Tuesday, 1 September 2026

रसशास्त्र यह एक स्वतंत्र एंटिटी है , रसशास्त्र को एक स्वतंत्र औषधी चिकित्सा पद्धति के रूप मे मान्यता मिलनी ही चाहिये

रसशास्त्र यह एक स्वतंत्र एंटिटी है

रसशास्त्र को एक स्वतंत्र औषधी चिकित्सा पद्धति के रूप मे मान्यता मिलनी ही चाहिये

प्रश्न 

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*रसकल्प आयुर्वेदीय भैषज्य-कल्पना के "विरुद्ध" हैं* तो कृपया यह भी स्पष्ट कर दीजिए कि शोधन, अग्निसंस्कार, भावना, सूक्ष्मीकरण, मात्रा और अनुपान इनमें से कौन-सी चीज आयुर्वेद के किस सिद्धांत के विरुद्ध है?


अलग या ज्यादा विकसित होना एक बात है, आयुर्वेद के विरुद्ध होना दूसरी बात।




उत्तर 

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1.

शोधन

जो शोधन मारण सत्त्वपातन या विष का शोधन, रसशास्त्र में है ...संहिताओ मे किसी भी द्रव्य की शुद्धी की जाये, शोधन किया जाये ... इस प्रकार की प्रक्रिया का उल्लेख संदर्भ प्राप्त नही होता है.


संहिता मे शोधन का अर्थ केवल दोषों का शोधन दुष्ट रक्त का शोधन शरीर से दोष या धातू को बाहर निष्कासित करना, इतने अर्थ से ही आता है


2.

मात्रा

संहिता मे उल्लेखित भैषज्य कल्पनाओं की मात्रा एक कर्ष (चूर्ण की मात्रा) और बाकी सभी की मात्रा एक पल या दो पल इतनी उल्लेखित हैं. जहा पर रसशास्त्र की मात्रा तीन रक्तिका = एक वल्लसे आगे प्रायः नही जाती है. संहिता में स्नेह या बस्ती की मात्रा तो 24 पल यहा तक जाती है!


3.

अनुपान 

संहिता मे अनुपान का वैविध्य अतिप्रचंड है & अनुपान प्रायः आहारीय है या कभी कभी संहिता मे उल्लेखित कषाय ही है

इस प्रकार का वैविध्य रसशास्त्र मे नही है


4.

सूक्ष्मीकरण

सूक्ष्मीकरण नाम की कोई संकल्पना संहिता मे नही. ना ही रस शास्त्र मे इस प्रकार के शब्द का कही संदर्भ प्राप्त होता है


5.

सबसे महत्वपूर्ण भेद तो अग्नि 🔥 संस्कार मे ही है !

आयुर्वेदीय भैषज्य कल्पना = मूलभूत पंचविध कषाया या तज्जन्य संयुक्त कल्पना ... इनमें "जल का अस्तित्व होने तक ही, अग्निसंस्कार" किया जाता है ... जल की संपूर्ण समाप्ती के समय के समीप, वह चिक्कण पाक = मध्यम पाक होता है वही आभ्यंतर प्रयोग के लिए ग्राह्य है! किंतु उसके आगे जब खर पाक मे बदलता है ... जो प्रायः आभ्यंतर उपयोग के लिए योग्य नही है! और जल की संपूर्ण अनुपस्थिती मे जो दग्धपाक होता है, उसे तो निष्प्रयोजन कहा गया है ... 


किंतु रसशास्त्र के पुट, औषध को पूर्णतः निःशेष जल= जलविरहित करके... एक बार नही अपितु... 7, 100, 1000 बार पूर्णतः जला देते है ! और वह भी मषी जैसे कृष्ण वर्ण तक नही, अपितु भस्म जैसे श्वेत रक्षा राख तक जला जला कर , उसमे उपस्थित किसी भी वनस्पती अंश को पूर्णतः दग्ध नष्ट कर देते है !

इस प्रकार का जल का संपूर्ण अभाव या दग्धपाक आयुर्वेदीय भैषज्य कल्पना में अभिप्रेत ही नही है ...


जल मे अवतारित औषधी अंश को "अनुपदग्धम् एव अवतार्य" ... थोडा सा भी जलने से पहले ही अग्नि से उतार दीजिए ... इस प्रकार से "सुरक्षित रखना" यह आयुर्वेदीय भैषज्य कल्पना का मूलाधार है !


