Friday, 28 November 2025

आर्युववेद का, "शास्त्र" इस अर्थ से, सुखद उदय, तेज दोपहर और भयानक/डरावना सूर्यास्त ...R ise, rein & ruin of Aryuwaweda as Shaastra".... "Pleasant rise, scorching noon and terrible/fearsome sunset of Aryuwaweda's, "as a science"

​आर्युववेद का, "शास्त्र" इस अर्थ से, सुखद उदय, तेज दोपहर और भयानक/डरावना सूर्यास्त Rise, rein & ruin of Aryuwaweda as Shaastra".... "Pleasant rise, scorching noon and terrible/fearsome sunset of Aryuwaweda's, "as a science" 

Picture credit Google Gemini AI 

यह लेख आर्युववेद नामक एक काल्पनिक, अस्तित्वहीन सत्ता के बारे में है, जिसका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है। यदि कोई प्रासंगिकता या समानता दिखाई दे, तो कृपया इसे मात्र संयोग मानें। इस लेख में दिए गए सभी कथन काल्पनिक हैं और उनमें त्रुटियाँ हो सकती हैं। इस आलेख में प्रत्येक कथन में की गई टिप्पणियों तथा वर्णित परिस्थितियों के संबंध में निश्चित रूप से सन्माननीय अपवाद हो सकते हैं।

​23


सबसे बुरा हिस्सा यह है कि जो आर्युववेद में मेरिट वाले बच्चे थे, उन्हें स्वाभाविक रूप से और जुनून से अभ्यास (प्रैक्टिस) का ही आकर्षण था ... इसलिए आर्युववेद के उस-उस बैच के ये सभी सबसे होशियार, सबसे बुद्धिमान, सबसे सक्षम, ऐसे युवा लोग, अपने-अपने समय पर, वास्तविक व्यवहार में प्रैक्टिस में आए...


​24


और उनके बैच में जिन्हें शास्त्र का 'ओ' 'का' 'ठो' भी पता नहीं था, जिनकी योग्यता क्षमता द्वितीयक, तृतीयक या वास्तव में निकम्मी थी, ऐसे लोग प्रैक्टिस में नहीं आ सके... क्योंकि उनमें वह हिम्मत, धमक (निर्भीकता), क्षमता, कुवत, औकात थी ही नहीं


​25


इसलिए ये मेरिट रहित, प्रैक्टिस करने की क्षमता रहित, लोग... अकादमी में और गवर्नमेंट में ऊपरी पदों पर जाकर स्थिर हो गए!


​27


जिन्हें मूल रूप से शास्त्र में मेरिट नहीं है, शास्त्र के प्रति किसी भी प्रकार की निष्ठा, समर्पण, अपनापन नहीं है ... ऐसे आर्युववेद में एकदम भी अक्ल न रखने वाले लोग, आर्युववेद के बारे में किसी भी प्रकार का लगाव न रखने वाले लोग, ये या तो अकादमी में शिक्षक, प्रोफेसर, रीडर, लेक्चरर बन गए या गवर्नमेंट में जहां नीति (पॉलिसी) तय होती है, पॉलिसीमेकर्स, ऑफिस बेयरर इस अर्थ में आर्युववेद के क्षेत्र में शैक्षणिक/ व्यावसायिक और औषधीकरण इन तीनों क्षेत्रों के "भविष्य तय करने वाले अधिकारियों की जगह पर" ऐसे लोग बैठ गए जिन्हें शास्त्र के प्रति अपनापन नहीं है, शास्त्र का मूल गहरा सच्चा ज्ञान नहीं है, इसलिए पढ़ाने वाले और शैक्षणिक/व्यावसायिक नीति तय करने वाले लोग, ये आर्युववेद को न जानने वाले, आर्युववेद के अनजान या आर्युववेद की बुद्धि न रखने वाले ही सभी हुए


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समाज में बहुसंख्यक रूप से गवर्नमेंट या ग्रांटेड कॉलेज की तुलना में, मेरिट वाले बच्चों की अपेक्षा अधिक संख्या में बाहर निकलने वाले, प्राइवेट कॉलेज के, आर्युववेद की डिग्री खरीद सकने वाले, ऐसे व्यापारी दृष्टिकोण रखने वाले, "पैसे वाले" लोग बाहर निकले ... इन सभी ने मिलकर आर्युववेद के वाणिज्यिक फैलाव को बहुत चतुराई से बढ़ाया...


​29


और उसे रोका जा सके, इतनी शक्ति, जो मूल रूप से गवर्नमेंट / ग्रांटेड कॉलेज के मेरिट वाले बच्चों में थी, बुद्धिमान बच्चों में थी, जिन्हें शास्त्र निष्ठा, शास्त्र समर्पण, शास्त्र के प्रति अपनापन, लगाव, लेना-देना शास्त्र के बारे में था...


​उनमें उतनी संगठन क्षमता, उतनी दूरदृष्टि, उतना रीच अप्रोच, उतनी पहुंच, उतना प्रभाव, और मुख्य रूप से अपनी प्रैक्टिस सेट करने के लिए उनकी जवानी में लगे समय के बाद उनके पास उतना उत्साह और सामर्थ्य नहीं बचा...


​कि यह जो सारा अधःपतन का भाग चल रहा है, उसे रोका जा सके, उस पर आपत्ति ली जा सके, यह गलत चल रहा है ऐसा कहा जा सके, ऐसी किसी भी प्रकार की परिस्थिति शेष नहीं रही


​इसलिए


A.


मेरिट वाले शास्त्रनिष्ठ और शास्त्र समर्पित शास्त्रज्ञान रखने वाले लोगों का शांत रहना, मौन, निष्क्रियता, अप्रतिकार


B.


गवर्नमेंट में पॉलिसी मेकर्स, ऑफिस बेयरर्स जैसे अधिकारियों की जगह पर आर्युववेद का ज्ञान न रखने वाले, आर्युववेद के प्रति अपनापन, निकटता, निष्ठा न रखने वाले, संहिता, श्लोक (श्लोक) में से कुछ भी न समझने वाले, लोगों का जाकर बैठना


C.


इससे द्वितीयक तृतीयक दर्जे के या वास्तव में योग्यताहीन = गुणवत्ता रहित लोग, प्रैक्टिस करने की कुवत, क्षमता न रखने वाले लोग, शिक्षा के क्षेत्र में घुसना


D.


और शास्त्र निष्ठा, शास्त्र समर्पण से अधिक, मैं आर्युववेद की डिग्री "खरीदते समय", "लगाया गया पैसा" मुझे "वसूल" कैसे हो सकता है, ऐसे "व्यापारी, नफेखोर (लाभार्थी) वृत्ति" से आर्युववेद क्षेत्र में, शास्त्रीय ट्रीटमेंट छोड़कर, बाकी की अनेक बातों के नैरेटिव और ट्रेंड इन्होंने सेट किए वह लोग


E.


और सबसे आखिरी में यानी सोशल मीडिया पर घरेलू दवाइयां बताकर, आर्युववेद के सारे मूल्य को पैरों तले रौंदने वाले, आर्युववेद का कचरा करने वाले लोग


F.


कुवत, क्षमता, योग्यता, लायक़ी, औकात न रखने वाले नवयुवा विद्यार्थियों के हाथों में, शास्त्रीय आर्युववेद, ज़रूरत से ज़्यादा सरल, यूज़र फ्रेंडली, रेडी टू यूज़, स्पून फीडिंग करके, जिन लोकप्रिय विद्यार्थीप्रिय वैद्यों ने, किसी भी प्रकार का भेदभाव न करते हुए, कोई भी छानबीन न करते हुए, ज्ञानदान के कोई भी मापदंड न लगाते हुए, खुले हाथ से सरल-सरल आर्युववेद, जो सामने आएगा उसे, बांट दिया, वे भी इस परिस्थिति के लिए जिम्मेदार हैं


👆🏼


ये सभी लोग आज के आर्युववेद के प्रचंड फैलाव के जनक हैं ... जिन्होंने आर्युववेद का फैलाव तो बहुत बढ़ाया ... पर शास्त्र के रूप में उसका गला दबाकर उसकी ह*त्या की है


​1


लगभग 90 के दशक तक महाराष्ट्र में आर्युववेद के गवर्नमेंट कॉलेज तीन और ग्रांटेड कॉलेज दस-बारह ऐसी स्थिति थी


​2


पर 2005 तक प्राइवेट कॉलेजों की संख्या बहुत ज़्यादा बढ़ गई


​3


जब तक विद्यार्थियों को आर्युववेद में प्रवेश लेने के लिए सीट बहुत कम थीं, तब तक मेरिट वाले विद्यार्थी उसमें आते थे या कुछ कानूनी सहूलियतों के कारण कम मेरिट वाले विद्यार्थी भी उसमें आते थे


​4


पर मेरिट न होते हुए और कानून की सहूलियत न होते हुए, सिर्फ "पैसे हैं" इसलिए आर्युववेद में प्रवेश लिया जा सकेगा ऐसी "व्यवस्था नहीं थी"!


​5


इसलिए जो कुछ विद्यार्थी आते थे वे दो प्रकार के थे कि


A.


जो बहुत ही अल्पसंख्यक, नगण्य, थोड़े से विद्यार्थी... सचमुच आर्युववेदशास्त्र को, जुनून, पसंद, समर्पण, देशनिष्ठा, राष्ट्रनिष्ठा, संस्कृति के प्रति अभिमान, अस्मिता या परंपरा, इनमें से किसी कारण से, सीखना चाहते थे और...


B.


इसके अलावा, बहुसंख्यक = 95% से 99% विद्यार्थी, "आर्युववेद इस शास्त्र में से", "कुछ भी न समझने के कारण", मॉडर्न मेडिसिन की जीपी (जनरल प्रैक्टिस) करते थे


​6.


यह चित्र 2000 तक सार्वत्रिक था पर जैसे-जैसे प्राइवेट कॉलेज की संख्या बढ़ती गई और उन कॉलेजों की अत्यधिक यानी गवर्नमेंट और ग्रांटेड कॉलेज की तुलना में, "कई गुना ज़्यादा फीस भर सकने वाले विद्यार्थी", इन कॉलेजों में से जैसे-जैसे बाहर निकलने लगे...


वैसे-वैसे "कम मेरिट होते हुए भी या मेरिट बिलकुल भी न होते हुए भी" आर्युववेद लर्न (सीखने) की अपेक्षा "अर्न" (कमाई) कर सकने वाली यानी "परचेस" (खरीद) कर सकने वाली, खरीद सकने वाली, ऐसी "खरीद" करने की "वृत्ति और क्षमता और विरासत" रखने वाले लोग, इस क्षेत्र में "दाखिल होने लगे"!


​7.


जब तक पैसे न रखने वाले लोग, केवल बुद्धि के बल पर या स्वयं के जुनून, समर्पण, निष्ठा के बल पर इस शास्त्र में काम कर रहे थे, तब तक यह शास्त्र, शास्त्र समझकर लेना, शास्त्र के अनुसार प्रैक्टिस करना... इतना तक ही "सीमित था!"


​8.


परंतु जैसे-जैसे मेरिट नहीं, पर "पैसा है", इसलिए इस शास्त्र की डिग्री "खरीदना" संभव है, ऐसी "वृत्ति" के लोग, ऐसी "क्षमता" के लोग इस क्षेत्र में आने लगे...


वैसे-वैसे शास्त्र निष्ठा, संस्कार, जीवन मूल्य, "नैतिकता यह बाजू हटकर"...


जिनके आर्युववेद प्रवेश का मुख्य मार्ग "मालमत्ता (धन-संपत्ति)" था,


उन्होंने आर्युववेद के प्रैक्टिस के व्यावसायिक क्षेत्र में आने के बाद, "वही मालमत्ता, कैसे दाम दुगुनी या अनेक गुना वसूल की जा सकती है" इसके लिए "मार्ग खोजे, मार्ग तैयार किए, ट्रेंड सेट किए, उस प्रकार के नैरेटिव सेट किए"


​9.


और देखते-ही-देखते... कहने भर में ... आर्युववेद यह "शास्त्र की दृष्टि से प्रैक्टिस करने का चिकित्सा क्षेत्र न रहकर", वह... तूफानी धंधे वाला मार्केट बन गया!!


दवा बेचने का


हैपनिंग (ट्रेंडी)


फील गुड


स्पा


रिसॉर्ट ट्रीटमेंट देने वाला


तथाकथित महंगा राजसी केरलीय पंचकर्म करने वाला


मालिश (मसाज) करने वाला


सुगंधित उबटन


तथाकथित आर्युववेदिक मेकअप काॅस्मेटिक्स का सामान


अभ्यंग तेल


शतावरी कल्प


च्यवनप्राश


गर्भसंस्कार


सुवर्णप्राशन


"Show धन" के लिए की गई पंचकर्म


शिरोधारा


जहां शरीर को छेद ही नहीं है, उन कटि, जानु, हृदय, मन्या जैसी जगहों पर, बस्ती (एनिमा) करना


मूल रूप से एक्यूपंक्चर वाला विद्ध


आर्युववेदिक आवासीय गुरुखूळ


पेड सेमिनार


पेड वेबिनार


पेड ऑनलाइन कोर्सेस


आर्युववेद शास्त्र की... नाड़ी परीक्षा, रसशास्त्र, मॉडर्न मेडिसिन, योगा, नेचुरोपैथी ऐसा किसी के साथ भी गांठ बांधकर, मिलावट करके,


उसका आए हुए नए तकनीक की सहायता से,


बहुत ज़्यादा, बेसुमार,


पर आकर्षक मार्केटिंग करके,


पिछली पीढ़ी की तुलना में, बहुत तेज़ी से और कई गुना पैसा कमाना यह शुरू हो गया...


