Thursday, 1 January 2026

रास्ना पंचक / सप्तक एवं आमवात & Rheumatoid Arthritis

रास्ना पंचक / सप्तक एवं आमवात & Rheumatoid Arthritis

लेखक ✍🏼 : वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे, एम डी आयुर्वेद संहिता एम ए संस्कृत. आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे & नाशिक. मोबाईल 9422016871

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1.

सप्तधातुगतवाते रास्नापञ्चक क्वाथः


रास्नाऽमृतामहादारुनागरैरण्डजैः शृतम् 

सप्तधातुगते वाते सामे सर्वाङ्गजे पिबेत्


2.

जङ्घावातादौ रास्नासप्तक क्वाथः


रास्नागोक्षुरकरण्डदेवदारुपुनर्नवा 

गुडूच्यारग्वधश्चैव क्वाथमेषां विपाचयेत् 

शुण्ठीचूर्णेन संयुक्तं पिबेज्जङ्घाकटीग्रहे पार्श्वपृष्ठोरुपीडायाम् आमवाते सुदुस्तरे 


रास्ना सप्तक एवं रास्ना पंचक तथा महारास्नादि ये नाम उच्चारण करते ही, हमे सर्वप्रथम आमवात ही स्मरण मे आता है


4.

अगर जनरल डिस्क्रीशन , ग्रॉस डिफरेन्सिएशन, सर्वसामान्य भेद करना है ... तो 


केवल वेदना हो तो, रास्ना पंचक देना चाहिए और 


वेदना के साथ, शोथ एवं डिफाॅर्मिटी हो तो, रास्ना सप्तक देना चाहिए ... क्यूकी सप्तक मे पुनर्नवा गोक्षुर आरग्वध ऐसे मूत्रल & अनुलोमक द्रव्य भी समाविष्ट है


5.

पेशंट की वेदना की तीव्रता, वय, व्याधि की क्रॉनिसिटी ड्यूरेशन इसके अनुसार इस रास्ना पंचक या सप्तक बलाधान टॅबलेट दो गोली तीन बार या तीन गोली दो बार भोजन के पश्चात देनी चाहिये (3 BD or 2 TDS)


अगर तीव्रता वय और क्रॉनिसिटी बहुत अधिक हो तो 6 tablets 3 बार ऐसे भी dose प्रारंभ के दिनो मे या सप्ताहो मे या 6 सप्ताह तक देना चाहिए !


6.

हर बार RA Factor पॉझिटिव्ह होना & पेशंट आमवात का होना, ऐसे थेरोटिकली कभी कभी होता भी है , ऐसे कभी कभी होता भी नही है ... क्लिनिकली जिनको आमवात है स्पष्ट रूप से, और लॅबोरेटरीकली भी RA फॅक्टर स्ट्रॉंग पॉझिटिव्ह हैं, ऐसे भी अनेक पेशंट होते है.


7.

मेरे प्रॅक्टिस में आमवात की सबसे दुष्कर केस ऐसी थी की ...

32 किलो वजन, वय वर्ष 38. 14 March 2016

मेन्सेस बंद, पूरा शरीर कृश, ब्रेस्ट पूरे के पूरे क्षीण होकर फ्लॅट हो गये है, 

दोनो हाथ डिफाॅर्मिटी के कारण मुड गये है, दोनों पांव डिफाॅर्मिटी के कारण मुड गये है, की करीब करीब जो पार्ष्णि /calcanius/ heel है, वो सामने की तरफ आ गई है 😳😳 ... इस कारण से किसी भी प्रकार का दैनंदिन कार्य तो छोड ही दीजिये, किंतु अपने स्वयं के कपडे पहनना, नाडी बांधना, बटन लगाना, चैन/हुक/बक्कल लगाना , यही संभव नही है ... इसलिये केवल एक गाऊन, शरीर पर पहना हुआ है, उसको उसके किसी रिश्तेदार ने, अपने हाथों मे उठाकर क्लिनिक तक लाया है 

और उसका आर ए फॅक्टर (RA Factor) उस समय 14 April 2016 के दिन 3560 इतना स्ट्रॉंग पॉझिटिव्ह था (normal value is <14), क्लिनिकली भी सभी मुख्य संधियों मे मणिबंध कूर्पर स्कंध मन्या पृष्ठ कटी जानु गुल्फ सभी जगह आत्यंतिक वेदना शोथ स्पर्श असहत्त्व ये सब था और ऐसे स्थिती मे जो की असाध्य / दुसाध्य है ... उसको ट्रीटमेंट शुरू की ... 


