण किया, पर इतनी सिधी साधी बात कभी समझ मे नही आयी की उससे टेम्परेचर गिन सकते है, संख्या परिमाण परादि चिकित्सा सिद्ध्युपाय ! चिकित्सा यैरविदितैर्न यथावत् प्रवर्तते ॥ ये सब केवल बडबड करने की बाते है... वाग्वस्तुमात्र!
और आज ज्वर के सेमिनार मे फॅरेनहाईट और डिग्री सेंटिग्रेड मे बात करते हो, यही कितना बडा वदतो व्याघात है! लेकिन किसी ने कुछ कहना नही! जो कर रहे है, वही ठीक ! कुछ गलत कर रहे है, ये समझने के लिए बुद्धी की आवश्यकता होती है, वो तो है ही नही किसी के पास, सिर्फ "जय हो" करना है और आरती करना है और वहां पर दिया हुआ प्रसाद खाकर घर जाना है ! क्या मिला सेमिनार अटेंड करके, भगवान जाने!! बाकी फोटो फ्लेक्स करने के लिए सोशल मीडिया तो पडा ही है!
या "ज्वर" ऐसा व्हाट्सअप 9422016871 पर करें


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