​10.


और एक बार ऐसी चीज़ों का फैलाव हुआ और मूल्यों का पतन = नैतिकता का त्याग = ह*त्या यह हुआ, तो फिर बाज़ार, मार्केट, धंधा, दुकान, दलदल, कीचड़, चिखल (गाद) यह फैलने में देर नहीं लगती


​11.


और दुर्भाग्य से इस प्रकार की वृत्तियां (प्रवृत्तियाँ) यह शास्त्रनिष्ठ समर्पण, ध्येयवाद, जुनून की अपेक्षा, बहुत प्रचंड गति से फैलती हैं


​12


इसमें आर्युववेद को आवश्यकता से ज़्यादा सरल-सरल करके बताने वाले, पिछली पीढ़ी के वैद्य भी बहुत हद तक जिम्मेदार हैं ... हम क्या योग्यता के, किस बुद्धिमत्ता के स्तर के लोगों के हाथों में, "शास्त्र को आसानी से उपयोग करने लायक" बनाकर दे रहे हैं , इसका भान/होश, उन्हें ज्ञानदान करते समय नहीं रहा


​13


आर्युववेद क्षेत्र के बाहर के कुछ लोगों ने बहुत चालाकी से और तेज़ी से लोकप्रिय प्रचार माध्यमों का सहारा लेकर आर्युववेद के हैपनिंग ट्रीटमेंट के और चमकदार प्रोडक्ट का मार्केट सेलिब्रिटी से सीधे आम जनता तक निचले स्तर तक फैलाया, पहुंचाया, इसमें तालाजीबांबे, मार देव, तपंजलि, धाबवमाग जैसे उद्योगपतियों (industrialists) का शेर का हिस्सा है


​14


यह दिखाते हुए कि मरीज को "संस्कृत में लिखे शास्त्र, संहिता, टीका यह न पढ़ने पर भी" ठीक किया जा सकता है, मरीज को "ठीक न करने पर भी" अन्य "विभिन्न मार्गों से" आर्युववेद में पैसा कमाया जा सकता है ... जिन्होंने संस्कृत शास्त्र, श्लोक, संहिता, टीका और मूल विरासत में से आर्युववेद की दृष्टि से कुछ भी निकट नहीं रखा था... ऐसे लोगों ने आर्युववेद को सरल, सेलेबल (बिकाऊ), मार्केटेबल, यूज़र फ्रेंडली बनाया... जिन्हें मूल शास्त्र का ओ का ठो भी पता नहीं,


ऐसे नए, युवा, "पैसे भरकर डिग्री खरीदे हुए", विद्यार्थियों के, नववैद्यों के हाथों में, सरल किया हुआ, रेडी टू यूज़ पैकेज, फॉर्म्युलेटेड आर्युववेद दिया


​15.


और जैसे होटल का मेनू कार्ड छापना हो, उसी प्रकार लोगों ने बोर्ड पर बीमारियों के नाम और दी जाने वाली तथाकथित पंचकर्म सुविधाओं के नाम छापे और "नोट (पैसे) कमाने का" उद्योग शुरू किया


​16.


और फिर, अनेकों ने यही करने के कारण, "यही आर्युववेद है" ऐसा नए-नए युवा हुए समाज के आम लोगों का भी "समझ/वहम हो गया"


​17


इसलिए सच्चा आर्युववेद क्या होता है?


जो हमें बेचा जाता है, वह आर्युववेद है क्या?


सचमुच मूल आर्युववेद में नाड़ी परीक्षा होती है क्या?


वास्तव में मूल आर्युववेद में पारद (पारा), गंधक (सल्फर), सोना, चांदी, हीरा, मोती, बचनाग, कुचला जैसे विषों, धातुओं, खनिजों का औषध के रूप में उपयोग किया गया है क्या?


सचमुच, आर्युववेद में गर्भसंस्कार, स्वर्णप्राशन, मसाज, मालिश, शिरोधारा,


जहां शरीर को छेद ही नहीं है, उन कटि, जानु, हृदय, मन्या जैसी जगहों पर, बस्ती करना,


जो स्पष्ट रूप से एक्यूपंक्चर है, उसे विद्ध कहना,


जो केमिकल के बिना बन ही नहीं सकते


और आर्युववेद के ग्रंथों में जिन शब्दों का उल्लेख नहीं हो सकता ,


ऐसे हर्बल मेकअप काॅस्मेटिक्स के साधन लिपस्टिक, साबुन, शैम्पू, कंडीशनर, जेल, मॉइश्चराइज़र की बिक्री यानी आर्युववेद नहीं है,


यह समझने जितना, ज्ञान, कुवत, बुद्धि, जानकारी, ओपनिंग्ज, सोर्स यह आम जनता को... सुलभ नहीं हैं, ज्ञात नहीं हैं, आवश्यक नहीं हैं


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जिन्हें मेरिट ही नहीं है, उन्हें मूल शास्त्र में क्या लिखा है, यह समझना संभव नहीं है और वह न समझते हुए भी हम जो कुछ करते हैं, उससे मरीज ठीक होता है ... या उसे ठीक हुआ है, ऐसा समझाया जा सकता है ... या ठीक नहीं हुआ, तब तक होने वाली भीड़ के कारण, अगले वैसे ही "बलि के बकरे" इस "पैसा कमाकर देने वाले चक्र में प्रवेश करते रहते हैं"


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और 140 करोड़ की जनता में किसी को भी इसमें से कपट, खोखलापन, धोखा, लूट, ठगी, गुमराह करना, भ्रम, गड़बड़ी, मिसगाइडिंग (भटकाव) यह ध्यान में नहीं आ सकता, यह स्पष्ट हुआ।


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उसमें 2015 से सबके हाथ में मोबाइल आने के कारण हजारों के सब्सक्राइबर और लाखों के व्यूज़ रखने वाले अवसरवादी, डेढ़-स्याणे आर्युववेदिक डॉक्टरों ने "घरेलू उपाय" बताने का नया ही मूर्खता, बकवास, बेवकूफी चालू कर दी


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या डेढ़-दो लाख रुपये भरकर, प्राइवेट टीवी चैनल पर, स्वयं की शेखी बघारने का, खरीदा हुआ एपिसोड, रियल शो के रूप में लगवाना, ऐसा भी एक अभिनव उद्योग शुरू हो गया ...


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दुनिया का कोई भी मॉडर्न मेडिसिन का डॉक्टर घरेलू दवाइयां इस प्रकार का उपदेश, सार्वजनिक मंच पर या प्रिंट मीडिया में या सोशल मीडिया में नहीं करता, यह स्पष्ट दिखते हुए भी...


आर्युववेद की घरेलू दवार बताकर, आर्युववेद का अत्यंत अवमूल्यन करने का काम, आर्युववेद को सस्ता बनाने का काम, आर्युववेद को हल्के में लेने का काम, आर्युववेद की रौनक खत्म करने का काम अगर किसी ने किया होगा तो वह इन घरेलू दवाइयां बताने वाले लोकप्रिय बेहूदा लोगों ने किया!!!



Rise, rein & ruin of Aryuwaweda as Shaastra".... "Pleasant rise, scorching noon and terrible/fearsome sunset of Aryuwaweda's, "as a science"

Rise, rein & ruin of Aryuwaweda as Shaastra".... "Pleasant rise, scorching noon and terrible/fearsome sunset of Aryuwaweda's, "as a science"

This article is about an imaginary non existent thing, named as Aryuwaweda. It has no relation with real life. If any relevance or resemblance found, please consider it as megre coincidence. All the statements in this article are fictitious and those may be wrong or contain mistakes. There may certainly be honorable exceptions to the observations made & situations reported in each statement in this article. 

Picture credit Google Gemini AI 

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The worst part is that the merit-based students in Aryuwaweda, they obviously and passionately were attracted to practice itself ... therefore all these Aryuwaweda's graduates of their respective batches smartest, most intelligent, most capable, such young people, at their time, in real life, came into professional clinical practice ...

​24

And in their batch, those who didn't know the ABC of the Shastra (science/scripture), whose competence capacity was secondary, tertiary or frankly incompetent, such kind of people could not come into practice... because they lacked that courage, daring, capability, capacity, worth/stature.

​25

Therefore, these people without merit, lacking the capacity to practice ... settled down by going to higher positions in the Academy and the Government!

​27

Those who fundamentally have no merit in Shastra, no kind of devotion, surrender, affection for the Shastra ... such people in Aryuwaweda without an ounce of intelligence, people with no affection for Aryuwaweda , they either became teachers, professors, readers, lecturers in the Academy or in the Government where policies are decided, policymakers, office bearers, meaning in the field of Aryuwaweda in the educational/professional and pharmaceutical sectors, people who "decide the future" sat on the "officers' positions" who have no affection for Shastra, no original deep, true knowledge of the Shastra, therefore those who do not know Aryuwaweda, ignorant of Aryuwaweda, or those without the intellect of Aryuwaweda, became teachers and the people deciding the educational/professional policies

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In society, a majority compared to Government or granted colleges, more in number than the merit students, came out of Private Colleges, those who could buy an Aryuwaweda degree, such people with a commercial outlook, "Money eyed" people came out ... all these together very cleverly increased the commercial spread of Aryuwaweda...

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And the power to curb 👆🏼 it, which was originally with the merit students of Government / granted colleges, the intelligent students, who had Shastra devotion, Shastra surrender, affection, attachment, taking care of the Shastra...

​They did not have that much organization, that much capability, that much foresight, that much reach, approach, connection, influence, and mainly after the time spent in their youth to set up their own practice, they did not have that much enthusiasm and strength left ...

​That the entire part of degradation that is going on, could be stopped, objected to, said that this is going wrong, such a situation did not remain.

​Therefore

A.

The silence, quietness, inactivity, non-resistance of the merit-based, Shastra-devoted and Shastra-knowledgeable people

B.

In the places of officers like Policy Makers, Office Bearers in the Government, people without the knowledge of Aryuwaweda, without affection, closeness, devotion for Aryuwaweda, those who don't understand anything from Samhita, Shloka (scriptural verses), going and sitting there in power

C.

People of secondary or frankly inferior quality = without quality, people without the competence and capacity to practice, entering the field of education

D.

And more than Shastra devotion, Shastra surrender, people with a "commercial, profit-making attitude" who set narratives and trends for many other things, leaving aside the classical treatment, in the field of Aryuwaweda, thinking how to "recover" the money I "spent" while "buying" the Aryuwaweda degree

E.

And lastly, people telling home remedies on social media, trampling all the value of Aryuwaweda, making trash of Aryuwaweda

F.

Popular, student-favorite Vaidyas (Ayurvedic doctors) who, without any discrimination, without any verification, without setting any criteria for imparting knowledge, freely distributed easy, simple Aryuwaweda to anyone who came, by making the classical Aryuwaweda, easier than necessary, user-friendly, ready-to-use, spoon-fed, into the hands of new young students without competence, capacity, eligibility, worth/stature, they too are responsible for this situation

👆🏼

All these are the cause reason originators of today's huge false unrealistic spread of Aryuwaweda ... who certainly increased the spread of Aryuwaweda ... but actually they all stra*ngled and m*ur*der*ed it as a Shastra

​1

Roughly till the 90s decade, the situation in Maharashtra was three Government colleges and ten-twelve granted colleges of Aryuwaweda

​2

But by 2005, the number of Private Colleges increased tremendously

​3

As long as the seats for students to take admission in Aryuwaweda were very few, merit students used to come/get admission, or due to some legal facilities, students with less merit also used to come

​4

But without merit and without the facility of law, there was "no system" that admission in Aryuwaweda could be taken just because "there is money"!

​5

Therefore, the students who came were of two types:

A.

The very minority, negligible, few students who genuinely wanted to learn the Aryuwaweda Shastra due to some reason out of passion, liking, devotion, patriotism, national devotion, pride, identity, or tradition towards the culture, and...

B.

Apart from this, the majority = 95% to 99% students, without understanding "anything" of "Aryuwaweda Shastra", used to do GP (General Practice) of Modern Medicine

​6.

This picture was universal till 2000, but as the number of Private Colleges increased and the students who could "pay the exorbitant fees" of those colleges compared to Government and granted colleges, "many times more", started coming out of these colleges...

So too, people with the "attitude and capacity and legacy" of "purchasing" (buying) the Aryuwaweda degree, who could "Earn" instead of "Learn" Aryuwaweda even with "low merit", "started entering" this field!

​7.

As long as people without much money, working in this Shastra only on the strength of intellect or their own passion, devotion, loyalty, until then this Shastra was "limited to" understanding the Shastra, practicing according to the Shastra...

​8.

But as people with the "attitude" and "capacity" that no merit, but "money is there", therefore it is possible to "buy" the degree in this Shastra, started entering this field...

Similarly, Shastra devotion, values, life principles, "morality fell aside"...