25.06.16 ... RA Factor 3080 ... मात्र दो महिने मे 480 से कम और लक्षण में काफी उपशम !



15.09.2019 ... RA Factor 2490 ... तीन वर्ष पश्चात और 400 से कम ... पहिले रिपोर्ट की तुलना मे 1070 से कम लक्षणों मे बहुत अधिक उपशम और आत्मविश्वास मे वृद्धी



21.11.2021 & 17.10.2022 ... ये बीच मे दो साल कोरोना के बीत गये ... RA Factor 650+ ! लक्षणों मे करीब करीब संपूर्ण उपशम



इतने वर्ष की निरंतर चिकित्सा पश्चात, धीरे धीरे धीरे पेशंट इम्प्रूव्ह होते होते, यहा तक आ गया की , उसका वजन 32 kg से 50 किलो से आगे चला गया , मेन्सेस पुनः नियमित रूप से शुरु हो गये, वय के अनुसार जो तारुण्य सुलभ स्तन का उन्नतत्व होना चाहिये वह पुनः स्थपित हुआ, पेशंट चलने फिरने लगा, सामान्य स्त्रियों की तरह सलवार कमीज कुर्ता दुपट्टा पहनने लगा, स्वयं रसोई/ स्वयंपाक तैयार करके अपने माताजी के लिए जो 70+ वर्ष की है, उसको खाने के लिए दो बार का भोजन तयार करके, पनवेल कामोठे, जहां पुणे मुंबई एक्सप्रेस हायवे समाप्त होता है, वहां से निकल कर, दो लोकल ट्रेन बदल कर, पनवेल से दादर, दादर से अंधेरी तक, जाकर अपना जॉब दिन भर करके, उसी क्रम से फिर से वापस आना , बीच मे जहा पर रेल्वे प्लॅटफॉर्म बदलने पडे, ब्रिज चढना उतरना पडे, ये सब सुकरता से कुशलता से करते हुए दैनंदिन जीवन यापन करना! क्लिनिकली, वह सभी वेदनाओं से लक्षणों से मुक्त और अपना दैनंदिन व्यवहार बडी कुशलता से सुकरता से करने मे सक्षम हो गयी! इसके बाद टॅबलेट का डोस धीरे धीरे कम करते चले गये!

उसके सोनोग्राफी के रिपोर्ट अच्छे है. उसके TSH, लिपिड प्रोफाईल के रिपोर्ट अच्छे है. उसका 2D Echo को अच्छा है ... ये सारे आवश्यक और संबंधित रिपोर्ट निरंतर अच्छे ही आते रहे है! ये सभी ओरिजनल रिपोर्ट हमारे पास उपलब्ध है.

आज उसके ट्रीटमेंट के भी दस साल हो गये है! तो इस प्रकार से क्लिनिकली इम्प्रूव्हमेंट आती है, किंतु यह भी प्रामाणिक रूप से बताना आवश्यक है, कि इसी वर्ष 14 . 9 . 2025 को किये हुए रिपोर्ट में भी उसका आर ए फॅक्टर 79 के आसपास है!!! अभी उसके शरीर पर कही पर भी, शोथ शूल स्पर्शासहत्व यह लक्षण नही, की उसको आमवात या वातव्यधि का पेशंट है ऐसा मान सके !


8.

तो कुछ मर्यादा तक, क्लिनिकली इतना इम्प्रूव्हमेंट हम देख सकते है! 

इससे थोडे कम तीव्रता के पेशंट: जिसमे ऐसे ही एक 50 वर्ष वय के पेशंट थे, जो डिझेल इंजिन मेकॅनिक थे, जीवन भर भारी भरकम इंजिन उठाना रखना रिपेअर करना किया था , उनके भी पांव मैने ऐसे देखे थे कि हम बचपन मे कहते है वैसे भूत की तरह = वह शूज पहना करते थे, तो सोल आगे की तरफ दिखते थे और शूज का जो फ्रंट है वो पीछे की तरफ!!! उनको चलना चढना उतरना मुश्किल था, वो अपने दोनो हाथ & दोनो पाव इनका उपयोग करके हमारे क्लिनिक के स्टेप्स चढते उतरते थे ! किंतु छह महिने की ट्रीटमेंट के पश्चात, इंजिन मेकॅनिक के जॉब पर पूर्ववत कुशलता के साथ काम करने लगे !


