Thursday, 1 January 2026

स्त्री शुक्र क्या है? रज या आर्तव या और हि कुछ?

 स्त्री शुक्र क्या है? रज या आर्तव या और हि कुछ?

लेखक : ✍️🏼 वैद्य हृषीकेश म्हेत्रे, एमडी आयुर्वेद, एम ए संस्कृत, आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे & नाशिक. महाराष्ट्र. भारत. +919422016871 MhetreAyurved@gmail.com 

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उसके पहले प्रश्न यह होना चाहिये की शुक्र क्या है


मूलतः शुक्र यह शब्दप्रयोग ही पुरुषदेह की पहचान है 

क्योंकि किशोरावस्था समाप्त होने के पश्चात पुरुष मे वीर्य या रेतस् इस स्वरूप मे शुक्र का उदीरण प्रत्यक्ष रूप मे दिखाई देता है 


किंतु आज हमे यह ज्ञात है कि उसमे बीज स्वरूप शुक्र, अंश / अल्प मात्रा में तथा उस बीज का पोषण करने के लिए आवश्यक, शेष सांद्र या द्रवद्रव्य बहुत प्रमाण मे होता है 


जैसे एक अंडा ... जिसमे केंद्रस्थ भाग केंद्रस्थ अंश से आगे जन्म लेने वाले पक्षी का शरीर निर्माण होता है और तब तक के लिये उस केंद्रस्थ अंश के बाहर जो पारदर्शक सेमी सॉलिड सांद्र पदार्थ होता है, वह उसका पोषण करता है 


इसी प्रकार से स्त्री के शरीर मे या योनी मे शुक्र का सिंचन होने के पश्चात बीज स्वरूप पुरूष शुक्र अर्थात स्पर्म का ओव्हम तक (प्रवास करके उसका भेदन करके उसका फलन /फर्टिलिटी /फर्टीलायझेशन होने तक) जो उसको आवश्यक पोषण न्यूट्रिशन है , वह अन्य सांद्र (या बादमे द्रवीभूत होने वाले) अंश से प्राप्त होता है 


हमे स्त्री शुक्र समजना है तो ...


 जैसे छ धातूओं के पश्चात , मज्जा के पश्चात पुरुष शरीर मे, शुक्र निर्माण होता है ... वैसे स्त्री शरीर मे आर्तव निर्माण होता है, इसलिये एक मास के बाद पुरुष मे शुक्र और स्त्री मे आर्तव उत्पत्ती होती है , ऐसा संदर्भ आता है 


यह आर्तव भी इसी दो प्रकार का है इसमे एक बीज स्वरूप अर्थ है और जिसे हम प्रत्यक्ष हर महिने रस जन्य तीन दिन स्रवित होते हुए देख पाते है , वह रज नाम से जाने वाला उसका माध्यम स्वरूप अंश है 


किंतु यह स्पष्टीकरण भी, पूर्व के दो उदाहरणों के अनुसार उचित नही है 


जो मासिक स्राव आता है , जो रक्त स्वरूप रज आता है, वह गर्भाशय से आता है और वह बीज नही है 


और जो बीज स्वरूप आता है वो ओव्हरी से आता है उसका थोडा प्रवास फॅलोपियन ट्यूब से होता है और ये दोनो अवयव पूर्व आचार्य को ज्ञात नही थे


12 वर्ष से प्रायः रजप्रवृत्ती आरंभ होती है, जिसे मेनार्क कहा जाता है = ऋतुप्राप्ती , ऐसा प्राचीन ग्रंथो मे जैसे उल्लेख हुआ है. उसमे पहले कुछ मास तो केवल गर्भाशय से ही रक्तस्त्राव या रजप्रवृत्ती होती है और बीज निर्मिती तब पहले कुछ मास तक ओव्हरी में नही होती है 


जैसे पुरुष शरीर मे वृषण से "बीज स्वरूप शुक्र" और प्रोस्टेट तथा सेमिनल वेसिकल से "माध्यम स्वरूप शुक्र" ये एक साथ मिलकर एक समय जननेंद्रिय से उत्सर्जित होते है ... उस प्रकार से यह रज आर्तव & स्त्री बीज के विषय मे नही होता है 


वस्तुतः प्राचीन आचार्य को स्त्री बीज ओव्हरी से निर्माण होता है यह (संभवतः) ज्ञात ही नही था त्रिआवर्ता योनी और गर्भाशय इतना ही संभवता उन्हे ज्ञात था 


उसके परे फॅलोपियन ट्यूब और उसके परे दोनो और एक एक ओव्हरी होती है, यह उन्हे ज्ञात होना असंभव लगता है. 


