## हिंदी *बस्ती श्रेष्ठ क्यों? मुख से औषध श्रेष्ठ क्यों नहीं?
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आयुर्वेद में बस्ती को श्रेष्ठ माना गया है...
1. क्योंकि मुँह से औषधि या अन्न लेकर
2. उसका अपनी अग्नि की क्षमता से उचित पाचन करके
3. उसके समान वायु द्वारा उचित सार-विवेचन करके
4. उससे स्वयं सम्यक् धातु का निर्माण करना
5. ...इसके लिए क्षमता और स्वावलंबन दोनों की आवश्यकता होती है
6. और इसमें लगभग 22 घंटे से अधिक का समय लगता है
7. लेकिन यहाँ बस्ती में कैसे...?!
कोई भी कष्ट नहीं?! 😃
8. मानो कोई ड्रॉअर खोला 📥📭📩🗃
9. और उसमें वस्तु रखी, ड्रॉअर बंद किया
10. उसी तरह गुदामार्ग से चीजें बहुत बड़ी मात्रा में 240 या 960 ml अंदर डाल दीं तो हो गया ✅️👍🏼
11. इसलिए आयुर्वेद के लोगों को बस्ती श्रेष्ठ लगता है
12. क्योंकि उसमें कष्ट नहीं हैं... बना-बनाया... रेडीमेड... स्पून-फीडिंग... प्रीडाइजेस्टेड... मुफ्त... आसान... बिना कष्ट के प्राप्त हो जाता है
13. लेकिन इन्हें साधारण-सी बात समझ में नहीं आती कि 22 घंटे के कष्ट के बाद भी जहाँ पाचन ठीक होगा ही, इसकी कोई गारंटी नहीं है
14. वहाँ 45 मिनट निरूह शरीर में रहा या नौ घंटे अनुवासन स्नेह शरीर में रहा... इसलिए ऐसा कौन-सा बड़ा दीपक 💡🕯🪔🔦 जलाने वाला काम हो गया!!!
15. मूलतः ये आयुर्वेदिक लोग 99.99% परावलंबी, निस्तेज, पराजित, असहाय, अगतिक, शरणागत, सर्वाइवल मोड में जैसे-तैसे जीने वाले, पैसे से अत्यंत धनी होने पर भी बुद्धि से और नैतिकता से और मुख्यतः धैर्य से, सच्चाई से, ईमानदारी से अत्यंत दरिद्र, दयनीय, भुक्कड़, बकवास, भंकस और ब्रोकन-ब्रेन इस प्रकार के होते हैं...
16. इन्हें केवल झूठ, चालाकी, पाखंड, मुफ्त की, निष्प्रयोजन चीजों को "सेलिब्रेट" करने के लिए कहिए... झूठ को रेट करने के लिए कहिए... और सामने वाले मरीज को कस्टमर समझकर "बेचना" करने के लिए कहिए... लूटने, ठगने, नोचने-खसोटने के लिए कहिए... उसमें ये होशियार हैं...!!!
17. लेकिन शास्त्र में चिंतन, संदर्भ, शंका-निरसन, चर्चा, संवाद कुछ भी मालूम नहीं होता... बुद्धि और शास्त्र का इससे कुछ भी लेना-देना नहीं होता... जान-जागरूकता नहीं होती... कहाँ लिखा है, मालूम नहीं होता... किसी भी प्रकार का प्राथमिक भी अध्ययन नहीं होता... परिचय नहीं होता... पहचान नहीं होती...
18. अच्छा, हमें यह मालूम नहीं है, इसके बारे में खेद, पछतावा, जागरूकता, जिज्ञासा, कौतूहल, प्रयास कुछ भी नहीं होता।
19. चरक चिकित्सा रसायन अध्याय में रसायन का वर्णन करने से पहले, हरितकी के गुणधर्मों के वर्णन से पहले, एक विरेचन योग आया हुआ है... उसे आज तक किसी ने भी उपयोग नहीं किया है... उसके परिणाम क्या होते हैं, उसकी मात्रा क्या है, किसी को भी मालूम नहीं है, उसमें उल्लिखित **पुराणशकृत्** का क्या अर्थ है, इसके विषय में किसी को भी कोई जानकारी या जिज्ञासा नहीं है...
20. परंतु वहाँ से आगे आया हुआ तीसरे क्रमांक का च्यवनप्राश मात्र सभी लोग "बाजार लगाकर" जोर-शोर से बेचते हैं... जैसे साप्ताहिक बाजार में लोग सड़क पर बैठकर बेचते हैं ना... या हमारे सभी शहरों में फुटपाथ पर फेरीवाले, हॉकर बेचते हैं या मछली बाजार में मछलियाँ बेचते हैं... वैसे ही ये सारे भंकस लोग, "ब्रोकन-ब्रेन" लोग अवसर मिलते ही, सीजन हो या न हो, च्यवनप्राश, उटने, अभ्यंग तेल, साबुन, शैम्पू, कंडीशनर, सुवर्णप्राशन, शिरोधारा, गर्भसंस्कार, विद्ध, नाड़ी, मर्म आदि कुछ भी बेचते रहना = "बेचना" यही एकमात्र काम करते रहते हैं।
21. एक ही छोटी-सी कागज की पुड़िया में जितने सूझें, जितने समा सकें, ऐसे दस-बारह-पंद्रह रसकल्प डालने की ऐसी घटिया प्रैक्टिस करते हैं... उन्हें मूल आयुर्वेद शास्त्र, संदर्भ, चिंतन, लॉजिक, तर्क से कुछ भी लेना-देना नहीं होता... ज्ञान, संगति कुछ भी नहीं होती...
22. और इसलिए उन्हें मुँह से जाने वाली औषधियों की अपेक्षा **गा#डी से, मां#डी से जाने वाला बस्ती** श्रेष्ठ लगता है... इतना सरल, सीधा और आसान उत्तर है।
23. अब कुछ लोग इसे "सामूहिक अपमान" करना कहेंगे... लेकिन सम्मान करने के लिए आपके पास आखिर है ही क्या???
अर्थात् यह मेरा व्यक्तिगत मत है।
इन कथनों में दोष, त्रुटियाँ, कमियाँ हो सकती हैं।
और उपरोक्त कथनों के कुछ सम्माननीय अपवाद निश्चित रूप से हो सकते हैं।




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