9.

तीसरी केस ऐसे थी की, पूरा समय व्हील चेअर पर बैठे हुए है, गाऊन पहने हुए है, कुछ करने को आता नही, उनके पति उनको खाना खिलाते थे ! लेकिन ट्रीटमेंट शुरू होने के तीन महिने के पश्चात, उन्होने मुझे रोहा अलिबाग यहा से फोन किया, कि मै आज 12 साल के बाद , रसोई मे किचन प्लॅटफॉर्म के पास खडी रहकर, पुरणपोळी बना रही हू और अपने पति को भोजन के लिये परोस रही हूं! अत्यंत अविश्वसनीय, आनंददायक और समाधानकारक!!! ऐसे कैसे कैसे पेशंट ठीक हुए है ... *और आज भी ठीक है* !


10 .

इनमे से कुछ पेशंट में क्लिनिकल इम्प्रूव्हमेंट पूरी तरह हो जाता है , किंतु RA फॅक्टर नॉर्मल को नही आता है, कुछ पेशंट में RA factor भी निगेटिव्ह हो जाता है, किंतु क्लिनिकली, कुछ सिम्प्टम्स, सीजन के अनुसार, खाने के अनुसार फ्लेयर के रूप में, उभरते रहते है! क्योंकि यह एक ऑटोइम्यून डिसीज है!

ये सारी इसकी मर्यादायें है !

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व्याधेस्तत्त्वपरिज्ञानं, वेदनायाश्च निग्रहः
एतत्त्वैद्यस्य वैद्यत्वं ; न वैद्यः प्रभुः आयुषः

11.

जब वचाहरिद्रादि, मै प्रयोग नही करता था और उस पर उतना कॉन्फिडन्स नही था, तब रास्ना पंचक /सप्तक सप्तधा बलाधान टॅबलेट इनका भरपूर उपयोग किया है !

 ये दोनो टॅबलेट मूल रूप मे सप्तधा बलाधान विधी से निर्मित करके म्हेत्रेआयुर्वेद MhetreAyurved द्वारा, अन्य सभी वैद्य सन्मित्रों के उपयोग के लिए उपलब्ध की गई है ✅️ जो सीधे हमार पुणे क्लिनिक से आपके पते पर कुरियर या स्पीड पोस्ट द्वारा भेज सकते है. पुणे मेट्र सिटी के अंदर और आसपास तो 1 hour doorstep delivery service   भी उपलब्ध है


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आज इनकी सप्तधा भावित बलाधान टॅबलेट का उपयोग करता हूं, तो वेदनाशमन के रूप मे प्रारंभिक दिनो मे इसका बहुत अच्छा परिणाम मिलता है! अनायास कुछ सप्ताह पश्चात ही वचाहरिद्रादि, वेदनाशामक दुरालभादि, द्रुतविलंबितगो पर शिफ्ट हो जाता हूँ... या ये टॅबलेट्स रास्ना पंचक / सप्तक के साथ जोड देता हूँ...

क्योंकि जितना शीघ्रकारित्व और जितना वीर्य वचाहरिद्रादि या द्रुतविलंबितगो या वेदनाशामक दुरालभादि इनके परिणाम से मुझे प्राप्त हुआ उतना, कोई परंपरागत प्रस्थापित लोकमान्य रास्ना सप्तक/ पंचक में, "कम से कम मुझे तो" प्राप्त नही हुआ 


12.

उसमे भी रास्ना की संदिग्धता बहुत अधिक रहती है! इसलिये जब रास्ना पंचक या सप्तक का प्रयोग करता हूँ, उसके साथ लशुन कल्प granules या लशुन आर्द्रक कल्प granules इनका प्रयोग करता हूँ


13.

