Friday, 1 August 2025

स्त्री : आयुर्वेदात 'नवांग' म्हणजे 'नववे' अंग किंवा एक 'नवीन' अंग! ... स्त्री !!!

आयुर्वेदात 'नवांग' म्हणजे 'नववे' अंग किंवा एक 'नवीन' अंग! ... स्त्री !!!

जसे काय चिकित्सा या मुख्य आणि व्यवहारात अस्तित्वात असलेल्या अंगाप्रमाणेच, बाल आणि वृद्ध यांच्यासाठीही अष्टांगांमध्ये स्थान आहे, तसेच खरंतर ते "स्त्री" साठी सुद्धा असायला हवे! 



हेमाद्रि 

👇🏼

*1. कायशब्देन "सर्वावस्थं + सर्वावयवं" च शरीरं गृह्यते, ... 

2. बालादिशब्दैः तस्य एव "अवस्था"विशेषा लक्ष्यन्ते। ... 

3. ऊर्ध्वाङ्गं तु "अवयव"विशेषः।* 


बालः प्रथमं "वयः"

जरा पश्चिमं "वयः" !!

वृषः स्त्रीप्रसङ्गित्वम्। 

👆🏼हेमाद्रि 


काय चिकित्सा म्हणजे सर्व अवस्था आणि सर्व अवयव!


उर्ध्वांग म्हणजे एक अवयवविशेष. 


बाल आणि वृद्ध (म्हणजे जरा म्हणजे रसायन) हे अवस्था विशेष किंवा वयोविशेष ...


तसं स्त्री हे 'अवस्था' विशेष, 'अवयव' विशेष आणि वय विशेष अशा सर्वार्थांनी *एक स्वतंत्र अंग* असायला हवं म्हणजे खरंतर अष्टांग ऐवजी नवांग आयुर्वेद असायला हवा ... पण नाही 'अष्टांगच' असायला हवेत, असं थोडं orthodox असेल तर मग आताच्या प्रस्थापित आठ अंगण पैकी अन्य कुठल्यातरी एका अंगाचा समावेश, दुसऱ्या कुठल्यातरी अंगात, आताच्या काळात तरी समावेश/inclusion करायला हवा 

किंवा 

एखादे अंग जे व्यवहारात अस्तित्वात नाही, ते "वगळायला" हवं ...

म्हणजे स्त्री = (/योनि/स्तन/गर्भाशय/प्रसूति/सूतिका) हे खऱ्या अर्थाने "अस्तित्वात असलेले आवश्यक असलेले" ... एक 'नवांग' म्हणजे 'नववे' अंग किंवा 'नवीन' अंग आयुर्वेद क्षेत्रात प्रस्थापित होईल ! आणि या अंगाचे मुख्य औषध मुस्तादि गण सप्तधा बलाधान टॅबलेट हे असेल "योनिस्तन्यामयघ्ना" ... 😀


मुस्तादि गण : स्त्री विशिष्ट विकारों में उपयोगी अत्यंत वीर्यवान कल्प!

Invictus : earnest Hemingway 

I am the captain of my soulमुस्तावचाग्निद्विनिशाद्वितिक्ता


भल्लातपाठात्रिफलाविषाख्याः। 


कुष्ठं त्रुटिं हैमवती च योनि ...


स्तन्यामयघ्ना मलपाचनाश्च॥


विशेष रूप से कफ प्रधान या शीतगुणजन्य स्निग्ध गुरु गुणजन्य क्लेद प्रधान पृथ्वी जल प्रधान स्त्री विशिष्ट विकारोमे उपयोगी अत्यंत वीर्यवान कल्प! 


https://mhetreayurved.blogspot.com/2024/10/blog-post_26.html

अष्टांग म्हणजे अवयव विशेष किंवा अवस्था विशेष या संदर्भाने सांगितलेली चिकित्सा काय चिकित्सा म्हणजे सर्व अवयव आणि सर्व अवस्था किंवा उपरोक्त विशेष अवयव विशेष अवस्था सोडून अन्य सर्व चिकित्सा


मग स्त्री अवयव विशेष किंवा अवस्था विशेष म्हणून वेगळं अंग स्वीकारणे, नव्यानेच स्थापन करणे, उचित व आवश्यक आहे ...जर बाल आणि वृद्ध हे सुद्धा विशेष अंग म्हणून सांगितले आहेत, तर ... 


