Tuesday, 22 September 2026

Desires of Life! Hindi हिंदी

 Desires of Life!

✒️ लेखक : वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे

एम डी आयुर्वेद, एम ए संस्कृत 

9422016871

आयुर्वेद क्लिनिक्स @ पुणे (रविवार) & नाशिक (बुधवार)





रोटी कपडा और मकान ये जीवन की 3 मुख्य आवश्यकतायें या जीने की प्रेरणायें है, ऐसा हमने पढा है ! 


आजकल के बच्चे कहते है ... फेसबुक इन्स्टा & व्हाट्सअप🤣!! या कुछ लोग कहते है... मोबाईल वाय-फाय & रिचार्ज!!!


आयुर्वेद कहता है की आहार निद्रा और मैथुन ये 3 जीवन के आधार = उपस्तंभ = डीलर्स है!


आगे आयुर्वेद के मुख्य ग्रंथकार चरक कहते है की जीवन मे तीन एषणा अर्थात मोटिव्ह्ज motives पर्पज purpose desires ऑफ लाईफ है ... प्राण धन & परलोक !


आज तो मुझे नही लगता की कोई परलोक के लिए कुछ करता होगा ... क्योंकि आज के जीने के ही इतनी पडी है की परलोक या उस दृष्टी से प्रयास या मोटिवेशन या पर्पज ऑफ लाईफ नही हो सकता!!


धन या प्राण अर्थात पैसा चाहिये और जिंदगी जान लाइफ एक्झिस्टन्स चाहिये ये सत्य है, "ऐसा हमे लगता है"


मुंबई के लोकल के हर प्लॅटफॉर्म पर रोज हजारो की संख्या मे भीड मे हर आदमी जो करता है, वो देख के लगता नही की प्राण की उसे कोई परवाह है... जो पुणे बेंगलोर हैदराबाद क रोज के ट्रॅफिक मे एक छोर से दूसरी छोर तक, दो दो घंटे तक ट्रॅव्हल करता है... ये देख के लगता नही की प्राण के लिए कोई काम कर रहा है... देखने मे तो ऐसा दिखता है, की एक ही चीज के लिए सारी मशक्कत परिश्रम struggle की जा रही है ... सारे मरे जा रहे है, वह केवल एक धन की प्राप्ती धन की लालसा के लिए ही है


फिर ये सोचता हूँ कि इतनी सारी struggle करके, जी जान लगाके, मेहनत समय बरबाद करके... जिस धन को पाने की ये सारी धडपड प्रयास चल रहे है... उस धनको पाकर क्या करेंगे??? स्वयं धन तो कुछ होता नही ... की उस धन को खा लेंगे पी लेंगे उस पर सो सकेंगे उस पर बैठकर ट्रॅव्हल कर सकेंगे, ऐसा तो नही है! उस धन का "कुछ" करना चाहिए , तो धन के विनिमय से "क्या" प्राप्त करना है कि जिसके लिए दिन भर की ये रोजमर्रा की इतनी सारी struggle हरेक की व्यक्ति की ये जा रहा है !?


धन का आवश्यकता के अनुसार या आवश्यकता से दस गुना सौ गुना जमा करके भी क्या करेगा!?!? एक साथ बीस रोटी नही खा सकता एक के ऊपर चार शर्ट एक साथ चार गाडी मे बैठकर ट्रॅव्हल नही कर सकता एक साथ चार घर मे रह नही सकता!!! ... तो धन से जो प्राप्त हो सकता है क्या वह उसकी एषणा = मोटिव्ह्ज motives पर्पज purpose desires ऑफ लाईफ है ??? 


धन विनियोग से वह अन्न वस्त्र घर गाडी जेवर महंगी लाइफस्टाइल की चीजे और ट्रॅव्हलिंग प्राप्त/संभव हो सकता है, तो क्या फिर ये सारा जीवन का पर्पज मोटिवेशन एम गोल ध्येय सार्थकता है ???


तो फिर हमे क्यों पढाया जाता है की "प्राण धन & परलोक ये 3 एषणायें है" !!!


ऐसे दिखाई तो नही देता है ... प्राण बने रहने के लिए जो शारीरिक आरोग्य चाहिये उसके प्रति तो कोई भी जागरूक नही है ... धन पाने के लिए प्राण के भी प्रवाह नही कर रहे है और परलोक तो किसे चाहिए आज के काल मे ऐसा लगता तो है नही और जिस दिन को पानी के लिए सारी चीजे की जा रही है उस धन से जो प्राप्त हो सकता है वो तो जीवन का मूल ध्येय प्रपंच एम गोल है ही नही ... तो ये सारा कथन कुछ गोलमाल है अर्थात परलोक किसी को भी नही चाहिये , प्राण की पर्वाह किसे भी नही है, हर कोई धन कमाने के पीछे दौड रहा है & उस धन से जो प्राप्त करना है, वो तो 3 एषणा में कही लिखा ही नही है!? तो क्या संहिता से एषणा विषय डिलीट करना चाहिए ... वैसे भी इस "वाग्वस्तुमात्र" विषय का वर्णन सुश्रुत और वाग्भट ने किया ही नही है !!!... या कुछ नये से नयी एषणायें लिखनी चाहिए

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