तो जिनको परंपरा गत रूप में या ग्रंथोक्त अधिकार के रूप मे, क्लिनिकली आमवात के पेशंट मे रास्ना पंचक / सप्तक का प्रयोग करना है , अवश्य इसका प्रयोग करे 


14.

रास्ना पंचक / सप्तक मे, मैं स्वयं इतना ही भेद समजता हूं कि, जहाँ शोथ का अधिक्य हो , वहां पर रास्ना सप्तक का प्रयोग करना चाहिए 

और यहा शोथ के बिना, वेदना आधिक्य हो और व्याधिका कालावधी अधिक हो, वहा पर रास्ना पंचक का प्रयोग करना उचित होता है


15.

यह बता सकते है की शुरुआती कुछ दिनो मे, कुछ सप्ताह मे रास्ना पंचक / रास्ना सप्तक का प्रयोग करे और उसके बाद धीरे धीरे, यथा लक्षण उपशम वचाहरिद्रादि, वेदनाशामक दुरालभादि, द्रुतविलंबितगो इन से रिप्लेस करते है , तो अपेक्षा से भी अधिक शीघ्र और दीर्घकालीन लाभदायक परिणाम स्थायीरूप मे प्राप्त होता है 


16.

उपर के तीन केसेस बताये, वे सभी दीर्घकालीन पेशंट थे ,उन्होने ठीक होने की उम्मीद छोड दी थी ... किंतु वे सभी ठीक हुए और आज भी ठीक है !

सबसे नया पेशंट दस साल पुराना है ... बाकी के दो पेशंट पंधरा साल पुराने है! 

एक सज्जन तो ईश्वर के घर चले भी गये, किंतु उनके अंतिम समय तक, उनको फिर से कभी संधि शोथ, संधि वेदना इस प्रकार की कंप्लेंट नही हुई !!!

यह इन कल्पों के सप्तधा बलाधान विधी से निर्मित सामर्थ्य का परिणाम और सत्य सिद्ध सार्थकता है.


17.

रास्ना पंचक मे रास्ना गुडूची देवदार शुंठी और एरंड इनका समावेश होता है 


तथा रास्नासप्तक मे "आरग्वध पुनर्नवा और गोक्षुर" इनका समावेश है और "शुंठी" का क्वाथ मे प्रक्षेप, इस प्रकार से उल्लेख है, तो वस्तुतः रास्नासप्तक न होकर, रास्ना अष्टक इस प्रकार का योग बनता है!


महारास्नादि मे रास्ना + अन्य 25 घटकद्रव्य है, इसलिये इसका क्या परिणाम आता है ... और फिर इसके साथ प्रक्षेप के रूप में शुंठी/ पिप्पली/अजमोदा/ योगराज गुग्गुलु या एरंडस्नेह इनका उल्लेख आता है, जब की शुंठी पिप्पली और एरंड इनका समावेश मूल क्वाथ द्रव्यों मे भी है! तो इतने सारे घटकों पर किसकी क्या कार्मुकता होगी, इस दृष्टि से, इस पर बात करना दुष्कर है. इसलिये हम रास्नापंचक & रास्नासप्तक यहां तक सीमित रहेंगे. 


18.

रास्नाऽऽमपाचिनी तिक्ता गुरूष्णा कफवातजित् |

शोथश्वाससमीरास्रवातशूलोदरापहा |

कासज्वरविषाशीतिवातिकामयसिध्महृत् ||

रास्ना वातहराणाम् & एरण्डमूलं वृष्यवातहराणाम् ... च सू.25/40 यह सर्व ज्ञात है. 

कटु रसस्कंध के अपवाद द्रव्य अर्थात जो कटु रस होकर भी अवृष्य और वात कोपन नही है अर्थात वृष्य और वातहर है इसमे शुंठी, पिप्पली & लशुन का उल्लेख है. लशुन को तो अष्टांग हृदय उत्तर तंत्र 40 श्लोक 48-58 में, प्रभंजनं जयति लशुनः अर्थात भंजन करने की क्षमता होने वाले वात को भी लशुन जीतता है!


19.

वातहर गणों के वर्णन मे अष्टांगहृदय सूत्रस्थान 15 में पहला द्रव्य देवदार है, जिसे कुछ लोग भद्रदार्व्यादि गण कहते है

भद्रदारु नतं कुष्ठं दशमूलं बलाद्वयम्। 

वायुं वीरतरादिश्च विदार्यादिश्च नाशयेत्॥


21.