Those for whom "wealth/property" was the main way to get admission in Aryuwaweda,

After coming into the professional field of Aryuwaweda practice, they "sought ways, created ways, set trends, set similar narratives" to see "how that same wealth could be recovered double or many times over"

​9.

And in no time... it became a tremendously commercial market, instead of being a medical field for practice from a "Shastra perspective"!!

Selling medicine

Happening (Trendy)

Feel Good

Spa

Resort treatment giving

So-called expensive royal Keraliya Panchakarma doing

Massage maalish anointing doing

Fragrant herbal powder (Ubtan)

So-called Ayurvedic makeup cosmetics material

Abhyanga oil

Shatavari Kalpa

Chyawanprash

Garbhasanskar

Suvarnaprashan

Panchakarma done for "Show Dhan"

Shirodhara

Doing Basti in places where the body has no openings, such as Kati (waist), Janu (knee), Hridaya (heart), Manya (neck)

Viddha (piercing) which is fundamentally Acupuncture

Ayurvedic residential Gurukhool

Paid seminars

Paid webinars

Paid online courses

Tying up, mixing the Aryuwaweda Shastra... with Nadi Pariksha, Rasashastra, Yoga, Naturopathy ... with anything,

With the help of new technology that came,

Doing excessive, immoderate,

but attractive Marketing,

Earning money very fast and many times more compared to the previous generation started...

​10.

And once such things sprouted and the degradation of values = abandonment of morality = mu*rde*)r happened, then it doesn't take time for the market, business, shop, swamp, mire, mud to spread

​11.

And unfortunately, such attitudes spread much faster than Shastra devotion, surrender, idealism, passion

​12

In this, the Vaidyas of the previous generation, who explained Aryuwaweda much simpler than necessary, are also responsible to some larger extent ... they did not remain conscious while imparting knowledge as to in whose hands of what competence, what level of intelligence, they are making the "Shastra easily useable"

​13

Some people outside the field of Aryuwaweda very cleverly and quickly took the support of popular media and spread and reached the market of happening treatments and shiny products of Aryuwaweda from celebrities to the common people at the grassroots level, in this, industrialists like Talajibaambe Maar Dev Tapanjali Dhabavmag have a lion's share

​14

Showing that a patient can be cured "even without reading the Shastra, Samhita, commentary which is in Sanskrit", that money can be earned in Aryuwaweda in other "various ways" "even without curing" the patient ... those who had nothing close to Sanskrit Shastra, Shloka, Samhita, commentary, and the original heritage from the perspective of Aryuwaweda ... such people made Aryuwaweda simple, saleable, marketable, user-friendly ... those who don't know the ABC of the original Shastra,

Gave the simplified, ready-to-use packaged, formulated Aryuwaweda into the hands of such new, young students, "who bought the degree by paying money", the new Vaidyas

​15.

And as if printing a hotel menu card, people printed the names of diseases and the names of the so-called Panchakarma facilities being offered on the board and started the business of "earning notes (money)"

​16.

And then, because many people did the same, a "misconception arose" among the common people of the newly young society that "this is Aryuwaweda"

​17

Therefore, what is true Aryuwaweda?

Is what is sold to us, Aryuwaweda?

Does Nadi Pariksha (Pulse diagnosis) really exist in original Aryuwaweda?

Is it really true that in original Aryuwaweda, Pārad (Mercury), Gandhaka (Sulfur), Gold, Silver, Diamond, Pearl, Bachnāg, Kuchalā, such poisons, metals, minerals are used as medicine?

Really, Garbhasanskar, Suvarnaprashan, Massage, Anointing, Shirodhara in Aryuwaweda,

Doing Basti in places where the body has no openings, such as Kati, Janu, Hridaya, Manya,

Calling Viddha (Piercing), which is clearly Acupuncture,

Cosmetics Cannot be made without chemicals

And whose words cannot be mentioned in the texts of Aryuwaweda,

Selling such herbal makeup materials like lipstick, soap, shampoo, conditioner, gel, moisturizer is not Aryuwaweda,

The understanding, competence, intelligence, information, openings, source to understand this are not accessible, not known, not necessary to the common people...


There is no reliable system available accessible for common man society patients to verify scrutinize validate the reality of so called Aryuwaweda treatment therapy medicines 

​18

Those who have no merit, it is not possible for them to know what is written in the original Shastra, and even without knowing that, the patient gets cured by what we do ... or they can be convinced that they are cured ... or even if they are not cured, due to the crowd that gathers until then, the next "sacrificial lambs" "keep entering this money-making cycle"

​19

And it became clear that no one among the 140 crore population can realize the cunningness, hollowness, deception, robbery, looting, misguidance, illusion, confusion, misguiding in this all.

​20

In addition, since 2015, with a mobile in everyone's hand, opportunistic, half-wise Aryuwaweda doctors with thousands of subscribers and millions of views started a new foolishness, nonsense, idiocy of telling "home remedies"

​21

Or, by paying one and a half to two lakh rupees, an innovative business also started of showing one's bragging, purchased episode on a private TV channel, as a real show...

​22

Even though it is clearly visible that no Modern Medicine doctor in the world gives such kind of advice about home remedies on a public platform or in print media or on social media...

If anyone has done the most devastating and damaging work of devaluing Aryuwaweda extremely, making Aryuwaweda cheap, taking Aryuwaweda lightly, ruining the glory of Aryuwaweda by telling home remedies in Aryuwaweda, it is done by these popular, foolish people who tell home remedies!!!

आर्युववेदाचा, "शास्त्र" या अर्थाने, सुखद उदय, टळटळीत दुपार आणि भयानक/भयाण सूर्यास्त Rise, rein & ruin of Aryuwaweda "as Shaastra"

आर्युववेदाचा, "शास्त्र" या अर्थाने, सुखद उदय, टळटळीत दुपार आणि भयानक/भयाण सूर्यास्त 

Rise, rein & ruin of Aryuwaweda "as Shaastra"

Picture credit Google Gemini AI

हा लेख आर्युववेद नावाच्या एका काल्पनिक बाबीबाबत आहे.  ज्याचा वास्तविक जीवनाशी काहीही संबंध नाही. जर काही प्रासंगिकता किंवा साम्य आढळले, तर कृपया तो केवळ योगायोग समजावा. या लेखातील सर्व विधाने काल्पनिक आहेत आणि ती सदोष असू शकतात किंवा त्यात चुका असू शकतात. या लेखामधील प्रत्येक विधानामध्ये लिहिलेल्या परिस्थितीला नोंदवलेल्या निरीक्षणाला सन्माननीय अपवाद निश्चितपणे असू शकतात

This article is about an imaginary non existent thing called as Aryuwaweda, it has no relation with real life. If any relevance or resemblance found, please consider it as megre coincidence. All the statements in this article are fictitious and those may be wrong or contain mistakes. There may certainly be honorable exceptions to the observations made & situations reported each statement in this article.

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 सर्वात वाईट भाग असा आहे की जी आर्युववेदातली मेरिट मधली मुलं होती, त्यांना ऑबवीअसली आणि पॅशनेटली प्रॅक्टिसचंच आकर्षण होतं ... त्यामुळे ही सगळी आर्युववेदातली त्या त्या बॅचची सगळ्यात हुशार, सगळ्यात बुद्धिमान, सगळ्यात सक्षम, अशी तरुण मंडळी, त्यांच्या त्यांच्या वेळी, प्रत्यक्ष व्यवहारात प्रॅक्टिस मध्ये आली ...


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आणि त्यांच्या बॅचमध्ये ज्यांना शास्त्रातला ओ का ठो कळत नव्हतं, ज्यांची कुवत कॅपॅसिटी ही दुय्यम तिय्यम किंवा खरंतर निकम्मे, अशा प्रकारातली होती, अशी लोकं प्रॅक्टिस मध्ये येऊ शकली नाहीत... कारण त्यांच्यामध्ये ती हिम्मत धमक क्षमता कुवत औकात नव्हतीच 


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त्यामुळे ही मेरिट नसलेली, प्रॅक्टिस करण्याची क्षमता नसलेली, लोकं ... अकॅडमी मध्ये आणि गव्हर्नमेंट मध्ये वरच्या पदांवरती जाऊन स्थिरावली!


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ज्यांना मुळात शास्त्र मधलं मेरिट नाही, शास्त्राबद्दल कुठल्या प्रकारची निष्ठा समर्पण आपुलकी नाही ... अशी आर्युववेदातली काडीचीही अक्कल नसणारी माणसं, आर्युववेद बद्दल कुठल्या प्रकारचा जिव्हाळा नसलेली माणसं , ही एकतर अकॅडमी मध्ये शिक्षक प्रोफेसर रीडर लेक्चरर झाली किंवा गव्हर्मेंट मध्ये जिथे धोरण ठरते पॉलिसीमेकर्स ऑफिस बिययर अशा अर्थाने आर्युववेदाच्या क्षेत्रात शैक्षणिक/ व्यावसायिक आणि औषधीकरण या तीनही क्षेत्रांचे "भवितव्य ठरवणाऱ्या अधिकाऱ्यांच्या जागेवर" अशी माणसं बसली की ज्यांना शास्त्र विषयी आपुलकी नाही, शास्त्राबद्दलचं मूळ सखोल खरंखरं ज्ञान नाही! त्यामुळे शिकवणारे आणि शैक्षणिक व्यावसायिक धोरण ठरवणारे लोक, हे आर्युववेद न जाणणारे , आर्युववेदातले अजाणते किंवा आर्युववेदाची बुद्धी नसलेले , असेच लोक अधिकारी झाले. कारण त्या जागांसाठी जे खरे सत्पात्र सक्षम सुयोग्य लोक होते ते प्रॅक्टिस मध्ये गेले ते शैक्षणिक किंवा धोरणात्मक शासकीय पदांवरती आले नाहीत


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 गव्हर्मेंट किंवा ग्रांटेड कॉलेजच्या तुलनेत , मेरिट मधल्या मुलांच्या पेक्षा जास्त संख्येने बाहेर पडणारे , प्रायव्हेट कॉलेज यातले आर्युववेदाची डिग्री विकत घेऊ शकणारे, असे व्यापारी दृष्टिकोन असणारे , "पैसेवाले" लोक समाजामध्ये बहुसंख्येने बाहेर पडले ... या सगळ्यांनी मिळून आर्युववेदाचा व्यवसायिक पसारा खूप चतुराईने वाढवला... 


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आणि त्याला आळा घालता येईल, इतकी ताकत, जी मुळातली गव्हर्मेंट / ग्रांटेड कॉलेज मधली मेरिट मधली मुलं होती, बुद्धिमान मुलं होती, ज्यांना शास्त्र निष्ठा, शास्त्र समर्पण, शास्त्र विषयी आपुलकी जिव्हाळा नातं शास्त्र बद्दल होतं...

त्यांच्यामध्ये तेवढा संघटितपणा, तेवढी क्षमता, तेवढी दूरदृष्टी, तेवढा रीच ॲप्रोच तेवढी पोहोच तेवढा प्रभाव आणि मुख्य म्हणजे स्वतःची प्रॅक्टिस सेट करण्यासाठी त्यांचे तारुण्यातल्या गेलेल्या वेळानंतर त्यांच्याकडे तितकी उमेद आणि सामर्थ्य उरलं नाही ...


की हा जो सगळा अधःपतनाचा भाग चालू आहे, त्याला रोखता येईल, त्याच्यावर आक्षेप घेता येईल, हे चुकीचं चाललंय असं म्हणता येईल , अशी कुठल्याही प्रकारची परिस्थिती शिल्लक राहिली नाही 


त्यामुळे ...

A.

मेरिट मधल्या शास्त्रनिष्ठ आणि शास्त्र समर्पित शास्त्रज्ञान असलेल्या लोकांचा शांतपणा मौन निष्क्रियता अप्रतिकार 

B.

गव्हर्मेंट मधील पॉलिसी मेकर्स ऑफिस बेअरर्स अशा अधिकाऱ्यांच्या ठिकाणी आर्युववेदाचं ज्ञान नसलेले, आर्युववेद बद्दल आपुलकी जवळीक निष्ठा नसलेले, संहिता श्लोक यातलं काही कळत नसलेले, लोक जाऊन बसणे 

C.

याच्याहीपेक्षा दुय्यम दर्जाचे किंवा करत खरं तर दर्जाहीन = गुणवत्ता नसलेले लोक प्रॅक्टिस करण्याची कुवत क्षमता नसलेले लोक, शिक्षणाच्या क्षेत्रात घुसणे 

D.

आणि शास्त्र निष्ठा शास्त्र समर्पण यापेक्षा, मी आर्युववेदाची डिग्री "विकत घेताना" , "लावलेला पैसा" मला "वसूल" कसा करता येईल, अशा "व्यापारी , नफेखोर वृत्तीने" आर्युववेद क्षेत्रात, शास्त्रीय ट्रीटमेंट सोडून , बाकीच्या अनेक गोष्टींचे नॅरेटीव्ह आणि ट्रेंड यांनी सेट केले ती लोक 

E.