जैसे यकृत का कार्य, सेमिनल वेसिकल की उपस्थिती, फुप्फुस कार्य, हृदय मे चार भाग, pancreas, cerebrum, cerebellum, thyroid इनकी उपस्थिती और उनका कार्य, वृक्क का रक्त से और मूत्र से सुनिश्चित संबंध ज्ञात नही था


उलटा वृक्क का संबंध मेद से है, क्लोम नाम का कोई अवयव है, उदकवह और अन्न वह यह 2 स्रोत अलग अलग होते है , अन्न वह और पुरीषवह स्रोत दो दो होते है... ऐसी कुछ प्रत्यक्ष प्रमाण से सहजही बाधित होने वाली कल्पनारम्य तार्किक बाते उन्हें सत्य लगती थी, तो ऐसी स्थिती मे प्राचीन काल के आचार्य को ओव्हरी फेलोपियन ट्यूब , ओव्ह्युलेशन ये पता होगा , यह असंभव है


रज या आर्तव को कुछ हद समझ पाना संभव है, उसे गर्भाशयांतर्गत इंडोमेंटरीयम में ब्लीडिंग तथा ओव्हम ओव्ह्युलेशन यहा तक समतुल्य आकलन कर सकते है 

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किंतु आज भी स्त्री शुक्र को समजना, यह दुष्कर ही है !


अगर हम स्त्री शुक्र की बजाय, यदि रजरूपी आर्तव को समझना चाहे तो सीधा उसे केवल गर्भाशय से होने वाला रक्तस्त्राव समजना चाहिए , मनुष्य की पुनरुत्पत्ती से प्रजोत्पादन से जननक्षमता से कोई सीधा संबंध नही है और वह रस का उपधातू है यहा तक उसको मान्य करना ठीक है 


स्त्री शुक्र यही संकल्पना समझनी है, तो जो ओव्हरीसे बीज = स्त्रीशुक्र के रूप मे आता है, हर महीने में एक बार अल्टरनेट ओव्हरी से, वही स्त्री शुक्र है , बीज स्वरूप मे और उसके साथ जो तत्कालीन अल्पकालीन न्यूट्रिशन पोषक अंश अत्यल्प मात्रा में होता है, उसे बीज माध्यम समझा जा सकता है 


स्त्री शुक्र और पुरुष शुक्र इन का, बीज और बीज माध्यम के अलावा, 

एक अन्य अर्थ ऐसा है की यदि प्रजोत्पादन के लिए बीज स्वरूप मे पुरुष या स्त्री के शरीर से उनकी व्यक्ती अभिव्यक्ती 12 और 16 साल के बाद होती है , तथापि शरीर तो जन्म से ही सप्तधातुयुक्त है, इसलिये 12 साल के पहले भी और पचास साल के बाद भी स्त्री शरीर मे भी शुक्र धातु तो होता ही है! चाहे रज आर्तव इनकी उपस्थिती हो या ना हो ! ऐसे भी गर्भिणी और सूतिका काल के शिशु को स्तनपान देने के काल मे कुछ महिनो तक रज प्रवृत्ती नही होती है और उसमे बीज स्वरूप स्त्री शुक्र अर्थात ओव्हरी से भी ओव्हम नही आता है, ऐसे सभी कालो मे भी अर्थात जन्म लेने के पश्चात प्रथम श्वास से अंतिम श्वास के पश्चात आने वाले मृत्यु तक , स्त्री और पुरुष दोनो शरीर मे , सातो धातू होते ही है , तो यह आजन्म आमरण , प्रथम श्वास से अंतिम श्वास तक , जो सप्तम धातू शुक्र स्वरूप, लिंग निरपेक्ष हर मनुष्य देहमें, स्त्री पुरुष उभय देह मे होता ही है, जो उसके शरीर के बाहर अन्य शरीर उत्पत्ती के लिये अर्थात अपत्य उत्पत्ती के लिये व्यक्त नही होता है, ऐसा जो शुक्र है जिसे हम आजीवन उपस्थित पुरुष शुक्र और आजीवन उपस्थित स्त्री शुक्र कहेंगे ... यह बीज स्वरूप + माध्यम स्वरूप ऐसे शुक्र या आर्तव से अलग है ... यह लिंगनिरपेक्ष, सर्व मनुष्य देहों मे उपस्थित होने वाला शुक्र, वह भाव है, जो "उस देह को, उसी देह मे" प्रतिक्षण प्रतिदिन प्रतिमास प्रतिवर्ष नया जन्म देता रहता है = इसका अर्थ क्या है? 


