आज के YOGA (योगा) का स्वरूप क्या है!? ... तो अत्यंत लोकप्रिय = पॉप्युलर (Popular) इस अर्थ में ✅️ कीर्तिमान = फेमस (Famous) इस अर्थ में नहीं!! If you Google these two English words have different shades of meanings
आज योग दुनिया भर में हर जगह पहुँच चुका है...
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी दखल ली जा रही है!
"ठीक इसी मार्ग पर" आयुर्वेद (Ayurveda) की भी अत्यंत तेज़ घुड़दौड़ 🐎🐴 शुरू है... आने वाले कुछ वर्षों में आयुर्वेद भी, आज के योगा के इसी स्वरूप में, बल्कि उससे भी अधिक लोकप्रिय होगा... कीर्तिमान नहीं!
दुनिया में हर जगह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह पहुँचा हुआ होगा... पर आज का योगा जैसे मूल योगदर्शन योगशास्त्र से कई सैकड़ों किलोमीटर दूर है, मूल योगदर्शन योगशास्त्र और आज के योगा का दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है... एक नाम की समानता को छोड़ दें तो, मूल योगदर्शन योगशास्त्र के स्वरूप और प्रयोजन का, आज के योगा से किसी भी प्रकार का कोई संबंध नहीं है!!!
ठीक वैसे ही मूल आयुर्वेद शास्त्र और आज जिस गति से कल की ओर झपट रहा है "उस आयुर्वेद का भी" बिल्कुल वैसा ही होने वाला है!!!
वैसा ही मतलब जैसे मूल योगदर्शन योगशास्त्र की तुलना में आज के योगा का बंटाधार (नाश) हुआ है... बिल्कुल वैसे ही मूल आयुर्वेद शास्त्र की तुलना में, "आज से कल की ओर तेज़ी से झपट रहे" आयुर्वेद का भी निश्चित रूप से अधिक विदीर्ण (broken brittle) स्वरूप में बंटाधार होगा ही, इसमें कोई शक नहीं है।
मूल योगदर्शन योगशास्त्र मन के लिए है, मन के दोषों के निवारण के लिए है, बल्कि योगशास्त्र मोक्ष प्रवर्तक है यानी मोक्ष की ओर ले जाने वाला मार्ग है...
परंतु आज का "योगा" इस प्रकार का मन के लिए या मोक्ष के लिए है, ऐसा सिर्फ कहना भी अत्यंत हास्यास्पद 🤣 और उपहासजनक 😏😖 होगा क्योंकि आज का योगा सिर्फ और सिर्फ "शरीर को समर्पित" है।
आज का योगा, भगवान पतंजलि महर्षि द्वारा लिखित मूल योगदर्शन या पातंजल योगशास्त्र या यहाँ तक कि भगवद्गीता, जो कि ब्रह्मविद्यात्मक योगशास्त्र है... इन सब से "आज के योगा" का कोई संबंध नहीं है!!!
आज का योगा, इन मूल योग संबंधी ग्रंथों के बहुत बाद आए व्यावहारिक और असल में भ्रष्ट और केवल नाम की समानता रखने वाले घेरंड संहिता या उसी काल के बाद के ग्रंथों से नाता जोड़ने वाला है!
मूल योगदर्शन अष्टांग स्वरूप का है, जिसमें यम और नियम के बाद, आसन और प्राणायाम इन दो अंगों का क्रम आता है और उसके भी आगे धारणा, ध्यान, प्रत्याहार और समाधि ये चार अंग आते हैं।
परंतु आज का योगा इन पहले दो अंगों पर तो बिल्कुल भी विचार नहीं करता...