आणि सगळ्यात शेवटचे म्हणजे सोशल मीडिया वरती घरगुती औषधे सांगून, आर्युववेदाचं सगळं मूल्य पायदळी तुडवणारे, आर्युववेदाचा कचरा करणारे लोक 

F. कुवत क्षमता योग्यता लायकी औकात नसलेल्या नवतरुण विद्यार्थ्यांच्या हातात, शास्त्रीय आर्युववेद, गरजेपेक्षा सोपा, युजर फ्रेंडली, रेडी टू यूज, स्पून फीडिंग करून, ज्या लोकप्रिय विद्यार्थीप्रिय वैद्यांनी, कसलाही भेदभाव न करता, कसलीही शहानिशा न करता, कसलेही ज्ञानदानाचे निकष न लावता, मुक्तहस्ताने सोपा सोपा आर्युववेद, समोर येईल त्याला, वाटून टाकला, तेही या परिस्थितीला कारणीभूत आहेत

👆🏼

हे सर्वजण आजच्या आर्युववेदाच्या प्रचंड पसाऱ्याचे जनक आहेत ... की ज्यांनी आर्युववेदाचा पसारा हा खूप वाढवला ... पण शास्त्र म्हणून त्याचा गळा दाबून त्याची ह*त्*या केलेली आहे


1

साधारण 90 च्या दशकापर्यंत महाराष्ट्रात आर्युववेदाची गव्हर्मेंट कॉलेज तीन आणि ग्रॅंटेड कॉलेज दहा-बारा अशी परिस्थिती होती 


2

पण 2005 पर्यंत प्रायव्हेट कॉलेजेस ची संख्या प्रचंड प्रमाणात वाढली 


3

जोपर्यंत विद्यार्थ्यांना आर्युववेद मध्ये प्रवेश घेण्यासाठी सीट फार कमी होत्या , तोपर्यंत मेरिट असलेले विद्यार्थी त्यात येत असत किंवा काही कायदेशीर सोयींमुळे कमी मेरिट असलेले विद्यार्थी सुद्धा त्यात येत असत


4

पण मेरिट नसताना आणि कायद्याची सोय नसताना, फक्त "पैसे आहेत" म्हणून आर्युववेद प्रवेश घेता येईल अशी "व्यवस्था नव्हती"!


5

त्यामुळे जे काही विद्यार्थी येत होते ते दोन प्रकारचे होते की 


A. ज्या फारच अल्पसंख्य, नगण्य, थोड्या थोडक्या विद्यार्थ्यांना ... खरंच आर्युववेदशास्त्र हे, पॅशन आवड समर्पण देशनिष्ठा राष्ट्रनिष्ठा संस्कृती बद्दलचा अभिमान अस्मिता किंवा परंपरा, यापैकी कोणतेतरी कारणामुळे, शिकावयाचे असायचे ✅️ आणि ...


B. याव्यतिरिक्त, बहुसंख्य = 95% to 99% विद्यार्थी हे , "आर्युववेद या शास्त्रातलं" , "काहीही न समजल्यामुळे", मॉडर्न मेडिसिन ची जीपी करत असत 


6.

हे चित्र 2000 पर्यंत सार्वत्रिक होतं पण जसे जसे प्रायव्हेट कॉलेजची संख्या वाढत गेली आणि त्या कॉलेजची भरमसाठ म्हणजे गव्हर्मेंट आणि ग्रांटेड कॉलेजच्या तुलनेत , "कित्येक पट असलेली फी भरू शकणारे विद्यार्थी" , या कॉलेजेस मधून जसे जसे बाहेर पडू लागले ...

तशी तशी "मेरिट कमी असताना सुद्धा" आर्युववेद लर्न LEarn करण्यापेक्षा "अर्न Earn करू शकणारी म्हणजे पर्चेस purchase करू शकणारी विकत घेऊ शकणारी", अशी "खरेदी" करण्याची "वृत्ती आणि क्षमता आणि वारसा" असणारी लोकं, या क्षेत्रामध्ये "दाखल होऊ लागली"!


7.

जोपर्यंत पैसे नसलेले लोक, केवळ बुद्धीच्या जोरावर किंवा स्वतःच्या पॅशनच्या समर्पणाच्या निष्ठेच्या जोरावर या शास्त्रामध्ये काम करत होती, तोपर्यंत हे शास्त्र , शास्त्र समजून घेणे , शास्त्र प्रमाणे प्रॅक्टिस करणे ... एवढ्या पुरतंच "मर्यादित होतं !"


8.

परंतु जसजशी मेरिट नाही, पण "पैसा आहे", त्यामुळे या शास्त्रातली डिग्री "विकत घेणे" शक्य आहे , अशा "वृत्तीची" माणसं , अशा "क्षमतेची" माणसं या क्षेत्रात यायला लागली ...

तसं तसं शास्त्र निष्ठा संस्कार जीवनमूल्य "नीतिमत्ता हे बाजूला पडून" ...

"मालमत्ता" हाच ज्यांच्या आर्युववेद प्रवेशाचा मुख्य मार्ग होता, 

त्यांनी आर्युववेदाच्या प्रॅक्टिसच्या व्यावसायिक क्षेत्रात आल्यानंतर, "तीच गुंतवलेली ( invest केलेली ) मालमत्ता, कशी दाम दुपटीने किंवा अनेक पटीने वसूल करता येईल" यासाठी "मार्ग शोधले, मार्ग तयार केले, ट्रेंड सेट केले, तशा प्रकारचे narrative सेट केले" 


9.

आणि बघता बघता... हा हा म्हणता ... आर्युववेद हे "शास्त्रदृष्ट्या प्रॅक्टिस करण्याचं वैद्यकीय क्षेत्र न राहता", ते ... तुफान धंदेवाईक मार्केट बनलं!!

औषध खपवण्याचं ...

हॅपनिंग 

फील गुड 

स्पा 

रिसॉर्ट ट्रीटमेंट देणारं ...

तथाकथित महागडं राजेशाही केरळीय पंचकर्म करणारं

मसाज मालिश करणारं 

सुगंधी उटणं 

तथाकथित आर्युववेदिक मेकअपचे सामान 

अभ्यंग तेल 

शतावरी कल्प 

चवनप्राश 

गर्भसंस्कार 

सुवर्णप्राशन 

"Show धन" साठी केलेली पंचकर्म

शिरोधारा 

जिथे शरीराला छिद्रच नाही , त्या कटी जानू हृदय मन्या अशा ठिकाणी, बस्ती करणे

मुळात ॲक्युपंक्चर असलेलं विद्ध 

आर्युववेदिक निवासी गुरुखूळ 

पेड सेमिनार 

पेड वेबिनार 

पेड ऑनलाईन कोर्सेस 

आर्युववेद शास्त्राची ... नाडी परीक्षा रसशास्त्र मॉडर्न मेडिसिन योगा नॅचरोपॅथी असं कशाबरोबरही मोट बांधून, सरमिसळ करून, 

त्याचं आलेल्या नवीन तंत्रज्ञानाच्या सहाय्याने,

 भरमसाठ बेसुमार ,

पण आकर्षक मार्केटिंग करून ,

मागच्या पिढीच्या तुलनेत, अतिशय वेगाने आणि कित्येक पटीने पैसा मिळवणे हे सुरू झालं ...


10.

आणि एकदा अशा गोष्टींचं पेव फुटलं आणि मूल्यांचा अधःपतन = नीतिमत्तेचा त्याग = ह*त्या हे झालं, की मग बाजार मार्केट धंदा दुकान दलदल कीचड चिखल हे पसरायला वेळ लागत नाही 


11.

आणि दुर्दैवाने अशा प्रकारच्या वृत्ती, ह्या शास्त्रनिष्ठ समर्पण ध्येयवाद पॅशन याच्यापेक्षा, फार प्रचंड गतीने पसरतात 


12

यामध्ये आर्युववेद आवश्यकतेपेक्षा जास्त सोपा सोपा करून सांगणारे, मागच्या पिढीतील वैद्यही याला काही प्रमाणात जबाबदार आहेत ... आपण काय कुवतीच्या, कुठल्या बुद्धिमत्तेच्या स्तरातील लोकांच्या हातात, "शास्त्र easily वापरणेबल" करून देतोय याचं भान त्यांना ज्ञानदान करताना राहिले नाही


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आर्युववेद क्षेत्राच्या बाहेरील काही लोकांनी अतिशय चलाखीने वेगाने लोकप्रिय प्रसारमाध्यमांचा आधार घेऊन आर्युववेदाचे हॅपेनिंग ट्रीटमेंटचे आणि चकचकीत प्रॉडक्टचे मार्केट सेलिब्रिटींपासून ते थेट जनसामान्यांपर्यंत तळागाळापर्यंत पसरवले पोहोचवले यात तालाजीबांबे मार देव तपंजली धाबवमाग अशासारख्या उद्योगपतींचा = industrialists चा सिंहाचा वाटा आहे


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"संस्कृत मध्ये असलेले, शास्त्र संहिता टीका हे न वाचता सुद्धा" पेशंट बरा करता येतो, पेशंट "बरा न करताही" अन्य "विविध मार्गाने" आर्युववेदात पैसा मिळवता येऊ शकतो ... असं दाखवून देणारे , ज्यांना संस्कृत शास्त्र श्लोक संहिता टीका आणि मूळचा वारसा यातलं आर्युववेदाच्या दृष्टीने काहीही जवळ नव्हतं ... अशा लोकांनी आर्युववेद सोपा, सेलेबल, मार्केटेबल, यूजर फ्रेंडली केला ... ज्यांना मूळ शास्त्रातलं ओ का ठो कळत नाही, 

अशा नव्या, तरुण, "पैसे भरून डिग्री विकत घेतलेल्या", विद्यार्थ्यांच्या, नववैद्यांच्या हातात, सोपा केलेला , रेडी टू युज पॅकेज , फॉर्म्युलेटेड आर्युववेद दिला 


15.

आणि हॉटेलचे मेनू कार्ड छापावं, त्याप्रमाणे लोकांनी बोर्ड वरती रोगांची नावं आणि दिल्या जाणाऱ्या तथाकथित पंचकर्म सुविधांची नावे छापली आणि "नोटा मिळवण्याचा" उद्योग सुरू केला 


16.

आणि मग , अनेकांनी हेच केल्यामुळे, "हाच आर्युववेद आहे" असा नव्याने तरुण झालेल्या समाजातील सर्वसामान्य लोकांचाही "समज झाला" 


17

त्यामुळे खरा आर्युववेद काय असतो?

आपल्याला जे विकले जाते, तो आर्युववेद आहे का

खरंच मूळ आर्युववेदात नाडी परीक्षा असते का

खरोखरच मूळ आर्युववेदामध्ये पारद गंधक सोनं चांदी हिरा मोती बचनाग कुचला अशा विषांचा धातूंचा खनिजांचा औषध म्हणून उपयोग केलेला आहे का?

खरंच, आर्युववेदामध्ये गर्भसंस्कार स्वर्णप्राशन मसाज मालिश शिरोधारा, 

जिथे शरीराला छिद्रच नाही , त्या कटी जानू हृदय मन्या अशा ठिकाणी, बस्ती करणे, 

जे स्पष्टपणे एक्यूपंक्चर आहे, त्याला विद्ध म्हणणे, 

केमिकल शिवाय जे बनूच शकत नाही 

आणि आर्युववेदाच्या ग्रंथांमध्ये ज्या शब्दांचा उल्लेख असू शकत नाही ,

अशी हर्बल मेकअपची साधने लिपस्टिक सोप शांपू कंडिशनर जेल मॉइश्चरायझर याची विक्री म्हणजे आर्युववेद नाही

हे समजणे इतपत, उमज कुवत बुद्धी माहिती ओपनिंग्ज , सोर्स हे जनसामान्यांना... एक्सेसिबल नाहीत, ज्ञात नाहीत, आवश्यक नाहीत 


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ज्यांना मेरिटच नाही, त्यांना मूळ शास्त्रात काय लिहिलेला आहे, हे कळणं शक्य नाही आणि ते न कळताही आपण जे काही करतोय, त्यातनं पेशंट बरा होतो ... किंवा तो बरा झालाय , असं त्याला पटवून देता येतं ... किंवा बरा नाही झाला, तरी तोपर्यंत होणाऱ्या गर्दीमुळे , पुढचे तसेच "बळीचे बकरे" या "पैसे मिळवून देणाऱ्या चक्रामध्ये प्रवेश करत राहतात" 


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आणि 140 कोटीचे जनतेमध्ये कुणालाही यातला कावेबाजपणा फोलपणा फसवणूक लूट लुबाडून दिशाभूल भ्रांती गोंधळ मिसगाइडिंग हे लक्षात येऊ शकत नाही, हे स्पष्ट झाले. 


20

त्यात 2015 पासून प्रत्येकाच्या हातात मोबाईल आल्यामुळे हजारोंचे सबस्क्राईबर्स आणि लाखोंचे व्ह्यूज असलेल्या संधिसाधू दीडशहाण्या आर्युववेदिक डॉक्टरांनी "घरगुती उपाय" सांगण्याचा नवाच मूर्खपणा भंकसपणा बावळटपणा चालू केला 


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किंवा दीड दोन लाख रुपये भरून, प्रायव्हेट टीव्ही चॅनेलवर, स्वतःच्या फुशारकीचा, विकत घेतलेला एपिसोड, रियल शो म्हणून लावायचा, असाही एक अभिनव उद्योग सुरू झाला ...