वही रसशास्त्र में तो गंधक जैसे अत्यंत उष्ण तीक्ष्ण विष स्वरूप पदार्थ के द्रव मे वनस्पती को या वनस्पती के भावित स्वरूप औषधी अंश को उबाल उबालकर जला🔥 जला कर पुट (1,7,100,1000), पोट्टली, पर्पटी करना यह दग्धपाक से भी बहुत ही परे है... *इसमे नैसर्गिक रूप मे वनस्पती का कोई भी अंश शेष रहने की कोई भी संभावना नही है*


आयुर्वेदीय भैषज्य कल्पना के सभी कल्प यह अपिधान = ढक्कन लगाये बिना , निर्माण किये जाते है. पिधान लगाने से विदग्ध और दुर्जर हो जाते है ... ऐसा होते हुए भी रसशास्त्र मे नाकमुंह बंद करके (मुस्कटदाबी करून गुदमरून घुसमटून) सात बार मृद् कर्पट मिट्टीकपडा लगाकर, seal करके औषधों को "जलाया" जाता है. यह आयुर्वेदीय भैषज्य कल्पना से *पूर्णतः विसंगत विलक्षण विपरीत और विरुद्ध* है


भावना

आयुर्वेद भैषज्य कल्पना में भावना दी जाती है, वह मूल आधारभूत बेस चूर्ण वनस्पतीजन्य होता है, तो उसमे "भावना का स्वीकार करना", ऐसी कोई संभावना निश्चित रूप से होती है ... किंतु रसशास्त्र मे धातू खनिज रत्न इनको भावना देना = पत्थर पर सर पटकने जैसा है क्योंकि *धातू खनिज रत्न इन पदार्थों में, वनस्पती का कोई भी अंश "प्रवेश करना" = शोषित होना , यह पूर्णतः असंभव है* 

जिस सुवर्ण पर विश्व के सबसे तीव्र एक्वा रेजिया का भी कुछ भी परिणाम नही होता है, ऐसे सुवर्ण को भावना देते है, 🤣यही हास्यास्पद है.


अनेक रत्नों की या सुधा वर्ग के द्रव्य की भस्म प्रक्रिया मे जिसकी भावना दी जाती है वह कुमारी या गुलाबजल संहिता मे उल्लेखित ही नही है 


संहिता मे भावना देने के बाद, और कुछ फिर से अग्निसंस्कार करना है, ऐसे प्रायः नही होता है... होता भी है, तो वह "अनुपदग्धम एव अवतार्य" इस सावधानी के साथ होता है! 


भावना यह बलाधान का स्वरूप है ... जहां पर रसशास्त्र मे भावना देने के बाद फिरसे अनेकों पुट देते रहना, पोट्टली करना ... यह बाते जिसमे अत्यंत तीव्र अग्नि दिया जाता है ... जिसमे भावनाद्रव्य के द्वारा जो वनस्पती औषधी अंश वहां पर उपस्थित है, उनका निःशेष दहन होकर, वह पूर्णतः निष्प्रयोजन हो जाते है. 


आयुर्वेदः "अमृता"नाम् ✅️ ... (अमृत = प्राणयुक्त सजीव = अर्थात शरीरधातुसमान ... शरीर धातु मे परिणत होने योग्य) इस प्रकार से अग्रेसंग्रह चरक ने लिखा है. 


रसशास्त्र के हर कल्प की निर्मिती में "मृत ☠️ मारीत💀 भस्म💩" ऐसे घटकों से होती है, इसलिये रसशास्त्र यह आयुर्वेद से आत्यंतिक विलक्षण विरुद्ध विपरीत विसंगत है 


इसी कारण से रसशास्त्र का आयुर्वेद से कणभर भी संबंध नही है


और भी कई सारे मुद्दे है, ... (जैसे आयुर्वेदावतरण मूलपरंपरा, शास्त्र का प्रयोजन, शास्त्र का मुख्य विषय या शास्त्र के अभिधेय घटक) जिससे यह सिद्ध हो जाता है कि आयुर्वेद शास्त्र से रसशास्त्र का कोई भी संबंध नहीं है


आयुर्वेद से रसशास्त्र का कणभर भी संबंध नही है ... इसका अर्थ *रसशास्त्र यह आयुर्वेद नही है ... रसशास्त्र यह आयुर्वेद नही है* 

"रसशास्त्र आयुर्वेद का भाग है" यह एक fake narrative है, ये मनगढंत भ्रम है... एक सोची समझी साजिश है ... एक जान बूझकर बिछाया हुआ जाल है ... 


जिन्हें आयुर्वेद के संहिता मे उल्लेखित औषधी स्कंधपर विश्वास नही है आत्मविश्वास नही है न्यूनगंड है सामर्थ्य नही है क्षमता नही है ऐसे दुर्बल और बुद्धिहीन लोगो ने उनकी सुविधा के लिये उनके कन्वेनियन्स के लिये आयुर्वेद से बाह्य अशास्त्रीय अनैतिक असंबद्ध आयुर्वेदीय भैषज्य कल्पना से संपूर्णतः विरुद्ध विलक्षण विपरीत विसंगत ऐसे रसकल्पों को अगतिकता के कारण असहाय्यता के कारण स्वीकार किया है


