🤔⁉️
द्रव्य गुण या निघंटु इनका प्रादुर्भाव संहिता काल मे क्यू नही हुआ होगा 🤔⁉️
मूलतः चरकने तो नामरूप ज्ञान का वैसे देखा जाये तो उपहास😆 ही किया है, नामरूप ज्ञान होने वालों की तुलना अविप अजप गोप असे सामान्य जनों से की है
ओषधीर्नामरूपाभ्यां जानते ह्यजपा वने ।
अविपाश्चैव गोपाश्च ये चान्ये वनवासिनः ॥😁😬
न नामज्ञानमात्रेण रूपज्ञानेन वा पुनः ।🤣😂
ओषधीनां परां प्राप्तिं कश्चिद्वेदितुमर्हति ॥
केवल गुण ज्ञान और योग ज्ञान को ही महत्व दिया है
हरीतकी (और उसके समान गुण कर्म विपाक ऐसे आमलकी इन 2)का गुणकर्म वर्णन छोड दिया, तो अन्य किसी भी औषधी द्रव्य का सविस्तर गुणवर्णन संहिता मे उपलब्ध नही है
कुछ लोगों का "क्लेम" है की उसको संहिता को संलग्न निघंटु अस्तित्व भी था
किंतु संहिता के पहले के उपनिषद् वेदों के भी मॅन्युस्क्रिप्ट उपलब्ध है ... किंतु संहिता के तत्कालीन समांतर अपेंडिक्स ॲनेक्जर के रूप मे निघंटु होने का कोई अस्तित्व या प्रमाण नहीं मिलता है
सबसे प्राचीन निघंटु, धन्वंतरी निघण्टु भी आठवी शती का माना जाता है
तो उसके पहले तो सारी संहितायें लिखकर पूर्ण हो गयी थी ... फिर भी औषधे द्रव्य के गुणकर्मों के वर्णन का कही पर अस्तित्व तथा आवश्यकता दिखाई नही देती है
अभी तो डायरेक्टली औषधी के वनस्पतीयों के गण का समूह का गुण कर्म वर्णन उपलब्ध होता है जसे की महाकषाय गण या उस उस रोग की चिकित्सा अधिकार में विविध कल्पों का कषाय क्वाथ अवलेह स्नेह इत्यादि का वर्णन तो उपलब्ध है
क्या द्रव्य के गुण कर्म वर्णन की & निघण्टु की आवश्यकता ही नही है??🤔⁉️
संभवतः नही ही है
क्योंकि गणों के अध्याय के अंत मे, जो उचित लगे उसको जोडिये, जो अनुचित लगे उसको छोडिये, ऐसा श्लोक आता है
इसका अर्थ यह होता है कि द्रव्य का महत्व उतना नही है, जितना की उसमें धारण किये हुये गुण कर्म का है
आज व्यवहार मे सबसे पॉप्युलर उपलब्ध और फॉलो किया जाने वाला निघंटु देखा जाये तो वो भावप्रकाश है, जिसका प्रारंभ करते समय, हरीतकी के गुणकर्म वर्णन के प्रसंग मे यह स्पष्ट रूप से लिखता है की ...
इसमे कोई शास्त्रीयता = व्हाय & हाऊ why & how ढूंढने का प्रयास न करे ... जो भी द्रव्य का गुणकर्म है वह "प्रभाव से" होता है ... उसमे कारण मीमांसा , नये से , शिष्य के बोधन के लिए , करना आवश्यक & उपयोगी दोनो नही है, "जो है, वो लिख दिया है" ...
👇🏼
स्वादुतिक्तकषायत्वात्पित्तहृत्कफहृत्तु सा |
कटुतिक्तकषायत्वादम्लत्वाद्वातहृच्छिवा ||✅
पित्तकृत्कटुकाम्लत्वाद्वातकृन्न कथं शिवा |🤔⁉️
प्रभावाद्दोषहन्तृत्वं सिद्धं यत्तत्प्रकाश्यते |😇
हेतुभिः शिष्यबोधार्थं नाऽपूर्वं क्रियतेऽधुना ||🙊
कर्मान्यत्वं गुणैः साम्यं दृष्टमाश्रयभेदतः |
यतस्ततो नेति चिन्त्यं 🤐😵💫😷🥴🙄😳 = hence & therefore ... why & how ... should not be "pondered" upon
इसका अर्थ यह होता है कि द्रव्य गुण यह शास्त्र न होकर , केवल "कॉपी पेस्ट" के रूप मे लिखा गया है ... तो निघंटु का सारा अस्तित्वही "कुछ किये बिना" सीधा कॉपी पेस्ट किया है, ऐसा लगता है!
क्योंकि सितोपलादी के गुणकर्म वर्णन मे शार्ङ्गधर ने जो गडबडी करके रखी है ... वह चरक के राजयक्ष्मा चिकित्सा के श्लोक नंबर 104 & 105 का इंटरमिंगलिंग है ... इसके संदर्भ मे हमने सविस्तर व्हिडिओ पहले ही प्रसिद्ध किया है ... जिसकी लिंक आगे दी है ... उत्सुक जिज्ञासू पड सकते है और इस संदर्भ मे अधिक ज्ञान प्राप्त कर सकते है ...
👇🏼
https://youtu.be/dFOWohsMAnk?si=0OMtNQz405OL1mhU
तो कहने का मूल उद्देश यह है की द्रव्य गुण और निघंटु की आवश्यकता उपयोगिता और महत्व, संहिताकारों को कभी लगा ही नही ... इसलिये संपूर्ण संहिता मे आपको औषधियों के गुण कर्म का वर्णन प्राप्त होता नही और इसलिये चरक भी "योगज्ञान" जिसे है , उसको ही श्रेष्ठ समजता है
👇🏼
योगवित्त्वप्यरूपज्ञस्तासां तत्त्वविदुच्यते ।
किं पुनर्यो विजानीयादोषधीः सर्वथा भिषक् ॥
योगमासां तु यो विद्याद्देशकालोपपादितम् ।
स ज्ञेयो भिषगुत्तमः ॥

No comments:
Post a Comment