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जगातला कुठलाच मॉडर्न मेडिसिनचा डॉक्टर, घरगुती औषधे, अशा प्रकारचा उपदेश, सार्वजनिक व्यासपीठावर किंवा प्रिंट मिडीया मध्ये किंवा सोशल मीडियामध्ये करत नाही, हे स्पष्ट दिसत असतानाही ...

आर्युववेदातली घरगुती औषध सांगून , आर्युववेदाचं अत्यंत अवमूल्यन करण्याचं काम, आर्युववेदाला चीप बनवण्याचे काम , आर्युववेदाला हलक्यात घेण्याचं काम , आर्युववेदाची रया घालवण्याचे काम जर कोणी केला असेल तर ते या घरगुती औषधे सांगणाऱ्या लोकप्रिय आचरट लोकांनी केलं!!!


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 सर्वात वाईट भाग असा आहे की जी आर्युववेदातली मेरिट मधली मुलं होती, त्यांना ऑबवीअसली आणि पॅशनेटली प्रॅक्टिसचंच आकर्षण होतं ... त्यामुळे ही सगळी आर्युववेदातली त्या त्या बॅचची सगळ्यात हुशार, सगळ्यात बुद्धिमान, सगळ्यात सक्षम, अशी तरुण मंडळी, त्यांच्या त्यांच्या वेळी, प्रत्यक्ष व्यवहारात प्रॅक्टिस मध्ये आली ...


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आणि त्यांच्या बॅचमध्ये ज्यांना शास्त्रातला ओ का ठो कळत नव्हतं, ज्यांची कुवत कॅपॅसिटी ही दुय्यम तिय्यम किंवा खरंतर निकम्मे, अशा प्रकारातली होती, अशी लोकं प्रॅक्टिस मध्ये येऊ शकली नाहीत... कारण त्यांच्यामध्ये ती हिम्मत धमक क्षमता कुवत औकात नव्हतीच 


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त्यामुळे ही मेरिट नसलेली, प्रॅक्टिस करण्याची क्षमता नसलेली, लोकं ... अकॅडमी मध्ये आणि गव्हर्नमेंट मध्ये वरच्या पदांवरती जाऊन स्थिरावली!


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ज्यांना मुळात शास्त्र मधलं मेरिट नाही, शास्त्राबद्दल कुठल्या प्रकारची निष्ठा समर्पण आपुलकी नाही ... अशी आर्युववेदातली काडीचीही अक्कल नसणारी माणसं, आर्युववेद बद्दल कुठल्या प्रकारचा जिव्हाळा नसलेली माणसं , ही एकतर अकॅडमी मध्ये शिक्षक प्रोफेसर रीडर लेक्चरर झाली किंवा गव्हर्मेंट मध्ये जिथे धोरण ठरते पॉलिसीमेकर्स ऑफिस बिययर अशा अर्थाने आर्युववेदाच्या क्षेत्रात शैक्षणिक/ व्यावसायिक आणि औषधीकरण या तीनही क्षेत्रांचे "भवितव्य ठरवणाऱ्या अधिकाऱ्यांच्या जागेवर" अशी माणसं बसली की ज्यांना शास्त्र विषयी आपुलकी नाही, शास्त्राबद्दलचं मूळ सखोल खरंखरं ज्ञान नाही, त्यामुळे शिकवणारे आणि शैक्षणिक व्यावसायिक धोरण ठरवणारे लोक, हे आर्युववेद न जाणणारे , आर्युववेदातले अजाणते किंवा आर्युववेदाची बुद्धी नसलेले असेच झाले


28

समाजामध्ये बहुसंख्येने गव्हर्मेंट किंवा ग्रांटेड कॉलेजच्या तुलनेत , मेरिट मधल्या मुलांच्या पेक्षा जास्त संख्येने बाहेर पडणारे , प्रायव्हेट कॉलेज यातले आर्युववेदाची डिग्री विकत घेऊ शकणारे, असे व्यापारी दृष्टिकोन असणारे , "पैसेवाले" लोक बाहेर पडले ... या सगळ्यांनी मिळून आर्युववेदाचा व्यवसायिक पसारा खूप चतुराईने वाढवला... 


29

आणि त्याला आळा घालता येईल, इतकी ताकत, जी मुळातली गव्हर्मेंट / ग्रांटेड कॉलेज मधली मेरिट मधली मुलं होती, बुद्धिमान मुलं होती, ज्यांना शास्त्र निष्ठा शास्त्र समर्पण शास्त्र विषयी आपुलकी जिव्हाळा घेणं शास्त्र बद्दल होतं...


 त्यांच्यामध्ये तेवढा संघटितपणा, तेवढी क्षमता, तेवढी दूरदृष्टी, तेवढा रीच ॲप्रोच तेवढी पोहोच तेवढा प्रभाव आणि मुख्य म्हणजे स्वतःची प्रॅक्टिस सेट करण्यासाठी त्यांचे तारुण्यातल्या गेलेल्या वेळानंतर त्यांच्याकडे तितकी उमेद आणि सामर्थ्य उरलं नाही ...


की हा जो सगळा अधःपतनाचा भाग चालू आहे, त्याला रोखता येईल, त्याच्यावर आक्षेप घेता येईल, हे चुकीचं चाललंय असं म्हणता येईल , अशी कुठल्याही प्रकारची परिस्थिती शिल्लक राहिली नाही 


त्यामुळे 

A.

मेरिट मधल्या शास्त्रनिष्ठ आणि शास्त्र समर्पित शास्त्रज्ञान असलेल्या लोकांचा शांतपणा मौन निष्क्रियता अप्रतिकार 

B.

गव्हर्मेंट मधील पॉलिसी मेकर्स ऑफिस बेअरर्स अशा अधिकाऱ्यांच्या ठिकाणी आर्युववेदाचं ज्ञान नसलेले, आर्युववेद बद्दल आपुलकी जवळीक निष्ठा नसलेले, संहिता श्लोक यातलं काही कळत नसलेले, लोक जाऊन बसणे 

C.

याच्यापेक्षा दुय्यम दर्जाचे किंवा करत खरं तर दर्जाहीन = गुणवत्ता नसलेले लोक प्रॅक्टिस करण्याची कुवत क्षमता नसलेले लोक, शिक्षणाच्या क्षेत्रात घुसणे 

D.

आणि शास्त्र निष्ठा शास्त्र समर्पण यापेक्षा, मी आर्युववेदाची डिग्री "विकत घेताना" , "लावलेला पैसा" मला "वसूल" कसा करता येईल अशा "व्यापारी , नफेखोर वृत्तीने" आर्युववेद क्षेत्रात, शास्त्रीय ट्रीटमेंट सोडून , बाकीच्या अनेक गोष्टींचे नॅरेटीव्ह आणि ट्रेंड यांनी सेट केले ती लोक 

E.

आणि सगळ्यात शेवटचे म्हणजे सोशल मीडिया वरती घरगुती औषधे सांगून, आर्युववेदाचं सगळं मूल्य पायदळी तुडवणारे, आर्युववेदाचा कचरा करणारे लोक 

F. कुवत क्षमता योग्यता लायकी औकात नसलेल्या नवतरुण विद्यार्थ्यांच्या हातात, शास्त्रीय आर्युववेद, गरजेपेक्षा सोपा, युजर फ्रेंडली, रेडी टू यूज, स्पून फीडिंग करून, ज्या लोकप्रिय विद्यार्थीप्रिय वैद्यांनी, कसलाही भेदभाव न करता, कसलीही शहानिशा न करता, कसलेही ज्ञानदानाचे निकष न लावता, मुक्तहस्ताने सोपा सोपा आर्युववेद, समोर येईल त्याला, वाटून टाकला, तेही या परिस्थितीला कारणीभूत आहेत

👆🏼

हे सर्वजण आजच्या आर्युववेदाच्या प्रचंड पसाऱ्याचे जनक आहेत ... की ज्यांनी आर्युववेदाचा पसारा हा खूप वाढवला ... पण शास्त्र म्हणून त्याचा गळा दाबून त्याची ह*त्*या केलेली आहे


Monday, 24 November 2025

कंसहरीतकी ? क्यूं सोचना 🤔⁉️ च्यवनप्राश!! सिर्फ बेचना 😃

कंसहरीतकी ? क्यूं सोचना 🤔⁉️

च्यवनप्राश!! सिर्फ बेचना 😃

Picture credit Google Gemini AI 

आपने भोजन कर लिया ?

इस प्रश्न के उत्तर में, "गर्मी के मौसम मे स्वेटर पहनना चाहिये" ऐसा सुना... तो आप क्या समझेंगे ! ?


साथ मे जुडा हुआ फोटो, मुझे एक ग्रुप मे चल रही चर्चा पर, किसी ने वैयक्तिक रूप मे, मेसेज के रूप मे भेजा है, मेरे पर्सनल व्हाट्सअप पर, उसका यह स्क्रीन शॉट है


आयर्वूवेद फिल्ड म्हनजे सुमार बुद्धीच्या, टुकार वृत्तीच्या, बेक्कार लोकांची, मोक्कार गर्दी !!!


हिंदी भाषांतर 

आयर्वूवेद का क्षेत्र औसत बुद्धि, आलसी रवैये और आलसी दिमाग वाले लोगों की एक बढती हुई बहुत बडी भीड़ है!!!


English 

The Ayawurveda field is a crazy crowd of people with mediocre intellect, a lazy attitude, and a lazy mind!!!


ऐसा क्यू हुआ होगा ????


आयुर्वेद के क्षेत्र में प्रश्न क्या पूछा है, यही बहुतांश लोगों को समझ मे नही आता है, इसलिये उसके बाद की चर्चा या तो होती नही है & अगर होती भी है तो दिशाहीन भ्रांती के रूप मे भटक जाती है


प्रश्न पूछा आवले का भार = वजन, कितना कर्ष = ग्राम होना चाहिये ?

यदि हरितकी का भार द्विकर्ष और बिभीतक का भार एक कर्ष शास्त्र मे लिखा है, तो इस आधार पर आवले का भारत "कितना ग्राम = कर्ष" होना चाहिये?? 


दूसरा प्रश्न पूछा चवनप्राश की एक समय की सेवन मात्रा कितनी है ??


यह प्रश्न मे पिछले 22 साल से पूछ रहा हूँ 


किसीने कभी भी उत्तर नही दिया 


इस साल अचानक दो चार ग्रुप मे इस पर रिस्पॉन्स प्रतिक्रिया आ गई 


एक सीनियर के ग्रुप में इस पर बडी चर्चा चली 


किंतु चर्चा का विषय यह था की, 

चवनप्राश खाने लायक टेस्टी बनाने के लिए , 

आवले की तुलना मे उसने कितनी गुना शुगर शर्करा डालने चाहिये ???


प्रश्न क्या पूछा है !? ... चर्चा क्या चल रही है ... !?


इस पर हमने आगे के कुछ पॉईंट्स उस सीनियर वैद्य ग्रुप मे रखे ...

जो आपके भी सामने प्रस्तुत कर रहे है

1

न मात्रामात्रमप्यत्र किञ्चिदागमवर्जितम्| 


2

किसी का भी अनुभव या मत कुछ भी हो यदि आप्त प्रमाण सर्वश्रेष्ठ है, तो उसमे जैसे बताया है, वैसे करना चाहिए, यह अंतिम निर्णय है


3

 इसलिये आवला और शर्करा का प्रमाण कितना होना चाहिए, यह वाद ही निराधार है अनावश्यक है निरुपयोगी है 


4

मूल प्रश्न ऐसा है की आवले का वजन/भार कितना होना चाहिए ?

जिस वजन/भार का आवला बाजार मे मिलता है, वह शास्त्रीय अपेक्षित आमलकी फल है क्या ?

और च्यवनप्राश की सेवन मात्रा क्या होनी चाहिये?


5.

अगर वो प्रश्न सुलझ गया तो बाकी कोई प्रश्न रहेगा नही 

उसका टेस्ट क्या आता है 

वो खाने लायक होता है की नही है

👆🏼 

ये प्रश्नही अशास्त्रीय है


6

आयुर्वेद औषधी का प्रायः टेस्ट रुचिकर होता ही नही है. औषधी प्रायः तिक्त कटु कषाय होते है , तो क्या फिर सभी औषधो को टेस्टी बनाने के लिए उसमे मनचाहे बदल करोगे क्या ?

नही !


6A

कंसहरीतकी मे भी हरीतकी फलों की संख्या 100 है और दशमूल क्वाथ का प्रमाण एक कंस है 


6B

वैसे चवनप्राश मे भी आमलकी फलों की संख्या 500 है और शर्करा का प्रमाण अर्ध तुला है 


6C

तो ऐसे फलों की संख्या और अन्य औषध का प्रमाण मान परिभाषा मे , ऐसे अन्य कल्प मे भी हुआ है जो की कंसहरीतकी है ...


6D

लेकिन उसके बारे मे कोई चर्चा वाद प्रश्न संदेह नही होता है , क्यूंकि उसको किसी को "बेचना" नही उसका "व्यापार" नही हो सकता उसको कोई "मार्केट" नही है


6E

कंसहरीतकी का टेस्ट कैसा होता है, उस पर कोई चर्चा नही करेगा, उसको कोई स्मरण मे तक नही लायेगा , क्यूंकि की वह "बेचने की बात" नही है ना!? 😇


7.