गुडूची कटुका तिक्ता स्वादुपाका रसायनी |

दोषत्रयामतृड्दाहमेहकासांश्च पाण्डुताम् ||


गुडूची त्रिदोषनाशक और आमनाशक भी है

गुडूची यह तिक्त रस में सर्वश्रेष्ठ द्रव्य है. 

और➡️ अस्थिक्षयजन्य विकारो मे गुडूची का या तिक्त रस क्षीरपाक उपयोगी होता है. 

➡️ अस्थि में वात का आश्रयस्थान है 

➡️ वातव्याधी & आमवात मे संधियों में वेदना होती है

➡️ संधी या अस्थियों से बनती है 

➡️ इस दृष्टी से गुडूची का स्थान पर, अवयव पर, धातु पर, और दोष पर परिणाम होता है


22.

तो ये पाचों द्रव्य वातनाशक भी है और आमनाशक भी! इसलिये सभी प्रकार के वातव्याधि तथा आमवात मे भी यह कार्यकारी होते है ।


23.

गोक्षुर और पुनर्नवा ये दोनो मूत्रल और आरग्वध सौम्य विरेचक है 


और अनुलोमन ही वात की मुख्य चिकित्सा है.


24.

अनुलोमन का अर्थ यद्यपि विरेचन का एक सौम्य प्रकार ऐसे लिया जाता है, तथापि अनुलोमन का अर्थ वस्तुतः अपान क्षेत्र के सभी भावों का सुकर उत्सर्जन यह होता है !


इसलिये पुरीष प्रवर्तन के साथ साथ, मूत्रप्रवर्तन यह भी वात अनुलोमन ही है! 


इसी कारण से, पुनर्नवा और गोक्षुर, यह इस प्रकार से वातानुलोमक है 


तथा पुनर्नवा मध्य पंचमूल में आती है 


और गोक्षर लघु पंचमूल आता है 


और ये दोनो बृंहण तथा वातनाशक है.


25.

आरग्वध यह बालकों के साथ साथ, सभी पेशंट के लिये मृदु अनुलोमन है अर्थात क्षोभ के बिना, आशय का क्षय या उद्वेग किये बिना अर्थात उस कारण से वात का प्रकोप किये बिना, यह मलानुलोमन वातानुलोमन = सौम्य विरेचन का काम करता है 


26.

योगरत्नाकर में भी आमवात का चिकित्सा सूत्र में भी विरेचन का ही उल्लेख करता है


लंघनं स्वेदनं तिक्त दीपनानि कटूनि च

विरेचनं स्नेहपानं बस्तयश्चाममारुते


27.

अगर वातव्याधी भी देखेंगे तो बस्ति के पहले भी विरेचन का ही उल्लेख चरक (चचि28) में आता है , जिस दुर्बल पेशंट को विरेचन नही दे सकते, "उसको" बस्ती देने के लिए लिखा है! 


क्रियामतः परं सिद्धां वातरोगापहां शृणु ।

केवलं निरुपस्तम्भमादौ स्नेहैरुपाचरेत् ॥७५॥

असकृत्तं पुनः स्नेहैः स्वेदैश्चाप्युपपादयेत् ॥८२॥

तथा स्नेहमृदौ कोष्ठे न तिष्ठन्त्यनिलामयाः ।

स्नेहन स्वेदन से काम ना बने तो ...

यद्यनेन सदोषत्वात् कर्मणा न प्रशाम्यति ॥८३॥

मृदुभिः स्नेहसंयुक्तैरौषधैस्तं विशोधयेत् (= विरेचयेत् because..⬇️

घृतं तिल्वकसिद्धं वा सातलासिद्धमेव वा ॥८४॥

पयसैरण्डतैलं वा पिबेद्दोषहरं शिवम् ।

👆🏼

उपरोक्त सभी द्रव्य/ योग/ उपाय ये विरेचन = अनुलोमन करने वाले ही है


स्निग्धाम्ललवणोष्णाद्यैराहारैर्हि मलश्चितः ॥८५॥

स्रोतो बद्ध्वाऽनिलं रुन्ध्यात्तस्मात्तम् "अनुलोमयेत्"।

"दुर्बलो योऽविरेच्यः स्यात्तं निरूहैरुपाचरेत्"॥


और आगे, यदि विरेचन देना संभव ही नही है, "तभी" निरूह का भी विकल्प दिया है! इसका अर्थ वातव्याधी चिकित्सा में निरूह या बस्ति यह मुख्य उपचार नही है ... "मुख्य उपचार अनुलोमन या विरेचन ही है"