... कि यद्यपि शुक्र का श्रेष्ठ कर्म गर्भ उत्पादन बताया गया है , तथापि ...


आज से दो तीन जनरेशन पहले तक, एक दंपती को या एक स्त्री को, दस या बारा बार जीवन मे गर्भधारणा या अपत्यप्राप्ती होती थी, जो पिछली पिढी मे तीन या चार तक आ गई , हमारी पिढी मे एक या दो तक आ गई और आनेवाले पिढी मे संभवता हा एक या शून्य तक आ जायेगी!...


 तो अगर शुक्र का काम गर्भ उत्पादन यह है, तो इस प्रकार से दस बारा से एक शून्य तक गर्भधारणा अपत्य प्राप्ति की संख्या आ गई है तो, "यह शुक्र सप्तम धातु लिंगनिरपेक्ष मनुष्य देहमे स्त्री देह मे पुरुष देह मे क्या कार्य करता है , किस स्वरूप मे होता है?" 


... तो जो अन्न रोटी चावल सब्जी दाल हम रोज खाते है , वो तो अगले कुछ दिनो मे कुछ काल मे , शरीर से नष्ट हो जाता है . क्यूंकि शीर्यते तत् शरीरम्। 


फिर भी जो जनम से आगे पाच दस बीस 40 60 80 वर्षतक, "मै वही हू , मेरा हात वही है , मेरा नाक वही है , मेरा पाव वही है , मेरे शरीर पर कही अगर व्रण होकर वह भर गया है, तो उस व्रण का वैसे ही होना सालो तक उसी प्रकार से है ... यह "मेरा परिचय/identity मेरे जो भूतकाल मे थी, उसी प्रकार से आज वर्तकाल मे है & ... वर्तमान काल मे है, उसी प्रकार से आगे भविष्यकाल मे भी बनी रहेगी ... अनुबंध रूप मे रहेगी... इसको प्रति दिन प्रतिक्षण प्रति सप्ताह प्रतिमास प्रतिवर्ष "बनाये रखना", यह कार्य जो शरीरस्थ भाव करता है , उसे लिंगनिरपेक्ष मनुष्य देह का शुक्रधातु सप्तम धातु कहते है ... 


जो वंध्य है, इनके शरीर मे बीज निर्मिती होती ही नही, उनके भी शरीर मे शुक्र धातु तो होता ही है ॥


ऐसे बीज निर्मिती न होने वाले शरीर मे भी, शुक्र ...

उनके ही देह को, उनके ही अवयवो को, उनके ही धातुओं को , प्रतिदिन प्रतिवर्ष उसी स्वरूप मे , "प्रति रूप मे प्रतिबिंब की तरह आयडेंटीकली शरीर के अंतर्गत ही जन्म देता रहता है" 


जैसे मराठी मे गाना है , एकाच या जन्मी जणू फिरुनी नवे जन्मेन मी 


या 


गाईड फिल्म का जो गाना है ... आज फिर जीने की तमन्ना है , आज फिर मरने का इरादा है , उस प्रकार से खाये हुए अन्न से निर्माण होने वाले धाते कुछ काल के बाद , "मरते है" और खाये हुए अन्न से फिरसे नये धातु नया देह "जीता रहता है", तो यह मेरा ही... मेरे ही शरीर के अंदर ... नये से बनना , नये से उत्पन्न होना, नये से जन्म लेना ...यह कार्य निरंतर जो शरीरस्थ भाव करता है , उसे शुक्र कहते है.


