लघुत्रयी की मर्यादायें & योगरत्नाकर
माधवनिदान मे साध्यासाध्यता के लक्षण ही नही लिखे है, जो की रोगनिदान का मूल प्रयोजन है!
जिसकी प्रतिज्ञा की = "सोपद्रवारिष्ट" ... उस उपद्रव और अरिष्ट इन की भी परिभाषा (=लक्षण /डेफिनेशन) उसने नही लिखे ...
ना ही उसने सभी रोगो मे उपद्रव & अरिष्ट का वर्णन किया है. इस प्रकार से सकल सर्वांगीण संपूर्ण सर्वंकष तो छोड ही दीजिए...
मूलभूत भी प्राथमिक ज्ञान तक न देने वाला ग्रंथ, लघुत्रयी मे स्थान प्राप्त किये हुए है 😵💫🙄
इसमे और भी कई दोष है , जिस कारण से , निदाने माधव श्रेष्ठः के बजाय निदाने माधवो नष्टः ऐसा सविस्तर स्पष्ट किया जा सकता है
इस प्रकार का लेख म्हेत्रेआयुर्वेद ने पहलेही लिखा है जिसके लिंक आगे दी हुई है
https://mhetreayurved.blogspot.com/2024/01/blog-post_12.html
शार्ङ्गधर ने पूर्व खंड के द्वितीय अध्याय मे, "दृष्टी से ज्ञातव्य" ऐसे "पशुपक्षियों की गती" पर आधारित नाडी परीक्षा, "स्पर्श परीक्षा" के रूप मे बताई , जो बहुत ही अवैज्ञानिक अशास्त्रीय प्रसिद्ध असत्य और बाधित हेत्वाभास अर्थात प्रमाणांतर से बाधित होने वाली दोषपूर्ण बात है
बहुत सारे कल्पों का, स्वयं कभी "निर्माण या उपयोग" बिना किये ही उसको कॉपी-पेस्ट किया है
जैसे सितोपलादि की फलश्रुती के बारे मे चरक के श्लोकों को इंटरमींगल करके लिखा है
इस पर भी हमने एक स्पष्टीकरण देने वाला व्हिडिओ प्रसृत किया है, जिसकी आगे लिंक दी है
https://youtu.be/4y_dUG27VQE?si=Tsnw0-cf5xLLZTQS
⬆️
सितोपलादि चूर्ण : चरकोक्त एवं शार्ङ्गधरोक्त फलश्रुति का तुलनात्मक अध्ययन
भावप्रकाश निघण्टु के आरंभ मे ही ... "शास्त्र की दृष्टि को ही नष्ट कर दिया है" !!!
जो जैसा है , वह वैसा मान के चलो
क्यू और कैसे है और ये मत पूछो
ऐसे हरीतकी के वर्णन के समय = सबसे पहले द्रव्य के वर्णन के समय ही स्पष्ट कर दिया ...
प्रभावाद्दोषहन्तृत्वं सिद्धं यत्तत्प्रकाश्यते |
हेतुभिः शिष्यबोधार्थं नापूर्वं क्रियतेऽधुना ||
कर्मान्यत्वं गुणैः साम्यं दृष्टमाश्रयभेदतः |
यतस्ततो नेति चिन्त्यम्
अनेक द्रव्यों को एक ही पर्याय नाम लिखने के कारण, आगे जाकर, आज उन द्रव्यों के बारे मे संदिग्धता उत्पन्न हो गई है
सबसे अच्छा संहितोत्तर ग्रंथ योग रत्नाकर है !
क्योंकि उसने उस उस रोग निदान के पश्चात, उस उस रोग की चिकित्सा लिखी.
पूर्व परंपरा के अनुसार , पहले सारा निदान लिख दिया और फिर "बॅक टू स्क्वेअर वन" आकर, चिकित्सा लिखते रहे, ऐसा पारंपारिक स्वरूप उसने अपनाया नही.
उसने रोग निदान वर्णन के बाद, "तुरंत" उसकी चिकित्सा लिखी.
हो सकता है की यह वृंद माधव के कारण हुआ होगा. लेकिन आज वृंद माधव या तो उपलब्ध नहीं है या सहज प्राप्त नही है, इसलिये योगरत्नाकर ही आज का संहिता के बाद का सर्वोत्तम उपयोगी ग्रंथ है

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