जो आप बेच रहे हो वो चवनप्राश नही है, इतना प्रामाणिक रूप से मान्य करो ... 


8.

जो शास्त्र मे लिखा चवनप्राश है, वो हम बनाते नही, ये प्रामाणिक रूप से मान्य करो. 


9.

फिर किसको क्या बेचना है, वो उसका स्वयं का प्रश्न है ... लेकिन उसको शास्त्रोक्त/च्यवनप्राश नाम देकर उसके नाम पर गलत चीजे मत बेचो, इतनी ही नम्र विनंती


10.

चरक कहता है "मात्रा"कालाश्रया युक्तिः ... आमलकी फल संख्या मे 500 है , केवल उस फल का भार कितना होना चाहिए, इसका निर्धारण होना आवश्यक है.

हरीतकी बिभीतक इनके भार कितने होते है, यह शास्त्र मे स्पष्ट रूप से उल्लेखित और उसके आधार पर आवले के फल का वजन पाच ग्रॅम (जादा से ज्यादा सव्वा छह ग्राम) होना चाहिये !!!

इनसे जो बनता है वह चवनप्राश आप अगर नही बना रहे, तो आप चवनप्राश नाम नही दे सकते. चवनप्राश नाम देने के बाद अन्य कुछ भी उसके नाम पर नही बेचना चाहिए


11.

सेवन मात्रा यह दूसरा शास्त्रीय तथा व्यावहारिक दृष्टी से महत्वपूर्ण प्रश्न है. चरक ने जो मात्रा लिखी है वह सब्जेक्टिव्ह है. उसको ऑब्जेक्टिव बनाने का प्रयास शार्ङ्गधर ने किया है जो अवलेह सेवन मात्रा एक पल लिखा है जो 40 ग्रॅम होता है 


12.

इतने दो ही प्रश्न , इस सभी चर्चा का जो मूल आरंभ है , जो मेरे इस विषय से संबंधित पाच लेखों के पोस्ट में है ... links given here👇🏼

के आया मौसम ..."च्यवनप्राश" 🥄🙃😇 का ?! ... 🤔⁉️


https://mhetreayurved.blogspot.com/2023/11/blog-post_20.html

👆🏼

हिंदी भाषा : च्यवनप्राश निर्मिती : कुछ प्रश्न और संदेह 😇🙃🤔⁉️


https://mhetreayurved.blogspot.com/2023/11/english-chyavanprasha-formulation.html

👆🏼

English: ChyavanPrasha Formulation : Queries and Doubts


https://mhetreayurved.blogspot.com/2023/11/blog-post_31.html

👆🏼

हिंदी भाषा : ययाती च्यवन ऋषी च्यवनप्राश अर्थवाद


https://mhetreayurved.blogspot.com/2023/11/yayaati-chyavana-arthavaada.html

👆🏼

English : Yayati, Chyavana Rushi, Chyavanaprasha & ArthaVaada


https://mhetreayurved.blogspot.com/2023/11/blog-post_48.html

👆🏼

मराठी : च्यवनप्राश निर्मिती : काही प्रश्न आणि शंका🤔⁉️


https://youtube.com/clip/Ugkx0qR3voYTyn8hKmW_ftAFnPTtfXce8LnF?si=NE-GsXBOkpgmJ9ql

👆🏼

के आया मौसम ... 💞


13.

बाकी चर्चा जो है, वो दिशाहीन है अनावश्यक है निरुपयोगी है प्रयोजन शून्य है


च्यवनप्राश की सेवन मात्रा (one time dose) कितनी है??

🤔⁉️

च्यवनप्राश अवलेह यदि "प्राश" है तो "प्रकर्षेण अशन" = "अशित" इस प्रकार से उसका सेवन होना चाहिए 



यदि "अवलेह" है, तो वह "लीढ" इस प्रकार मे आता है


अशित खादित पीत लीढ 

ऐसे चार प्रकार के अन्न होते है इसमे से "अशित & लीढ" यह दोनो भिन्न प्रकार है, तो च्यवनप्राश "अशित है या लीढ है" ??


च्यवनप्राश की सेवन मात्रा कितनी है?? 🤔⁉️


As per charaka, 

👇🏼

अस्य मात्रां प्रयुञ्जीत योऽपरुन्ध्यान्न भोजनम्|

It should be taken in the dose which does not interfere with the food intake and digestion

👆🏼

This is subjective अर्थात भगवान जाने कितनी मात्रा देना है!?😇🤔⁉️


सोऽवलेहश्च लेहः स्यात्तन्मात्रा स्यात्पलोन्मिता 

👆🏼

अर्थात शार्ङ्गधर के अनुसार मात्रा एक पल = 40 ग्रॅम है


एक समय में, इतनी मात्रा में, कोई वैद्य, च्यवनप्राश देता है क्या ...


और कोई पेशंट, इतनी मात्रा में, एक समय में, च्यवनप्राश खाता है क्या?


⚖️

Eltroxin की मात्रा mcg मे काउंट होती है 

1 milligram (mg) = 1,000 micrograms (mcg).


और च्यवनप्राश की निर्मिति में प्रति वर्ष, पूरे भारत मे, संभवतः प्रायः किलो में या टनों मे अपराध होता रहता है! 😔☹️🤦🏻‍♂️🙆🏻‍♂️

चरक संहिता के सभी 8 स्थानो का उचित नामांतरण

चरक संहिता के आठ (8) स्थानो का नाम तथा तद् अंतर्गत विषय वर्णन सुसंगत नही है

Picture credit Google Gemini AI 

स्वयं चरक ने सूत्रस्थान को श्लोकस्थान ऐसा पर्यायी नाम दिया है वह उचित ही/भी है क्यूंकि, सूत्रस्थान मे मूलभूत सिद्धांत एवं शास्त्र विषय के संक्षिप्त आरंभिक प्राथमिक परिचय के साथ साथ/अलावा/बजाय , अन्य स्थानों के भी कई विषयों का भी "सविस्तर" वर्णन होता है 


निदान इस "शब्द" का रोगज्ञान से किसी भी तरह से, कोई भी, सीधा संबंध नही है, ऐसा विजय रक्षित ने स्पष्ट किया है. Diagnosis शब्द की तरह निदान शब्द स्पष्ट रूप से रोग बोधक नही है. नि यह उपसर्ग और दान यह मूल शब्द या "दा" दीयते यह मूल धातु , इनका स्पष्ट संबंध रोगबोधन से या रोग उत्पादन से नही है. बहोत दूर दूर से जोडतोड करके जुगाड करके निदान शब्द का रोग बोधन से संबंध टीकाकार प्रस्थापित करते है. इसलिये निदान यह शास्त्रीय यौगिक इस प्रकार का शब्द न होकर यह केवल एक रूढ शब्द है

इसलिये उसका भी नामांतरण हेतु स्थान या व्याधिस्थान/रोगस्थान होना चाहिए, जो हमने पहले भी एक अन्य लेख मे लिखा है जिसकी लिंक आगे दी है

https://mhetreayurved.blogspot.com/2024/04/blog-post.html

👆🏼

युगानरूप नवीन संहिता लेखन संकल्प और उसकी भूमिका तथा प्रतिपाद्य विषय एवं विषय विन्यास

विमान स्थान मे सारे इधर उधर के विषय है, पूर्व अध्याय में वर्णित विषय का आगे के अध्याय मे वर्णित विषय से कोई भी संबंध नही है 

इसलिये विद्यमान विमान स्थान का नाम तो विकीर्ण स्थान, विक्षिप्त स्थान या विस्कळीत स्थान होना चाहिए 

और विमान स्थान आठ अंतिम अध्याय में तो , इतने सारे विषय एक साथ जोड दिये है, की वह केवल एक अध्याय मात्र न होकर , एक स्वतंत्र स्थान है ऐसा लगता है, तो केवल विद्यमान चरक विमान स्थान अध्याय आठ , इस अकेले एक अध्याय का ही नाम खिलस्थान रखना चाहिए😇

शारीर स्थान मे शारीर कम और तत्त्वज्ञान अधिक, ऐसा होने के कारण इसको, अल्प शारीर , लघु शारीर , र्‍हस्व शारीर, अंश शारीर ऐसा नाम होना चाहिए 


इंद्रिय स्थान मे जिस विषय का वर्णन है , वैसे ही उस विषय का नाम = अरिष्ट स्थान ऐसे होना चाहिए 


चिकित्सा स्थान मे रोगों के हेतू और लक्षणों का भी वर्णन है , 90% से अधिक अध्यायों में , तो इसका नाम हेत्वौषध या व्याध्यौषध या रोगभेषज स्थान होना चाहिये 


कल्प स्थान = वमन विरेचन द्रव्य वर्णन स्थान 


सिद्धि स्थान का नाम पंचकर्म वर्णन स्थान ऐसे होना चाहिए 


यही उन स्थानों के विषय उनके अनुसार उचित नाम है


कृपया आप इस विषय पर समर्थन या खंडन के रूप मे अपना मत लिखे

Tuesday, 18 November 2025

आयुष् लक्षण : शार्ङ्गधर का लिखा🖊 हुआ आयुष् लक्षण, चरकोक्त आयुष् लक्षण से बेहतर है 👌🏼✅️

आयुष् लक्षण : शार्ङ्गधर का लिखा🖊 हुआ आयुष् लक्षण, चरकोक्त आयुष् लक्षण से बेहतर है 👌🏼✅️

लेखक : copyright © वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे.

एम् डी आयुर्वेद, एम् ए संस्कृत.

आयुर्वेद क्लिनिक्स @पुणे & नाशिक.

9422016871

MhetreAyurveda@gmail.com

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शरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगो धारि जीवितम् ।

नित्यगश्चानुबन्धश्च पर्यायैरायुरुच्यते ॥ चरक

इस प्रसिद्ध चरकोक्त आयु लक्षण/definition/परिभाषा की तुलना मे शार्ङ्गधरोक्त आयु परिभाषा अधिक योग्य है.

*शरीरप्राणयोरेवं संयोगादायुरुच्यते*👍🏼

चरकोक्त आयु लक्षण अतिव्याप्त है तथा असंभव है. 

अव्याप्त अतिव्याप्त असंभव ऐसे 3 दोष विरहित, असाधारण धर्म का कथन करने वाला वाक्य, लक्षण कहा जाता है. 

तो इस दृष्टी से, चरकोक्त आयु लक्षण अव्याप्त अतिव्याप्त असंभव ऐसे तीनो दोष से युक्त है 

और वह आयु का असाधारण धर्म कथन नही करता. 


इंद्रिय हमेशा होंगे हि ऐसा नही. अनेक जीव धारियो मे अनेक इंद्रियों की अनुपस्थिती होती है. 

मनुष्य देह मे भी कई बार कुछ इंद्रियों की अनुपस्थिती होती है. 

स्वप्न या सुषुप्ति अवस्था मे इंद्रिय और मन हे दोनो नही होते है. 

इसलिये चरक का आयु लक्षण अतिव्याप्त है.


आत्मा का संयोग यह असंभव स्थिती है. क्योंकि आत्मा विभु है. इसलिये उसका संयोग विभाग, यह संभव नही हो सकता. इस कारण से चरकोक्त आयु लक्षण असंभव है.


चरकोक्त आयु लक्षण अव्याप्त भी है क्योंकि जिस भाव पदार्थ का उल्लेख होना, अत्यंत आवश्यक है, प्राण अर्थात श्वास का उल्लेख, इस लक्षण में नही है. जो कि, अत्यंत योग्य रूप से शार्ङ्गधरोक्त आयु लक्षण में उपलब्ध है. तो यह प्रथम दोष अव्याप्ती यह चरक के लक्षण मे है, प्राण श्वास इस शब्द का उल्लेख नही. 


इंद्रिय और मन ये दोनो अनुपस्थित होकर भी जीवन चल सकता है, इसलिये यह अतिव्याप्त है. कोमा मे कई साल तक बेड पर पडे रहने वाले पेशंट, मन और इंद्रिय दोनो से विरहित होते है, किंतु उन का श्वास अर्थात प्राण शुरू होता है और शरीर वही पडा रहता है, इसलिये कोमा मे होने पर भी उन्हे जिवंत समजा जाता है. जब इस शरीर का श्वास बंद होता है , तो उस कोमा के पेशंट को मृत घोषित करते है. इस प्रकार से मन और आत्मा का उल्लेख चरक के आयु लक्षण मे होना यह अतिव्याप्त दोष चरक के आयु लक्षण मे उपलब्ध है और आत्मा का संयोग विभाग तो होता ही नही है, इसलिये यह असंभव नाम का दोष भी चरक के आयु लक्षण में है.


संपूर्णतः तीन दोषों से विरहित निर्दोष लक्षण शार्ङ्गधर मे उपलब्ध है. *शरीरप्राणयोरेवं संयोगादायुरुच्यते* शरीर के साथ श्वासोंका संयोग बना रहना, यही आयुष्य है. प्राण जब नही होता है , तब आयु नही होती


आयु के इस लक्षण के साथ, और एक लक्षण, यहा पर प्रस्तुत करता हूॅ, कि *जन्म मरणांतराल भावी कालखंडः आयुः* इतनाही लक्षण उचित है. जो अव्याप्त अति व्याप्त असंभव से विरहित है और असाधारण धर्म का कथन करता है. यह लक्षण म्हेत्रेआयुर्वेद MHETREAYURVEDA ने स्वयं लिखा है


शार्ङ्गधरोक्त लक्षण *शरीरप्राणयोरेवं संयोगादायुरुच्यते* यह यद्यपि अव्याप्त अतिव्याप्त असंभव से विरहित है, फिर भी वह असाधारण धर्म का कथन नही करता है.