सभी गाडीया इंधन पर चलती है यह बात सत्य है 


किंतु विमान रेल्वे मोटर गाडी टू व्हीलर ये अलग है 


यद्यपि यात्रा सभी से संभव होती है 


वैसे ही रसशास्त्र के कुछ शारीरिक परिणाम दुष्परिणाम हो सकते है , ऐसे आयुर्वेद के भी शरीर पर परिणाम होते है


 इतना साम्य मान लिया जाये तो रसशास्त्र का आयुर्वेद से कण मात्र भी संबंध नही है


 रसशास्त्र के औषध हो सकते है


 रसशास्त्र के औषधो का परिणाम हो सकते है 


रसशास्त्र के औषधों का जिसको उसके बुद्धि को उचित लगे वह प्रयोग कर सकता है


 किंतु रसशास्त्र को आयुर्वेद के नाम पर , रसशास्त्र को आयुर्वेद का अंश समजकर , रसशास्त्र को आयुर्वेद का भाग बता कर... यह काम नही होना चाहिए 


रसशास्त्र यह एक स्वतंत्र एंटिटी है


जैसे बी ए एम एस कोर्स चलता है ... वैसे बी आर एम एस BRMS कोर्स चलना चाहिये


 जैसे AYUSH है , वैसे

SHAYUR होना चाहिये



रसशास्त्र को एक स्वतंत्र औषधी चिकित्सा पद्धति के रूप मे मान्यता मिलनी चाहिये 


रसशास्त्र को आयुर्वेद मे समाविष्ट नही करना चाहिए


 दूसरे स्पष्ट शब्द मे ... *रसशास्त्र को आयुर्वेद से बाहर निकाल देना चाहिए!*✅


चलो एक दोन मिनिट के लिये ऐसा मान लेते है की ..


रसशास्त्र अस्तित्व में ही नही था 


या रसशास्त्र आपके सिलॅबस मे ही नही था या


एक बी आर एम एस BRMS नाम का अलग कोर्स चलता था जो आपने नही किया गया है 


किंतु बी ए एम एस मे हमे पढाया गया की *चरकस्तु चिकित्सिते*... तो क्या हमे इतना कॉन्फिडन्स नही होना चाहिये की ... जिस शास्त्र की संहिता से हम पेशंट के हेतु स्कंध & लक्षणस्कंध सीख कर, उसका निदान करते है और उस निदान के लिए उसी संहिताने लिखा हुआ औषध स्कंध पर्याप्त है !!!


हमे ये आवश्यकता क्यूं लगती है , हमे ये असहाय्यता अगतिकता शरण्यता क्यूं लगती है कि जिस शास्त्र मे निदान और लक्षण लिखे ही नही है, ऐसे रसशास्त्र के औषधो को अगर मैं प्रयोग ना करूं, तो मै पेशंट को ठीक करने में सक्षम ही नही हूँ... इतना भयानक *आत्मविश्वास का अभाव* कहा से उत्पन्न होता है!? 


और फिर *चरकस्तु चिकित्सिते* कहने के लिए कहा से आत्मबल आता है!?!?


 इतना बडा ढोंग एक साथ इतनी सदियों से आयुर्वेद समाज कैसे कर लेता है... ये मुझे आज तक समज मे नही आया है!?


😇🤔⁉️


लोह वाद तो मेरा विषय ही नही है


देह वाद मे तो इतने सारे कनिष्ठ और त्याज्य द्रव्य प्रयुक्त हुए है कि इतना अपमान तो निश्चित ही अस्वीकार्य है 


किसी भी द्रव्य का जो श्रेष्ठ प्रकार है वह लोहवाद के लिए 


और किसी भी द्रव्य का जो कनिष्ठ प्रकार है वो देह वाद के लिए 



और दो मिनिट के लिए लोहवाद धातुवाद श्रेष्ठ मान ले, फिर भी उसी रसशास्त्र के जो मूल सिद्धांत है भस्म के मुख्य तीन श्रेणी या उत्तम रसभस्म मध्यम मूलीभिः अधम गंधकादि और चौथा दुर्गुण अरिलोह यह जो बताया है इसमे से पहले दो तो प्रॅक्टिकली होते नही है और अंतिम दो ही आज व्यवहार मे है 

इसपर विस्तृत लेख भी लिखा है


शिलाजतु के बारे मे तो मैने विस्तार से लिखा है 


रत्नों का शोधन करे मारण ना करे रत्न का भस्म करने से वीर्यहानि होती है ऐसा कहने के बावजूद रत्नों के भस्म रत्न का मारण व्यवहार मे उपयोग मे लाया जाता है 


ये अपने आप में वदतो व्याघात है


 ऐसे अनेक मुद्दे है जो मुझे एक आयुर्वेद वैद्य के दृष्टी से, रसशास्त्र को स्वीकार करना, किसी भी जस्टिफिकेशन समर्थन से , स्वीकार्य नही है

🖊 वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे, एमडी आयुर्वेद संहिता, एमए संस्कृत, आयुर्वेद क्लिनिक @ पुणे & नाशिक ... 9422016871 

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