पाचनैर्दीपनीयैर्वा भोजनैस्तद्युतैर्नरम् ।

संशुद्धस्योत्थिते चाग्नौ स्नेहस्वेदौ पुनर्हितौ ॥

स्वाद्वम्ललवणस्निग्धैराहारैः सततं पुनः ।

नावनैर्धूमपानैश्च सर्वानेवोपपादयेत् ॥

इति सामान्यतः प्रोक्तं वातरोगचिकित्सितम्


इसका अर्थ यह है की वात की पहली चिकित्सा = विरेचन अर्थात अधो अनुलोमन है.


इस दृष्टी से आरग्वध उपयोगी है.


28.

इस प्रकार से रास्ना पंचक / सप्तक दोनो भी, सभी प्रकार के सभी स्थान गत, वातव्याधि में उपयोज्य है.


और बहुतांश द्रव्य "तिक्त कटु उष्ण" होने के कारण, पाचन कर्म करने वाले होने के कारण, आमनाशक भी है.

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29.

औषध अन्न विहाराणाम् उपयोगं सुखावहम्✅️


रास्ना पंचक / रास्ना सप्तक सप्तधा बलाधान टॅबलेट इन के प्रयोग के समय, प्राणायाम और योगासन को भी वर्ज्य रखे, तथा उस प्रकार के किसी भी, jerk धक्का झटका देनेवाले बलक्षयकारी व्यायाम को भी न करे, और उस प्रकार के स्पोर्ट्स को भी न करे , जैसे की जंपिंग रनिंग सायकलिंग स्किपिंग वेटलिफ्टिंग बॅडमिंटन टेनिस क्रिकेट इत्यादि


30.

किसी भी प्रकार का व्यसन एडिक्शन तंबाखू बिडी सिगरेट मिश्री दंतमंजन टूथपेस्ट गुटखा ऐसे किसी भी प्रकार मे तथा दारू अल्कोहोल ड्रिंक्स व्हिस्की रम व्होडका जिन ये नही लेना चाहिए. बियर एवं वाईन अल्पमात्रा मे कभी कभी लेना ठीक है. वैसे देखा जाये तो कोल्ड्रिंक तक नही लेने चाहिये, फ्रिज का अन्न, आईस्क्रीम, ठंडा पाणी यह भी वर्ज्य रखना चाहिए


31.

पथ्य अपथ्य आहार इनका पालन होना आवश्यक है विशेषतः, सभी खट्टी चीजे = दही छास टमाटर नींबू, जमीन के नीचे उगने वाले पदार्थ = शकरकंद, गाजर, बीट, आलै, साबुदाणा, मैदा और काॅर्न की चीजे = बेकरी, हाॅटेल रोटी और कुकर मे पकाये हुआ अन्न नही देना चाहिए.


32.

जितना संभव हो सके उतना, आग पर ज्योती फ्लेम पर सीधे पकाये हुये भूने हुए roasted भर्जित फुलके या ज्वार की भाकरी तथा मूग मसूर और चवळी ये अखंड दाल या आटे के स्वरूप मे ... इनसे बने व्यंजन तथा फलवर्ग की सब्जी Gourds, चाय इतना गरम पाणी , हो सके तो धान्यक जीरक नागर या केवल आर्द्रक सिद्ध जल पीना चाहिये और कॉन्स्टिपेशन नही हो acidity नही हो तो लशुन सिद्ध क्षीरपाक भी इसके साथ लेना उपयोगी होता है , दिन मे एक बार सूर्योदय या सूर्यास्त के समय , उसके पहले और बाद में एक घंटा कुछ भी न खाये पीये.


33.