चरकने आयु के जो पर्याय दिये है, उसमे नित्यग अनुबंध इन पर्यायी शब्दों का पूर्ण चरक संहिता मे फिरसे कभी भी उपयोग नही हुआ है , ऐसे स्वयं चक्रपाणि भी कहते है. तथा धारि यह शब्द केवल एक बार प्रयुक्त हुआ है. अर्थात यह अनवपतित शब्द अकष्टशब्द ऐसे शास्त्र परीक्षा से विपरीत है. क्योंकि यह अपरिचित शब्दों का अप्रसिद्ध शब्दों का अनावश्यक प्रयोग होता है. जैसे की अंतर्वत्नी यह भी एक शब्द चरकने प्रयुक्त किया है.


व्हेंटिलेटर पर रखकर, वस्तुतः मृत आदमी को कुछ दिनो तक आगे भी जिंदा है, ऐसे दिखाया जा सकता है, जैसे की उसका आत्मा कब का चला गया होता है, इंद्रिय मन काम नही कर रहे है या वे भी भी चले गये होते है, फिर भी उसका व्हेंटिलेटर के द्वारा श्वास चालू है और शरीर वहा पडा है , तब तक उसको डेड घोषित नही करते और डिस्चार्ज देकर बिल करके बॉडी हात मे नही देते है. अर्थात इंद्रिय सत्व आत्मा न होने पर भी, केवल प्राण अर्थात श्वास और शरीर इनका संयोग सुरू है, ऐसा व्हेंटिलेटर के द्वारा दिखा कर भी, कुछ दिनो तक आयु है , ऐसा मानकर बिलिंग तो चलता ही रहता है.


इसलिये शार्ङ्गधरोक्त आयु लक्षण *शरीरप्राणयोरेवं संयोगादायुरुच्यते* उचित है, न कि चरकोक्त आयु लक्षण. 


इसीलिए कई शतको पूर्व लिखा हुआ चरक थोडा बाजू को रख के, उसमे से जो कुछ व्यवहार शून्य भाग है, उसको छोड कर, जो लेटेस्ट अपडेटेड आयुर्वेद का व्हर्जन है = आयुर्वेद 3.0 अर्थात अष्टांग हृदय, उसीका ही अनुसरण, अध्यापन & व्यवहार होना चाहिए 

अगर हम क्रेडल वाला डायल वाला फोन आज प्रयोग मे नही लाना चाहते , ना ही हम फिचर फोन बारा बटन वाला प्रयोग करते है, हमे 8 जीबी रॅम वाला स्मार्टफोन चाहिए, तो फिर सदैव पुराना दोषयुक्त ग्रंथ शिरोधार्य मान्य करने के बजाय , जो लेटेस्ट अपडेटेड है, (हां, उसको भी 900 साल हो गये किंतु वही लेटेस्ट अपडेटेड होने के कारण) उसी वाग्भटका अनुसरण और व्यवहार होना उचित है.


अर्थात 900 साल के बाद आज के नये हेतु नये लक्षण इन स्कंधों के लिए, नये औषध स्कंध के साथ, एक नई युगानुरूप संहिता का निर्माण होना, अविर्भाव होना, आज के आयुर्वेद के लिए अत्यंत आवश्यक है


स्वयं अरुण दत्त ने चरकके ही कई दोष, अष्टांगहृदय सूत्रस्थान एक श्लोक क्रमांक एक की टीकामें दिये है. वहा पर वह स्वयं को *वाचाट* ऐसा दूषण लगाकर आगे चरक के कई दोष का विवरण करता है। 


अन्यानि हि तन्त्राणि सदोषाणि। तथा हि। यदेतत्तावद्भगवता चरकमुनिना प्रणीतं तन्त्रं रत्नाकर इव *गान्भीर्यातिशययोगाद्दुर्बोधम्*। 

*तस्यापि सदोषतां प्रकटयन्ति वाचाटाः।*😇


अरुण दत्त को लोग केवल वैय्याकरण या शब्दप्रधान टीकाकार समजते है किंतु अरुण दत्त ने चरक के जो दोष गिनाये है, वे शास्त्रीय है, द्रव्य गुण के है, क्लिनिक के है, इसकी तरफ भी ध्यान देना चाहिए. वरना केवल प्रस्थापित है पॉप्युलर लोकप्रिय हे इसलिये, भेड बकरीयों की तरह, उसी एक प्रस्थापित चीज के पीछे दशकों तक दौडते रहना, यह बुद्धिमत्ता का लक्षण नही है.

लेखक : copyright © वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे.

एम् डी आयुर्वेद, एम् ए संस्कृत.

आयुर्वेद क्लिनिक्स @पुणे & नाशिक.

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Tuesday, 11 November 2025

Height Growth, Hair Problems, Bone Degenerative Diseases, Recurrent Heavy Bleeding & Yashti Laakshaa यष्टी लाक्षा Tablet

यष्टी लाक्षा टॅबलेट / Yashti Laakshaa

For Height Growth

Hair Problems, 

Bone Degenerative Diseases & 

Recurrent Heavy Bleeding

न मात्रामात्रमप्यत्र किञ्चिदागमवर्जितम्| 

Picture credit Google Gemini AI 

यष्टी & लाक्षा

1.

भग्नाधिकार मे उल्लेखित ये मुख्य दो द्रव्य है , जो आभ्यंतर प्रयोग के रूप मे उपयोगी है … 

2.

लाक्षा का सप्तधा बलाधान नही कर सकते, क्यू कि वह एक निर्यास है

3.

लाक्षा संधानकारी अग्रे द्रव्य है … कृमिजा संधाने अष्टांगहृदय उत्तर तंत्र अध्याय 40 श्लोक 48 से 58 

&

4.

यष्टी चरकोक्त महाकषायों मे सर्वाधिक बार रिपीटेड द्रव्य है 

5.

और यष्टी का अग्रेसंग्रह चरक सूत्र 25 मे सबसे दीर्घ = लंबा है … 

6.

मधुकं 1 चक्षुष्य 2 वृष्य 3 केश्य 4 कण्ठ्य 5 वर्ण्य 6 विरजनीय &  रोपणीयानां,

7.

अर्थात यह अस्थिधातुगामी है

और 

8.

यष्टी स्पष्ट रूप मे भग्नाधिकार मे उल्लेखित है

9.

यष्टी & लाक्षा का समप्रमाण मे बनाया हुआ म्हेत्रेआयुर्वेद MHETREAYURVEDA फार्मसी का यष्टी लाक्षा टॅबलेट अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है और केवल बोन डी जनरेशन ऐसे अस्थिक्षयजन्य वेदनाओं में ही नही अपितु

10.

दंतरोग केशपतन खालित्य पालित्य इसमे भी म्हेत्रेआयुर्वेद MHETREAYURVEDA फार्मसी का यष्टी लाक्षा टॅबलेट का प्रयोग पंचतिक्त या यष्टी गुडूची क्षीरपाक ग्रॅन्युल्स Granules के साथ लाभदायक होता है 

11.

इसका अनुकूल परिणाम हेमंत और शिशिर इन शीत ऋतुओ मे = नोव्हेंबर डिसेंबर जानेवारी फेब्रुवारी = मार्गशीर्ष पौष माघ फाल्गुन इस काल मे सर्वाधिक होने की संभावना रहती है !

12.

मात्र 6 से 12 सप्ताह (= मात्र 1.5 महिने से 3 महिने) के उपचार कालावधी मे इसमे अपेक्षित लाभदायक परिणाम प्राप्त होता है

13.

इसी प्रयोग से, जिस वय में हाईट बढना संभव 📶⏫️⤴️⬆️🔝🔜 है, किंतु फिर भी अपेक्षित हाईट वृद्धी नही हो रही है, ऐसे वय के युवाओं की युवतीयोंकी की हाईट अपेक्षित या उसे भी अधिक बढ सकती है

14.

अर्थात इसमे अस्थिक्षयकारी अस्थिवृद्धीविरोधक ऐसे अम्लरस कटुरस लवणरस के अन्नपदार्थों का, पर्युषित अन्न (अर्थात निशोषित अर्थात बासे स्टेल stale) , मैदा कॉर्नफ्लोअर बेकरी जन्य पदार्थों का तथा तंबाखू मद्य जैसे द्रव्य का सेवन पूर्णतः वर्ज्य होना आवश्यक होता है. साथ ही क्षीरौदन क्षीरघृत इनका अपानकाल में सेवन लाभदायक सिद्ध हो सकता है. 

15.

हाईट बढाने के औषध उपचार के प्रयोग कालावधी मे रनिंग करना जंपिंग करना स्किपिंग रोप का प्रयोग करना सिंगलबार पर लटकना यह प्रकार वर्ज्य करे! 

16.

एवं भी पांव, घुटने, कमर, मणके, व्हर्टेब्रा, लो बॅक, मन्या, इनकी वेदनाओ में तथा सायटिका लंबार स्पॉंडिलाॅसिस सर्वायकल स्पॉंडिलॉसिस स्कंध वेदना फ्रोजन शोल्डर इन सभी अस्थिक्षयजन्य वेदना मे, 

उपरोक्त रनिंग करना जंपिंग करना स्किपिंग रोप का प्रयोग करना सिंगलबार पर लटकना यह प्रकार वर्ज्य करे

तथा बॅडमिंटन टेबल टेनिस लॉन टेनिस क्रिकेट ट्रेकिंग फुटबॉल व्हॉलीबॉल स्टेप चढना उतरना दस किलो से अधिक वजन बोज भार वेट उठाना, यह जितना हो सके उतना बंद रखे

🤔⁉️ क्यूं  ?

हाईट बढना अर्थात फीमर और टीबिया इनकी length बढना. सिंगल बार पर लटकने से हाथ की length बढेगी , तो हाईट नही बढेगी और ना ही सिंगलबार पर लटकने से femur tibia length बढेगी


जम्पिंग इत्यादी व्यायाम करने से फिमर और टीबीया के बोन्स तथा उनकी संधी ऊपर अनावश्यक जर्क प्रेशर आता है और वही पर हाईट बढने के वय मे एपीफायसीस मे मार्जिन गॅप रहता है जिससे हाईट बढना संभव होता है

17.

यष्टी रोपण व शीत है 

18.

लाक्षा संधानकारी है 

19.

इसलिये अति रक्तस्राव मे भी स्तंभन के रूप मे इसका उपयोग होता है , जैसे कि योनिगत, नासागत, गुदगत, कंठगत (oesophagial varices), दीर्घकालीन री करंट पुनरावर्तक अतिप्रमाण रक्तस्राव मे भी यह उपयोगी है

20.

इन रक्तस्त्रावों में , यष्टी लाक्षा के साथ, यष्टी सारिवा यह भी सप्तधा बलाधान टॅबलेट उपयोगी होती है. विशेषतः क्षोभ शोक स्ट्रेस ऐसे वैचारिक भावनिक बौद्धिक प्रक्षोभक तथा बाह्य वातावरण के उष्ण तीक्ष्ण गुणयुक्त तथा कटु अम्ल लवण उष्णयुक्त आहारजन्य , दाह पाक आभ्यंतर व्रण ऐसे कंप्लेंट मे भी यष्टी सारिवा उपयोगी है

यष्टी सारिवा सप्तधा बलाधान टॅबलेट article blog लेख 

👇🏼

https://mhetreayurved.blogspot.com/2024/07/blog-post_6.html


21.
यह कोई मेरा एकाधिकार या मेरा अपना संशोधन /डिस्कवरी /रिसर्च /पेटंट ऐसा कुछ भी नही है. म्हेत्रेआयुर्वेद MhetreAyurveda ने इस टॅबलेट का महाराष्ट्र शासन की औषध निर्माण रजिस्ट्री में विधीपूर्वक रजिस्ट्रेशन किया हुआ है

जिन्हे इस प्रकार की टॅबलेट का अनुभव लेना हो, तो वे स्वयं इस प्रकार का प्रयोग करके देखे. टॅबलेट बनाकर इसका प्रयोग करे. जिन्हे प्रयोग के लिए / अभ्यास की दृष्टि से / शास्त्र अनुभव के रूप मे, इस प्रकार की टॅबलेट का उपयोग करके देखना है, वे हमे संपर्क कर सकते है या अपने यहां स्थानिक स्तर पर स्वयं टॅबलेट का निर्माण करके उसका उपयोग करके इस अनुभव को स्वयं ले सकते है. 

🖊डिस्क्लेमर/Disclaimer : उपरोक्त कल्प क्वाथ योग टॅब्लेट का परिणाम; उसमे सम्मिलित द्रव्यों की क्वालिटी, दी हुई मात्रा, कालावधी, औषधिकाल, ऋतु, पेशंट की अवस्था इत्यादि अनेक घटकों पर निर्भर करता है. 






