निरात्मन् (Nir-atman), निर्दोष (Nir-dosha), निरोजस् (Nir-ojas) , निःस्रोतस् (Nis-srotas), निर्मनस् (Nir-manas), निर्मर्म (Nir-marma), चतुर्भूत (4bhoota), षड्धातु (6dhatu), द्विमल (2mala), शून्यदोष (zero-dosha)
🇮🇳 हिंदी अनुवाद (Hindi Translation)
1.
वात का स्थान पक्वाशय हो तो क्या उसे सिर्फ रेक्टम तक ही लेना चाहिए? या नाभि के नीचे के सभी अवयव लेने चाहिए? लार्ज इंटेस्टाइन जो अपेंडिक्स सिकम से शुरू होकर आगे रेक्टम के पास असेंडिंग ट्रान्सवर्स डिसेंडिंग इस प्रकार समाप्त होता है, वह पक्वाशय है या आमाशय? क्योंकि लार्ज इंटेस्टाइन का 70 प्रतिशत भाग नाभि के ऊपर है, तो फिर उसे आमाशय कहना चाहिए या पक्वाशय?
अगर आमाशय कहें तो उसमें पका हुआ अन्न होता है।
अगर पक्वाशय कहें तो वह नाभि के ऊपर होता है।
मान लीजिए बहुत पेट छूटे हुए व्यक्ति की नाभि बहुत नीचे आ गई, साधारणतया इलियाक बोन की लाइन पर आ गई, तो फिर वात का क्षेत्र कहाँ मानना चाहिए और पित्त का क्षेत्र कहाँ मानना चाहिए?
वात ऊर्ध्वगामी हो तो वह शरीर के अधोभाग में कैसे रहता है?
द्रव्यमूर्ध्वगमं तत्र प्रायोऽग्निपवनोत्कटम्।
2.
अधोभाग में नाभि के नीचे देखें तो जल प्रधान मूत्र, पृथ्वी प्रधान पुरीष, पृथ्वी प्रधान गर्भ, अग्नि प्रधान जल प्रधान आर्तव, मांस प्रधान अर्थात पृथ्वी प्रधान नितंब, सक्थि, पिंडिका, सोम जल प्रधान शुक्र, वृषण ये सब हैं, ऐसा होते हुए नाभि के नीचे वात स्थान है ऐसा कहने के बजाय, अधोगामी पृथ्वी और जल का कफ का अधिष्ठान वहाँ है, यह उचित है।
अधोगामि च भूयिष्ठं भूमितोयगुणाधिकम्॥
3
हृदय के ऊपर कफ का स्थान है, ऐसा कहा जाए तो हृदय के ऊपर दोनों फुफ्फुस, हृदय, कंठ, मुख, शिर, साइनस, सभी इंद्रिय अधिष्ठान ये खोखले vaculoes हैं, साइनस युक्त हैं, आकाश महाभूत प्रधान और उसमें गति प्रधानता है... जन्म के पहले क्षण से लेकर मृत्यु के आखिरी क्षण तक... मतलब वह वात का स्थान है, गति का स्थान है, छिद्रों का स्थान है, ऐसा होते हुए, उसे कफ का स्थान कहना व्यर्थ है?
4.
वात ऊर्ध्वगामी है इसलिए हृदय के ऊर्ध्व भाग में सब जगह वात, वात और वात ही दिखता है, ऐसी स्थिति में दोषों के स्थान नैसर्गिक रूप से ही आयुर्वेद शास्त्र में गलत हैं, ऐसा लगता है।
द्रव्यमूर्ध्वगमं तत्र प्रायोऽग्निपवनोत्कटम्।
5.
मूलतः आहार से दोष निर्माण होते हैं यही भयानक अविश्वसनीय है।
दोष यह संकल्पना आयुर्वेद का प्रति तंत्र सिद्धांत है, महाभूत, अन्य सप्तधातु, दो मल, इतना ही नहीं तो सिरा, स्नायु, रज का उल्लेख भी आयुर्वेद से इतर दर्शनशास्त्र, साहित्य, नाट्य, काव्य में भी मिलता है, लेकिन आयुर्वेद में दोष यह संकल्पना केवल और केवल आयुर्वेद में ही है।
6.
आहार सेवन करने के बाद सार-किट्ट विभाजन होकर सार भाग से छह धातु (रस नहीं) और दो मल (तीन नहीं, स्वेद नहीं) ऐसे स्पष्ट तैयार होते हुए "दिखते" हैं, ऐसे में दोष निर्माण होने की जगह/संभावना ही कहाँ है?
7.
अगर रोज़ आहार से कफ-पित्त निर्माण हो रहे हैं तो उनकी वृद्धि लक्षण दिखने चाहिए
और अगर आहार रोज़ वात वृद्धि हो रही है तो बढ़े हुए कफ-पित्त का क्षय होना चाहिए।
हलचल movement होने के बाद क्या होता है?
वात बढ़ता है या कफ-पित्त कम होते हैं?
हलचल movement सचमुच वात से होती है, या मांस से होती है?
बल-मांस क्षय होने के बाद असाध्यता क्यों आती है?
इसलिए गति मांस के कारण होती है यह स्पष्ट होते हुए भी, अनावश्यक रूप से वात को उसमें लाना क्या आवश्यक नहीं है
8.