बल्कि यम और नियम की 10 बातें, आज के योगा का अनुसरण, अवलंबन, आचरण, "प्रैक्टिस" करने वाले सभी को, मूल रूप से पता ही नहीं हैं या उन्हें जानबूझकर नज़रअंदाज़ किया गया है या किनारे कर दिया गया है या कूड़ेदान (डस्टबिन) 🗑 में फेंक दिया गया है... क्योंकि उनमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, ईश्वर प्रणिधान, शौच जैसे मानवीय जीवन मूल्यों या सद्गुणों का समावेश होता है, उल्लेख होता है।
इन दसों चीजों का आज की व्यावहारिक दुनिया के इंसान को कोई उपयोग, संबंध, महत्व, सरोकार जरा भी नहीं है।
आज का योगा कई प्रकार के बॉडी पोस्चर्स (poses) और विभिन्न प्रकार के फैंटेसी, फैंसी, फैड (fad) के स्वरूप में अतिरंजित लाभ, अति-मानवीय लाभ या असल में अशास्त्रीय सफेद झूठ लाभ दिलाने वाला ब्रीदिंग एक्सरसाइज (breathing exercise) है—कपालभाति, भस्त्रिका इत्यादि बातें और विचित्र प्रकार के अंग्रेजी नाम मिले हुए आसनों का नया स्वरूप में आविष्कार, इसे ही आज सामान्य लोग योगा समझते हैं।
इस गलतफहमी को बढ़ावा देने या इसे और गहरा करने के लिए, ऑफलाइन-ऑनलाइन ऐसे कई अति लोकप्रिय गुरु या योग विक्रेता (Sellers), ट्रेडर्स (Traders), मार्केटर्स (Marketers) हर जगह उत्पात मचा रहे हैं।
उसमें से योगा जैसे जमे वैसे, जिसे जैसा लगे वैसे, "बेचकर, पैसे और प्रसिद्धि कमाना"... इतना ही उसमें उद्देश्य है।
मूल योगदर्शन जिन प्रयोजनों से प्रेरित, उदित, उपदिष्ट है, उन मनःशांति या मोक्ष या मनोदोष निवारण से, आज के योगा यानी ब्रीदिंग एक्सरसाइज और फिजिकल पोस्चर्स (poses) का कोई संबंध नहीं है... खैर।
योगदर्शन हमारा अधिकार क्षेत्र नहीं है इसलिए उस पर विस्तार से बोलना सही नहीं है... परंतु इस तुलना के बिना, आयुर्वेद की जो गिरावट, अधःपतन, भ्रष्टाचरण हो रहा है और होता ही जाएगा और भविष्य में आयुर्वेद का स्वरूप अधिक से अधिक भद्दा, भयावह, दयनीय, शास्त्रहीन और अधिक से अधिक मार्केट, ट्रेड, सेल, बिक्री के स्वरूप का होता जाएगा, यह योगशास्त्र के प्राचीन और वर्तमान स्वरूप की तुलना किए बिना बताना संभव नहीं है!!!
जैसे हम आठ मंजिला किसी बिल्डिंग में, तीसरी मंजिल पर जाना चाहते हों तो, पहली दो मंजिलें सीढ़ियों से चढ़कर जाते हैं या लिफ्ट से गए तो भी वह पहली दो मंजिलें पार करके ही तीसरी मंजिल पर लिफ्ट जाती है... सीधे ग्राउंड फ्लोर से तीसरी मंजिल पर हम नहीं पहुँचते... उसका एक विशिष्ट क्रम है... पहली, दूसरी और फिर ही तीसरी, चौथी मंजिल... परंतु आज मात्र यम-नियम इन दो पहले अंगों, पहले विभागों, पहली मंजिलों को टालकर, योगा करने वाला प्रत्येक आदमी सीधे आसन-प्राणायाम इन मंजिलों पर छलांग मारता है, जो कि गलत, दोषपूर्ण और असल में दिशाहीन मूर्खता है।
शास्त्र के मूल तत्वों को किनारे रखकर, जो आयुर्वेद है ही नहीं ऐसी चीजों को आयुर्वेद के नाम पर, सिर्फ पैसे और प्रसिद्धि पाने के लिए खपाने (बेचने) का उद्योग हर जगह अत्यंत निडरता से, निर्लज्जता से, बेशर्मी से शुरू है...
जिसमें मसाज, मालिश, कॉस्मेटिक बेचना, सुवर्णप्राशन, गर्भसंस्कार, शिरोधारा, वेलनेस होम, वेलनेस रिसॉर्ट, आयुर्वेदिक दिनचर्या, निवासी गुरु-कूल (Guru-cool), धन्वंतरि के देह-टैग, स्थल...