Degenerative bone disease & Rasona/Lashuna Granules

Degenerative bone disease & Rasona/Lashuna Granules 

प्रभंजनं जयति लशुनः 🧄🧄

Picture credit Google Gemini AI 

"प्रभंजनं जयति लशुनः” का अर्थ है , जो भंजन करने मे प्रकर्षेण = अतिशय समर्थ है = अस्थियों का डीजनरेशन Degenerative bone  जिसके कारण अत्यधिक गति से होता है, शीघ्र गति से, अल्पकाल मे होता है … क्योंकि अस्थि और वात का आश्रयाश्रयी भाव संबंध = परस्पर विरोधी है! वात बढेगा, तो अस्थी घटेगा!!

इसमें लशुन क्षीरपाक Granules ग्रॅन्युल्स दिया जाये तो अधिक कार्मुक होता है 

लशुन भग्नसंधानकारी केश्य और बल्य है अर्थात यह अस्थिधातुगामी और बलदायक है

लशुनो भृशतीक्ष्णोष्णः कटुपाकरसः सरः॥

हृद्यः केश्यो गुरुर्वृष्यः स्निग्धो रोचनदीपनः। 

भग्नसन्धानकृद्बल्यो 

मेरे स्वयं के अनुभव के अनुसार 3000 से भी अधिक रुग्णों मे वेदनाशमन के लिए अत्यंत शीघ्र, अल्पकाल मे लाभदायक परिणामकारक सिद्ध हुआ है 

Degenerative bone disease, most commonly osteoarthritis, is a chronic condition where the protective cartilage in joints breaks down over time, leading to bone-on-bone friction, pain, and stiffness. While it can affect any joint, it frequently impacts the hands, knees, hips, and spine. Symptoms include grinding or creaking, instability, and muscle weakness. 

गृध्रसी = सायटिका का भी मुख्य कारण नर्व्ह कॉम्प्रेशन है 

नर्व्ह कॉम्प्रेशन का मुख्य कारण vertebrae/ disc Degeneration जिसे अस्थि तरुणास्थि क्षय के रूप मे समझ सकते है

और ऐसे डीजनरेटेड अस्थि को भग्नाधिकार के औषधों से अपुनर्भवरूप मे ठीक किया जा सकता है , जो पेशंट हमने आज से 10 15 20 22 साल पहले किये ठीक है, वे आज भी अपने पैरो पर खडे है & वेदना मुक्त स्थिती मे कार्यरत है, वो भी बिना किसी ऑपरेशन सर्जरी के, बिना बेल्ट लगाये, बिना कॉलर लगाये, बिना knee cap / knee brace के

नर्व्ह कॉम्प्रेशन का कारण डिस्क डीजनरेशन है जिसे अस्थि क्षय व भग्नाधिकार के अनुसार विशेष रूप मे तरुणास्थी अधिष्ठान मानकर समजा जा सकता है इसके लिये दो मुख्य औषध है 

*लशुन क्षीरपाक (Granules) & यष्टी लाक्षा

इसके साथ हि चरकसूत्र २८ और वाग्भट सूत्र 11 मे आये हुये तिक्त रस द्रव्य = यष्टी गुडूची ग्रॅन्युल्स Granules or पंचतिक्त ग्रॅन्युल्स Granules के रूप मे दिये जाये तो सहाय्यक उपयोगी होता है, किंतु यह दीर्घकाल देना आवश्यक होता है, जो डीजनरेशन की परिस्थिती, पेशंट का वय /अवस्था , उसके एडिक्शन , उसके व्यवसाय उसके आहार इन सभी पर निर्भर होता है 

जो प्रेझेंटिंग कंप्लेंट, अत्यंत वेदना, चलने मे अक्षमता, यह होती है … उसके लिए लशुन क्षीरपाक (Granules) अत्यंत शीघ्र लाभदायक परिणाम देते है 


🔥यह औषध उष्ण तीष्ण कटुरस युक्त होने के कारण क्षीर & घृत के साथ देना अधिक उचित तथा हितकारक होता है ✅️

चरकोक्त वातहर अग्रे संग्रह ... तैल, बस्ति, रास्ना (& एरंडमूल) इन सभी की तुलना में ... *"वाग्भटोक्त अग्रे संग्रह"*... *"प्रभंजनं जयति लशुनः"* यह *लशुन क्षीरपाक ग्रॅन्युल्स* के रूप मे Highly Effective, Easily Available, Affordable, palatable, transportable, Fast Result giving होने के कारण *सर्वतोपरी श्रेष्ठ* है

1.

लशुन वैसेभी वातके सभी आवरणों मे श्रेष्ठ द्रव्य है

2.

लशुन भग्नसंधानकारी स्निग्ध बल्य होने के कारण, वातवृद्धिजन्य धातुक्षयजन्य विकारो मे भी श्रेष्ठ है

3.

लशुन; कटुरसमे अपवाद द्रव्य & श्रेष्ठ द्रव्य है, वृष्य है, वातकोपकारी नही है, स्रोतो विवरण अर्थात स्रोतोरोधनाशक है, बंधच्छेदक है ... इसीलिए कटुरस अतियोगजन्य कटी पृष्ठ वेदना (Low back, spine & neck Pain) में उपशमदायक है

4. लशुन स्वयं *रसायन* है

5. इसीलिए लशुन को *महौषध* यह भी नाम है

So, After huge, consistent and ever growing Response to The BOSS VachaaHaridraadi... get ready to Welcome, yet another, Highly Potent Samhitokta Medicine from MhetreAyurveda ... *Lashuna (Rasona) Granules ... प्रभंजनं जयति लशुनः*

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1.

वातहरों में सर्वश्रेष्ठ तो बस्ति है, जिसको देना और पेशंट के लिये लेना, दोनोही समय अपहारक , थेरपिस्ट पर निर्भर , अनेक बार "नॉन ॲफॉर्डेबल" , एक ही बस्ती मे काम न होना, घर छोडकर क्लिनिक तक आना जाना और फिर भी उपशम के गॅरंटी न होना, ऐसा बस्ती के बारे मे ड्रॉबॅक्स या लिमिटेशन्स होते है 

2.

फिर वातहर मे दूसरा सर्वश्रेष्ठ तैल है, जिसकी डिस्पेन्सिबिलिटी और जिसकी ट्रान्सपोर्टिबिलिटी , परिणाम की गॅरंटी इसके बारे मे दुरवस्था है 

3.

तिसरा वातहर सर्वश्रेष्ठ द्रव्य रास्ना है, जिसकी संदिग्धता बहुत अधिक है और वातजन्य संप्राप्ती के जगह, आमजन्य संप्राप्ती मे अधिक उपयोगी है 

4. चौथा वातहर श्रेष्ठ द्रव्य एरंडमूल कहा गया है किंतु उसकी भी उपयोगिता उतनी सिद्ध नही है और उपलब्धता भी दुष्कर है और एरंड तेल तो और भी व्यापत् कारक है ... और एरंड तेल की ट्रान्सपोर्टेबिलिटी दुर्गंध और उसकी टेस्ट ये भी सारा पेशंट के लिये उतना सुकर नही होता है. और वैसे भी ये तीक्ष्ण उष्ण है और उपविष है अर्थात विष सदृश्य है

ऐसी स्थिति मे जिसका उल्लेख चरक मे वातहर अग्रे द्रव्य में नही है, किंतु …

वाग्भट ने जिसे वातहर द्रव्य मे अग्रद्रव्य के रूप मे प्रशस्तीकारक द्रव्य के रूप मे उल्लेख किया है वह है “प्रभंजनं जयति लशुन:” … लशुन/रसोन एक ऐसा द्रव्य है जो हर घर में उपलब्ध है, बारा महिने उपलब्ध है, प्रायः वर्ष मे एखाद महिना छोड दिया तो ॲफोर्डेबल है और इसका उपयोग करना बस्ती/तैल/रास्ना/एरंड मूल की तुलना मे सुकर है और यदि म्हेत्रेआयुर्वेद MHETREAYURVEDA फार्मसी द्वारा निर्मित लशुन क्षीरपाक ग्रॅन्युल्स दिया जाये, तो ये और भी सुकर और शीघ्र परिणामदायक होता है 

इसकी वेदनाशमन का इफेक्ट बढाने के लिए, पोटेन्सी बढाने के लिए, लशुन के साथ साथ आर्द्रक 🫚 का संमेलन करके, “रसोन🧄 आर्द्रक 🫚 क्षीरपाक ग्रॅन्युल्स ” बनाया है, जो ये दोनो कटुरस के श्रेष्ठद्रव्य है, पिप्पली को निकाल दिया जाये तो !

पिप्पली को उबालना यह शास्त्र को उतना संमत नही है, पिप्पली अनेक अवलेहो में संपूर्ण अग्निसंस्कार पश्चात के, प्रक्षेप चूर्ण के रूप मे आती है. इसलिये म्हेत्रेआयुर्वेद MHETREAYURVEDA कटुरस के तीन श्रेष्ठ द्रव्य मे से, पिप्पली को हटा कर “रसोन 🧄आर्द्रक 🫚 क्षीरपाक ग्रॅन्युल्स” बनाया है,

जो वेदनाशामक दुरालभादि या द्रुतविलंबितगो या गृध्रसी नाशक सप्तधा बलाधान टॅबलेट के साथ गरम पानी/दूध मे एक चमचा मिला कर , प्राग्भक्त = भोजनपूर्व = अपान काल मे दिया जाये, तो वेदनाशमन का कार्य प्रायः अतिशय शीघ्र होता है 

⛔️🚫❌️कभी कभी क्षीर का बहुत उद्वेग उत्क्लेश होता है,  क्षीर का पचन नही होता है, कुछ लोगों को छर्दि हृल्लास होता है, कुछ लोगों को ब्लोटिंग होता है, कुछ लोगों को अच्छा दूध नही मिल पाता, कुछ लोगों को दूध लेने से भी ॲसिडिटी गॅस होता है, कुछ लोगों को विरेचन हो जाता है, कुछ लोगों को लॅक्टोज इन्टॉलरन्स होता है, तो जो लोग क्षीरपाक नही ले सकते हो, ❌️🚫⛔️ ...

वे रसोन आर्द्रक के ग्रॅन्युल्स गरम पाणी के साथ ले सकते है 

या उससे भी अधिक अच्छा सतीनज यूष अर्थात सूखे मटर वाटाणा peas का, पानी मे उबाल कर, उनको पक जाने तक, पानी मे उबालना और सूखे मटर वाटाणा peas पक जाने के बाद भी, जो पानी शेष रहे जायेगा वह यूष के रूप मे एक चमचा घृत के साथ और एक चम्मच रसोन आर्द्रक ग्रॅन्युल्स के साथ, यह यूष, एक चम्मच घृत के साथ अपानकाल मे लेना. 

यह जिनको क्षीर का असहत्व है, द्वेष है उनके लिये सतीनज यूष उपयोगी होता है सतीनज यूष का उल्लेख भग्नाधिकार मे सुश्रुत मे हुआ है, वाग्भट मे भी हुआ है


40 वय के पश्चात भग्न साध्य नही है, ऐसे सुश्रुत ने उसके भग्न अध्याय मे लिखा है 

और हम भी देखते है की 40 वय के बाद बाथरूम मे फिसलकर कोई व्यक्ति गिर जाता है , तो उसका सबसे जो दुर्बल अस्थि/संधि है, वह क्लॅविकल नही फ्रॅक्चर होता है , किंतु बल्कि उसका सबसे सामर्थ्यवान सबसे स्ट्रॉंग और सबसे डीप ऐसा जो अस्थि/संधी है वह फीमर हेड टूट जाता है!!! क्यूं कि, फीमर हेड अर्थात जघन यह अस्थिवहस्त्रोत का मूल है , तो वही से यह विकृती शुरू होती है और अगर वही से इसको ठीक करना है , तो ऐसे भग्नकारी वात को, जीतने वाले लशुन का उपयोग करना यह बुद्धिमानी है 


इसलिये फिमर हेड मे जिसकी संप्राप्ती है ऐसे AVN मे भी लशुन क्षीरपाक ग्रॅन्युल्स Granulesद्रुतविलंबितगो या वेदनाशामक दुरालभादि या गृध्रसी नाशक, इन सप्तधा बलाधान औषधी कल्पों का अच्छा उपयोग होता है ... इसके साथ ही यष्टी लाक्षा टॅबलेट / यष्टी गुडूची ग्रॅन्युल्स / पंचतिक्त ग्रॅन्युल्स इनका भी यथा अवस्था उत्तम लाभ प्राप्त होता है


इसके साथ साथ अस्थि क्षय का सूत्र है उसमे से तिक्तद्रव्य क्षीरपाक के रूप मे यदि पंचतिक्त Granules या यष्टी गुडूची Granules का प्रयोग किया जाये तो ये और भी शीघ्र निश्चित लाभदायक परिणाम देता है, वेदनाशमन के लिए भी और दीर्घकालीन अपुनर्भव यश के लिए भी!

इसके साथ, गृध्रसी नाशक सप्तधा बलाधान टॅबलेट / द्रुत विलंबित गो सप्तधा बलाधान टॅबलेट & दुरालभादि वेदनाशामक सप्तधा बलाधान टॅबलेट इनका भी अवस्थानुरूप उपयोग होता है 


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