आकाश नामक महाभूत का इस आयुर्वेद शास्त्र को कोई उपयोग नहीं है क्योंकि वह बढ़ता नहीं, घटता नहीं, दिया नहीं जा सकता, लिया नहीं जा सकता, डेमोंस्ट्रेबल नहीं है, डिस्पेंसिबल नहीं है।
9.
तो भी इन सभी शंकाओं, कुशंकाओं, प्रश्नों, संदेहों, भ्रमों, संभावनाओं, वास्तविकताओं पर विचार करके अपना मत इस पर बताएं, यह नम्र विनती है।
10.
कफ = पृथ्वी-जल यह अधोगामी है, इसलिए उसका स्थान नाभि के नीचे ही होना चाहिए और वैसे ही भाव-पदार्थ नाभि के नीचे हैं भी, इसलिए अनावश्यक रूप से कफ का स्थान हृदय के ऊपर है ऐसा कहना अशास्त्रीय है और वास्तविकता से परे है।
अधोगामि च भूयिष्ठं भूमितोयगुणाधिकम्॥
11.
अन्न पाचन होते समय भी जो सबसे कठिन स्थूल भाग हैं, वे सबसे अंत में अलग होने चाहिए, जो सबसे विरल और सूक्ष्म भाव हैं वे पहले मुक्त होने चाहिए, यानी प्रथम अवस्था पाक में वात निर्माण होना चाहिए और तृतीयावस्था पाक में कफ निर्माण होना चाहिए।
12.
एक बार प्रथम अवस्था पाक, द्वितीय अवस्था पाक में कफ-पित्त निर्माण हो गए कि फिर रस के मल के रूप में, रक्त के मल के रूप में फिर से कफ-पित्त निर्माण होते हैं, मतलब ये कौन से निर्माण होते हैं, ठीक कहाँ निर्माण होते हैं? रस का रक्त में रूपांतरण यकृत में होता है, तो क्या कफ का निर्माण यकृत में होता है? और रक्त का रूपांतरण मांस में ठीक कहाँ होता है? वह जहाँ होता है, वहाँ पित्त का निर्माण होता होगा तो वहाँ दाह (जलन) आदि क्यों नहीं होता?
13.
अगर कफ और पित्त दोनों ही अवस्था पाक में भी निर्माण होते हैं और धातुओं के मलों के रूप में भी निर्माण होते हैं
... तो फिर वात भी अवस्था पाक के साथ-साथ किसी धातु के मल के रूप में क्यों नहीं निर्माण होता?
14.
द्रवत्व छोड़ा हुआ पित्त यानी अग्नि! अग्नि महाभूत , जल महाभूत कहें ना, आसान है!
15.
स्तंभन करता है, रुकता है वह शीत,
प्रेरणा करता है, चलता है वह चल,
और ये दोनों गुण एक ही वात में होते हैं मतलब रोकने वाला भी वही और चलाने वाला भी वही, यह कैसे संभव है?
यह प्रत्यक्ष हमारे सामने दिख रहा होता है,
ऐसा होता है ना? यह ऐसे बेतुके विचार क्या काम के हैं?
16.
95 प्रतिशत सार भाग का एब्जॉर्प्शन छोटी आँत intestine में पूर्ण होता है, जबकि बड़ी आँत large intestine में कुछ भी एब्जॉर्ब नहीं होता यह वास्तविकता होते हुए, बस्ती में तेल, घी, शहद, थिक, डेंस इमल्शन डालकर क्या सिद्ध होने वाला है और सचमुच इतने महंगे, बड़े निरूह, अनुवासन उस पक्वाशय में डालकर, उसमें से सचमुच (देह के) कौन-कौन से चीजें 45 मिनट में रिवर्स आने वाली हैं, क्या यह सत्य है? क्या शरीर का मेटाबॉलिज्म, फिजियोलॉजी, सर्कुलेशन इतना आसान है?
17.
इसके अलावा विरेचन जो बिल्कुल स्पष्ट, नैसर्गिक, स्वाभाविक, सुकर प्रक्रिया है, वह करना अधिक अच्छा! वैसे भी वातव्याधि की चिकित्सा की शुरुआत में विरेचन देना चाहिए ऐसा ही लिखा है और जो दुर्बल, अविरेच्य होता है, उसे बस्ती देना चाहिए ऐसा बताया है।
18.
कुछ तो भयानक बेसिक लेवल पर गलत हो रहा है! वह वैसा नहीं होता तो पंचकर्म का इतना लोप नहीं होता कि लोग उसे पूरी तरह भूल गए हैं और बाद में फिर उसका प्रचार-प्रसार करके पिछले बीस वर्षों में हैपनिंग ट्रीटमेंट, फील गुड ट्रीटमेंट, मसाज, मालिश, स्पा के रूप में उसका पूर्णतः पुनःस्थापन शोधन = Show Dhan के रूप में किया गया है, जिसका शास्त्र से शून्य संबंध है।
19.
निर्दोष षड्धातुक द्विमल चतुर्भूत निरात्म निर्मनस् निरोजस् निर्मर्म निःस्रोतस् निष्कला निर्धात्वग्नि ऐसा शरीर अधिक सुगम, सुबोध, सुकर, सुलभ, सुचिकित्स्य है।

Sir yehi vichar students ke mind me bhi aate h..... pr ayurveda me jo ayurvedic physiology or anatomy h vo kabhi bhi ache se nahi padhai jaati jisse basic fundamentals hi students ache se nahi smjh paate
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