रास्ना पंचक / रास्ना सप्तक सप्तधा बलाधान टॅबलेट इन के, हमने पहले भी जो दो ... "द्रुतविलंबितगो & वेदनाशामक दुरालभादि" सप्तधा बलाधान टॅबलेट वैद्यों के उपयोग के लिये प्रसारित किये है ...

उसमे द्रुत विलंबित गो , इसमे शुंठी और देवदार यही तो दो मुख्य द्रव्य है, & तीसरा द्रव्य सहचर है.


जो वातजज्वर मे उल्लेखित, वेदनाशामक दुरालभादि है, उसमे भी गुडूची & नागर है, साथ मे मुस्ता आमपाचक ज्वरनाशक है, अंतिम द्रव्य धमासा है.


सर्वाधिक लोकप्रिय वचाहरिद्रादि है, उसमे भी रास्ना पंचक & सप्तक के मुख्य द्रव्य, शुंठी गुडूची देवदार, इनका समावेश वचाहरिद्रादि में हैं, इसलिये अगर वात से अधिक, आमपाचन को प्राधान्य देना है, तो रास्ना पंचक / सप्तक या महारास्नादि की तुलना में भी, वचाहरिद्रादि अधिक कार्यक्षम है


34.

शार्ङ्गधर में आमवात इस तरह से स्पष्ट शब्द मे उल्लेख करके एक बहुत ही लघुकाय कल्प जिसमे केवल 3 ही द्रव्य आये है, वे इस प्रकार से है

आमवाते धान्यनागरजक्वाथः 

धान्यनागरजः क्वाथः पाचनो दीपनस्तथा

एरण्डमूलयुक्तश्च जयेदामानिलव्यथाम्


धान्य & नागर यही दो द्रव्य, अनुवासन बस्ति के अप्रवर्तन के पश्चात, शेष स्नेह पाचन के लिए भी उल्लेखित है. 


कामदुधा / पंचामृत पर्पटी के अनुपान मे धान्य जीरक नागरम् शब्द आता है ... 

अर्थात स्नेह कफ आम क्लेद पृथ्वी जल इनका क्षपण करने के लिए, अग्नि वायु प्रधान तिक्त कटुरस प्रधान धान्य नागर का प्रयोग संहिताओ मे प्रचुर मात्रा मे दिखाई देता है.


35.

केवल शुंठी गोक्षुर क्वाथ, यह मात्र दो द्रव्यों का योग भी, आमवात और कटीशूल मे वेदनानाशन के लिए योगरत्नाकर मे उल्लेखित है


36.

वैसे देखा जाये तो, रास्ना यह एक संदिग्ध और दुर्लभद्रव्य है, इसलिये रास्ना की जगह यदि धान्यक जीरक (परंतु, इन में कीडे लगते है) या मुस्ता या वचा या हरिद्रा या लशुन, इनका भी समावेश किया जाये, तो भी वह अनुचित नही है.


37.

योग रत्नाकर में वचाहरिद्रादि गण के बहुतांश द्रव्यों का समावेश होने वाले योग का उल्लेख आमवात चिकित्सा में है 


38.

विशेष रूप से देखा जाये तो योगरत्नाकर में आमवात चिकित्सा में मात्र एक गुग्गुलु, सिंहनाद और एकमात्र रसकल्प, आमवात विध्वंसन का उल्लेख है, जिसका ना तो कोई उपयोग करता है और ना ही मार्केट मे उपलब्ध है

39.

