Tuesday, 9 July 2024

*कल्पसिद्धौ च वाग्भटः* = अर्थात *औषधे वाग्भटः श्रेष्ठः* = *औषध हि आयुर्वेद है*

*कल्पसिद्धौ च वाग्भटः* = अर्थात 

*औषधे वाग्भटः श्रेष्ठः*


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*औषध हि आयुर्वेद है*

अष्टांग हृदय कल्पस्थान 6 + 

शार्ङ्गधर पूर्व खंड 1 + मध्यम खंड 1 से 9 + 

सुश्रुत चिकित्सा 31 & 

चरक कल्प 12

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एक ज्ञानयज्ञ = 90 लेक्चर 

सुस्वागतम् 🪔

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*संयोजक : वैद्य हृषीकेश बाळकृष्ण म्हेत्रे, 

एमडी आयुर्वेद संहिता, एमए संस्कृत, 

आयुर्वेद क्लिनिक @ पुणे & नाशिक ...

 9422016871*

त्रिस्कंध आयुर्वेद मे हेतू और लक्षण यह रुग्ण संबंधित है. 

बाकी बचा अंतिम स्कंध = औषध स्कंध, 

यही वैद्य का कर्तृत्व है और 

*औषध हि आयुर्वेद की पहचान / आयडेंटिटी + अस्तित्व + प्रयोजन है*. 

_चरकोक त्रिविध औषध मे से, दैवव्यपाश्रय और सत्त्वावजय यह अन्यक्षेत्रों के तद्विद्य आचार्य का अधिकार है_ 


*आयुर्वेद का अधिकार युक्ती व्यपाश्रय चिकित्सा इतना हि है*

और वह सर्वथैव या बहुतांश रूप मे औषध पर ही निर्भर है , इसलिये ...


*औषध हि आयुर्वेद है*


कर्ता हि करणैर्युक्तः कारणं सर्वकर्मणाम् ॥

चरक संहिता


कर्ता, *योग्य "साधनों" के साथ ही* सभी कर्मों का कारण होता है. आयुर्वेदिक चिकित्सा क्षेत्र में कर्ता भिषक् अर्थात वैद्य है.


इस वैद्य का करण अर्थात साधन = *भेषज अर्थात औषध* है.


वैद्यके द्वारा आयुर्वेद का चिकित्सकीय लाभ पेशंट तक पहुंचाने का *साधन औषध ही है*. 


इस कारण से *औषध ही आयुर्वेद है*, ऐसा कहना अनुचित नही है.


समाज मे भी आयुर्वेद शास्त्र की पहचान = आयडेंटिटी यह वैद्य न होकर , *औषध ही है यह भूलना नही चाहिये* 


संहितोक्त औषध का उपयोग करके रिझल्ट नही आते है(?), इस भ्रम से, अनेक गणमान्य ज्येष्ठ एवं समकालीन यशस्वी लोकप्रिय प्रस्थापित वैद्य भी, आयुर्वेद मे है हि नहीं, ऐसे रसशास्त्र के कल्पों को अगतिक होकर शरण जाते है, और रसशास्त्र भी आयुर्वेद हि है, ऐसा स्वयं का दैन्ययुक्त समाधान false piltiful justification करने का प्रयास करते है.


उसका एकमात्र कारण संहितोक्त औषध, *संहितोक्त मात्रा मे दिये नही जाते*, इतना हि है.


*मात्राकालाश्रया युक्तिः*, सिद्धिर्युक्तौ प्रतिष्ठिता ।


औषध की सिद्धी अर्थात सुनिश्चित यश, यह युक्तीपर निर्भर है और यह युक्ती *औषध की "उचित मात्रा + योग्य औषधी काल अर्थात ड्यूरेशन" इस पर भी निर्भर है. Dose & Duration ✅️


इसी कारण से औषध को *"करण"* कहा गया है.


करणं पुनर्भेषजम् । 

भेषजं नाम तद्यदुपकरणायोपकल्पते भिषजो धातुसाम्याभिनिर्वृत्तौ प्रयतमानस्य 


औषध योजना तथा औषध निर्माण का सर्वमान्य ग्रंथ शार्ङ्गधर है, जो लघुत्रयी मे अपना सन्मानस्थान प्राप्त किया हुआ है.


शार्ङ्गधर के प्रथम अध्याय मे मान परिभाषा तथा,

शार्ङ्गधर के मध्यम खंड के प्रथम 9 अध्याय,

इनमें, मूलभूत आयुर्वेद भैषज्य कल्पना का सविस्तर वर्णन प्राप्त होता है.


इस सभी ज्ञान का *मूलाधार वाग्भट कल्पस्थान अध्याय 6* अर्थात *द्रव्यकल्प* अध्याय है.


इसलिये ...

*कल्पसिद्धौ च वाग्भटः* = *औषधे वाग्भटः श्रेष्ठः*

इस शीर्षक से 100+ लेक्चर का ज्ञानयज्ञ है.


इसमे ...

1. वाग्भट कल्पस्थान अध्याय 6 अर्थात द्रव्यकल्प अध्याय तथा 

2. शार्ङ्गधर प्रथम खंड अध्याय 1 और 

3. शारंगधर मध्यमखंड अध्याय 1 से 9 , एवं च 

4. सुश्रुत चिकित्सा 31 और 

5. चरक सिद्धी 12 ...

यहां उल्लेखित 

मान परिभाषा का तथा 

भैषज्य कल्पना के 

मूलभूत सिद्धांतों का प्रकाशन 

सुबोध रूप में किया जायेगा.


वाग्भट कल्पस्थान 6 के साथ हि,

अष्टांग हृदय के अन्य सभी स्थानों पर प्रस्तुत 100+ लेक्चर का फ्री एक्सेस भी इस उपक्रम मे प्राप्त होगा.


इस 100 lectures के ज्ञानयज्ञ मे सम्मिलित होने के पश्चात,

प्रत्येक वैद्य सन्मित्र को...

*संहितोक्त कल्पों से हि,*

_रसशास्त्र के कल्प को शरण गये बिना हि,_

अपने पेशंट को ...

सुरक्षित 

प्रामाणिक 

परिणामकारक 

शीघ्र फलदायी 

अल्पमात्रोपयोगी 

अरुचिविरहित 

सुलभ 

सुकर 

सुवाह्य (carriable पोर्टेबल)

औषध योजना करने का आत्मविश्वास प्राप्त होगा. 


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