इसलिये यह शुक्र, आज मॉडर्न सायन्स मॉडर्न बायोलॉजी के अनुसार, हर सेल का न्यूक्लिअस या जीन्स या डीएनए है, ऐसा समज सकते है.


रज या आर्तव... गर्भाशयस्थ मासिक स्त्राव स्वरूप रसजन्य उपधातु है इसीलिए उसका वर्ण रक्त है (हर उपधातू जिस धातू का उपधातू है उस धातू के अगले धातू के वर्ण का या स्वरूप जैसा होता है). यह तो बीज माध्यम स्वरूप भी नही है


रज नही , अपितु केवल आर्तव अर्थात ओव्हम , यह बीजरूप में अभिव्यक्त मॅनिफेस्ट होता है, जिसे पुरुष शुक्र के लिए चरक चिकित्सा 2 अंतिम पाद में रूपद्रव्य = (चरतो विश्वरूपस्य रूपद्रव्यम्) कहा गया है बीजरूप = रूपद्रव्य =स्त्री शुक्र है. 


रूपद्रव्यमिति रूपप्राक्तनकारणम्। एतेन, अव्यक्तस्यात्मनो व्यक्तशरीरनिर्वृत्तौ शुक्रं हेतुरित्युक्तं भवति। शुक्रं चेह प्रकरणागतत्वेनोक्तं; *तेन आर्तवमप्यात्मनो रूपद्रव्यं ज्ञेयम्॥*


इसीलिए ओव्हम को रज नही कहेंगे, क्योंकि उससे वस्त्र का रंजन नही होता है


मेंस्ट्रुअल ब्लीडिंग को ही रज कहेंगे क्योंकि उससे वस्त्र का रंजन होता है


ओव्हम को ही आर्तव कहेंगे, क्यू की वह ऋतु की तरह ही एक ओव्हरी मे दो महिने के बाद आता है


मेंस्ट्रुअल ब्लीडिंग को ही आर्तव नहीं कहेंगे क्योंकि वह तो हर महिने आता है 


किंतु ऋतु तो दो महीने के बाद आता बदलता है 


यद्यपी ऋतू बारा दिन का होता है , यह स्त्री देह के संदर्भ मे शारीर स्थान मे स्वीकृत स्व संज्ञा परिभाषा आयुर्वेद टर्मिनोलॉजी है


तथापि निसर्ग मे जो ऋतू होते है ये दो महिने के बाद बदलते है और एक्झॅक्टली उसी प्रकार से दो महीने के बाद उसी ओव्हरी मे फिरसे बीज उत्पत्ती होती है इसलिये ओव्हम को आर्तव कहना अधिक उचित है


और सबसे अंत में ...

जो इस प्रकार से ... ना तो, ब्लीडिंग = रज है 

ना हि अपत्य उत्पत्तीकारक बीजरूप रूप द्रव्य = ओव्हम है ...

वह स्त्री शुक्र जो स्त्री देह के प्रथम श्वास असे अंतिम श्वास तक आमरण स्त्री देह के अस्तित्व के आजीवन संपूर्ण कालावधी मे शरीर मे सर्वत्र उपलब्ध व्याप्त रहता है वह स्त्री शुक्र लिंगनिरपेक्ष मनुष्य देह मे उपस्थित प्राप्त अस्तित्व मे होने वाला हर सेल के केंद्र मे स्थित, न्यूक्लिअस या जीन्स या डीएनए, यही स्त्री शुक्र, निश्चित रूप से है


लेखक : ✍️🏼 वैद्य हृषीकेश म्हेत्रे, एमडी आयुर्वेद, एम ए संस्कृत, आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे & नाशिक. महाराष्ट्र. भारत. +919422016871 MhetreAyurved@gmail.com 


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