निवातं गृहम् आयासो गुरुप्रावरणं भयम्॥

उपनाहाऽऽहवक्रोधा भूरिपानं क्षुधाऽऽतपः॥

बाह्य उपचार के रूप में, वालुका पोट्टली से, रूक्ष स्वेद देने का विधान है, किंतु यह स्वेद स्थानिक हो जाता है इससे अच्छा है,  कि रूम मे हिटर लगाकर दो ब्लांकेट ओढकर सो जाये तो ये अग्नि और अनग्नि स्वेद एक साथ हो जाता है जो अत्यंत उपयोगी होता है... या फिर पूरे दिन अच्छे कंपनी का वूलन थर्मल लोअर और अप्पर एक्स्ट्रीमिटी के लिए पहनना चाहिए! दोनों कान कॉटन का प्लग लगाकर बंद करने चाहिए. शूज, साॅक्स,ग्लोव्ह्ज पहनना उचित होगा और जितना हो सके उतना 24 घंटा उष्ण जल चाय जैसा फूंक फूंक कर पीना चाहिए या आर्द्रक सिद्ध जल या धान्य जीरक सिद्ध जल पीना स्वेदन के लिये आवश्यक/उपयोगी होता है. जितना यह स्वयंको उष्ण रखेंगे उतना, पाचन दीपन होता रहेगा. तो नये आम का निर्माण नही होगा और उष्ण गुण के कारण वात का शमन होता रहेगा ! स्वेद मृदूकरण के लिए सर्वश्रेष्ठ है, डिफॉर्मिटी होने के लिए जो मसल का स्टिफनेस होना आवश्यक होता है, वो इस प्रकार से बाह्य आभ्यंतर स्वेदन से निश्चित रूप से टाला जा सकता है! जिनको संभव है, वो लोग प्रति दिन आतप का सेवन अवश्य करे, जितना हो सके उतना जितना मध्याह्न के आसपास ! हो सके उतना , भोजन की वारंवारिता/मात्रा जितना कम रखेंगे, उतना वह क्षुधानिग्रह की जैसा होकर वह भी एक प्रकार का स्वेदन होता है. एअर सायकलिंग ओर स्पायनल ट्विस्ट जैसे बलक्षय न करने वाले व्यायाम करना उचित होता है, क्यूकी व्यायाम यह भी एक अनग्नि स्वेद है. एसी पंखा खिडकी खोले रखना ऐसा जितना नही करेंगे, उतना भला. निवांत गृह भी एक अनग्नि स्वेद का प्रकार है स्नान के पश्चात् संपूर्ण शरीर को वचा चूर्ण का उद्घर्षण उदवर्तन करके,  उसके पश्चात थर्मल पहनकर, बाकी के कपडे पहने, तो किसी प्रकार की वेदना से चाहे व आमजन्य हो या वातजन्य हो उसे मुक्ती मिलना संभव होता है ... यह अच्छी आदते सिखाना, यह वैद्य का कर्तव्य है! केवल टॅबलेट देना यह वैद्य का काम नही है , औषध के साथ साथ अन्न और विहार इनका भी उतनाही महत्व है क्योंकि औषध कुछ दिन के लिये ही लेना है, करेक्शन तक ... लेकिन उसके बाद जीवनभर ठीक रहने के लिए उचित आहार और उचित विहार इसका आचरण आवश्यक होता है ...


क्या न करे क्या न खाये ऐसे निगेटिव्ह निर्देश के साथ साथ ही,  क्या करे क्या खाये इस प्रकार का पॉझिटिव्ह पथ्य बताना ,यह भी वैद्य का ही कर्तव्य है. पेशंट का प्रशिक्षण अवेअरनेस जागरूकता यह औषध के परे महत्त्वपूर्ण उपयोगी आवश्यक और वैद्य के कर्तव्य मे सर्वश्रेष्ठ है.

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Disclaimer/अस्वीकरण: लेखक यह नहीं दर्शाता है, कि इस गतिविधि में व्यक्त किए गए विचार हमेशा सही या अचूक होते हैं। चूँकि यह लेख एक व्यक्तिगत राय एवं समझ है, इसलिए संभव है कि इस लेख में कुछ कमियाँ, दोष एवं त्रुटियां हो सकती हैं। भाषा की दृष्टी से, इस लेखके अंत मे मराठी भाषा में लिखा हुआ/ लिखित डिस्क्लेमर ग्राह्य है


डिस्क्लेमर : या लेखत व्यक्त होणारी मतं, ही सर्वथैव योग्य अचूक बरोबर निर्दोष आहेत असे लिहिणाऱ्याचे म्हणणे नाही. हे लेख म्हणजे वैयक्तिक मत आकलन समजूत असल्यामुळे, याच्यामध्ये काही उणीवा कमतरता दोष असणे शक्य आहे, ही संभावना मान्य व स्वीकार करूनच, हे लेख लिहिले जात आहेत.


Disclaimer: The author does not represent that the views expressed in this article are always correct or infallible. Since this article is a personal opinion and understanding, it is possible that there may be some shortcomings, errors and defects in this article.


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