ऑनलाइन-ऑफलाइन कोई भी, कोई भी विषय, कितने भी दिनों में, कितने भी रुपयों में सिखाना, असल में बेचना,
च्यवनप्राश को किसी होटल के स्नैक्स या रेसिपी की तरह बेचना, उसके अंदर आज के व्यवहार में आंवला और चीनी का अनुपात अत्यंत अशास्त्रीय है, इसकी ओर सुविधा के अनुसार आँखें मूँद लेना,
नाड़ी परीक्षा को और रस शास्त्र की औषधियों को ज़बरदस्ती दबाव डालकर आयुर्वेद ही है, ऐसा झूठ-मूठ बोलकर "बेचते रहना",
शास्त्र में कहीं भी नहीं बताया गया है ऐसा नाड़ी के तीन उंगलियों के स्पर्श में दोषों के पाँच-पाँच प्रकार पता चल पाना, जबकि सभी प्रकार से सभी चीजों का आलोचन-परीक्षण करके ही पेशेंट का निदान करना चाहिए ऐसा स्पष्ट बताया गया है... (अतोऽभियुक्तः सततं सर्वमालोच्य सर्वथा।) नाड़ी परीक्षण से सब कुछ पता चलता है, ऐसा भ्रम जानबूझकर फैलाना...
आयुर्वेद भैषज्य कल्पना से अत्यंत विसंगत, विरुद्ध, विलक्षण, विपरीत ऐसे रसकल्प (Mercurial formulations), जो मूलतः 99% जले हुए, झुलसे हुए, भस्म हुए, राख हुए, दग्धपाकी (overcooked) होते हैं, उन्हें आयुर्वेद का ही हिस्सा है, ऐसा कहकर बेचते रहना...
इसके अलावा एक्यूपंक्चर को 'विद्ध' कहकर बेचना,
शास्त्र में नहीं बताया गया है ऐसे प्रकार का तथाकथित 'अग्निकर्म' करना,
मॉडर्न साइंस द्वारा बनाई गई मशीनों का उपयोग करके... उसे आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट या कॉस्मैटोलॉजी कहना... गाल और बाल के प्रॉडक्ट बेचना, अभ्यंग तेल, उबटन, शैम्पू, लिपबाम, लिपस्टिक बेचना, ऐसी कितनी ही अराजक, अनियंत्रित, अशास्त्रीय, अनैतिक और...
सबसे महत्वपूर्ण और सबसे बुरा यानी अन्नदाता पेशेंट को बहकाने वाला, फंसाने वाला, लूटने वाला ऐसा व्यापारिक जाल तैयार करके उसमें पेशेंट को कस्टमर, क्लाइंट या असल में बलि का बकरा बनाकर फंसाना और उसका शोषण (Exploitation), दिशाभूल, धोखाधड़ी, वंचना, लूटपाट करना आज का सार्वत्रिक व्यवहार है।
निश्चित ही, इस वर्णित स्थिति के अत्यंत दुर्लभ ऐसे सम्माननीय अपवाद हो सकते हैं 🙏🏼।
परंतु अधिकांश नए आने वाले छात्र, नए वैद्य बनने वाले युवक और अधिकांश स्थापित विद्यमान आयुर्वेद प्रैक्टिसनर्स को, मूल शास्त्र के मूल ग्रंथों के वाक्य ठीक से पढ़ने तक नहीं आते... इसलिए उन्हें समझना-जानना और भी असंभव होता है... और जो पढ़ना ही नहीं आता, जो समझा ही नहीं है... उसकी "प्रैक्टिस करना" तो अत्यंत विनोद, विरोधाभास और असल में दयनीय और घिनौना प्रकार है...
परंतु इस पर किसी का नियंत्रण नहीं है... बल्कि यह गलत है ऐसा भी किसी को महसूस नहीं होता।
जैसे आज मूल योगदर्शन योगशास्त्र से... आज का योगा मात्र चित्र-विचित्र आसन और अतिरंजित लाभ वाले प्राणायाम... इतने तक ही सीमित है...
बिल्कुल वैसे ही आयुर्वेद का पूरी तरह बंटाधार करके, उसे मूल शास्त्र से अलग करके... केवल आयुर्वेद का व्यवसाय, व्यवहार, व्यापार, पैसे कमाने के लिए बेचना (Trade, Sale, Market) इतना ही फिलहाल अधिकांश जगहों पर चल रहा है....