एखाद्या विषयाबाबत मतभेद असले, तरी त्या विषयामध्ये त्या क्षेत्रामध्ये निपुणतेने कुशलतेने सक्षमपणे यशस्वीपणे कार्यरत असणाऱ्या व्यक्ती/संस्था या बद्दल निरंतर आदर आहेच!💐


1 comment:

  1. महोदय, सादर प्रणाम। 💐
    आपने “स्त्री” को आयुर्वेद के एक स्वतंत्र नवम अंग के रूप में स्थापित करने का जो विचार रखा है, वह निश्चित रूप से चिंतन योग्य है। स्त्रीरोग एवं प्रसूति के क्षेत्र को आयुर्वेद में अधिक व्यवस्थित, आधुनिक संदर्भों के अनुरूप और स्वतंत्र पहचान देने की आवश्यकता पर चर्चा होनी ही चाहिए।
    लेकिन एक मूलभूत प्रश्न यहाँ उपस्थित होता है—
    यदि बाल, वृद्ध, ऊर्ध्वांग आदि को अलग-अलग विशेषताओं के आधार पर अष्टांग आयुर्वेद की संरचना में स्थान दिया गया, तो फिर स्त्री के लिए अलग अंग क्यों नहीं?
    और यदि आज के संदर्भ में स्त्रीरोग, गर्भाशय-विकार, योनि-विकार, स्तन-विकार, गर्भधारण, गर्भावस्था, प्रसूति तथा सूतिकावस्था जैसे विषयों का इतना व्यापक चिकित्साशास्त्रीय क्षेत्र है, तो इसे केवल किसी अन्य अंग के भीतर समाहित करके देखने के बजाय एक स्वतंत्र शाखा के रूप में विकसित करने का विचार अनुचित भी नहीं कहा जा सकता।
    लेकिन यहाँ एक दूसरी बात भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
    चरक, सुश्रुत, वाग्भट आदि आचार्यों ने स्त्रीरोग और प्रसूति का वर्णन किया ही नहीं था, ऐसा कहना उचित नहीं होगा। उनके संहिताओं में स्त्रीरोग, गर्भविज्ञान, गर्भावस्था, प्रसव, सूतिकाकाल तथा स्त्री-विशिष्ट विकारों का पर्याप्त विवेचन मिलता है।
    इसलिए प्रश्न यह अधिक उचित है कि—
    जब आचार्यों को स्त्री-शरीर, गर्भ, प्रसूति और स्त्री-विशिष्ट व्याधियों का इतना ज्ञान था, तब उन्होंने “स्त्री चिकित्सा” को अष्टांग आयुर्वेद के स्वतंत्र नवम अंग के रूप में क्यों स्थापित नहीं किया?
    संभवतः इसका उत्तर उस समय की आयुर्वेदिक वर्गीकरण-पद्धति, चिकित्सा-विषयों की परस्पर व्याप्ति और तत्कालीन चिकित्सकीय आवश्यकताओं में छिपा हुआ है। उस समय “स्त्री” को केवल एक स्वतंत्र anatomical category के रूप में नहीं, बल्कि गर्भाधान से लेकर गर्भावस्था, प्रसव, सूतिका तथा स्त्री-विशिष्ट विकारों तक एक विशेष clinical domain के रूप में देखा गया था।
    आज परिस्थिति बदल चुकी है।
    आज स्त्रीरोग एवं प्रसूति विज्ञान स्वयं एक अत्यंत विशाल और विशिष्ट चिकित्सा-विषय है। अतः आधुनिक आयुर्वेद में इसे अधिक स्वतंत्र, व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से विकसित करने की आवश्यकता पर गंभीर विचार होना चाहिए।
    हाँ, एक बात पर मैं आपसे पूर्णतः सहमत नहीं हो पाता—
    अष्टांग आयुर्वेद में से किसी एक अंग को हटाकर उसके स्थान पर “स्त्री चिकित्सा” को रखना, केवल इसलिए कि वर्तमान समय में कोई शाखा व्यवहार में कम दिखाई देती है, उचित समाधान नहीं होगा। प्रत्येक अंग के पीछे आयुर्वेद की अपनी शास्त्रीय भूमिका है। किसी अंग को हटाने के बजाय उसके अंतर्गत आने वाले विषयों की वर्तमान उपयोगिता और परस्पर सीमाओं को पुनः परिभाषित करना अधिक उचित होगा।
    और यदि “नवांग आयुर्वेद” की संकल्पना करनी ही है, तो वह केवल नाम बदलने तक सीमित न रहकर—
    स्त्रीरोग + प्रसूति + गर्भविज्ञान + स्तनरोग + सूतिकाविज्ञान + स्त्री-विशिष्ट शरीरक्रिया एवं विकृति-विज्ञान
    इन सभी को एक स्वतंत्र, व्यवस्थित और प्रमाणाधारित चिकित्सा-विषय के रूप में विकसित करने की दिशा में होनी चाहिए।
    जहाँ तक “मुस्तादि गण” जैसे योगों का प्रश्न है, उनके स्त्री-विशिष्ट उपयोगों पर स्वतंत्र रूप से चर्चा एवं शास्त्रीय प्रमाणों का परीक्षण किया जा सकता है; लेकिन किसी औषधि की उपयोगिता के आधार पर संपूर्ण चिकित्सा-शाखा का वर्गीकरण निर्धारित करना उचित नहीं होगा।
    अंततः—
    मतभेद होना स्वाभाविक है, परंतु आचार्यों की चिकित्सा-दृष्टि को आज के आधुनिक वर्गीकरण के आधार पर सीमित समझना भी उचित नहीं है।

    विचार निश्चित रूप से स्वागत योग्य है।
    मतभेद हो सकते हैं, परंतु विषय के प्रति निष्ठा और परस्पर सम्मान बना रहना चाहिए। 💐

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