और आने वाला हर नया बैच मूल ग्रंथों से, श्लोकों से, मूल शास्त्र से अधिक से अधिक दूर, अपरिचित, अज्ञानी, अनजान ही आता रहने वाला है।
और सरकारी या सरकार द्वारा अनुदानित कॉलेजों की तुलना में, लाखों की भारी फीस भरकर प्राइवेट कॉलेजों से पढ़ने वाला, औसत बुद्धि का, मामूली क्षमता का और घटिया प्रवृत्ति का आने वाला हर नया बैच, शास्त्र को समझने-पढ़ने की ऐसी कैपेसिटी (क्षमता) का हो ही नहीं सकेगा...
दुर्भाग्य से जिन्हें आयुर्वेद शास्त्र की प्रैक्टिस करके पेशेंट ठीक करके अपना जीवन चलाना कदापि संभव नहीं है... ऐसी संभावना और क्षमता और आत्मविश्वास जिनके अंदर नहीं है... ऐसे ही लोग केवल रोज़गार, रोटी-बेटी (Employment) के रूप में... गली-गली, जंगल, घाट, पर्वत, नुक्कड़, गाँव, तालुका, ऐसे कहीं भी कुकुरमुत्ते (Mushroom) की तरह उगने वाले नए-नए प्राइवेट कॉलेजों में शिक्षक के रूप में जॉइन होते रहते हैं... उनमें से भी 20 से 80 प्रतिशत शिक्षक कागजों पर यानी 'घोस्ट' (Ghost) = भूत = अस्तित्वहीन प्रकार के होते हैं... इसलिए ऐसे शिक्षकों से, ऐसे कॉलेजों से जो उत्पाद (Product/Manufacture) पैदा होंगे, वे कितने मैलप्रैक्टिस (Malpractice), कुपोषित (Malnourished), गलत शिक्षित (False educated)... असल में थर्ड ग्रेड रिजेक्ट करने योग्य दर्जे के होंगे... यह बताने के लिए सोचने की आवश्यकता नहीं है!!!
इसलिए यहाँ से आगे... जिनके हाथ में आयुर्वेद जाने वाला है, वे लोग, शास्त्र कभी न पढ़े हुए, न जाने हुए, न सीखे हुए, न समझे हुए ऐसे ही लोग 99% होने वाले हैं!!!
इसलिए जैसे योगदर्शन योगशास्त्र की तुलना में आज के "योगा" का पूरी तरह मार्केटिंग होने के कारण बंटाधार हुआ है... बिल्कुल वैसे ही... आयुर्वेद का भी... उससे भी बुरे स्वरूप में बंटाधार होगा, यह 100, 200, 1000% निश्चित है!!! 💯% ✅️
अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं। लेखक इनके पूर्णतः सत्य या त्रुटिहीन होने की पुष्टि नहीं करता है। चूँकि यह सामग्री व्यक्तिगत समझ पर आधारित है, इसमें तकनीकी या तथ्यात्मक कमियाँ संभव हैं। पाठक इस संभावना को स्वीकार करते हुए ही लेख का संज्ञान लें।
एक छोटी सी बात: इस पोस्ट में जो भी विचार हैं, वे मेरी निजी समझ पर आधारित हैं। मैं यह दावा नहीं करता कि ये पूरी तरह सही या सटीक हैं। इंसान हूँ, तो लिखने में कुछ कमियाँ या गलतियाँ हो सकती हैं। इन बातों को ध्यान में रखकर ही मैं अपनी बात साझा कर रहा हूँ।
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अस्वीकरण (Disclaimer): इस पोस्ट में व्यक्त किए गए विचार पूरी तरह से सही, सटीक या दोषरहित हैं, ऐसा लेखक का दावा नहीं है। चूँकि ये लेख व्यक्तिगत राय, समझ और धारणा पर आधारित हैं, इसलिए इनमें कुछ कमियाँ, त्रुटियाँ या दोष होना संभव है। इस संभावना को स्वीकार करते हुए ही ये लेख लिखे जा रहे हैं।

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